सोमवार, 8 जून 2015

मोदी सरकार की पहली वर्षगांठ-भाग.2




पिछले अंक से जारी
न्यायपालिका से टकराव: प्रजातांत्रिक संस्थाओं की अवहेलना
मोदी सरकार ने अगस्त 11ए 2014 को लोकसभा में 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्तियां आयोग विधेयक 2014' व 'संविधान ;121वां संशोधन: विधेयक 2014' प्रस्तुत किए। इन दोनों विधेयकों को राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्तियां आयोग ;एनजेएसी: के गठन के लिए लाया गया था। एनजेएसी अधिनियम में उस प्रक्रिया का वर्णन किया गया है, जो कि एनजेएसी भारत के मुख्य न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों, उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों व उच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए अपनाएगा। अगर न्यायाधीशों की नियुक्ति की कॉलिजियम व्यवस्था में कमियां थीं तो एनजेएसी एक ऐसी दवा हैए जो मर्ज को और बिगाड़ेगी। इस आयोग के अध्यक्ष होंगे भारत के मुख्य न्यायाधीश। इसके सदस्यों में केन्द्रीय विधि मंत्री, उच्चतम न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश व दो प्रतिष्ठित विधिवेत्ता होंगे। प्रतिष्ठित विधिवेत्ताओं का नामांकनए प्रधानमंत्री,विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश की सदस्यता वाली त्रिसदस्यीय समिति करेगी।
इस समय देश की विभिन्न अदालतों में व विशेषकर उच्च व उच्चतम न्यायालयों में जितने भी मुकदमे चल रहे हैं, उनमें से अधिकांश में भारत सरकार एक पक्षकार है। न्यायिक नियुक्तियां आयोग में केंद्रीय कानून व न्याय मंत्री.जो कि सबसे बड़े पक्षकार के प्रतिनिधि हैं.और भारत के मुख्य न्यायाधीश.जिन्हें उन कई मुकदमों में निर्णय सुनाना है, जिनमें भारत सरकार एक पक्षकार है.एक साथ बैठेंगे। एक बड़ी पुरानी कहावत है कि न्याय न केवल होना चाहिए वरन् होते हुए दिखना भी चाहिए। अगर विधि मंत्री और आयोग के दो में एक विधिवेत्ता सदस्य मिल जाएं तो उनके पास किसी भी प्रस्तावित नियुक्ति को वीटो करने का अधिकार होगा क्योंकि एनजेएसी एक्ट में यह व्यवस्था है कि अगर आयोग के दो या दो से अधिक सदस्य किसी व्यक्ति के नाम पर सहमत न हों तो आयोग उसकी नियुक्ति की सिफारिश नहीं करेगा। जाहिर है कि एनजेएसी अधिनियम का उद्देश्य, केंद्र सरकार के प्रति नर्म रूख रखने वाले या उसकी पसंद के व्यक्तियों की उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियां सुनिश्चित करना है। भारत में लंबित मुकदमों का अंबार है। इन मुकदमों के जल्द से जल्द निपटारे और न्याय व्यवस्था को अधिक सुगम व सरल बनाने के लिए कुछ करने की बजाए,मोदी सरकार अपनी पसंद के जजों की नियुक्ति करने की जुगत भिड़ा रही है। ज्ञातव्य है कि जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे,तब मोदी और उनके मंत्रिमंडल के अनेक साथियों पर कई मुकदमे चले थे और उनके दो निकटस्थ सहयोगियों.मायाबेन कोडनानी और अमित शाह.को अदालतों ने दोषी करार दिया था।
एनजेएसी, न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सीमित करेगा। कुछ समय पहले प्रधानमंत्री मोदी ने न्यायपालिका का आह्वान किया था कि वो आत्मावलोकन व आत्म.मूल्यांकन के लिए आंतरिक मशीनरी विकसित करे। उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू व अन्य न्यायाधीशों को यह सलाह भी दी थी कि वे इस पर विचार करें कि कहीं 'पांच सितारा कार्यकर्ता' व 'पांच सितारा परिप्रेक्ष्य' तो न्यायपालिका पर हावी नहीं हो रहा है। एक तरह से यह कार्यपालिका के मुखिया द्वारा सार्वजनिक रूप से न्यायपालिका पर आक्षेप था। मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ताओं को'पांच सितारा कार्यकर्ता' कहना न केवल दुर्भाग्यपूर्ण बल्कि आधारहीन भी था। इससे ऐसा प्रतीत होना स्वाभाविक था कि कार्यपालिका, न्यायपालिका से टकराव की ओर बढ़ रही है। भारत के मुख्य न्यायाधीश ने एनजेएसी की कार्यवाही में भाग लेने से यह कहकर इंकार कर दिया कि उच्चतम न्यायालय,एनजेएसी के गठन को चुनौती देने वाली जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है।
मोदी सरकार ने सूचना का अधिकार अधिनियम ;आरटीआई के अंतर्गत मुख्य सूचना आयुक्त और खाली पड़े चार आयुक्तों के पदों पर नियुक्तियां नहीं की। इस कारण आरटीआई अर्थहीन.सा हो गया। केंद्रीय सूचना आयोग में 2011 में छः आयुक्तों ने 22,351 प्रकरणों का निपटारा किया था वहीं 2014 में सात आयुक्तों ने केवल 16,006 मामले निपटाए।
मोदी सरकार ने लोकपाल की नियुक्ति भी नहीं की। हिंदू राष्ट्रवादियों की जयजयकार के बीचए 'टीम अन्ना' ने लोकपाल की नियुक्ति के लिए कानून बनाए जाने की मांग को लेकर लंबा आंदोलन किया था। टीम अन्ना का मानना था कि लोकपाल की नियुक्ति से भ्रष्टाचार की समस्या समाप्त हो जाएगी। मोदी सरकार ने चुनाव के पहले जनता से यह वायदा किया था कि वो देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाएगी परंतु उसने तो लोकपाल की नियुक्ति करने तक की ज़हमत नहीं उठाई।
सांस्कृतिक व नैतिक पुलिस
जहां एक ओर सड़कों और चौराहों पर नैतिकता और संस्कृति के स्वनियुक्त रक्षकों की गतिविधियों में तेजी से वृद्धि हुई वहीं मोदी सरकार ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणीकरण बोर्ड के अध्यक्ष पद पर पहलाज निहलानी की नियुक्ति कर यह स्पष्ट कर दिया कि वह समाज पर अनुदारवादी व दकियानूसी परंपराएं लादने की हामी है। निहलानी फिल्म निर्माता हैं परंतु इस क्षेत्र में उनकी कोई विशेष उपलब्धि नहीं है। हां,उन्होंने मोदी के प्रचार के लिए एक फिल्म जरूर बनाई थी जिसका शीर्षक थाए 'हर हर मोदी, घर घर मोदी'।
फिल्म प्रमाणीकरण अपीलीय अभिकरण ने एक फिल्म 'मेसेंजर ऑफ गॉड' को प्रमाणीकृत कर दिया। इसके पहलेए सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म, जिसमें डेरा सच्चा सौदा के मुखिया गुरूमीत राम रहीम सिंह की मुख्य भूमिका है, को पास करने से इंकार कर दिया था। इसके कारण बोर्ड की पूर्व मुखिया लीला सैमसन के लिए उनके पद पर बने रहना कठिन हो गया और उनके साथ बोर्ड के 12 अन्य सदस्यों ने भी इस्तीफा दे दिया।
बोर्ड के 12 सदस्यों इरा भास्कर, एमके रैना, पंकज शर्मा, टीजी थियागराजन, शाजी करूण, अंजुम राजाबलि, शुभ्रा गुप्ता, निखिल अल्वा, राजीव मसंद, मनमंग दाई, केसी शेखर बाबू व आईके प्रभु ने केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री राज्यवर्धन राठौर को भेजे एक संयुक्त ईमेल में अपने इस्तीफे की सूचना देते हुए लिखा किए 'लंबे समय से हमारे धैर्य की परीक्षा ली जा रही थी और अंततः, हालिया घटनाक्रम के बाद, अध्यक्षा सुश्री लीला सैमसन ने मजबूर होकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया.हम लोग काफी लंबे समय से कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तनों की मांग करते आए हैं जो कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणीकरण बोर्ड की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए आवश्यक हैं। परंतु 'कई बार सिफारिशें और अपीलें भेजने,मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों व सचिवों के साथ कई बैठकों के आयोजन और पिछले मंत्री के साथ एक मुलाकात के बाद भी मंत्रालय ने एक भी सकारात्मक कदम नहीं उठाया'।
पहलाज निहलानी के काम करने के तरीके के विरूद्ध सेंसर बोर्ड में विद्रोह हो गया। बोर्ड के एक प्रतिष्ठित सदस्य अशोके पंडित ने निहलानी को एक 'आदिम बादशाह' बताया जो कि बोर्ड को अपना'व्यक्तिगत साम्राज्य'समझता है।  बोर्ड के कई सदस्य पहलाज निहलानी की निर्णय लेने की तानाशाहीपूर्ण प्रक्रिया से सहमत नहीं हैं और ना ही वे फिल्मों में जबरन कांटछांट करने की उनकी प्रवृत्ति से इत्तेफाक रखते हैं। वे निहलानी द्वारा बनाई गई 'गालियों' की सूची से भी सहमत नहीं हैं,जिसमें हिंदी के 15 और अंग्रेजी के 13 ऐसे शब्द शामिल हैंए जिन्हें निहलानी के अनुसार, किसी फिल्म में नहीं होना चाहिए। फिल्मी दुनिया ने निहलानी पर 'नैतिक पुलिस' बनने का प्रयास करने का आरोप लगाया तो फिल्म निर्माता विशाल भारद्वाज ने कहा कि वे तालिबान की तरह व्यवहार कर रहे हैं।
पांच सितारा कार्यकर्ता
गुजरात के सन् 2002 के दंगों के बाद, प्रधानमंत्री मोदी को कई सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा दायर किए गए ऐसे मुकदमों का सामना करना पड़ा था, जिनमें यह आरोप लगाया गया था कि उनकी और उनकी सरकार की गुजरात दंगों में भूमिका थी। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने औद्योगिकरण के नाम पर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की जमीनें जबरदस्ती अधिग्रहित किए जाने का विरोध भी किया था। जो लोग विस्थापित किए गएए उनमें मुख्यतः आदिवासी और दलित थे। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने उन लोगों के पक्ष में भी आवाज़ उठाई जिन्होंने गुजरात कत्लेआम के पीडि़तों की न्याय की लड़ाई लड़ी थी। यही कारण है कि मोदी सरकार,मानवाधिकार संगठनों पर निशाना साध रही है। प्रधानमंत्री की 'पांच सितारा कार्यकर्ता' वाली टिप्पणी को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। 'विदेशी योगदान नियमन अधिनियम';एफसीआरए के अंतर्गत 'सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस' की तीस्ता सीतलवाड और 'ग्रीनपीस' की प्रिया पिल्लई की जांच की गई। उनको मिलने वाले अनुदान और सहायता के स्त्रोतों की पड़ताल की गई और प्रिया पिल्लई को तो इंग्लैंड जाने से रोक दिया गया। वहां वे इसलिए जा रही थीं ताकि इंग्लैंड में पंजीकृत एस्सार कंपनी द्वारा छत्तीसगढ़ में किए जा रहे भारी पर्यावरणीय नुकसान के बारे में ब्रिटिश सांसदों के समक्ष एक प्रस्तुतिकरण दे सकें। इन कार्यकर्ताओं को इसलिए निशाना बनाया गया ताकि अन्य एनजीओ, हाशिए पर पड़े लोगों के अधिकारों की रक्षा से तौबा कर लें और नागरिक समाजए पर्यावरणीय व श्रम कानूनों के उल्लंघनों पर नजर रखना बंद कर दें और बड़े औद्योगिक घराने, देश की प्राकृतिक संपदा को खुलकर लूट सकें और श्रमिकों का शोषण कर अपने खजाने भर सकें।
जहां एक ओर सरकार मानवाधिकारों के रक्षकों को सींखचों के पीछे पहुंचाने के लिए हर तरह की कोशिश करती रही वहीं माया कोडनानी व बाबू बजरंगी जैसे कई दोषसिद्ध अपराधी, मोदी सरकार के पहले साल में जेलों से बाहर आने में कामयाब हो गए। इनमें गुजरात के ऐसे कई पुलिस अधिकारी शामिल हैं जिनपर झूठी मुठभेड़ों में निर्दोष लोगों को मारने के आरोप हैं। डीजी वंझारा, एमके अमीन व अन्य कई पुलिस अधिकारियों को जमानत मिल गई। जमानत पर जेल से बाहर आने के बाद वंझारा ने कहा कि उनके 'अच्छे दिन' आ गए हैं। गुजरात सरकार ने तुलसीराम प्रजापति को फर्जी मुठभेड़ में मार गिराने संबंधी मामले में गुजरात के पूर्व पुलिस महानिदेशक पीसी पांडे पर मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं दी।
सरकार की पलटियां
मोदी सरकार को अलग.अलग मुद्दों पर पलटियां खाने के लिए कई लोगों ने कटघटरे में खड़ा किया। कांग्रेस द्वारा प्रकाशित एक पुस्तिका में शुरूआती 180 दिनों के 25 यू.टर्नों की सूची दी गई है। इनमें शामिल हैं सौ दिन के भीतर विदेशों में जमा काला धन वापिस लाना व हर भारतीय के खाते में 15 लाख जमा करना आदि। बाद में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि अगर काला धन वापिस आया तो भी उसे हर भारतीय के खाते में जमा नहीं कराया जाएगा और यह भी कि हर भारतीय को 15 लाख रूपये मिलने की बात तो चुनाव प्रचार का एक जुमला थी।
स्वच्छ भारत अभियान से भी बहुत कुछ हासिल नहीं हुआ। यह अभियान केवल नारेबाजी और प्रतीकात्मकता तक सीमित रह गया। इस अभियान को असफल होना ही था क्योंकि सरकार की इसमें बहुत कम भूमिका थी और मुख्य काम नागरिकों को करना था। साफ.सफाई का उच्च स्तर बनाए रखने के लिए ढ़ेर सारे संसाधनों और उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है। चाहे वह जमीन हो, हवा, पानी या मनुष्य का दिमाग.सफाई बनाए रखना एक कठिन और खर्चीला काम है। इस अभियान ने गांधी की तौहीन की। गांधीजी की विराट भूमिका को केवल साफ.सफाई तक सीमित कर दिया गया। सरकार ने क्रिसमस के त्योहार का महत्व घटाने की कोशिश भी की। इसके लिए 25 दिसंबर को सुशासन दिवस मनाया गया।
हमें क्या करना चाहिए
हाशिए पर पड़े वर्गों के कुछ हिस्सेए विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले लोगों का मोदी सरकार से मोहभंग हो रहा है। हम यह नहीं कहते कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए की सरकार का प्रदर्शन बेहतरीन था। परंतु यह सरकार उससे भी बुरी साबित हुई है।
दलितए आदिवासी, श्रमिक व छोटे व सीमांत कृशकों जैसे वंचित समुदायों के लिए अच्छे दिन केवल सरकार की नीतियों के प्रभाव से उन्हें परिचित करवाने से नहीं आएंगे। इन वर्गों के लोगों को साम्प्रदायिकता की अफीम चटाई जा रही है ताकि वे अपनी समस्याओं के असली स्त्रोत को न पहचान सकें और एक दूसरे वंचित तबके.अल्पसंख्यकों.को अपना शत्रु समझ लें। साम्प्रदायिक राजनीति का मूलमंत्र ही यह है कि समाज के एक वंचित व दमित तबके को दूसरे वंचित व दमित तबके से भिड़ा दिया जाए। दरअसल सबसे राक्षसी कुटिलता वाली शासन प्रणाली वह नहीं होती जिसमें ऊपर बैठे लोग नीचे वालों को नियंत्रित करते हैं बल्कि वह होती है जिसमें ऊपर बैठे लोग सभी को आपस में लड़वाते रहते हैं।
हमें लोगों की भौतिक जिंदगी बेहतर बनाने के लिए तो लड़ना ही हैए हमें अपनी संस्कृति व परंपराओं का आलोचनात्मक परीक्षण भी करना होगा। भारत विविधताओं का देश है और हमें ऐसी शिक्षा व्यवस्था की जरूरत है जो विद्यार्थियों को विविधता और बहुवाद का सम्मान करना सिखाए।
----------इरफान इंजीनियर

कोई टिप्पणी नहीं: