गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

लोकसंघर्ष खुशहाली और खुशी

इस वर्ष फरवरी के तीसरे सप्ताह में मुझे भूटान के प्रधानमंत्री का एक पत्र प्राप्त हुआ। इस पत्र में मुझे भूटान नरेश द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में "खुशहाली और खुशी" विषय पर आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में भाग लेने के लिए निमंत्रित किया गया था। पत्र में कहा गया था कि बैठक में राज्याध्यक्ष, अध्येता, प्राध्यापक व जानेमाने सामाजिक कार्यकर्ता भाग लेंगे। मुझे इस्लामिक विद्वान व मुस्लिम धार्मिक नेता बतौर बैठक को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया गया था। बैठक 2 अप्रैल को आयोजित थी व मुझसे यह अनुरोध भी किया गया था कि मैं दो दिन और अर्थात 3 व 4 अप्रैल को भी न्यूयार्क में रहूं ताकि बैठक के निष्कषोर्ं को कार्यरूप में परिवर्तित करने की योजना बनाई जा सके।
भूटान के प्रधानमंत्री जिग्मी वाई थिनले के आमंत्रण पत्र में कहा गया था कि,"आपने अंतरधार्मिक संवाद के क्षेत्र में अपने असाधारण कार्य से दुनिया के सामने एक शानदार और सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत किया है। आपके द्वारा विकसित माडल को पूरे विश्व में अपनाए जाने की आवश्यकता है। मैं इस्लाम के सकारात्मक, प्रगतिशील पहलुओं को समाज के सामने लाने के आपके अभियान से अत्यंत प्रभावित हूं। जैसा कि आपने डूशे वैेले को दिए गए अपने साक्षात्कार में कहा था कि इससे इस्लाम के मानने वालों में प्रश्न पूछने का साहस और इच्छा उत्पन्न होती है। इससे व्यक्ति की सोच व्यापक और आलोचनात्मक बनती है और यह कार्य, मेरी दृष्टि में अत्यंत महत्वपूर्ण है।"
प्रधानमंत्री ने अपने पत्र में आगे कहा"भूटान नरेश ने तीन दशक पहले कहा था कि सकल राष्ट्रीय उत्पाद से कहीं महत्वपूर्ण है सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता"। आपकी प्रगतिशील सोच भूटान के राष्ट्रीय दशर्न से मेल खाती है। सच तो यह है कि आपके कार्यकलाप और भूटान के राष्ट्रीय उद्धेश्य और महत्वाकाक्षाएं लगभग पूर्णतः समान एकसी हैं और इनकी पूरे विश्व को जरूरत है। इसीलिए मैं आपको दिनांक 2 अप्रैल 2012 को न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय में आयोजित इस उच्च स्तरीय बैठक में भाग लेने के लिए निमंत्रित कर रहा हूं"।
मैंने यह निमंत्रण सहर्ष स्वीकार कर लिया और 30 मार्च को बैठक में भाग लेने के लिए न्यूयार्क पहुंच गया। मुझे और कुछ अन्य आमंत्रितों को मिलेनियम यूएन प्लाजा होटल में ठहराया गया जोकि संयुक्त राष्ट्र संघ की इमारत के ठीक सामने स्थित है। बैठक सुबह 10 बजे शुरू होने वाली थी परंतु चूंकि संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय में प्रवेश के पहले व्यक्ति को अनेक सुरक्षा जांचों से गुजरना होता है इसलिए हम लोगों से यह अनुरोध किया गया कि हम 8 बजे संयुक्त राष्ट्र परिसर में स्थित एक इमारत में पहुंच जाएं। हम सब 9़30 बजे के लगभग मुख्य हॉल मे पहुंच गए।
बैठक में अनेक राष्ट्राध्यक्ष, पूर्व राष्ट्राध्यक्ष, संयुक्त राष्ट्र संघ में विभिन्न देशों के प्रतिनिधि, राजनयिक व अलगअलग राजनैतिक दलों के नेता शामिल हुए। बैठक के उद्घाटक मंडल में संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव वान की मूंग, न्यूजीलैण्ड के पूर्व प्रधानमंत्री हेलेन क्लार्क, भूटान के प्रधानमंत्री जिग्मी वी थिंगले, संयुक्त राष्ट्र संघ की साधारण सभा के 66 वें सत्र के अध्यक्ष नासिर अब्दुल अजीज व कोस्टारिका की राष्ट्रपति सुश्री लौरा चिंचलीया शामिल थे। सुश्री लौरा सम्मेलन की मुख्य वक्ता भी थीं।
सम्मेलन में समय की कमी के कारण उद्घाटक मंडल के प्रत्येक सदस्य को उनके वक्तव्य के लिए केवल तीन मिनिट का समय दिया गया। सुश्री लौरा चिंचलीया को 10 मिनिट का समय मिला कोस्टारिका को पर्यावरण के क्षेत्र में उसकी उपलब्धियों के लिए सर्वश्रेष्ठ राज्य का पुरस्कार दिया गया। स्मरणीय है कि कोस्टारिका दुनिया का एकमात्र देश है जिसकी कोई सेना नहीं है। मैं सन 2009 में कोस्टारिका गया था। वह हर दृष्टि से एक आदशर देश है। भूटान की तरह कोस्टारिका भी पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए भौतिक विकास और विश्व शांति का हामी है और यही इस उच्च स्तरीय बैठक की विषयवस्तु थी।
भारत के प्रधानमंत्री की विशेष दूत और केन्द्रीय पर्यावरण व वन राज्यमंत्री सुश्री जयन्ती नटराजन ने भारत की नई उभरती हुई अर्थव्यवस्था पर प्रकाश डाला जो कि नए आर्थिक नजरिए के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। उद्घाटन सत्र में अनेक मंत्रियों, उपमंत्रियों व विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने अपनेअपने विचार व्यक्त किए।
उद्घाटन सत्र के बाद अलगअलग विषयों पर चर्चा के लिए कई कार्यसमूहों का गठन किया गया। इन कार्यसमूहों को "खुशहाली एवं खुशी", "पर्यावरण संतुलन"""", """"प्राकृतिक संसाधनों का उचित उपयोग"""", व """"संसाधनों का निष्पक्ष व निरपेक्ष वितरण"""" विषयों पर चर्चा करनी थी। धार्मिक नेताओं के समूह को भी इन विषयों पर अपनेअपने विचार व्यक्त करने थे। मुझे इस्लामिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई।
धार्मिक नेताओं के समूह में हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म, ईसाई धर्म, यहूदियों व मुसलमानों के प्रतिनिधि शामिल थे। हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व रामकृष्ण मिशन के मोहन मुनासिंगे ने किया। मैं इस्लाम का प्रतिनिधि था। ईसाई धर्म की ओर से फ्रांस की सुश्री रोशी जोन हेलीफेक्स उपस्थित थीं। यहूदी धर्म का प्रतिनिधित्व नीदरलैंड के रब्बी डेविड कैडमैन कर रहे थे जबकि बौद्ध प्रतिनिधि थे भूटान के अनिल शाक्य।
धार्मिक नेताओं के समूह के सभी सदस्य विद्वान व अत्यंत प्रबुद्ध थे और शांति, अंतरधार्मिक संवाद और पर्यावरण संरक्षण के साथ विकास के क्षेत्रों में काम कर रहे थे। सभी का यह मानना था कि धर्म आमजनों को खुशहाल व प्रसन्न रखने के लक्ष्य की प्राप्ति में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है और मानवता को इस लक्ष्य तक पहुंचाने में धर्म एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। यह तभी हो सकता है जब धर्म थोथा शब्दाडंबर न होकर ठोस यथार्थ पर आधारित हो।
मैं यहूदी धर्म गुरू रब्बी डेविड कैडमेन के वक्तव्य से काफी प्रभावित हुआ। उन्होंने अपने भाषण में यहूदी धार्मिक स्त्रोतों का हवाला देते हुए शांति व प्रसन्नता को ब़ावा देने के प्रभावी उपाय सुझाए। उन्होंने ईश्वर से फिलिस्तिनियों की व्यथा दूर करने की प्रार्थना की। उन्होंने कहा कि फिलिस्तीनी अपनी स्वतत्रंता व संप्रभुता के लिए लंबी लड़ाई लड़ रहे हैं और इस लड़ाई में उन्होंने बहुत कुर्बानियां दी हैं। सभा ने रब्बी कैडमेन के भाषण की मूलात्मा व उनके सह्दय व न्यायपूर्ण दृष्टिकोण की जमकर सराहना की। अपना भाषण समाप्त कर रब्बी मंच से उतरे और मुझे गले लगाकर उन्होंने मेरे वक्तव्य की सराहना की। मैंने भी उन्हें बधाई दी। हम दोनों ने ईमेल के द्वारा विचार विनिमय करने और एकदूसरे के संपर्क बनाए रखने निर्णय किया।
मैंने अपने प्रस्तुतिकरण में कहा कि आज की दुनिया में ऐसे लोगों का बहुमत है जो व्यथित, दुःखी व परेशानहाल हैं। प्रसन्नता उनसे कोसों दूर है। मैंने कहा कि भूटान द्वारा चर्चा के लिए चुना गया विषय """"खुशहाली व प्रसन्नता"""" अत्यंत उपयुक्त व प्रासंगिक है। सचमुच, मानवता की भलाई व विकास के दो पहलू हैं : खुशहाली व खुशी। किसी व्यक्ति की खुशहाली के लिए यह आवश्यक है कि उसकी मूलभूत आवश्यकताएंरोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य व शिक्षापूरी हों। अगर उसकी मूल आवश्यकताएं पूरी नहीं होंगी तो वह कतई खुश नहीं रह सकता। मूल आवश्यकताओं की पूर्ति किसी व्यक्ति के खुश रहने की अनिवार्य शर्त है।
हम किसी भूखे या अधनंगे व्यक्ति से या किसी ऐसे व्यक्ति से जिसके सिर पर छत न हो, कभी अपेक्षा नहीं कर सकते कि वह प्रसन्न रहे। यद्यपि धन, खुशी की गारंटी नहीं है तथापि जिस मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताएं पूरी न हों वह कभी खुशहाल नहीं हो सकता और खुशहाली के बगैर खुशी की कल्पना तक नहीं की जा सकती। किसी व्यक्ति की खुशहाली उसकी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति पर निर्भर करती है। इसके विपरीत, खुशी कोई भौतिक वस्तु नहीं है। बहुत धनी व्यक्ति भी अप्रसन्न हो सकता है।
हमारी दुनिया में आज भी करोड़ों लोग भूखे सोते हैं। उनकी मूल आवश्यकताएं पूरी नहीं होतीं। समाज में आर्थिक गैरबराबरी का बोलबाला है। यहां तक कि संयुक्त राज्य अमरीका जैसे देश में भी अमीरों व गरीबों के बीच गहरी खाई है। वहां """"हम 99 प्रतिशत हैं"""" जैसे आंदोलन खड़े हो रहे हैं। अमरीका के आर्थिक संसाधनों पर देश के एक प्रतिशत लोगों का बोलबाला है और बाकी 99 प्रतिशत उनपर निर्भर हैं। जहां तक एशिया और अफ्रीका का प्रश्न है वहां आर्थिक विषमताएं कहीं अधिक भयावह हैं। इन महाद्वीपों के 99 प्रतिशत रहवासी, अमरीका के 99 प्रतिशत नागरिकों की तुलना में अत्यंत कंगाल हैं।
अतः यदि हम एक प्रसन्न दुनिया का निर्माण करना चाहते हैं तो इस दिशा में पहला कदम होगा धरती के सभी निवासियों की खुशहाली सुनिश्चित करना। यह तभी हो सकता है जब दुनिया में संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण हो। जहां तक इस्लाम का संबंध है, मुसलमानों का पवित्र ग्रंथ कुरआन, धन इकट्ठा करने की प्रवॢत्ति को पूरी तरह गलत ठहराती हैं। कुरआन कहती है कि चंद लोगों द्वारा संग्रहित धन दोजख की आग बन जाएगा। कुरआन पवित्र पैगम्बर से कहती है कि अगर कोई उनसे पूछे की उसे अल्लाह की राह पर कितना खर्च करना चाहिए तो उनसे कहो की उनकी मूल आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद बचा पूरा धन।
इस्लाम सादा जीवन जीने की सीख देता है। पवित्र पैगम्बर भी अत्यंत सादगी से रहते थे और सभी मुसलमानों का पवित्र कर्तव्य है कि वे पैगम्बर की बताई राह पर चलें। परंतु सच यह है कि अल्जीरिया से लेकर इंडोनेशिया तक पूरे इस्लामिक विश्व में न केवल आर्थिक गैरबराबरी का साम्राज्य है बल्कि घोर गरीबी और पिछड़ापन भी है। मुस्लिम बादशाह, शेख, सामंत व पूजींपति अत्यंत ऐश्वर्यपूर्ण जीवन जीते हैं जबकि करोड़ों मुसलमान भुखमरी के शिकार हैं।
खुशहाली और खुशी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। जब हम एक खुशहाल दुनिया बनाएंगे तभी हम एक खुश दुनिया बना सकेंगे। यद्यपि यह भी सही है कि खुशी के लिए खुशहाली आवश्यक तो है परंतु पर्याप्त नहीं। मैंने भूटान के प्रधानमंत्री को इस सम्मेलन के आयोजन के लिए धन्यवाद व बधाई दी। मैंने कहा कि चुने गए विषय पर विचारमंथन के लिए इससे बेहतर मंच नहीं हो सकता था। मेरे भाषण को सभी ने सराहा व कई लोगों ने मुझे बधाई दी।
अन्य धार्मिक नेताओं की तरह, मुझसे भी अनुरोध किया गया कि मैं कोई धार्मिक प्रार्थना करुं। मैंने अपनी प्रार्थना में कुरआन का पहला अध्याय """"अलफतिहा"""" शामिल किया। """"अल्लाह के नाम से जो अत्यंत कृपाशील और दयावान है और जो सारे संसार का रब हैं (जिस संसार को हम संसाधनों के निमर्म दोहन से नष्ट करने पर आमादा हैं। ) हे अल्लाह, निर्णय वाले दिन तुम यह तय करना कि हमने अपने संसाधनों का उचित उपयोग किया या नहीं। हे अल्लाह, हमें सही मार्ग दिखाओवह मार्ग जिसपर तुमने अपने वरदानों की वर्षा की है। ये वरदान हमें हमारी दुनिया के अमूल्य प्राकृतिक संसाधनों के रूप में मिले। और जो इन संसाधनों को नष्ट करें वे तुमारे प्रकोप के भागी हों।""""
सम्मेलन का समापन सर्वधर्म प्रार्थना से हुआ।
-डॉ़ असगर अली इंजीनियर