शनिवार, 18 अगस्त 2012

असम हिंसा : क्या हो स्थायी हल



असम हिंसा : क्या हो स्थायी हल ?मुंबई हिंसा क्या इससे मूर्खतापूर्ण कुछ हो सकता था

पिछले कुछ हफ्तों के घटनाक्रम को देखते हुए यह आश्चर्यजनक नहीं कि इसकी परिणति मुंबई में हालिया (12 अगस्त 2012) हिंसा में हुई। ऐसा लगता है कि यह घटना, घटने का इंतजार कर रही थी। पिछले कुछ हफ्तों से बड़े पैमाने पर यह प्रचार किया जा रहा था कि पूरी दुनिया में मुसलमानों को मारा जा रहा है। बोडोमुस्लिम हिंसा और बर्मा में मारे जा रहे रोंहिग्या मुसलमानों के लिए लगभग हर मस्जिद में विशेष नमाज अदा की जा रही थीं और लाखों की संख्या में एसएमएस भेजे जा रहे थे। उर्दू अखबार ऐसे लेख प्रकाशित कर रहे थे जिनमें यह कहा गया था कि मुसलमानों को खत्म करने की विश्वव्यापी साजिश पर अमल हो रहा है। इनमें से अधिकांश लेख केवल भावनाओं को भड़काने वाले थे। उनमें घटनाओं के वस्तुपरक विश्लेषण के लिए कोई स्थान नहीं था।
मैंने मुंबई की उर्दू प्रेस में इस विेषय पर कोई गंभीर और विश्लेषणात्मक लेख नहीं देखा। मुस्लिम नेतृत्व, मुसलमानों के मन में यह धारणा उत्पन्न कर रहा था कि पूरी दुनिया मुसलमानों के पीछे पड़ी है। इससे उत्पन्न गुस्से को फूट पड़ने के लिए कोई बहाना भर चाहिए था। बर्मा में मुसलमानों के मारे जाने की तस्वीरों ने मुस्लिम युवकों को बहुत आहत किया। यहां यह कहना होगा कि इनमें से बहुत सी तस्वीरें नकली थीं परंतु उन्हें बड़े पैमाने पर इंटरनेट और सेलफोनों द्वारा पूरे देश में भेजा गया और इससे भावनाएं भड़कीं।
मुस्लिम नेतृत्व समुदाय की असली भलाई के लिए कभी कुछ नहीं करता। उसे केवल इस तरह के संवेदनशील मुद्दों की तलाश रहती है ताकि वह उनका इस्तेमाल अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए कर सके। इस मामले में भी यही हुआ। आज़ाद मैदान में रैली के आयोजन की घोषणा मस्जिदों में की गई जिससे पूरे मसले पर धार्मिक रंग च़ गया। जो लोग मस्जिदों में नमाज प़ने जाते हैं, उनमें से बहुत से सहज विश्वासी होते हैं और ज्योंही किसी मुद्दे को धार्मिक कलेवर दिया जाता है, वे उस संबंध में अति संवेदनशील हो जाते हैं। रमजान के पवित्र महीने में मस्जिदों में नमाज प़ने वालों की संख्या में भारी वॢद्धि होती है।
मुसलमानों के धार्मिक नेता और कई सामाजिकराजनैतिक नेता भी, असम और बर्मा में क्या हो रहा है, उसके बारे में कुछ खास जानतेसमझते नहीं हैं। वे इन दोनों घटनाक्रमों को मुसलमानों के खिलाफ षड़यंत्र बताते हैं। उन्हें इससे ज्यादा न कुछ मालूम है और न वे जानना चाहते हैं। आजाद मैदान में वक्ताओं ने अत्यंत भावनात्मक और भड़काऊ भाषण दिए। विशेषकर मीडिया पर यह आरोप लगाया गया कि उसने बर्मा में मुसलमानों की हत्याओं को पर्याप्त तरजीह नहीं दी। वक्ताओं ने अत्यंत उत्तेजनापूर्ण शब्दों का उपयोग, यह जानते हुए किया कि वहां मौजूद भारी भीड़ में हर तरह के लोग शामिल थे और उसमें असामाजिक तत्वों की भी कोई कमी नहीं थी। हिंसा भड़काने के लिए इतना काफी था।
यह सिर्फ भीड़ पर नियंत्रण बनाए रखने का प्रश्न नहीं है। रैली के नेतृत्व का व्यवहार घोर गैरजिम्मेदारीपूर्ण था। उनका कहना था कि वे केवल 1500 के लगभग लोगों के इकट्ठा होने की उम्मीद कर रहे थे परंतु वहां 50,000 से ज्यादा लोग पहुंच गए। क्या केवल इसी तथ्य से उन्हें यह समझ में नहीं आना था कि इस मामले ने भावनात्मक स्वरूप अख्तियार कर लिया है और भीड़ को अत्यंत समझदारी व परिपक्वता से संभाला जाना जरूरी है। कोई भी समझदार नेतृत्व इस तरह की बड़ी भीड़ के सामने भड़काऊ भाषण देने की इजाजत कभी नहीं देगा क्योंकि इससे भावनाओं के और अधिक भड़कने का खतरा रहता है।
आयोजकों के इस दावे में दम नहीं है कि उन्हें केवल 1500 लोगों के आने की उम्मीद थी। पिछले दोतीन शुक्रवारों से शहरभर की मस्जिदों में रैली के आयोजन की घोषणाएं की जा रहीं थीं और शहर के कई भागों में पोस्टर भी लगाए गए थे। साफ है कि आयोजक बड़ी संख्या में लोगों को इकट्ठा करना चाहते थे और इसमें वे सफल भी रहे। बेहतर तो यह होता कि 1000,1500 ऐसे व्यक्ति, जो मुद्दे की गंभीरता और उसके सभी पहलुओ से वाकिफ हैं, आजाद मैदान पर दिन भर का धरना करते और शाम को मुख्यमंत्री या गृहमंत्री को अपनी मांगों के संबंध में ज्ञापन सौंपते। रैली आयोजित करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी।
और अगर इतनी बड़ी रैली आयोजित की भी गई थी तो उसमें भावनात्मक भाषण क्यों दिए गए? क्या आयोजकों को मामले की संवेदनशीलता का अंदाजा नहीं था? परंतु वह मुस्लिम नेतृत्व ही क्या जो लोगों की धिर्मक भावनाएं न भड़काए? जहां तक रैली के आयोजकों का संबंध है, उनमें से शायद मुट्ठीभर भी असम में हो रही हिंसा के पीछे के कारणों को समझते होंगे। वे केवल एक चीज जानते हैं और वह यह कि वहां मुसलमान मारे गए हैं और इस बात को वे तोते की तरह दुहराते रहते हैं।?
असम में बोडोमुस्लिम विवाद का इतिहास हमें समझना होगा। बोडो, मुसलमानों को इसलिए नहीं मार रहे हैं क्योंकि वे मुसलमान हैं। वहां मूल विवाद जमीन का है। बोडो, आदिभाषियों, संथालों और अन्य समुदायों से भी संघर्षरत हैं। हालांकि यह सही नहीं है कि बड़ी संख्या में बांग्लादेशी असम में घुस रहे हैं (यह केवल संघ परिवार का प्रचार है) परंतु दुर्भाग्यवश अपना बोडो राज्य कायम करने के लिए बोडो, इस दुष्प्रचार का इस्तेमाल, बोडो क्षेत्रीय परिषद के अन्तर्गत चार जिलों से बंगाली मुसलमानों व अन्य गैरबोडो जातीय समूहों को खदेड़ने के लिए कर रहे हैं। इस पूरे विवाद की जड़ में कांग्रेस सरकार की नीति है जिसने इस इलाके में शांति कायम करने की कीमत, बोडो क्षेत्रीय परिषद का गठन कर अदा की। बोडो अतिवादी समूहों से यह समझौता करने से पहले सरकार को अन्य जातीय समुदायों को विश्वास में लेना था और बोडो क्षेत्रीय परिषद में उन्हें पर्याप्त
प्रतिनिधित्व दिया जाना सुनिश्चित करना था। कोकराझार व अन्य जिलों में बोडोमुस्लिम दंगो के संबंध में पिछले लेख में हमनें प्रकाश डाला था।
जहां तक रोंहिग्या मुसलमानों का प्रश्न है, उन पर हो रही ज्यादतियों के लिए केवल और केवल बर्मा की सैनिक तानाशाह सरकार जिम्मेदार है। दंगों के बाद मैं रंगून गया था और वहां मेरी कई रोंहिंग्या मुसलमानों से लंबी चर्चा हुई थी। मुझे बताया गया था कि सन 1981 तक वहां कोई समस्या नहीं थी। रोहिंग्या मुसलमानों को मताधिकार प्राप्त था और उन्हें पूर्ण नागरिक माना जाता था। म्यंनमार की सैनिक तानाशाह सरकार ने अचानक और बिना कोई कारण बताए रोहिंग्या मुसलमानों से उनके नागरिकता संबंधी दस्तावेज छीन लिए और अब उन्हें पिश्चमी म्यंनमार के राखीने जिले से निकाल बाहर करने की कोशिश हो रही है।
मयंनमार की सरकार का यह कहना है कि ये मुसलमान विदेशी हैं और वह चाहती है कि बांग्लादेश उन्हें अपनी जमीन पर बसाए। यह पूरी तरह से अन्यायपूर्ण मांग है। रोंहिग्या मुसलमान उस इलाके में सदियों से रहे रहे हैं और उन्हें बाहरी बताए जाने का कोई आधार नहीं है। जहां तक मयंनमार की सैनिक सरकार का सवाल है, वह अन्य प्रान्तो में बर्मी मूल के लोगों पर भी अत्याचार कर रही है और प्रजातंत्रसमर्थक आंदोलनों के बाद कई बौद्ध धर्मगुरूओं को भी मौत के घाट उतारा गया है। यह सही है कि कुछ बौद्ध धर्मगुरूओं ने अपने धर्मांवलम्बियों के प्रति एकता प्रदशिर्त करने के लिए राखीने जिले के मुसलमानों के खिलाफ पर्चे जारी किए हैं। उन्हें ऐसा कतई नहीं करना था। परंतु वे भी क्या करें। जैसा कि प्रजातंत्रसमर्थक आंदोलनों से सिद्ध होता है, बौद्ध धर्मगुरूओं का भी राजनीतिकरण हो गया है। परंतु एक बात बिल्कुल साफ है। न तो असम और न ही रोहिंग्या मुसलमानों के मामले, मुसलमानों के खिलाफ किसी विश्वव्यापी षड़यंत्र का हिस्सा हैं, जैसा कि प्रचारित किया जा रहा है।
मुंबई में मीडिया पर हमला किया गया और इसका एकमात्र कारण था भड़काऊ भाषण। यह अत्यंत मूर्खतापूर्ण काम था। कोई भी समझदार नेतृत्व मीडिया को खुश रखने की कोशिश करता है न कि उसे नाराज करने की। दूसरे, मीडिया को इस तरह की हिंसा से दबाना असंभव है। इसके अलावा, पूरे मीडिया को एक रंग में रंगना भी गलत है। पिं्रट और इलेक्ट्रानिकदोनों मीडिया के विभिन्न संस्थानों की अलगअलग वैचारिक प्रतिबद्धताएं और व्यवसायिक मजबूरियां हैं। अगर मीडिया का एक हिस्सा मुसलमानों की समस्याओं को तरजीह नहीं देता या उनके प्रति पूर्वाग्रहग्रस्त है तो भी इस समस्या का इलाज पत्रकारों पर हमले कर और ओबी वैनों में आग लगाकर नहीं हो सकता। यह शुद्ध मूर्खता है।
उर्दू अखबार अक्सर लिखते हैं कि उलेमाकिराम (सम्मानीय उलेमा) को मुस्लिम उम्मा का पथप्रदशर्न और नेतृत्व करना चाहिए। उलेमा से यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है जबकि उनमें से अधिकांश
आधुनिक दुनिया के बार में न के बराबर जानते हैं और धार्मिक भावनाएं भड़काना जिनकी मानसिकता का अंग होता है। कहने की जरूरत नहीं कि सभी उलेमा ऐसे नहीं हैं परंतु राजनैतिक मसलों में अधिकांश उलेमा या तो घोर अवसरवादी नीतियां अपनाते रहे हैं या आम मुसलमानों की भावनाओं से खिलवाड़ करते रहे हैं।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मुंबई की हिंसा रमजान के पवित्र महीने में हुई। उलेमा हमें यह बताते नहीं थकते कि रमजान के महीने में रोजे रखने का उद्धेश्य यह है कि हम अधिक धैर्यवान बनें और अपने गुस्से पर नियंत्रण पाना सीखें। ऐसा कहा जाता है कि इस पूरे माह को केवल इबादत करते हुए बिताना चाहिए अर्थात अल्लाह को याद करते हुए व गरीबों और कमजोरों के प्रति करूणाभाव रखकर उनकी मदद करते हुए। जब असम और बर्मा में कोई ताजी हिंसक घटनाएं नहीं हो रहीं थीं तब रमजान के पवित्र महीने में यह रैली आयोजित करने की जल्दी क्या थी। असम में हिंसा पर नियंत्रण स्थापित कर लिया गया था और अब वहां चार हिंसा पीड़ित जिलों में शरणार्थी शिविरों में रह रहे लोगों के लिए पैसे, वस्त्र, जूते व दवाईयां आदि इकट्ठा करने की जरूरत थी।
परोपकार के इस पवित्र महीने में ये नेता उन चार लाख लोगों के लिए मदद इकट्ठा कर सकते थे जो अत्यंत अमानवीय परिस्थितियों में शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं। मुसलमानों द्वारा की गई बदले की कार्यवाही में कई बोडो भी मारे गए हैं और कुछ शरणार्थी शिविरों में बोडो भी रह रहे हैं और उनकी हालत भी उतनी ही दयनीय है जितनी कि बांग्लाभाषी मुसलमानों की। एक सच्चे और दयावान मुसलमान की तरह इन नेताओं को बोडो शरणार्थियों के लिए भी मदद इकट्ठी करनी चाहिए थी। पवित्र कुरान हमसे यही अपेक्षा करती है। परंतु इसकी जगह उन्होंने मुसलमानों के खिलाफ काल्पनिक विश्वव्यापी षड़यंत्र का प्रचार किया और बेजा हिंसा भड़काई।
अगर असम के घटनाक्रम को केवल मुसलमानों के खिलाफ षड़यंत्र बताए जाने के स्थान पर बोडो की हत्या की भी निदां की जाती और उनकी भलाई के लिए भी प्रार्थना की जाती तो इस मुद्दे को भड़काऊ बनने से रोका जा सकता था। दूसरे, जो रैली आयोजित की गई थी, उसमें केवल मुसलमानों को बुलाया जाना गलत था। उसमें हिन्दुओं, ईसाईयों, बौद्घों और अन्य धमोर्ं के नेताओं को भी बुलाया जाना था जिससे रैली का चरित्र धर्मनिरपेक्ष बनता। यहां तो संकीर्णता की यह हद थी कि रैली का आयोजन रजा अकादमी द्वारा किया गया था जो कि बरेलवी मुसलमानों की प्रतिनिधि है। क्या इससे अधिक संकीर्णता कुछ हो सकती है? अगले दिन, उसी स्थान पर, देवबंदी मुसलमानों की विरोध रैली आयोजित थी, जो कि हिंसा के बाद रद्द कर दी गई।
अगर हम हिंसा के खिलाफ हैं तो इस मुद्दे पर हमें पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध होना चाहिए और हमें प्रत्येक समुदाय या वर्ग के खिलाफ हिंसा का विरोध करना चाहिए। इस मामले में संकीर्ण रूख अपनाने से काम नहीं चलेगा। अगर हम केवल किसी एक वर्ग के विरूद्ध हिंसा का विरोध करेंगे तो इससे जवाबी हिंसा भड़कने की आशंका बनी रहेगी। दूसरी ओर, यदि हम सभी वर्गों के साथ मिलकर, हर प्रकार की हिंसा का विरोध करेंगे तो इस विरोध का चरित्र न केवल प्रजातांत्रिक वरन अहिंसक बना रहेगा। एक वर्ग की संकीर्णता, दूसरे वर्ग की संकीर्णता को ब़ावा देती है। दूसरी ओर, उदार नजरिया अपनाने से हमें सभी का समर्थन और सहयोग प्राप्त होता है।
पुलिस का कहना है कि यह हिंसा सुनियोजित थी। इसका अर्थ यह है कि कई मुस्लिम युवक अब पुलिस की प्रताड़ना का शिकार बनेंगे। यह शर्मनाक है कि रैली में शामिल कई लोगों ने महिला पुलिसकर्मियों के साथ अश्लील व्यवहार किया और उनके रिवाल्वर छीन लिए। इससे पुलिसकर्मियों के मन में प्रतिशोध का भाव जाग सकता है। हम केवल आशा कर सकते हैं कि ऐसा न हो। यहां हमें पुलिस की इस बात के लिए प्रशंसा करनी होगी कि उसने धैर्य का परिचय दिया और पुलिस कमिश्नर अरूप पटनायक ने स्वयं रैली स्थल पर आकर मंच से रमजान के पवित्र महीने में धैर्य और शांति बनाए रखने की अपील की।
आईए, हम सब यह आशा करें कि सभी संबंधित पक्ष समझदारी और परिपक्वता से व्यवहार करेंगे और शांति भंग नहीं होने देंगे।
-डॉ़ असगर अली इंजीनियर


6 टिप्‍पणियां:

Raj Pratap Singh ने कहा…

सुमन जी आपको बहुत बहुत बधाई !!

आपको सायद याद होगा की आपने कहा था की
जितने भी दंगे भारत मई होते है वो हिन्दू वादी संगठन करता है , और नाम होता है ,,, मुस्लिमो का
अब सिर्फ आपका शहर ही नहीं बल्कि पूरा हिंदुस्तान की इस आग मई जल रहा है ,,,
क्या इसके पीछे भी हिंदूवादी संगठन है ???

रविकर फैजाबादी ने कहा…

तथ्यात्मक यह लेख है, पूर्णतया निष्पक्ष ।

दुनिया भर के लेखकों, समझो सारे पक्ष ।

समझो सारे पक्ष, दोष यूँ नहीं लगाओ ।

बने सही माहौल, किसी को नहीं भगाओ ।

अपने दुश्मन देश, लड़ाने का दे ठेका ।

जाते हम पगलाय, जहाँ कुछ टुकड़े फेंका ।।

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

बढ़िया आलेख साझा करने के लिए आभार।

राजन ने कहा…

अच्छा लेख है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

ईद मुबारक !
आप सभी को भाईचारे के त्यौहार की हार्दिक शुभकामनाएँ!
--
इस मुबारक मौके पर आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (20-08-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

dheerendra ने कहा…

इस बेहतरीन सार्थक आलेख लिए,सुमन जी बधाई,,,,
RECENT POST ...: जिला अनुपपुर अपना,,,