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शनिवार, 10 दिसंबर 2011

मीडिया पर खुफिया नियंत्रण भाग 3

मुम्बई सीरियल धमाकों के तुरन्त बाद मीडिया में आने वाली खबरों की शुरुआत पुणे और वाराणसी की घटना के बाद वाले समाचारों से भिन्न नहीं थी। हालाँकि इस बार इंडियन मुजाहिदीन का ईमेल भी नहीं था। 13 जुलाई की शाम को लगातार बारिश के कारण जाँच में कई प्रकार की बाधाएँ थीं। अफवाहों के कारण यातायात बाधित होने की आशंका से स्थानीय प्रशासन ने थोड़े समय के लिए मोबाइल नेटवर्क जाम कर दिया था। धमाके के बाद से समाचार पत्रों के प्रकाशन में दो से तीन घण्टे का समय भी बाकी था। शायद इतने कम समय में जाँचदल के घटना स्थल पर पहुँचने पर कोई निश्चित जानकारी हासिल कर पाना भी संभव नहीं हो पाता। यदि कोई सुराग हाथ भी जाता तो यह तय कर पाने के लिए समय नहीं था कि जाँच हित में उसे सार्वजनिक किया जाए अथवा नहीं। केन्द्रीय गृहमंत्री ने धमाकों से पूर्व किसी भी खुफिया जानकारी के होने से साफ इंकार किया था। ऐसे में अगले ही दिन कई समाचार पत्रों में इस समाचार से खुफिया एजेंसी (आई0बी0) की भूमिका एक बा फिर संदेह के घेरे में ती है। ‘‘धमाकों से दहली मुम्बई’’ ’......इन हमलों के पीछे इंडियन मुजाहिदीन और लश्कर--तोयबा का हाथ होने की आशंका है’ (दैनिक जागरण 14 जुलाई पृष्ठ-1) ‘‘मुम्बई में आतंकी हमला’’ .....विस्फोटों के पीछे इंडियन मुजाहिद्दीन और लश्कर--तोयबा का हाथ होने की आशंका जताई जा रही है....’’ (हिन्दुस्तान 14 जुलाई पृष्ठ-1) यही नहीं अगले दिनों के समाचार पत्रों में देश के कई क्षेत्रों के कथित इंडियन मुजाहिदीन माड्यूल्स पर यकीन की हद तक शक जाहिर करने वाले समाचार खुफिया एजेंसियों के हवाले से प्रकाशित होते रहे। इन समाचारों के शीर्षकों से ही उनके प्रायोजित होने का संदेह होता है। ‘‘आई0एम0 माड्यूल्स की तलाश में आजमगढ़ में छापे’’ ‘‘ जाँच एजेंसियाँ खाली हाथ’’ कहीं आत्मघाती हमला तो नहीं’’ (हिन्दुस्तान 15 जुलाई पृष्ठ-1) ‘‘आई0एम0 के भटकल ग्रुप का हाथ’’ ‘‘मानव बम इस्तेमाल भी जाँच के घेरे में’’ जाँच एजेंसियाँ खाली हाथ’’ (दैनिक जागरण 15 जुलाई पृष्ठ-1) ‘‘ब्लास्ट का यूपी कनेक्शन तलाश रही 0टी0एस0’’ (दैनिक जागरण 15 जुलाई पृष्ठ-13) ‘‘शक की सुई आत्मघाती हमलावर पर’’ (अमर उजाला 15 जुलाई पृष्ठ-1) ‘‘पुलिस की जाँच दायरे में हैं कई आतंकी संगठन’’ (अमर उजाला 15 जुलाई पृष्ठ-13) एक ही दिन के अखबार के इन समाचार शीर्षकों से स्पष्ट होता है कि उन्हें कोई अज्ञात शक्ति नियंत्रित कर रही है। वह शक्ति यह तय कर चुकी है कि इन धमाकों का आरोप इंडियन मुजाहिदीन पर ही डालना है और वह लगातार एक-एक चीज़ की निगरानी भी कर रही है। मुम्बई के झाबेरी बाजार में आत्मघाती हमला होने के समाचार लगभग सभी समाचार पत्रांे में 15 जुलाई को छपे तो 16 जुलाई को ‘‘धमाकों के पीछे हो सकता है कोई नया संगठन’’ शीर्षक से प्रकाशित समाचार में कहा गया.... जाँच अधिकारियों का मानना है कि पिछले कुछ महीनों में आन्ध्र प्रदेश और केरल से कुछ कम उम्र मुस्लिम युवकों के फिदाईन संगठन में शामिल होने की खुफिया एजेंसियों ने जानकारी दी थी।’’ (अमर उजाला 16 जुलाई पृष्ठ-13) पहले फिदाईन हमले की आशंका जताने वाला समाचार और अगले दिन खुफिया एजेंसियों के हवाले से आने वाली इस खबर को जोड़कर देखा जाए तो साफ तौर पर यह लगता है कि आत्मघाती हमला साबित होने की सूरत में भी यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है कि जाँच की जो दिशा पहले तय की जा चुकी है उस पर कोई आँच आने पाए। लगभग एक सप्ताह तक चलने वाले इस अभियान में इंडियन मुजाहिदीन के भूत को सिर पर उठाए खुफिया एजेंसियाँ देश भर में भ्रमण करती रहीं। कभी कोलकाता से तार जोड़ने का समाचार छपा तो कभी वाराणसी विस्फोट से। कई जगहों से पूछताछ और मुस्लिम युवकों को हिरासत में लेकर यातना देने के समाचार भी आए। फैज उसमानी की मुम्बई क्राइम ब्रांच द्वारा पूछताछ के दौरान टार्चर किए जाने से मृत्यु भी हो गई। जेलोें में बंद धमाकांे के आरोपियों से भी पूछताछ की गई। इस पूरी कवायद से देश भर में दो बड़े समुदायों के बीच भय और संदेह का वातावरण निर्मित होने में अवश्य मदद मिली परन्तु तीन महीने बाद भी गुत्थी नहीं सुलझ सकी। जाँच के गलत दिशा में जाने का यह एक और सुबूत है।
पुणे और वाराणसी धमाकों के बाद बगैर किसी ठोस सुराग के इंडियन मुजाहिदीन और मुस्लिम समुदाय के खिलाफ मीडिया बाजी को लेकर मानवाधिकार संगठनों और सभ्य समाज ने कड़ी आपत्ति जताई थी। शायद इसी वजह से मुम्बई सीरियल
धमाकों के बाद केन्द्रीय गृह मंत्री, गृह सचिव और स्वयं मुम्बई ए0टी0एस0 चीफ ने लगातार यह बात दोहराई कि ऐसा कोई सुराग नहीं मिला है जिससे स्पष्ट रूप से किसी संगठन या व्यक्ति पर उँगली उठाई जाए। फिर भी धमाकों के बाद इंडियन मुजाहिदीन और उसके नाम पर मुसलमानों के खिलाफ पहले से भी ज्यादा आक्रामक मीडिया अभियान पर सीधे इंटेलीजेंस ब्यूरो पर उँगली उठ रही है। आई0बी0 पर यह भी आरोप लग रहा है कि वह भगवा आतंकवाद पर परदा डालने और अपनी नाकामियों से जनता का ध्यान हटाने के लिए मीडिया को हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रही है। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।


-मसीहुद्दीन संजरी
समाप्त
मो. 9455571488

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

मीडिया पर खुफिया नियंत्रण भाग 2

भगवा आतंकवाद से परदा उठते ही प्रज्ञा सिंह ठाकुर और कर्नल पुरोहित एण्ड कम्पनी की गिरफ्तारी के साथ-साथ उनके द्वारा कराए गए बम धमाकों का आरोप मुसलमान युवकों पर मढ़ने की साजिश का पर्दा भी फाश हो गया। आतंकवाद के नाम पर अब चलने वाली एक तरफा बहस को एक और रुख मिल गया। खुफिया एजेंसियों की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे। विशेष रूप से समझौता एक्सप्रेस धमाके को लेकर इन्टेलीजेंस ब्यूरो (आई0बी0) पर प्रत्यक्ष रूप से टिप्पणियाँ होने लगीं। 26/11 के मुम्बई पर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी हमले के दौरान भगवा आतंकवाद का खुलासा करने वाले तत्कालीन मुम्बई 0टी0एस0 चीफ हेमन्त करकरे संदिग्ध परिस्थितियों में शहीद हो गए। उसके बाद देश में होने वाली सभी आतंकी घटनाओं के पश्चात खुफिया एवं अन्य बेनामी सूत्रों के हवाले से सघन मीडिया अभियान की शुरुआत हो गई। खास बात यह कि साध्वी और उसके साथियों की गिरफ्तारी के बाद मुम्बई 0टी0एस0 की कहानी से ज्यादा रुचि मीडिया ने उन समाचारों में दिखाई जिनमें उन गिरफ्तारियों का विरोध किया गया था। आतंकवाद को लेकर संघ परिवार के तेवर बदल गए। हेमंत करकरे को धमकियाँ मिलने लगीं। परन्तु इस विषय पर एक दो खबरों के अपवाद को छोड़ दें तो कोई मीडिया अभियान नहीं चला। पुलिस रिमाण्ड के दौरान साध्वी पर बल प्रयोग को लेकर अडवाणी जी नाराज हो गए तो प्रधानमंत्री के विशेष सलाहकार उन्हें मनाने उनके निवास तक गए। जो शक्तियाँ आतंकवाद के मामले में सरकार के नरम रवैये की कटु आलोचक थीं व्यक्ति और संगठन का नाम बदलते ही पुलिस के तौर तरीके में उन्हें इतनी सख्ती नजर आई कि बिलबिला उठे। भगवा आतंकवाद के खुलासे से उत्पन्न नई परिस्थितियों को बदलने और पुरानी हालत बहाल करने के लिए यह सभी शक्तियाँ एक जुट प्रयास में लग र्गइं। जिसके नतीजे में अगले धमाके से ही शक्तिशाली मीडिया अभियान की शुरुआत भी हो गई।
13.02.2010 का पुणे जर्मन बेकरी धमाका हो या 07.12.2010 का शीतला घाट, वाराणसी विस्फोट, 13.07.11 का मुम्बई सीरियल ब्लास्ट हो या 13.09.11 की दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर की घटना, इन सभी वारदातों के बाद खुफिया सूत्रों के हवाले से मीडिया में लगातार आने वाले समाचारों में भगवा आतंकवाद से जनता का ध्यान हटाकर जेहादी आतंकवाद को पूरी तरह फिर से स्थापित करने के प्रयासों की झलक साफ दिखाई देती है।
पुणे धमाके के तुरन्त बाद इंडियन मुजाहिदीन और उसके पाकिस्तानी कनेक्शन की खबरें अलग-अलग सूत्रों से आना शुरू हो र्गइं। घटना को अंजाम देने वाले माड्यूल्स के तार कभी पुणे और मुम्बई से जुड़े बताए गए तो कभी उत्तर प्रदेश और भटकल से। अभी कडि़याँ जुड़ भी नहीं पा रही थीं कि जल्दबाजी में भटकल के एक युवक को गिरफ्तार कर लिया गया। इससे पहले कि 0टी0एस0 उसके दोषी होने का प्रथम दृष्टया कोई सुबूत दे पाती उसने अपनी बेगुनाही अदालत में साबित कर दी शीतला घाट वाराणसी के धमाके के पश्चात खुफिया एजेंसियों ने एक बार फिर शक की सुई इंडियन मुजाहिदीन की तरफ घुमाई। इस बार आई0एम0 का कथित आजमगढ़ माड्यूल निशाने पर रहा। कुछ मुस्लिम युवकों के नाम भी उछाले गए। इस घटना को अंजाम देने वाले सूत्रधारोें के बारे में खुफिया एजेंसियों (आई0बी0 तथा रा) के हवाले से कभी यह खबर आई कि वे शारजाह में हैं तो कभी पाकिस्तान में। जाहिर सी बात है कि शीतला घाट पर फटने वाले बम को उतनी दूर से उछाला नहीं जा सकता था। इसके लिए यहाँ पर कुछ लोगों की मौजूदगी आवश्यक थी। ऐसी स्थिति में इन सम्पर्क सूत्रों तक पहुँचे बगैर सूत्रधारों तक पहुँचने की थ्योरी कितनी हास्यास्पद और दुर्भावना पूर्ण है। लगभग एक साल बीत जाने के बाद भी अब तक जाँच में कोई प्रगति नहीं हो पाई है। इससे जाहिर होता है कि जाँच की दिशा ही गलत थी और इसकी जिम्मेदारी खुफिया एवं जाँच एजेंसियों पर ही जाती है। समाचार माध्यमों पर खुफिया एजेंसियों का कितना नियंत्रण है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुम्बई धमाकों के बाद पिछले विस्फोटों को अंजाम देने वाले संगठनों की जो सूची समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई है उसमें पुणे और वाराणसी धमाकों के सामने इंडियन मुजाहिदीन का नाम अंकित है। हालाँकि उनको अभी हल नहीं किया जा सका है।

-मसीहुद्दीन संजरी
क्रमश:

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

मीडिया पर खुफिया नियंत्रण भाग १


दिल्ली से प्रकाशित होने वाले उर्दू समाचार पत्र ‘सहरोजा दावत’ में सुप्रीम कोर्ट के वकील एन0डी0 पंचोली से बातचीत पर आधारित एक लेख ‘‘मीडिया इन्टेलीजेन्स के जेरे कन्ट्रोल (अधीन)’’ के शीर्षक से प्रकाशित हुआ, जिसमें कहा गया है ‘‘ इस वक्त सरकारों ने अवाम (जनता) को गुमराह करने के लिए मीडिया का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। यही नहीं उस पर इन्टेलीजेन्स का भी कंट्रोल है। खुफिया संस्थाएँ (एजेंसियाँ) जिस तरह की खबरें चाहती हैं मीडिया उसी तरह की खबरें उसी अंदाज में पेश करता है। इससे अवाम की ताकत घटी है और यह जमहूरियत (लोकतंत्र) के लिए बड़ा खतरा है। क्योंकि जो बातें आनी चाहिए वे नहीं आती हंै और जो आ रही हैं उन्हें तोड़ मरोड़ कर पेश किया जा रहा है।’’ विद्वान अधिवक्ता, माओवाद और आतंकवाद समेत देश की आन्तरिक सुरक्षा के समक्ष चुनौतियों तथा सरकार एवं खुफिया एजेंसियों की भूमिका पर चर्चा कर रहे थे। आतंकवाद की समस्या से निपटने के लिए खुफिया एवं जाँच एजेंसियाँ पिछले कुछ सालों से लगातार सवालों के घेरे में रही हैं। इन्टेलीजेन्स ब्यूरो (आई0बी0) समेत पूरे खुफिया तंत्र पर साम्प्रदायिक आधार पर मुसलमानों के प्रति भेदभाव पूर्ण रवैया अपनाने का आरोप भी लगता रहा है। हर आतंकी वारदात के बारे में खुफिया एजेंसियों और उनके बेनामी सूत्रों के हवाले से प्रकाशित होने वाले समाचार श्रृंखलाओं से इन आरोपों को बल मिलता है तो जाँच एजेंसियों की कार्यशैली इसे और गंभीर बना देती है।
जहाँ तक आतंकी वारदातों के पश्चात खुफिया एजेंसियों और विभिन्न सूत्रों के हवाले से आने वाले समाचारों, सुर, दिशा, आक्रामकता और कुछ मामलों में निष्तेजता का प्रश्न है वह परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहा है। भगवा आतंकवाद के सामने आने से पहले किसी घटना को अंजाम देने वाले सम्भावित संगठनों या व्यक्तियों के नामों को लेकर सूत्रों के हवाले से छपने वाले समाचार बहुत कम देखने को मिलते थे। घटना के तुरन्त बाद लश्कर, हूजी, या हिजबुल जैसे संगठनों के साथ सिमी का नाम जोड़ दिया जाता है। शुरुआती दौर में गिरफ्तार होने वाले कथित आतंकियों में कुछ कश्मीरियों के साथ उत्तर, मध्य या दक्षिण भारत के कुछ मुसलमानों के नाम शामिल हुआ करते थे। कश्मीर के अलगाववादी आन्दोलन और इन घटनाओं में कश्मीरियों के नाम शामिल होने के कारण जेहादी आतंकवाद तथा उससे मुसलमानों के जुड़ाव को आम स्वीकार्यता प्राप्त हो गई थी। इसलिए किसी मीडिया ट्रायल या अभियान की आवश्यकता ही नहीं रह जाती थी। आतंकवाद से मुक्ति दिलाने के नाम पर फर्जी इनकाउन्टरों का भी एक दौर आया। कई मामलों में सच्चाई मीडिया तक पहुँची भी परन्तु वह कोई खबर नहीं बन पाई। आजमगढ़ से हकीम तारिक और जौनपुर से मौलाना खालिद को क्रमशः 12 और 16 दिसम्बर को उठा लिया गया। जब उन्हें किसी अदालत में पेश नहीं किया गया तो फर्जी इनकाउन्टर में मार दिए जाने की आशंका को लेकर आन्दोलन शुरू हो गया। आतंकवाद के नाम पर होने वाली नाइंसाफियों के खिलाफ भारत का यह पहला भरपूर आंदोलन था। अन्ततः इन दोनों को 22 दिसम्बर 2007 को बाराबंकी रेलवे स्टेशन से हथियार तथा गोला बारूद के साथ हूजी के खूँखार आतंकी के तौर पर गिरफ्तार दिखाया गया। अब तक जो समाचार पत्र उनके अपहरण और तलाश की खबरें छाप रहे थे अचानक उन्हें कट्टर धार्मिक, हूजी एरिया कमाण्डर और आतंकवादी लिखने लगे। पूर्व की खबरों के बिल्कुल उलट पुलिस की कहानी को वैधता प्रदान करने वाले समाचारों से खुफिया एवं जाँच एजेंसियों का मीडिया पर अंकुश का पता चलता है। उन दोनों की गिरफ्तारी की सत्यता जानने के लिए गठित जस्टिस निमेष कमीशन की जाँच के तीन साल से भी अधिक समय से लंबित होने में भी इन एजेंसियों की भूमिका है। बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ पर काफी बहस हो चुकी है और यह सिलसिला अब भी जारी है। परन्तु एक बात बहुत यकीन के साथ कही जा सकती है कि यदि जेहादी आतंकवाद को आम स्वीकार्यता प्राप्त नहीं होती और मीडिया पर इन एजेंसियों की इतनी मजबूत पकड़ न होती तो देश की राजधानी में, दिन के उजाले में दो मासूमों की फर्जी मुठभेड़ में हत्या न होती।

-मसीहुद्दीन संजरी
क्रमश:
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