सोमवार, 23 अप्रैल 2012

साम्प्रदायिक दंगे 2011 -2


मेरठ में 25 अप्रैल को एक गिलास ठंडा पानी सांप्रदायिक हिंसा का सबब बन गया। मेरठ के नजदीक काज़ीपुर गाँव के दो रहवासी गाँव की छोटी मस्जिद में पहुँचे और पीने के लिए पानी माँगा। उनसे कहा गया कि वे मस्जिद प्रांगण में लगे नल से पानी पी सकते हैं। परंतु उन्होंने ठंडे पानी की माँग की। जब उनसे यह कहा गया कि ठंडा पानी मस्जिद में उपलब्ध नहीं है तो वे मस्जिद के इमाम और वहाँ मौजूद अन्य लोगों पर टूट पड़े। उन्होंने मस्जिद में पढ़ रहे कुछ बच्चों की भी पिटाई कर दी। इमाम और उनके साथियों की रपट लिखने से पुलिस ने साफ इंकार कर दिया। इसके बाद मुसलमानों की एक भीड़ ने थाने को घेर लिया। पथराव हुआ जिसमें सिटी मजिस्ट्रेट और कुछ पुलिस अधिकारी घायल हुए।
इसके बाद भीड़ ने दुकानों और मकानों को निशाना बनाना शुरू किया। कई पुलिस चौकियों को आग के हवाले कर दिया गया। पुलिस ने बतौर सावधानी शहर के सभी सरकारी और निजी स्कूलों को बंद करवा दिया। यह सब हुआ केवल एक गिलास ठंडे पानी की खातिर।
मेरठ का सांप्रदायिक हिंसा का लंबा इतिहास है। सन 1987 में वहाँ हुई जबरदस्त हिंसा के बाद पी0ए0सी0 जवानों ने 54 मुस्लिम युवकों को उनके घरों से निकाल कर गोली मार दी थी। उनके शवों को हिण्डन नहर में फेंक दिया गया था।
अगली घटना भी उत्तरप्रदेश के ही मुरादाबाद में हुई। कुछ पुलिसवाले मुल्ज़िम की तलाश में एक मुस्लिम घर में घुसे। मुल्ज़िम को वहाँ न पाकर वे घरवालों से दुव्र्यवहार करने लगे। उन्होंने नूरजहाँ नामक 10 साल की बच्ची के हाथ से कुरान छीनकर उसके बिस्तर पर पटक दिया। जब उन्होंने बिस्तर पलटा तब कुरान नीचे गिर गई। इससे मुसलमान नाराज हो गए। इसे कुरान का अपमान बताते हुए मुसलमानों की भारी भीड़ इकट्ठा हो गई और पुलिसवालों के विरुद्ध कार्यवाही की माँग करने लगी। पुलिस बारबार भीड़ को तितरबितर होने के लिए कहती रही और भीड़, पुलिसवालों के खिलाफ कार्यवाही की माँग दोहराती रही। भीड़ ने पुलिस थाने पर भी हमला किया और पुलिसवालों की गाड़ियों को आग लगा दी। पुलिसकर्मियों पर पत्थर भी फेंके गए। जवाब में गुस्साए पुलिसकर्मियों ने भीड़ की जम कर पिटाई की। पुलिस ने गोलियाँ भी चलाईं जिसमें दो मुसलमान और पेट्रोल पंप पर काम करने वाला एक हिन्दू गंभीर रूप से घायल हो गए। शहर में कफ्र्यू लगाया गया। निकटवर्ती गाँवों के रहवासियों ने पुलिस की बर्बर कार्यवाही और गिरफ्तारी के डर से आसपास के जंगलों में शरण ली।
उस्मानिया विश्वविद्यालय की ए0बी0व्ही0पी0 शाखा की बदौलत तेलंगाना जैसे क्षेत्रीय आंदोलन का भी साम्प्रदायिकीकरण हो गया है। इसी सांप्रदायिकीकरण का नतीजा था कि आंध्र प्रदेश के आदिलाबाद जिले में 8 जुलाई को छः मुसलमानों को जिंदा जला दिया गया। यह लोमहर्षक घटना आंध्रप्रदेश व महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित एक गाँव में हुई। शरारती तत्वों ने जिले के वाटोली गाँव में अल्पसंख्यकों के एक घर में आग लगा दी। निकटवर्ती भैनसा नगर का साप्रंदायिक हिंसा का लंबा इतिहास है इसलिए सरकार काफी सावधान थी। वाटोली गाँव में मारे गए लोगों में महबूब खान, नोमान, अरसालन, रिजवान व साफिया बेगम के अलावा दो वर्षीय टूबा महोश भी शामिल थे।
दिनांक 12 जुलाई को आगरा के मनटोला इलाके में साम्प्रदायिक हिंसा भड़क उठी। एक बीमार बकरी को अस्पताल ले जा रहे ट्रक से दूसरे समुदाय के कुछ लोगों को मामूली चोटें आईं। इसके बाद शुरू हुए विवाद ने जल्द ही दोनों समुदायों के सदस्यों के बीच हिंसक झड़पों का रूप ले लिया। पत्थरबाजी शुरू हो गई। दुकानों, मकानों और गाड़ियों में आग लगा दी गई। कुछ लोगों ने गोलियाँ भी चलाईं। जवाब में पुलिस ने भी गोलीबारी की। ड्यूटी पर तैनात डी0आई0जी0 को गोली लगतेलगते बची। लोग अपने घरों की छतों से गोलियाँ चला रहे थे। भारी संख्या में हथियारबंद पुलिस व पी0ए0सी0 के जवानों की तैनाती के बाद बड़ी मुश्किल से दंगे पर नियंत्रण पाया जा सका।
-डा. असगर अली इंजीनियर
क्रमश:

1 टिप्पणी:

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

नागरिक और प्रशासन, सभी को अपने अधिकारों के साथ अपने फ़र्ज़ का भी ध्यान रखना चाहिए।

हिंसा से समाज का तो भला नहीं होता लेकिन जो लोग सदियों से अवाम को ग़ुलाम बनाए हुए हैं। उन्हें इसका लाभ ज़रूर मिलता है। लोग हिंदू, मुस्लिम और जाति के आधार पर बंटते हैं तो कमज़ोर वर्गों के लिए न्याय की लड़ाई कमज़ोर पड़ती है।
मुसलमान भी जब तक केवल अपने लिए लड़ते रहेंगे, कामयाब न होंगे।
हरेक शोषित के लिए उन्हें खड़ा होना पड़ेगा और इसके लिए भी हिंसा की ज़रूरत नहीं है बल्कि सबको आपस में एक दूसरे का सम्मान करने और आपस में सहयोग करने के जज़्बे को जगाने की ज़रूरत है।
कमज़ोर कमज़ोर आपस में जुड़कर खड़े होंगे तो ज़ालिम बिना लड़े ख़ुद ही कमज़ोर हो जाएगा।

पुलिस और पीएसी से या सेना से टकराना बेकार है।
इस लड़ाई का कोई अंत नहीं है।
दुनिया में ताक़त ही राज करती है।
कोशिश करनी चाहिए कि ताक़त न्याय करने वालों के हाथों में ही पहुंचे।
इसके लिए जागरूकता के लंबे आंदोलन की ज़रूरत है क्योंकि इस तरह के लोग न इस पार्टी में हैं और न उस पार्टी में।
समस्या को शॉर्ट कट तरीक़े से हल करने की कोशिश में कमज़ोर लोग दमन का शिकार होंगे और वे पहले से भी ज़्यादा बर्बाद होकर रह जाएंगे।
See
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