शनिवार, 21 अप्रैल 2012

साम्प्रदायिक दंगे 2011 -1



दंगामुक्त भारत अब भी एक ऐसा स्वप्न बना हुआ है जिसका निकट शिष्या में पूरा ह®ना असंभव जान पड़ता है। हर वर्ष की तरह, वर्ष 2011 में भी देश के विभिन्न हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा हुई। बीते वर्ष के शुरुआती महीनों में देश के किसी हिस्से से बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा की खबर नहीं आई या ऐसा लगा कि शायद यह वर्ष तुलनात्मक दृष्टि से शांत रहेगा। परंतु साल के मध्य अ©र अंत में अनेक सांप्रदायिक फसाद हुए जिन्होंने हमारे देश क® शर्मसार किया। इस संदर्भ में एक सकारात्मक पहलू यह है कि सन् 2011 में, मुंबई (1992-93) व गुजरात (2002) जैसी भयावह हिंसा नहीं हुई। परंतु इसके पीछे एक कारण है। शिवसेना, भाजपा अ©र उसके जैसे अन्य संगठन या पार्टियाँ चाह कर भी बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा नहीं फैला सकतीं क्योंकि उसके लिए जिस भावनात्मक ज्वार की जरूरत ह®ती है, उसे पैदा करना बहुत आसान नहीं है। यह तभी ह® सकता है जब बाबरी मस्जिद क® ढहाए जाने जैसी क®ई बड़ी घटना ह®।
सन् 2011 में सांप्रदायिक दंगों का खाता खुला महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के उमरखेडी में, जहाँ 13 जनवरी क® कुछ हिन्दू लड़क®ं द्वारा एक मुसलमान लड़की क® छेड़े जाने के बाद द® गुटों के बीच पथराव शुरू ह® गया। बड़े पैमाने पर हिंसा भड़कने की आशंका के चलते दुकानें बंद ह® गईं या ल®ग अपने जूते चप्पल तक छ®ड़ कर बाजार से भागने लगे। परंतु स्थानीय पुलिस अधिकारी श्री देवकाटे ने जल्दी ही स्थिति पर नियंत्रण कर लिया। जिला मुख्यालय से पुलिस बल बुलवाकर उन्होंने हालात क® बिगड़ने नहीं दिया।
इससे साफ है कि यदि पुलिस निष्पक्षता से काम करे त® हिंसा र®की जा सकती है। यह भी साफ है कि छेड़छाड़ जैसी मामूली घटनाएँ, जब केवल कानून अ©र व्यवस्था की समस्या न रहकर सांप्रदायिक स्वरूप अख्तियार कर लेती हंै, जनता, हिन्दू अ©र मुसलमानों में विभाजित ह® जाती है। किसी क® क्रिकेट बाल लगने या क®ई छ®टी-म®टी सड़क दुर्घटना जैसी साधारण घटनाएँ तक समाज क® सांप्रदायिक आधार पर विभाजित करने के लिए पर्याप्त ह®ती हंै। यह सब नतीजा है निरंतर चलने वाले सांप्रदायिक दुष्प्रचार का अ©र हमारी शिक्षा व्यवस्था का ज® विद्यार्थियों के दिल® दिमाग में फिरका-परस्ती का जहर श्र देती है।
इसी तरह की एक अन्या घटना में, एक ईसाई पादरी व मुसलमान रिक्षा चालक के बीच हुए झगड़े ने हिन्दू-मुस्लिम विवाद का रूप ले लिया। कुछ सांप्रदायिक तत्व एक मुस्लिम म®हल्ले में घुस गए और वहाँ जम कर पत्थरबाजी की। कई मकानों व दुकानों क® आग के हवाले कर दिया गया। अनेक वाहन भी क्षतिग्रस्त हुए। हमलावरों ने क्षेत्र में रह रहे आदिवासियों क® भी नहीं बख्शा। दुर्भाग्य्ावष, पुलिस ने अत्यंत पक्षपातपूर्ण व्यवहार किया अ©र केवल मुसलमानों व आदिवासियों पर लाठी चार्ज किया। संपत्ति का नुकसान भी मुसलमानों का ही ज्यादा हुआ।
गुजरात का बड़©दा, सांप्रदायिक दृष्टि से संवेदनशील शहर है। वहाँ 16 फरवरी क® कुछ शरारती तत्वों ने ईद के उपलक्ष्य्ा में सड़क पर लगाए गए स्वागत द्वार क® गिराकर उसमें आग लगा दी। मछुआरा समुदाय के चमीस कहार नामक व्यक्ति क® गिरफ्तार किया गया। कहारों अ©र मुसलमानों के बीच बड़©दा में अक्सर झड़पें ह®ती रहतीं हैं क्योंकि द®नों समुदायों के कुछ सदस्य अवैध शराब के धंधे में संलग्न हंै। शिव कहार के नेतृत्व में कहारों व मुसलमानों के बीच बड़©दा में 1982 में भयावह हिंसा हुई थी।
इस साल मार्च के महीने की द® तारीख क® मुंबई के सेवरी में पैगंबर साहब के जन्मदिन के सिलसिले में लगाए गए झंडे अ©र प®स्टर कुछ सांप्रदायिक तत्वों ने फाड़ दिए। द® दिन बाद, 5 मार्च क® कुछ ल®गों ने एक बच्चे क® धक्का देकर गिरा दिया। इससे हिंसा भड़क उठी। द®नों अ®र से पथराव ह®ने लगा। कुछ ल®गों ने मुस्लिम महिलाअ®ं के साथ छेड़छाड़ भी की। पुलिस का व्यवहार एक बार फिर पक्षपातपूर्ण रहा। शरारती तत्वों के विरुद्ध कुछ नहीं किया गया। उल्टे मुसलमानों पर लाठीचार्ज हुआ अ©र कई मुस्लिम लड़कों क® हिरासत में ले लिया गया। पुलिस कमिष्नर ने भी यह स्वीकार किया कि एक सामान्य झगड़े क® सांप्रदायिक रंग दे दिया गया था अ©र उनके प्रयासों से द®नों पक्षों में समझ©ता हुआ।
अगली घटना महाराष्ट्र के एक अन्य संवेदनशील शहर अ©रंगाबाद में हुई। 20 मार्च क® कुछ मुसलमान लड़के अ©र लड़कियाँ एस0बी0 कालेज से एक परीक्षा देकर ल©ट रहे थे। मुस्लिम लड़कियाँ बुर्क़ा पहने हुए थीं परंतु इसके बावजूद उन पर कुछ सांप्रदायिक तत्वों ने रंग डालना शुरू कर दिया। जब उन्होंने इसका विर®ध किया त® उन पर चाकुअ®ं अ©र गुप्ती से हमला कर दिया गया। चार विद्यार्थी गंभीर रूप से घायल हुए।
पुलिस ने हमलावरों क® गिरफ्तार कर लिया। इनमें वे लड़के भी शामिल थे ज® घटनास्थल से भाग गए थे। डाँ अंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय के कुल पति प्र®0 पांडे ने एस0बी0 काॅलेज के प्रशासन के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही की क्योंकि काॅलेज ने सांप्रदायिक हमलावरों क® क®ई सजा नहीं दी थी।
मुंबई की धारावी एशिया की सबसे बड़ी मलिन बस्ती है। सांप्रदायिक दृष्टि से अत्य्ान्त संवेदनशील इस इलाके में सन् 1992-93 के दंगों के द©रान भारी हिंसा हुई थी। इसके बाद वहाँ म®हल्ला शंाति समितियाँ बनाई गईं जिनका अच्छा असर हुआ। सन् 1992-93 के बाद पहली बार इस वर्ष यहाँ सांप्रदायिक हिंसा हुई जिसमें चार ल®ग घायल हुए। ऐसा लगता है कि शंाति समितियों की सक्रियता क® बढ़ाए जाने की जरूरत है।
दुर्भाग्य्ावष, पिछले कुछ सालों में पूरा महाराष्ट्र राज्य ही सांप्रदायिक दृष्टि से अत्यन्त संवेदषील बन गया है अ©र हर वर्ष इस राज्या में बड़ी सन्ख्या में सांप्रदायिक दंगे ह®ते हंै। सन् 2001 से 2011 के दषक में महाराष्ट्र में देष के अन्य्ा सभी राज्याओं से ज्यादा, 1192 सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएँ हुईं जिनमें 172 ल®ग मारे गए। उŸार प्रदेश में इसी अवधि में 1112 दंगे हुए जिनमें 384 मासूमों ने अपनी जान गवाईं।

-डा. असगर अली इंजीनियर
क्रमश:

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