बुधवार, 25 अप्रैल 2012

साम्प्रदायिक दंगे 2011 -4

राजस्थान के भरतपुर जिले के गोपालग में 14 सितम्बर को सन 2011 का सबसे बड़ा साम्प्रदायिक दंगा हुआ। हिंसा में 11 लोग मारे गए जिनमें से 9 की मौत मस्जिद के अंदर पुलिस द्वारा गोली चलाने से हुई। भरतपुर में मुख्यतः मेव मुसलमान बसते हैं। विवाद एक कब्रिस्तान को लेकर था। हिन्दुओं का कहना था कि उनके जानवरों को पानी पिलाने के लिए गाँव में स्थित तालाब की भूमि को पंचायत ने गलत तरीके से मुसलमानों के कब्रिस्तान के लिए आवंटित कर दिया था।
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत राज्य में साम्प्रदायिक हिंसा को नियंत्रित करने में पूरी तरह असफल रहे हैं। हलोत से व्यक्तिगत रूप से अनुरोध किया कि इन दोनों अधिकारियों को निलंबित किया जाना चाहिए। पिछले साल राजस्थान में सरोदा और मंगल थाना में दो बड़े दंगे हुए थे और दोनों ही जगह पुलिस की भूमिका घोर पक्षपातपूर्ण थी। उदयपुर जिले के सरोदा में जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक की उपस्थिति में मुसलमानों के 30 घर जलाए गए। मैंने श्री गबड़ी संख्या में मुसलमानों ने उनके कार्यालय के बाहर धरना भी दिया। परंतु उन्होंने कोई कार्यवाही नहीं की। इससे साम्प्रदायिक सोच वाले पुलिस अधिकारियों का मनोबल ब़ा और अन्य स्थानों पर भी पुलिस अधिकारियों ने खुलओम साम्प्रदायिक तत्वों का साथ देना शुरू कर दिया।
गोपालग के दंगे को गहलोत ने शुरू में केवल जमीन का विवाद बताया। परंतु बाद में श्रीमती सोनिया गांधी द्वारा उनसे जवाब तलब किए जाने के बाद उन्होंने कलेक्टर और एसपी को निलंबित किया। राजस्थान में साम्प्रदायिक स्थिति बहुत खराब है और गहलोत हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। भाजपा, सत्ता में वापसी के लिए खुलओम साम्प्रदायिक कार्ड खेल रही है। श्रीमती सोनिया गांधी से मिले राजस्थान के कांग्रेसी नेताओं और सांसदों के एक
प्रतिनिधिमंडल ने भी उनसे शिकायत की कि मस्जिद के भीतर पुलिस का गोली चलाना अनुचित और अकारण था। राजस्थान के मुसलमान श्री गहलोत से बहुत नाराज हैं और बड़ी संख्या में मुसलमान उनके कार्यक्रमों का बहिष्कार कर रहे हैं।
यद्यपि भरतपुर साम्प्रदायिक दृष्टि से संवेदनशील है परंतु गोपालग का साम्प्रदियक हिंसा का कोई इतिहास नहीं था। वहाँ हिन्दू और मुसलमान शांतिपूर्वक एक साथ रह रहे थे। वैसे भी, मेव मुसलमान, सांस्कृतिक दृष्टि से
आधे हिन्दू हैं। उनमें से कई के हिन्दू नाम हैं और वे हिन्दू त्यौहार भी मनाते हैं। भाजपा हमेशा से यह कहती आई है कि मुसलमान, देश की सामाजिक मुख्यधारा में शामिल होने के लिए तैयार नहीं हैं और इसलिए बहुसंख्यक सम्प्रदाय उनके प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त रहता है। यद्यपि प्रजातंत्र में जीने का अधिकार पाने के लिए शर्तें नहीं लगाई जा सकतीं तथापि भरतपुर के मुसलमानों के हिन्दूकरण के बाद भी उनके विरुद्ध क्रुर साम्प्रदायिक हिंसा की गई। इससे भाजपा के दावे का खोखलापन उजागर हो जाता है।
भाजपा शासित उत्तराखण्ड के रुद्रपुर में भी साम्प्रदायिक दंगा हुआ। रुद्रपुर का भी साम्प्रदायिक हिंसा का कोई इतिहस नहीं है। ऐसा लगता है कि वहाँ जानबूझकर दंगा भड़काया गया। दो प्रयास हुए जिनमें से एक सफल हो गया।
पहली घटना में 28 सितम्बर की रात को कुछ लोगों ने कुरान के पन्ने एक कपड़े में बाँधे। उस कपड़े को लाल पेंट में इस तरह डुबाकर मानो वह खून से रंगा हो, सती मंदिर में रख दिया। 29 सितम्बर की सुबह जब श्रद्घालु मंदिर पहुँचे तब खून से रंगी हुई कुरान के पन्ने मंदिर में रखे देखकर उनमें तनाव फैल गया। पुलिस ने स्थिति को सँभाला। हिन्दुओं को यह समझाया गया कि इस घटना से मुसलमान भी उतने ही नाराज हैं जितने कि वे।
दूसरा प्रयास सफल हो गया। गांधी जयंती के दिन कुछ कागजों को, जिनपर अरबी में कुछ लिखा हुआ था, मांस के टुकड़ों के साथ बाँधकर उसी मंदिर में फेंक दिया गया। जैसे ही खबर फैली करीब 150 मुसलमान मंदिर के पास इकट्ठा हो गए। धीरेधीरे यह संख्या लगभग 800 हो गई। भीड़ जल्दी ही हिंसक हो गई और हिंसा में 38 पुलिसकर्मी और अन्य अधिकारी जख्मी हो गए। इसके बाद हिन्दुओं की जवाबी कार्यवाही शुरू हुई जिससे स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई।
पुलिस के अनुसार 30 से अधिक नागरिक घायल हुए और कम से कम 100 वाहनों में आग लगा दी गई। दिल्ली, नैनीताल राष्ट्रीय राजमार्ग पर रुद्रपुर के आसपास सड़क के दोनों ओर जले हुए वाहनों के स्टील के कंकाल बिखरे पड़े थे। लगभग एक सौ दुकानों को लूटकर उनमें आग लगा दी गई। पुलिस ने 37 लोगों के खिलाफ एफ0आई0आर0 दर्ज की जिनमें से 24 को गिरफ्तार कर लिया गया। स्थिति को इस हद तक बिगड़ने से रोका जा सकता था यदि प्रशासन 29 सितम्बर को ही कड़ी कार्यवाही करता और दोषियों को सींखचों के पीछे डाल देता। बाद में राज्य सरकार ने रुद्रपुर के जिला मजिस्ट्रेट और क्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक का तबादला कर दिया।
यह था सन 2011 में हुए साम्प्रदायिक दंगों का लेखाजोखा। कहने की आवश्यकता नहीं कि इनमें से अधिकांश दंगे बहुत मामूली विवादों से शुरू हुए। यह साफ है कि छोटेमोटे मुद्दे भी बड़ी हिंसा का रूप इसलिए ग्रहण कर लेते हैं क्योंकि अनवरत चलने वाले साम्प्रदायिक प्रचार ने हम सबके मन में ज़हर भर दिया है। दोनों समुदायों के सदस्य एक दूसरे के प्रति पूर्वाग्रह पाले हुए हैं और उनमें आपसी विश्वास न के बराबर है। इसके अतिरिक्त, पुलिसकर्मी मुसलमानों के विरुद्ध रहते हैं और अक्सर हिंसा भड़काने वालों का साथ देते हैं। साम्प्रदायिक हिंसा भड़कने का एक कारण गरीबी और बेरोजगारी भी है। जब तक इन मुद्दों पर समुचित ध्यान नहीं दिया जाता तब तक देश को साम्प्रदायिक हिंसा से मुक्त करना संभव नहीं होगा।

-डा. असगर अली इंजीनियर



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