नरेन्द्र मोदी की जगह अगर भारत के प्रधानमंत्री आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत होते तो नागपुर से सन्देश सरकार को देने के लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता . अयोध्या में राम मंदिर, संविधान से अनुच्छेद 370 का खात्मा, पूर्ण गौहत्या निषेध के साथ देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने में कोई परेशानी या दिक्कत नहीं होती . नरेन्द्र मोदी बड़े हैं या मोहन भगवत ? शुक्रवार, 14 नवंबर 2014
बाल दिवस पर विशेष-नरेन्द्र मोदी बड़े या मोहन भागवत
नरेन्द्र मोदी की जगह अगर भारत के प्रधानमंत्री आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत होते तो नागपुर से सन्देश सरकार को देने के लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता . अयोध्या में राम मंदिर, संविधान से अनुच्छेद 370 का खात्मा, पूर्ण गौहत्या निषेध के साथ देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने में कोई परेशानी या दिक्कत नहीं होती . नरेन्द्र मोदी बड़े हैं या मोहन भगवत ? शुक्रवार, 24 जनवरी 2014
देश को कसाईखाना मत बनाइये
रविवार, 29 सितंबर 2013
मुखौटा युद्ध प्रारंभ
भारतीय राजनीति में मुखौटा युद्ध प्रारंभ हो चुका है। २०१४ के संसदीय चुनाव में इजारेदार कंपनियों उद्योगपतियों ने एक राहुल नाम का मुखौटा तैयार कराया है और एक नरेन्द्र मोदी नाम का चाहे यह मुखौटा पसंद करो चाहे वह मुखौटा पसंद करो. मुखौटों को पसंद कराने के लिए लाखों करोड़ रुपये खर्च किये जा रहे हैं प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया व अन्य प्रचार माध्यमो का भरपूर उपयोग खरीद कर किया जा रहा है. इस युद्ध में सत्तर प्रतिशत भारतियों की बात ही नहीं की जा रही है। भावनात्मक सवालों को उठा कर जनता के जल, जंगल, जमीन पर कब्जे की तैयारियां की जा रही हैं साम्राज्यवादी ताकतों का समर्थन प्राप्त करने के लिए उक्त मुखौटाधारी उनके विश्वासपात्र बनने के लिए कसमें खा रहे हैं, जनता मंत्रमुग्ध है। महंगाई, बेरोजगारी, भुखमरी, शोषण, अत्याचार, उत्पीडन सब समाप्त हो गया है और मोदी चुनो या राहुल। प्राकृतिक संपदाओं पर इजारेदार कंपनियों के नाम कर दिया जायेगा और आप विस्थापित हो जायेंगे आपको मुफ्त भोजन मिल जायेगा और पालतू जानवरों की तरह आप दुम हिलाते नजर आयें इसकी पूरी सम्भावना है कि इस चुनाव के बाद चाहे यह मुखौटा जीत कर आये, चाहे वह मुखौटा जीत कर आये करने की व्यवस्था हो गयी है। आम आदमी का का और उसके मत का कोई अर्थ नहीं रह जायेगा क्यूंकि सम्मोहन करने वाले जादूगर अपने-अपने आकाओं की तरफ से जादू का प्रदर्शन कर रहे हैं
इसी कड़ी में मोदी के रैली स्थल पर 20 एलईडी लगाए जाएंगे। दिल्ली की प्रमुख जगहों पर 100 एलईडी लगे हुए है जिस पर मोदी का भाषण लाइव दिखाया जाएगा। इस रैली में 20 हजार से ज्यादा मुस्लिम भी जुटेंगे, छात्रों के लिए विशेष युवा पास बनाए गए हैं जबकि वरिष्ठ नागरिकों के लिए ई-रिक्शा की व्यवस्था की गई है।
बुधवार, 21 अगस्त 2013
सरदार पटेल और संघ परिवार
स्मारक इसलिए बनाए जाते हैं ताकि किसी महान आंदोलन या व्यक्ति की स्मृति जीवित रहे और लोगों को सद्कार्य करने की प्रेरणा दे। परंतु दमनकारी व अत्याचारी शासक भी स्मारक बनाते हैं ताकि वे लोगों पर अपनी धाक और रौब जमा सकें और उन्हें अपने सामने बौना दिखा सकें। सच तो यह है कि दमनकारी शासकों ने अत्यंत भव्य स्मारक बनाए ताकि वे दुनिया को दिखा सकें कि वे कितने शक्तिशाली हैं और अनंतकाल तक बने रहेंगे। अमेरिका की स्टेच्यू आॅफ लिबर्टी पहली श्रेणी का स्मारक है जबकि पदानुक्रम पर आधारित सामंती समाजों के अत्याचारी शासकों द्वारा निर्मित भव्य धार्मिक स्मारक, दूसरी श्रेणी में आते हैं। मोदी जो स्मारक बनाने वाले हैं, वह किस श्रेणी में आएगा यह तो समय आने पर ही पता चल सकेगा। परंतु एक बात निर्विवाद है और वह यह कि सरदार पटेल का स्मारक बनाना एक बात है और उनके द्वारा दिखाए गए सुशासन के रास्ते पर चलना दूसरी बात।
संघ परिवार और विशेषकर मोदी, सरदार पटेल की छवि का दुरूपयोग मुख्यतः दो उद्धेश्यों से करते हैं।
1. सरदार, नेहरू-गांधी परिवार के सदस्य नहीं थे और इसलिए संघ परिवार उनका इस्तेमाल, नेहरू और गांधी के स्वाधीनता संग्राम में योगदान को कम करके दिखाने और अंततः कांग्रेस का विरोध करने के लिए करना चाहता है। संघ परिवार को कांग्रेस के एक गैर नेहरू-गांधी नेता को अपना नायक इसलिए बनाना पड़ रहा है क्योंकि उसके पास स्वयं का कोई नायक है ही नहीं। आरएसएस ने तो स्वाधीनता आंदोलन का विरोध किया था और कांग्रेस द्वारा 1942 में दिए गए ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो‘ के नारे से अपनी असहमति सार्वजनिक रूप से व्यक्त की थी। मुस्लिम लीग की तरह, संघ ने भी ब्रिटिश साम्राज्यवादियों का साथ दिया था। हिन्दुत्ववादी नायक सावरकर ने तो अंग्रेजों से माफी तक मांगी थी। सावरकर ने ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों में भाग लेने की अपनी ‘भूल‘ के लिए उन्हें अंडमान के सेल्यूलर जेल में दी गई कालेपानी की सजा माफ करने की अंगे्रज सरकार से भीख मांगी थी। निःसंदेह, सरदार के नेहरू से मतभेद थे; परंतु वे मतभेद उतने गहरे और मूलभूत नहीं थे जितने कि सरदार और संघ परिवार में थे। संघ परिवार, नेहरू और सरदार के मतभेदों का इस्तेमाल, उन्हें एक ऐसे नायक के रूप में प्रस्तुत करने के लिए करना चाहता है जिसने नेहरू को चुनौती दी और उनका विरोध किया।
2. सरदार के निजाम-शासित हैदराबाद राज्य को भारत में विलीन करवाने के सफल अभियान को संघ, मुसलमानों को उनकी औकात बताने वाले कदम के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है। सच यह है कि सरदार हैदराबाद ही नहीं, पूरे भारत के मुसलमानों की सुरक्षा और बेहतरी की गारंटी देने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे।
मोदी के पास सरदार के नाम का इस्तेमाल करने का एक अतिरिक्त कारण यह है कि सरदार गुजराती थे और मोदी स्वयं को गुजराती अस्मिता के एकमात्र प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं। मोदी चाहते हैं कि उन्हें भी सरदार की तरह ‘लौह पुरूष‘ का दर्जा मिले। अक्सर समाज में अराजकता फैलने का भय दिखाकर, कमजोर वर्गों के मन में यह बैठा दिया जाता है कि देश को अब एक तानाशाह ही बचा सकता है।
सरदार व हिन्दू मुस्लिम एकता
सरदार को अपनी हिन्दू विरासत पर गर्व था परन्तु वे बहुत धार्मिक नहीं थे। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि उनका हिन्दू धर्म, संकीर्ण नहीं था और अन्य धर्मों का सम्मान करता था। उन्होंने भारत के मिलेजुले चरित्र को स्वीकार किया था। परन्तु वे अल्पसंख्यकों से यह अपेक्षा रखते थे कि उन्हें भी यह स्वीकार करना चाहिए कि वे इस देश का अभिन्न अंग हैं। सरदार, संघ परिवार के हिन्दू राष्ट्रवाद के राजनैतिक लक्ष्य के विरूद्ध थे। सन् 1949 में उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह घोषित किया कि हिन्दू राष्ट्र का विचार पागलपन है और वह भारत की आत्मा को मार देगा। उनका राष्ट्रवाद समावेशी था और उसमें जातिगत या नस्ल-आधारित संकीर्णता के लिए कोई जगह नहीं थी। गांधी जी ने एक बार सरदार के बारे में कहा था, ‘‘मैं सरदार को अच्छी तरह से जानता हूँ। हिन्दू-मुस्लिम प्रश्न व कई अन्य मुद्दों पर उनकी सोच मुझसे और पंडित नेहरू से काफी अलग है। परन्तु यह कहना कि वे मुस्लिम-विरोधी हैं, सत्य का मखौल बनाना होगा। सरदार का दिल इतना बड़ा है कि उसमें सब समा सकते हैं।’’ एक बार इस आरोप के संदर्भ में कि उनके बहुत सारे मुसलमान दोस्त हैं, सरदार ने कहा कि ‘‘मैं अच्छे मुसलमानों के जितने करीब आता जाउंगा, मैं मुसलमानों और उनके कामों का उतना ही न्यायपूर्ण आंकलन कर सकूंगा। मुझे मुसलमानों को यह साबित करना होगा कि मैं उनसे उतना ही प्रेम करता हूँ जितना कि हिन्दुओं से’’।
जयप्रकाश नारायण और यहां तक कि राममनोहर लोहिया की ऐसी मान्यता थी कि सरदार, राजनैतिक दृष्टि से विशुद्ध हिन्दू थे। परन्तु हिन्दुत्व विचारधारा के समर्थक नाथूराम गोडसे द्वारा गांधीजी की हत्या के बाद सरदार में काफी परिवर्तन आया और उन्होंने अल्पसंख्यकों व विशेष रूप से मुसलमानों को, यह आश्वासन दिया कि वे उनके सच्चे मित्र हैं। नेहरू के साथ उनके मतभेद भी धीरे-धीरे समाप्त हो गए। सरदार ने पाकिस्तान और भारत के बीच नेहरू-लियाकत समझौते का समर्थन किया, जिसके अंतर्गत दोनों देशों ने अपनी अपनी अल्पसंख्यक आबादी की सुरक्षा की गारंटी दी थी।
संविधानसभा में मुस्लिम प्रतिनिधियों द्वारा पृथक मताधिकार की मांग छोड़ देने के बाद, सरदार ने हिन्दुओं को चेताया कि अल्पसंख्यकों ने उनमें एक पवित्र विश्वास व्यक्त किया है और उन्हें अल्पसंख्यको के इस भरोसे पर खरा उतरना चाहिए। उन्होंने चेतावनी भरे शब्दों में कहा, ‘‘असंतुष्ट अल्पसंख्यक एक बोझ और एक खतरा होते हैं और हमें तब तक अल्पसंख्यकों की भावनाओं को चोट पहुंचाने वाला कोई काम नहीं करना चाहिए, जब तक कि उनका व्यवहार अत्यंत अनुचित न हो’’। उन्होंने यह भी कहा कि ‘‘बहुसंख्यक समुदाय का यह कर्तव्य है कि वह अपने उदारतापूर्ण आचरण से, अल्पसंख्यकों में विश्वास पैदा करे। अल्पसंख्यक समुदायों का यह कर्तव्य है कि वे गुजरी बातों को भूल जाएं’’। ‘‘हम बहुसंख्यकों को सोचना होगा कि अल्पसंख्यक क्या महसूस कर रहे हैं। हमें यह भी कल्पना करनी होगी कि उनके साथ जैसा व्यवहार हो रहा है, वैसा अगर हमारे साथ होता तो हम कैसा महसूस करते’’।
सरदार ने अपने धर्म में आस्था रखने व उसका अनुपालन करने के अधिकार के अतिरिक्त, अपने धर्म का प्रचार करने के अधिकार को भी धार्मिक स्वतंत्रता के मूल अधिकार का हिस्सा बनाने के लिए अपनी पूरी प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी। धर्मप्रचार के अधिकार को मूल अधिकार बनाने के प्रस्ताव का बहुसंख्यक समुदाय के दक्षिणपंथियों द्वारा कड़ा विरोध किया जा रहा था। सरदार ने यह भी सुनिश्चित किया कि अल्पसंख्यकों को उनकी विशिष्ट भाषा, लिपि व संस्कृति का संरक्षण करने का अधिकार मिले और भाषायी व धार्मिक अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना करने और उन्हें चलाने का संवैधानिक हक उपलब्ध हो।
सरदार और सांप्रदायिक दंगे
जब सन् 1947 में दिल्ली में सांप्रदायिक दंगे भड़के, तब अपने असमझौतावादी व त्वरित निर्णय लेने के स्वभाव के अनुरूप, सरदार ने कड़ी कार्यवाही करने की वकालत की, फिर चाहे उसके नतीजे कुछ भी हों। अगर इस प्रयास में कुछ लोग मारे जाते हैं तो सरदार उसके लिए भी तैयार थे। हत्यारों, लुटेरों, चोरों और आगजनी करने वालों के खिलाफ प्रभावी कार्यवाही करने के प्रयास में यदि कुछ निर्दोषों की जान जाती है तो यह भी सरदार को स्वीकार्य था। अगर सरदार को गुजरात के सन् 2002 के दंगों से निपटना पड़ता, तो वे क्या करते? वे शायद कुछ ही घंटो के भीतर दंगाग्रस्त इलाकों में सेना की तैनाती कर देते। यह तो सुनिश्चित है कि साबरमती एक्सप्रेस में जलकर मरे लोगों की लाशों का जुलूस निकालने के लिए वे उन्हें विश्व हिन्दू परिषद को नहीं सौंपते और ना ही खुले में इन शवों का पोस्टमार्टम होने देते। मोदी ने दंगा पीडि़तों के किसी शिविर में जाने की जहमत नहीं उठाई। इसके ठीक विपरीत, सरदार को जैसे ही यह खबर मिली की हजरत निजामुद्दीन की दरगाह में शरण लिये हुए हजारों मुसलमान आतंकित और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, वे तुरंत दरगाह पहंुचे। उन्होंने दरगाह में लगभग 45 मिनट बिताए। पूरी श्रद्धा से दरगाह में नमन किया और मुसलमानों की सुरक्षा के पूरे इंतजामात करके ही लौटे।
पूर्वी पंजाब में सिक्ख बहुत गुस्से में थे। उनकी आंखों में खून उतर आया था। सरदार इलाके के कई शहरों में स्वयं पहुंचे। इस यात्रा के दौरान, 30 सितम्बर 1947 को, उन्होंने सिक्खों से यह अपील की कि वे भारत की इज्जत पर बट्टा न लगाऐं और उसकी शान को कलंकित न करें। उन्होंने कहा ‘‘वीरों को यह शोभा नहीं देता कि वे निर्दोष और निहत्थे पुरूषों, महिलाओं और बच्चों का कत्ल करें’’। उनके प्रयास का अपेक्षित नतीजा निकला और पूर्वी पंजाब के मुस्लिम शरणार्थियों को सुरक्षित पश्चिमी पंजाब जाने दिया गया। इसकी तुलना करंे मोदी से, जिन्होंने सन् 2002 के गुजरात दंगों को क्रिया-प्रतिक्रिया के सिद्धांत के आधार पर औचित्यपूर्ण ठहराया और कफ्र्यू लगाने में देरी की।
25 अक्टूबर, 1947 को छत्तारी के नवाब को लिखे अपने पत्र से सरदार ने उनका दिल जीत लिया। उन्होंने नवाब को यह आश्वासन दिया कि भारत में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की जाएगी और यह कि भारत कभी धर्म-आधारित राष्ट्र नहीं बनेगा। विभाजन के कारण पैदा हुई कटुता और मुस्लिम लीग द्वारा फैलाये गए साम्प्रदायिकता के जहर के बावजूद, न तो सरदार और ना ही कांग्रेस, भारत को धर्म-आधारित राष्ट्र बनाने पर विचार तक करने को तैयार थे। हैदराबाद और जूनागढ़ के जिद्दी नवाबों ने जब प्रेम और तर्क की भाषा सुनने से इंकार कर दिया तब सरदार ने बलप्रयोग कर उनके राज्यों को भारत में मिलाया। परंतु बलप्रयोग करने के पहले, उन्होंने इन राज्यों के आम मुस्लिम रहवासियों का भरोसा जीता और इसलिए आमजनों ने भारत सरकार द्वारा बलप्रयोग का स्वागत किया।
एक और घटना का हम यहां संक्षिप्त विवरण देना चाहेंगे। नेहरू की तरह, सरदार भी बाबरी मस्जिद में रात के अंधेरे में भगवान राम की मूर्तियां स्थापित किए जाने से अत्यंत उद्वेलित थे। उन्होंने उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री गोविन्दबल्लभ पंत को बल के एकतरफा प्रयोग का मुकाबला बल से करने की सलाह दी। इसके विपरीत, संघ परिवार ने बाबरी मस्जिद को ढहाने के लिए आक्रामकता और एकतरफा बल प्रयोग को तवज्जो दी।
अतः हम बिना किसी दुविधा के यह कह सकते हैं कि सरदार के विचार, मोदी और संघ परिवार की सोच से कतई नहीं मेल खाते। बल्कि, सरदार और संघ परिवार के विचार परस्पर विरोधी हैं। सरदार धर्मनिरपेक्ष भारत और सांझा भारतीय राष्ट्रवाद के हामी थे। यही कारण है कि महात्मा गांधी की हत्या के बाद, सरदार ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया और यह प्रतिबंध तभी उठाया गया जब आरएसएस ने वायदा किया कि वह अपनी गतिविधियां केवल संस्कृति के क्षेत्र तक सीमित रखेगा। आरएसएस पर अन्य कड़ी शर्ते भी लगाई गईं। आरएसएस ने न तो इन शर्तों को निभाया और ना ही सरदार से किए गए अपने वायदों को। इस सब से यह संदेह होना स्वभाविक है कि सरदार का स्मारक बनाने के पीछे संघ परिवार व मोदी का कुछ और ही उद्देश्य है। यह तो स्पष्ट है कि संघ परिवार सरदार के आदर्शों पर नहीं चलना चाहता। वह तो केवल यह चाहता है कि लोग संघ परिवार के नकली लौह पुरूषों के झांसे में फंसे रहें।
-इरफान इंजीनियर
गुरुवार, 11 जुलाई 2013
साम्प्रदायिकता नई रणनीतियां
साम्प्रदायिक संगठन अक्सर यह प्रचार व दावा करते हैं कि चूंकि देश में कोई बड़ा दंगा नहीं हो रहा है इसलिए यहां शांति है। वे यह भी कहते हैं कि चूंकि शांति है इसलिए प्रस्तावित साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निरोधक विधेयक या साम्प्रदायिक दंगों से निपटने के लिए किसी अन्य विशेष कानून की आवश्यकता नहीं है। बल्कि, उनके अनुसार, इस तरह का कानून, साम्प्रदायिक खाई को और गहरा करेगा और उन घावों को फिर से कुरेदेगा, जो धीरे.धीरे भर रहे हैं।
यह सच है कि सन् 2002 के बाद से गुजरात जैसे दंगे देश में नहीं हुए हैं। परन्तु यही बात अहमदाबाद के 1969 के दंगे, जिसमें आधिकारिक अनुमानों के अनुसार 2000 लोग मारे गए थे, और 1970 में हुए इतने ही भयावह भिवण्डीए जलगांव, महाड़ दंगों के बारे में भी सच है। इन दंगों के बाद, लगभग 14 साल तकए देश में कोई बड़ा दंगा नहीं हुआ। सन् 1984 में दिल्ली, अहमदाबाद, भिवण्डी और मुम्बई में दंगे भड़क उठे। सन् 1980 के दशक में गोधराए मेरठ, मलियाना, मुरादाबाद, अलीगढ़, भागलपुर आदि में छोटे.बड़े दंगे हुए। इन दंगों की पृष्ठभूमि में था उच्चतम न्यायालय के शाहबानो मामले में निर्णय का विरोध और अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिराकर उसके स्थान पर राममंदिर बनाने का आंदोलन। बाबरी मस्जिद को जमींदोज करने के अभियान के नतीजे में उत्तर और पश्चिमी भारत के कई शहरों, जिनमें मुंबई, अहमदाबाद और सूरत शामिल हैंए में दंगे हुए।
हमारे देश में विभिन्न जातियों और समुदायों को उपलब्ध अवसरों और विकास के फलों में अपनी हिस्सेदारी का दावा करने के लिए जिस ढंग से उत्प्रेरित किया जाता हैए उससे बेशक यह नतीजा निकाला जा सकता है कि साम्प्रदायिक हिंसा चक्रीय और आवर्ती है। चक्र की अवधि कम.ज्यादा हो सकती है परन्तु हिंसा की तीव्रता में केवल बढ़ोत्तरी ही होती है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि वर्तमान में देश में जो साम्प्रदायिक शांति है, वह एक तरह से तूफान के पहले की शांति है। यह महत्वपूर्ण है कि शांति के इस दौर में भी कम से कम आठ स्थानों पर दंगे हुए हैं, जिनमें उत्तरप्रदेश के कई नगर और महाराष्ट्र का धुले शामिल है। इस संदर्भ में यह भी कहा जा रहा है कि समाज का साम्प्रदायिकीकरण और धु्रवीकरण करने के लिएए साम्प्रदायिक संगठनों की दंगों पर निर्भरता कम होती जा रही है।
साम्प्रदायिक संगठन इस मिथक का भरपूर प्रचार करते हैं कि साम्प्रदायिक दंगे किसी भयावह घटनाक्रम की स्वभाविक जनप्रतिक्रिया होते हैं.वह घटना इन्दिरा गांधी या स्वामी लक्ष्मणानन्द की हत्या हो सकती है या साबरमती एक्सप्रेस के कोच में आगजनी। सच यह है कि साम्प्रदायिक हिंसा हमेशा जानते.बूझते भड़काई जाती है और इसका उद्देश्य पहले से तय लक्ष्यों को पाना होता है। पॉल ब्रास के अनुसार, स्वतंत्रता के बाद से देश के कुछ क्षेत्रों विशेषकर उत्तरी व पश्चिमी राज्यों में, एक ष्संस्थागत दंगा व्यवस्था अस्तित्व में आ गई है, जिसे चुनाव के समय या राजनैतिक आवश्यकता पड़ने परए सक्रिय किया जा सकता है। साम्प्रदायिक हिंसा कभी स्वस्फूर्त नहीं होती। एक दंगे के उत्पादन के लिएए ब्रास कहते हैं, कई काम करने होते हैं। इनमें शामिल हैं अफवाहें फैलाना, सूचनाओं का आदान.प्रदान, उत्तेजक भाषणबाजी, दंगाईयों की भर्ती और हिंसा शुरू करवाने के लिए पूर्व.नियोजित हरकत। दंगा कैसे शुरू किया जायेगा, इसकी बाकायदा रिहर्सलें होती हैं और उचित समय परए जब वातावरण हिंसा भड़काने के अनुकूल हो और रास्ते में कोई बड़ी बाधा न होए दंगे शुरू कर दिये जाते हैं। भारत में साम्प्रदायिक दंगे भड़काने के पीछे उद्देश्य होता है साम्प्रदायिक पहचान को, भाषायी, लैंगिक व नस्लीय पहचानॉ की तुलना में, अधिक मजबूती देना। इस मामले में दो व्यक्तियों का एक ही व्यवसाय में होना या किसी एक क्लब का सदस्य होना या कलाप्रेमी होना महत्व नहीं रखता। महत्व रखता है सिर्फ उनका धर्म। साम्प्रदायिक दंगे इसलिए भी करवाये जाते हैं ताकि दमित, दलित और आदिवासी, इस तथ्य को नजरअंदाज कर, कि उनके साथ जाति.आधारित पदानुक्रम के चलते किस कदर भेदभाव किया जाता है, अपनी साम्प्रदायिक पहचान को गले लगा लें और उच्च जातियों के हित में काम करें।
साम्प्रदायिक हिंसा इसलिए भी किसी व्यक्ति की साम्प्रदायिक पहचान को उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण बना देती है क्योंकि उसे लगता है कि उसके धर्म के कारण उसे मौत के घाट उतारा जा सकता है। हिंसा के दौरान दूसरे का भय अपने सबसे उच्च स्तर पर रहता है। हमारे समुदाय का हर व्यक्ति हमें मित्र नजर आता है और दूसरे समुदाय का प्रत्येक व्यक्ति, शत्रु। यही कारण है कि दंगों के दौरान लोग अजनबियों की भी धार्मिक पहचान जानने के लिए व्यग्र रहते हैं। दंगों के खत्म हो जाने के बाद भी उनके दौरान जाग्रत हुई साम्प्रदायिक चेतना और भय का भाव खत्म नहीं होता। साम्प्रदायिक शक्तियां इस चेतना को अनवरत प्रचार और कई तरह के मिथक फैलाकर जिंदा रखती हैं। दूसरे समुदाय को खतरा बताया जाता है। इस तरहए साम्प्रदायिक हिंसा से साम्प्रदायिक पहचान मजबूत होती है और सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक क्षेत्रों में अपने समुदाय के व्यक्ति को प्राथमिकता देने और दूसरे समुदाय के व्यक्तियों के साथ भेदभाव करने की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। इससे समाज बंट जाता है व साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद को वैधता मिलती है और धर्मनिरपेक्ष व समावेशी राष्ट्रवाद की परिकल्पना में लोगों का विश्वास घटता है। प्रजातंत्र और स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व के मूल्यों में विश्वास में कमी आती है। इस तरह, साम्प्रदायिक दंगे समाज का साम्प्रदायिकीकरण करते हैं।
नई रणनीति
चूँकि पहले साम्प्रदायिक ताकतों के समर्थक इतनी बड़ी संख्या में नहीं थे कि वे बिना दंगों का सहारा लिए समाज की सोच को अपनी विचारधारा के अनुरूप बना सकें इसलिए पहले बड़े और भयावह दंगे करवाना आवश्यक होता था। पॉल ब्रास के शब्दों मेंए दंगों के उत्पादन से साम्प्रदायिक संगठनों को मीडिया के एक हिस्से में कवरेज मिलता था व वे राष्ट्र का ध्यान अपनी ओर खींचने में सफल रहते थे। दंगों और मीडिया.दोनों का इस्तेमाल समाज में साम्प्रदायिकता की जड़ें मजबूत करने के लिये किया जाता था। परन्तु हाल के कुछ वर्षों में, साम्प्रदायिक संगठनों ने एक नई रणनीति अपना ली है, जिसके तहत उन्हें समाज का साम्प्रदायिकीकरण करने के लिए बड़े पैमाने पर दंगे करवाना आवश्यक नहीं रह गया है। कहना ना होगा कि दंगे करवाने के अपने खतरे थे। कई बार मीडिया हिंसा के खिलाफ हो जाता था, कई बार अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन सामने आ जाते थे, कई बार उच्च न्यायपालिका सहित देश की अन्य संस्थाएं समस्याएं खड़ी करती थीं तो कई बार प्रधानमंत्री या अन्य उच्च राष्ट्रीय पदों पर काबिज होने के महत्वाकांक्षी नेता भी परेशानी का सबब बन जाते थे।
अब साम्प्रदायिक दंगें भड़काकर, कुछ समय के लिए अल्पसंख्यकों को आतंक के साए में रखने की बजाए, साम्प्रदायिक शक्तियां, इस्लामिक आंतकवाद के भेस मेंए हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों पर आतंकी हमले कर रही हैं और इस तरह समाज को लगातार आतंक के साये में जीने पर मजबूर कर रही हैं।
हिन्दुत्व की विचारधारा से प्रेरित आतंकवादियों के अस्तित्व का पहली बार पता तब चला जब 6 अप्रैल 2006 को बम बनाने के दौरान हुए विस्फोट में बजरंग दल के दो कार्यकर्ता मारे गए। इनमें से एक का नाम राजकोंडवार था। पुलिस को जांच के दौरान उस स्थान से कुछ मस्जिदों के नक्शे और मुसलमानों के पारम्परिक परिधान भी मिले। बम धमाके में घायल राहुल पांडे ने पुलिस के समक्ष स्वीकार किया कि उसने और उसके साथियों ने पहले भी कई बम बनाए थे। जनवरी 2008 में तमिलनाडु के तेनकासी में आरएसएस के कार्यालय और बस स्टेण्ड के समीप बम रखने के आरोप में हिन्दू मुनानी के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। उनका मानना था कि बम लगाने के लिए स्वाभाविकतः मुस्लिम संगठनों को दोषी ठहराया जायेगा और इससे हिन्दू उनके खिलाफ भड़केंगे। 24 अगस्त 2008 को कानपुर में बम बनाते समय दो बजरंग दल कार्यकर्ता मारे गए। बजरंग दल का इरादा पूरे उत्तरप्रदेश में भारी बम विस्फोट करने का था।
सन् 2010 में 30 अप्रैल को आरएसएस से लंबे समय तक जुड़े रहे देवेन्द्र गुप्ता विष्णु प्रसाद और चन्द्रशेखर पाटीदार को अक्टूबर 2007 में अजमेर शरीफ में बम रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। ऐसा कहा जाता है कि इन्हीं लोगों ने हैदराबाद की मक्का मस्जिद में भी बम विस्फोट किया था जिसके सिलसिले में कई निर्दोष मुस्लिम युवकों को पुलिस ने हिरासत में लिया और उन्हें जमकर शारीरिक यंत्रणा दी गई। गोवा के मारमागोवा में 16 अक्टूबर 2009 को हुए विस्फोट में दो व्यक्ति मारे गए। एनआईए ने इस घटना में प्रशांत जावडेकर ;रत्नागिरी सारंग कुलकर्णी ;पुणे जयप्रकाश उर्फ अन्ना ;मेंगलोर व एक अन्य अज्ञात व्यक्ति को आरोपी बनाया। मालगोंडा पाटिल और योगेश नायक नामक दो व्यक्ति एक बोरी में विस्फोटक भरकर स्कूटर से ले जा रहे थे तभी उनमें विस्फोट हो गया। यह घटना तब हुई जब मारमागोवा में एक धार्मिक पर्व चल रहा था जिसमें बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक.स्वरूप नरकासुर के पुतले जलाए जाते हैं। पुलिस ने इस घटना के लिए सनातन संस्था नामक दक्षिणपंथी हिन्दू संगठन को दोषी ठहराया। इस संगठन का मुख्यालय गोवा के पोंडा क्षेत्र में स्थित रामनाथी नगर था जो कि अपने मंदिरों के लिए जाना जाता है।
इसी तरहए सन् 2008 में सनातन संस्था के 6 सदस्यों को वाशी ;ठाणे में एक सभागार में बम रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। 30 अगस्त 2011 को ठाणे की सेशन्स अदालत ने सनातन संस्था के रमेश गडकरी और विक्रम भावे को बम रखने का दोषी पाया और उन्हें दस वर्ष के कारावास की अधिकतम सजा सुनाई। एनआईए के अधिकारियों ने इस संस्था के मुख्यालय पर अक्टूबर 2011 में छापा मारा। संस्था की गतिविधियों की जांच जारी है। इन दोनों घटनाओं में निशाने पर मुसलमान नहीं थे परन्तु विस्फोट करने वाले यह जानते थे कि घटनाओं का दोष मुस्लिम संगठनों पर मढ़ा जायेगा।
आईबी व एटीएस के एक हिस्से का साम्प्रदायिकीकरण
जहां एक ओर साम्प्रदायिक संगठनों ने आतंकवाद और बम विस्फोटों के जरिए मुसलमानों को खलनायक और दानव सिद्ध करने की कोशिश की वहीं उन्होंने सुरक्षाबलों में ऐसे लोगों की घुसपैठ करवाई जिनकी मानसिकता साम्प्रदायिक थी। ये लोग अपने पद व शक्तियों का दुरूपयोग कर निर्दोष मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार करते उन्हें सीमा पार से आया ऐसा आतंकवादी बताते जिसके निशाने पर नरेन्द्र मोदी या कोई अन्य महत्वपूर्ण व्यक्ति या कोई सामरिक महत्व का स्थान था व मुठभेड़ के नाम पर उनकी हत्या कर देते। यह सिलसिला लम्बे समय से चल रहा था और चलता ही रहता यदि सोहराबुद्दीन के भाई ने भारी मुसीबतों को झेलते हुए लम्बी कानूनी लड़ाई न लड़ी होती। यह इस तथ्य के बावजूद कि इस घटना में शामिल व्यक्ति अत्यंत शक्तिशाली व प्रभावशाली थे और उनके हाथ बहुत लंबे थे। सोहराबुद्दीन की तरह ही इशरत जहां,जावेद शेख और दो अन्यों को, जिनमें से एक का नाम सादिक जमाल था, मौत के घाट उतार दिया गया था। इशरत जहां की हत्या की सीबीआई द्वारा की गई जांच में यह सामने आया कि उसमें गुजरात के पुलिस महानिदेशक पद से सेवानिवृत्त पीपी पाण्डेय का हाथ था। फर्जी मुठभेड़ में आई.बी. के अधिकारी राजेन्द्र कुमार की क्या भूमिका थी,इसकी जांच जारी है। राजेन्द्र कुमार ने वे गुप्तचर सूचनाएं उपलब्ध करवाईं थीं जिनके आधार पर हत्या को मुठभेड़ साबित किया गया। राजेन्द्र कुमार ने ही कथित रूप से उन एके.47 बंदूकों का इंतजाम करवाया, जिन्हें इशरत जहां व अन्य मृतकों की लाशों के पास रख दिया गया। गुजरात के गृह मंत्री और नरेन्द्र मोदी के विश्वस्त अमित शाह को सोहराबुद्दीन,कौसर बानो और तुलसीराम प्रजापति की हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया।
निर्दोष मुसलमानों की फर्जी मुठभेड़ों में हत्या को पूरे देश में मीडिया के जरिए प्रचारित करवाया जाता। जो कुछ पुलिस कहती,मीडिया उसे सौ प्रतिशत सत्य मानकर निगल लेती। इस तरह की घटनाओं के मीडिया द्वारा बिना कोई संदेह व्यक्त किए कवरेज करने और इन घटनाओं पर टीवी में बहस मुबाहिसों के लंबे सिलसिलों के चलते, टीवी का एक आम दर्शक यह मानने पर मजबूर हो जाता कि सभी आतंकवादी मुसलमान होते हैं। नरेन्द्र मोदी और एलके आडवाणी जैसे नेतागण इसी बात को लगतार दोहराते रहते हैं। इस प्रकार, मुसलमानों के प्रति घृणा पैदा करने के लिएए दंगें भड़काने की बजाए, उन पर आतंकवादी होने का लेबल चस्पा करना शुरू कर दिया गया। फर्जी मुठभेड़ों का एक और लाभ था। जो लोग कथितआतंकवादियों के निशाने पर बताये जाते थे, वे नायक के रूप में उभरते थे और उन्हंे लौहपुरूष बताया जाता था।
निष्कर्ष
साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा अब यह रणनीति अपनाई जा रही है कि गुप्तचर एजेंसियों और आतंकवाद निरोधक दस्तों के एक हिस्से और मीडिया कवरेज के सहारेए अल्पसंख्यकों को देश के लिए बड़े खतरे के रूप में प्रस्तुत किया जाए। साम्प्रदायिक ताकतों ने अपनी विचारधारा से ओतप्रोत लोगों की घुसपैठ सुरक्षाबलों में करवाने में सफलता पा ली है। होता यह है कि आईबी का एक हिस्सा झूठी गुप्त सूचनाएं देता है और इन सूचनाओं पर तुरत.फुरत कार्यवाही करते हुए आतंकवादी निरोधक दस्ते, निर्दोष मुसलमानों काए उन्हें आतंकवादी बताकर,कत्ल कर देते हैं और यह दावा करते हैं कि उन्होंने देश को एक और आतंकी हमले से बचा लिया। उत्तरप्रदेश के निमेश आयोग ने ऐसे मुस्लिम युवकों की सूची तैयार की है जिन्हें धर्मनिरपेक्ष मायावती सरकार में आतंकवादी बताकर गिरफ्तार किया गया था। निमेश आयोग के अनुसारए खालिद मुजाहिद नामक एक युवक को भी बिना किसी सुबूत के गिरफ्तार किया गया था। बाद में पुलिस हिरासत में उसकी मौत हो गई। आम जनता के दिलो.दिमाग में फिरकापरस्ती का जहर इस हद तक भर दिया गया है कि आतंकवादी होने के आरोप में मुकदमों का सामना कर रहे मुस्लिम युवकों की पैरवी करने वाले वकीलों को उनके ही हम पेशा अदालतों के परिसरों में पीट रहे हैं और इस पर न तो समाज और ना ही न्यायपालिका अपेक्षित प्रतिक्रिया व्यक्त कर रही है। कम से कम किसी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय ने अदालतों की परिसरों में हो रही इस तरह की घटनाओं पर आपत्ति दर्ज नहीं की है। कतील सिद्दीकी को यरवदा जेल में मार डाला गया क्योंकि उसकी गवाही से हिमायत बेग, जिसे जर्मन बेकरी धमाकों के सिलसिले में फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है, निर्दोष साबित हो जाता। ऐसा लगता है कि नई रणनीति काम कर रही है परन्तु ऐसा कब तक होगा, कहना मुश्किल है। जो नागरिक प्रजातंत्र और उसकी संस्थाओं का सम्मान करते हैंए वे आखिर कब इस तरह की नंगी हिंसा के विरोध में अपनी आवाज बुलंद करेंगे? इसके पहले कि भारत एक फासीवादी देश बन जाए, हम सबको इस तरह की क्रूरता और अन्याय के विरूद्ध उठ खड़ा होना चाहिए।
-इरफान इंजीनियर
शनिवार, 6 जुलाई 2013
दुश्मन से यारी
क्या अल्पसंख्यकों को मोदी एण्ड कंपनी के जाल में फंसना चाहिए?
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सन् 2002 के कत्लेआम के बादए भारत, और विशेषकर गुजरात की राजनीति में एक नए सितारे का उदय हुआ.नरेन्द्र मोदी का। उनके प्रचारतंत्र के अथक प्रयासों से उनकी छवि एक ऐसे नेता की बना दी गई जो आर्थिक विकास का पुरोधा है, जिसे भ्रष्टाचार छू तक नहीं गया है और जो ,कड़े कदम उठाने से डरता नहीं है।
समाज के एक बड़े हिस्से ने इस प्रचार को आंख मूदकर निगल लिया है। मोदी ने भाजपा के अंदर भी दादागिरी करए स्वयं को सन् 2014 के चुनाव के लिए गठित चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष घोषित करवा लिया और अब वे इशारों ही इशारों में यह कह रहे हैं कि वे भाजपा.एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। इसी सिलसिले में वे मुसलमानों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए सम्मेलनों का आयोजन कर रहे हैं। वे भाजपा के नेताओं को भी यह सलाह दे रहे हैं कि वे अल्पसंख्यकों को स्वयं को जोड़ें।
इसी सिलसिले में, अहमदाबाद में विभिन्न समुदायों के लगभग 200 सामाजिक कार्यकर्ताओं और विद्वानों का सम्मेलन, हाल ;जून 2013द्ध में आयोजित किया गया। प्रतिभागियों में से 30 मुसलमान थे। कई मुस्लिम नेताओंए कार्यकर्ताओं और विद्वानों ने आयोजकों द्वारा बहुत जोर दिए जाने पर भीए सम्मेलन में हिस्सा लेने से इंकार कर दिया। उनका तर्क था कि मुसलमान नेताओं को अपने सम्मेलन में बुलाकर, मोदी अपनी साख बढ़ाना चाहते हैं। परन्तु किसी भी समुदाय या समूह के सभी लोगों के विचार एक से नहीं होते। कुछ मुस्लिम नेताओं ने सम्मेलन में भाग लेना स्वीकार कर लिया। उनमें से एक, सैयद जफर महमूद ने सम्मेलन में एक विस्तृत प्रस्तुतिकरण दिया। सम्मेलन से पहले महमूद से पूछा गया कि मोदी की नीतियों के कटु आलोचक होने के बावजूदए वे बैठक में हिस्सा क्योंकि ले रहे हैं। इस पर उनका उत्तर था कि उनसे यह प्रश्न तब पूछा जाए जब वे बैठक में अपनी बात रख चुकें। महमूद, सच्चर समिति में विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी थे और वर्तमान में "ज़कात फाउण्डेशन ऑफ इंडिया" के अध्यक्ष हैं।
शायद उन्होंने सम्मेलन में भागीदारी करना इसलिए उचित समझा होगा क्योंकि इससे उन्हें अपने समुदाय की बदहाली से मोदी को परिचित करवाने का मौका मिलता और वे मुसलमानों की समस्याओं को सामने ला पाते। महमूद ने अपने प्रस्तुतीकरण में मुस्लिम समुदाय की वर्तमान हालत पर विस्तार से प्रकाश डाला और भाजपा की उसकी नीतियों के आधार पर कड़ी आलोचना की। उनका प्रस्तुतीकरण शोधपूर्ण था। उन्होंने भाजपा को यह सलाह भी दी कि आने वाले समय में उसे क्या करना चाहिए। उनके प्रस्तुतीकरण का सार.संक्षेप यह था कि भाजपा, विचारधारात्मक स्तर पर ही मुस्लिम.विरोधी है। महमूद ने केवल देश के वंचित मुसलमानों के लिए न्याय और संवैधानिक अधिकारों की मांग ही नहीं की. उन्होंने भाजपा की अधिकृत वेबसाइट पर उपलब्ध सामग्री के आधार पर यह दर्शाया कि भाजपा, मुसलमानों से किस हद तक नफरत करती है। जैसे, उन्होंने कहा कि भाजपा की वेबसाइट पर उपलब्ध एक लेख, जिसका शीर्षक है, हिन्दुत्व,महान राष्ट्रीयतावादी विचारधारा, मुसलमानों के प्रति नफरत और उनके बारे में भड़काऊ बातों से भरपूर हैं। एक अन्य लेख, जिसका शीर्षक है गिव अज़ दिस डे अवर सेंस ऑफ मिशन व जिसे एमव्ही कामथ ने लिखा है, में मुसलमानों से आह्वान किया गया है कि वे हिन्दू नाम रखें और मुस्लिम महिलाओं को कहा गया है कि वे मंगलसूत्र पहनें। जिस तीसरे लेख से उन्होंने उद्धृण प्रस्तुत किए उसका शीर्षक है सेमिटिक मोनो थिएजम;यहूदी एकेश्वरवादद्। इस लेख में मुसलमानों और इस्लाम को पूरी दुनिया के लिए समस्या बताया गया है। लेख कहता हैए हम सबको यह समझना होगा कि परंपरावादी और परिवर्तन.विरोधी इस्लामिक समाज, भारत के लिए एक बड़ी समस्या है। इस्लाम के इस चरित्र को समाप्त कर समावेशी हिन्दुत्व की स्थापना की जानी आवश्यक है।
यहां तक तो सब ठीक है। ये सारी बातें सही हैं और बिना किसी शक.शुब्हे के मुस्लिम.विरोधी हैं। मुस्लिम समुदाय की हालत का बयान करते हुए महमूद ने यह मांग की कि उनकी बेहतरी के लिए नई योजनाएं लागू की जाएं और प्रभावी कदम उठाए जायें। उन्होंने मोदी से मांग की कि सच्चर समिति की रपट को लागू किया जाए। गुजरात उन चंद राज्यों में से एक है जो मुस्लिम विद्यार्थियों को वजीफा देने के लिए केन्द्र द्वारा उपलबध करवाई गई धनराशि को उपयोग किए बिना वापस लौटाता आ रहा है। यहां यह भी बताते चलें कि एक अन्य भाजपा मुख्यमंत्री ने भी यह घोषणा की है कि वे सच्चर समिति की सिफारिशों को लागू नहीं करेंगे। महमूद ने अहमदाबाद में मुस्लिम समुदाय के बुरे हाल का भी वर्णन किया।
हम सबको यह सहर्ष स्वीकार है कि महमूद ने जो.जो बातें कहीं, वे अक्षरशः सही हैं। परन्तु असली मुद्दा कुछ ओर है। जो कुछ उन्होंने कहा, वह कोई नई जानकारी नहीं है। कई सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक गला फाड़.फाड़ कर चिल्ला रहे हैं कि गुजरात में मुसलमानों की हालत दिन प्रतिदिन बदतर होती जा रही है। मुस्लिम अपने मोहल्लों में सिमट गये हैं, उन्हें बैंकिंग व शैक्षणिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं और वे समाज की मुख्यधारा से कट गए हैं.ये सभी बातें कई बारए अलग.अलग मंचों से कही जा चुकी हैं। इस विषय पर कई रपटें, लेख और किताबें उपलब्ध हैं। समाज और राजनीतिक नेता उन पर ध्यान नहीं दे रहे हैं, यह एक अलग मुद्दा है। मोदी इन सब तथ्यों से अच्छी तरह से वाकिफ हैं। उनके सद्भावना उपवास से यह स्पष्ट हो गया है कि उन्हें भारत की विविधता स्वीकार्य नहीं है। जहां उन्होंने अन्य लोगों द्वारा भेंट की गई रंग बिरंगी टोपियों को पहन लिया वहीं एक मुस्लिम मौलवी द्वारा दी गई टोपी को पहनने से इंकार कर दिया। वे मुसलमानों के साथ भेदभाव करते हैं, यह सारा देश जानता है।
यह दावा किया जाता है कि गुजरात के मुसलमान, देश के अन्य राज्यों के मुसलमानों से बेहतर स्थिति में हैं। तथ्य यह है कि गुजरात के मुसलमानों का जीवन स्तर हमेशा से भारत के अन्य हिस्सों में रहने वाले मुसलमानों से अच्छा रहा है, परन्तु यहां मुद्दा यह है कि मोदी की ताकत बढ़ने के , मुसलमानों, और कुछ हद तक ईसाईयों, की हालत में गिरावट आई है।
गुजरात के मुसलमान पिछले बारह सालों में मोदी को अच्छी तरह से पहचान गए हैं। वे मोदी की फासीवादी और साम्प्रदायिक नीतियों से परिचित हैं। मोदी ने मुसलमानों के खिलाफ सन् 2002 के कत्लेआम का नेतृत्व किया था। तब फिर, मोदी को वे बातें बताकर, जो वे पहले से जानते हैं, और मुसलमानों को वह बताकर, जो वे भोग रहे हैं, महमूद आखिर क्या हासिल करना चाहते हैं। ऐसा बताया जा रहा है कि मोदी ने महमूद को आश्वासन दिया कि वे उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों पर विचार करेंगे। परन्तु साथ ही, महमूद के भाषण को ब्लेक आउट कर दिया गया। इसके विपरीत, मुस्लिम नेतृत्व के एक तबके की स्वीकार्यता हासिल करने के अपने प्रयास में मोदी सफल रहे। गुजरात के जानेमाने मानवाधिकार कार्यकर्ता डा. बंदूकवाला, जो कि गुजरात के कत्लेआम के स्वयं भी शिकार रहे हैंए कहते हैंए इस समय मोदी को केवल प्रधानमंत्री की कुर्सी दिख रही है और मुसलमानों के कड़े विरोध के चलतेए उनके लिए इस कुर्सी को हासिल करना संभव नहीं है। इसलिए वे मजबूरी में कुछ प्रमुख मुस्लिम नेताओं के साथ सार्वजनिक मंचों पर आकर यह दिखाना चाहते हैं कि वे सभी मुसलमानों को स्वीकार्य हैं। दुख की बात यह है कि हमारे नेताओं ने मोदी को ऐसा करने का सुनहरा मौका दे दियाए वह भी इस बचकानी मान्यता के कारण कि वे मोदी को मुस्लिम समुदाय की भावनाओं से अवगत करना चाहते हैं! क्या जफर महमूद को यह नहीं पता कि इन मुद्दों पर पिछले ग्यारह सालों में गुजरात के मुसलमानों ने असंख्य मौकों पर प्रिन्ट व इलेक्ट्रानिक मीडिया से बात की है?
मोदी ने सम्मेलनों के आयोजन के लिए जो समय चुना, उससे भी महमूद और उनके जैसे अन्य नेताओं को सावधान हो जाना चाहिए था। वे भले ही ऐसा मानते रहें कि सम्मेलनों में भाग लेने से उन्हें समुदाय की मांगों को प्रस्तुत करने का मौका मिलेगा परन्तु तथ्य यह है कि वे मोदी की एक सोची.समझी चाल में फंस रहे हैं, जिसका उद्देश्य है अपनी साख बढ़ाना और मुस्लिम समुदाय के सदस्यों को अपना अनुयायी बनाना। ठीक उसी तरहए जैसे उन्होंने एक बड़े व्यावसायी ज़फर सरेसवाला को अपने जाल में फंसा लिया है और अब जफर पूरी वफादारी से मोदी की सेवा में जुटें हुए हैं। यह सही है कि महमूद ने भाजपा की वेबसाइट को खंगालकर उसमें से मुस्लिम विरोधी साम्रगी को काफी मेहनत से छांटकर निकाला। परन्तु वे और उम्मीद भी क्या कर सकते थे?भाजपा, आरएसएस की राजनैतिक शाखा है और अपने पूरे जीवनकाल में इस पार्टी ने जो भी मुद्दे उठाएं हैं, उनसे इसका मुस्लिम.विरोध झलकता रहा है.फिर चाहे वह राममंदिर आंदोलन हो, जिसका अंत बाबरी मस्जिद के ध्वंस से हुआ या गौहत्या का मुद्दा हो या धारा 370 का। हमें यह समझना होगा कि भाजपा स्वतंत्र नहीं है। वह आरएसएस के अधीन काम करती है और संघ के स्वयंसेवक, भाजपा का संचालन करते हैं। ऐसे ही स्वयंसेवकों में से एक मोदी हैं। आरएसएस का लक्ष्य है हिन्दू राष्ट्र का निर्माण। स्वाधीनता आंदोलन में आरएसएस का क्या योगदान था? उसने स्वाधीनता आंदोलन का विरोध किया और कहा कि वह आन्दोलन केवल ब्रिटिश विरोधी क्यों है! आरएसएस किस तरह का संविधान चाहता है? भाजपा और एनडीए ने केन्द्र में अपने शासन के दौरान, संविधान का पुनर्वलोकन करने का प्रयास क्यों किया था।
इन सभी प्रश्नों के उत्तर आरएसएस और उसके बाल.बच्चों के एजेण्डे पर केन्द्रित पुस्तकों और लेखों में सहर्ष उपलब्ध हैं। मोदी ने मुस्लिम समुदाय को अपने साथ लाने के लिए अस्थाई रूप से एक मुखौटा लगा लिया है। उन्होंने गिरगिट की तरह, केवल अपनी त्वचा का रंग बदला है। उनका दिलोदिमाग वही है। सन् 2014 के चुनाव के मद्देनजर मोदी अपने मुखौटे के बल पर वोट हासिल करना चाहते हैं। इन प्रयासों को महत्व देने और मोदी द्वारा आयोजित सम्मेलनों में भाग लेने से मुस्लिम नेताओं को कुछ क्षणों की प्रसिद्धि मिल सकती है.शायद कुछ टी.वी. इन्टरव्यू भी। उन्हें यह संतोष भी हो सकता है कि उन्होंने अपनी बात रख दी। परन्तु सच यह है कि मुस्लिम समुदाय के लिए यह एक घोर प्रतिगामी कदम है। यह ऐसा ही है मानो यहूदियों के नेता हिटलर से मिलते और उन्हें बताते कि किस तरह यहूदियों को गैस चेम्बरों में मारा जा रहा है। और यह सोचकर खुश होते की उन्होंने अपनी बात रख दी है।
अब समय आ गया है कि अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्य और उनके नेता, जो सामने दिख रहा है उसके पीछे झांककर देखें। वे इस प्रश्न पर विचार करें कि आरएसएस का एजेण्डा क्या है और आरएसएस क्यों अल्पसंख्यकों और समाज के अन्य वंचित वर्गों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाना चाहता है। कुछ पुस्तकों का अध्ययन भी उन लोगों की आंखे खोल सकता हैए जो यह मानते हैं कि भाजपा अपना दूरगामी एजेण्डा बदल सकती है या यह कि मोदी के सम्मेलन में जाकर भाषण देने से भाजपा की अल्पसंख्यकों के प्रति नीतियां बदल जाएंगी। इनमें से कुछ पुस्तकें हैं व्ही. ऑर नेशनहुड डिफाइण्ड जो अल्पसंख्यकों के विरूद्ध हिटलर द्वारा की गई कार्यवाहियों की प्रशंसा करती है और ए बंच ऑफ थौट्सजो मुसलमानों, ईसाईयों और कम्युनिस्टों को हिन्दू राष्ट्र के लिए आंतरिक खतरा बताती है। इन दोनों पुस्तकों के लेखक आरएसएस के पूर्व प्रमुख एमएस गोलवलकर हैं।
-राम पुनियानी
बुधवार, 19 जून 2013
मोदी, आडवाणी और संघ का एजेण्डा
सन् 2014 के आमचुनाव के लिए भाजपा की चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष पद पर नरेन्द्र मोदी के मनोनयन ;जून 2013 ने प्याले में उठने वाले तूफान से कुछ बड़ा तूफान बरपा कर दिया है। यह दिलचस्प है कि पहली बार इस तरह के पद पर मनोनयन ने इतना हंगामा और विवाद खड़ा किया है। इसके लिए मोदी की प्रचार मशीनरी काफी हद तक जिम्मेदार है। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है मानो मोदी को भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया हो। हां, यह अवश्य हो सकता है कि प्रचार प्रमुख के रूप में मोदी की नियुक्ति, उनके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित होने की ओर पहला कदम हो। मोदी के मनोनयन का सबसे कड़ा विरोध लालकृष्ण आडवाणी ने किया, जो कि मोदी के राजनैतिक आका माने जाते हैं और जिन्होंने मोदी को आगे बढ़ाने और उनका बचाव करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यदि मोदी आज भाजपा और गुजरात में इतने शक्तिशाली होकर उभरे हैं तो उसका काफी कुछ श्रेय आडवाणी और उनकी राजनीति को जाता है। आडवाणी ने ही मुख्यमंत्री बतौर मोदी का नाम प्रस्तावित किया था। गुजरात में भाजपा के गिरते ग्राफ को मोदी ने सम्हाला। इसमें सन् 2002 के कत्लेआम ने उनकी कितनी मदद कीए यह चिंतन का विषय है।
गुजरात हिंसा में मोदी की स्पष्ट भूमिका के चलते, तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी मोदी को मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहते थे। परन्तु आडवाणी ने मोदी की कुर्सी बचा ली। मोदी को बढ़ावा देने में भी आडवाणी की महत्वपूर्ण भूमिका थी। आडवाणी के मोदी प्रेम के पीछे कोई व्यक्तिगत कारण नहीं था। इसका कारण यह था कि दोनों स्वयंसेवकों के राजनैतिक एजेण्डे एक थे। मोदी और आडवाणी, दोनों ने मिलकर देश की धमनियों में साम्प्रदायिकता का जहर प्रवाहित करने के लिए हर संभव काम किया। ये दोनों स्वयंसेवक, आरएसएस के हिन्दू राष्ट्र के वफादार सिपाही हैं।
भाजपा को 1984 में लोकसभा में दो सीटें मिलीं थीं। वहां से आडवाणी बाबरी ध्वंस के बाद हुए चुनाव में पार्टी की सदस्य संख्या को 161 तक ले गए। सन् 1999 के चुनाव मेंए साम्प्रदायिक धु्रवीकरण में और वृद्धि के चलते, भाजपा को इतिहास में सबसे ज्यादा.182.लोकसभा सीटें प्राप्त हुईं। आडवाणी की साम्प्रदायिक राजनीति ने भाजपा को पहले प्रमुख विपक्षी दल का दर्जा दिलाया और तत्पश्चात केन्द्र में सत्ता। भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन ने लगभग 6 साल तक दिल्ली में गद्दी सम्हाली। आडवाणी, राजनीति के अत्यंत चतुर खिलाड़ी हैं। वे जानते थे कि उनकी विघटनकारी राजनीति के चलते, अन्य राजनैतिक दल भाजपा के साथ गठबंधन नहीं करेंगे। इसलिए उन्होंने प्रधानमंत्री पद के लिए अपने साथी स्वयंसेवक, अटल बिहारी वाजपेयी का नाम आगे बढ़ाया। वाजपेयी का एजेण्डा भी हिन्दू राष्ट्र ही था परन्तु फर्क सिर्फ यह था कि उनकी छवि एक मध्यमार्गी, नर्म नेता की थी।
वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल के बाद आडवाणी में भी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा जागी और इसे पूरा करने के लिए उन्होंने भी अपनी छवि को मध्यमार्गीय कलेवर देने की कोशिश शुरू की। बाबरी मस्जिद के ध्वंस के इस अघोषित नेता ने पाकिस्तान की संविधान सभा में 11 अगस्त 1947 को मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा दिए गए भाषण को उद्धृत करते हुए जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष नेता घोषित कर दिया। केवल एक भाषण के आधार पर जिन्ना का आंकलन करना निश्चित रूप से अनुचित है। हम यह कैसे भूल सकते हैं कि जिन्ना, मुस्लिम लीग के मुखिया थे और उन्होंने ही द्विराष्ट्र सिद्धांत को मजबूती दी थी। द्विराष्ट्र सिद्धांत से उद्भूत साम्प्रदायिक विचारधारा, हिन्दू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के साम्प्रदायिक तत्वों को प्रिय थी। जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बताकर आडवाणी शायद कुछ ज्यादा ही बोल गए। क्योंकि तब तक संघ परिवार ने हिन्दुओं को ष्जिन्ना और मुसलमानों से नफरत करो के आधार पर धु्रवीकृत कर लिया था। ऐसे में आडवाणी के इस बयान को संघ पचा नहीं सका और उन्हें पद से हटा दिया गया। आडवाणी की बढ़ती उम्र के कारण भी आरएसएस उन्हें हटाना चाहता था परन्तु किसी नए, विश्वसनीय चेहरे के अभाव में, सन् 2009 के आम चुनाव में आडवाणी को एक बार फिर पुनर्जीवन मिल गया।
भाजपा की कमान मोदी के हाथों में सौंपने के लिए आरएसएस बहुत इच्छुक नहीं था क्योकि संघ व्यक्तियों की बजाए संगठन की प्रधानता चाहता है। जहां तक मोदी का सवाल है, वे संगटन पर हावी हो जाते हैं। परन्तु मोदी के मामले में आरएसएस, अन्ततः, शायद इसलिए राजी हो गया क्योंकि मोदी ने अत्यंत कुशलतापूर्वक गढ़े गए प्रचार अभियान और गुजरात कत्लेआम की सहायता से, गुजरात में जबरदस्त साम्प्रदायिक धु्रवीकरण करने में सफलता पाई थी। आरएसएस की राजनीति, मूलतः, धार्मिक पहचान के भेस में पूर्ण एकाधिकारवाद की राजनीति है। यह एक तरह की फासीवादी राजनीति है। फासीवादी राजनीति के लिए जरूरी होता है एक करिश्माई जननेता। मोदी इस तरह के नेता हैं और इस राजनैतिक मजबूरी के चलते, मोदी के बारे में अपनी आपत्तियों को दरकिनार कर, आरएसएस ने उनके कद में हो रही अनियंत्रित वृद्धि को स्वीकार कर लिया।
इस राजनैतिक प्रहसन के चलते, मोदी की विघटनकारी छवि के कारणए एनडीए के गठबंधन के साथी भाजपा से दूर जा रहे हैं। इन दलों को अपने अल्पसंख्यक वोट बैंक को ध्यान में रखना है और इसलिए वे मोदी के नेतृत्व को स्वीकार नहीं कर सकते। एनडीए से पहले ही कई दल बाहर जा चुके हैं और मोदी युग के उदय के बाद कई और दल एनडीए का साथ छोड़ सकते हैं। सम्भावना तो यही है कि अन्ततः भाजपा के साथ केवल हिन्दुत्ववादी शिवसेना और साम्प्रदायिक अकाली दल रह जाएंगे। आडवाणी ने विद्रोह का झण्डा उठाया अवश्य परन्तु आरएसएस प्रमुख के एक फोन ने उनके तेवर ठंडे कर दिए। आरएसएस द्वारा प्रशिक्षित स्वयंसेवक, नागपुर से आए निर्देशों का किसी भी स्थिति में उल्लंघन नहीं कर सकते। इसके कई कारण हैं। पहला यह कि स्वयंसेवकों को यह सिखाया जाता है कि मूलतः उनकी वफादारी संघ और हिन्दू राष्ट्र के प्रति है। हम सबको याद है कि जब 1977 में आपातकाल की समाप्ति के बादए भाजपा के पूर्व अवतार भारतीय जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हो गया था, तब जनता पार्टी के अन्य घटक दलों ने जनसंघ के सदस्यों से आरएसएस से उनके संबंध तोड़ने को कहा था। जनसंघ ने जनता पार्टी को तोड़ना बेहतर समझा बजाए आरएसएस से संबंध तोड़ने के। अटल बिहारी वाजपेयी, जो कि तथाकथित मध्यममार्गी और नरम नेता बताये जाते हैं ने भी अमेरिका के स्टेटन आईलैण्ड में अनिवासी भारतीयों की एक सभा को सम्बोधित करते हुए कहा था कि वे स्वयंसेवक पहले हैं, प्रधानमंत्री बाद में।
विचारधारात्मक कारकों के अलावा, चुनावी कारक भी आरएसएस के वर्चस्व के पीछे हैं। भाजपा की मुख्य शक्ति हैं आरएसएस के स्वयंसेवक, जो भाजपा के उम्मीदवारों को चुनाव जितवाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। भाजपा के कार्यकलापों पर आरएसएसए संगठन मंत्रियों द्वारा कड़ा नियंत्रण रखता है। ये संगठन मंत्री, भाजपा में, आरएसएस के प्रतिनिधि होते हैं। राम मंदिर मुद्दे के जोर पकड़ने, आडवाणी की विघटनकारी रथयात्रा, उसके बाद हुई हिंसा और साम्प्रदायिक धु्रवीकरण और इन सब से हिन्दुत्व की राजनीति को हुए लाभ से आरएसएस काफी प्रसन्न था। अब स्थिति यह हो गई है कि भाजपा की ताकत में दिन ब दिन गिरावट आ रही है और क्षेत्रीय पार्टियां मजबूत होती जा रही हैं। इन क्षेत्रीय पार्टियों को मुख्यतः केवल क्षेत्रीय मुद्दों से मतलब रहता है और इसलिए चुनाव के बाद वे किस करवट बैंठेंगी, यह कहना बहुत मुश्किल है।
इस पूरे घटनाक्रम से मुख्यतः दो चीजें साफ होती हैं। पहली यह कि मोदी, समाज को धु्रवीकृत करने में काफी हद तक सफल रहे हैं। ऐसा माना जा रहा है कि मोदी स्वभाव से तानाशाह हैं और जब वे सत्ता में आते हैं तो सारी शक्तियां स्वयं में केन्द्रित कर लेते हैं। उनके इस तानाशाहीपूर्ण चरित्र को उनका शक्तिशाली होना बताया जा रहा है। गुजरात की अन्य पार्टियों के नेता तो मोदी के इस आंकलन से सहमत हैं ही कई पूर्व भाजपा नेताओं को भी मोदी ने हाशिए पर पटक दिया है। उनकी कोई पूछ परख नहीं हैं। मोदी को सत्ता से बाहर रखने में क्षेत्रीय पार्टियां किस हद तक आवश्यक भूमिका निभाएंगी, यह कहना मुश्किल है। इन पार्टियों की सिद्धान्तो और मूल्यों में कोई खास श्रृद्धा नहीं है।
जब सन् 1996 में भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी तब कोई दूसरी पार्टी उसके साथ गठबंधन करने को तैयार नहीं थी। परन्तु कुछ ही साल बाद, कई दल सत्ता के लोभ में भाजपा के आसपास मंडराने लगे थे। संघ.भाजपा.मोदी इसी ऐतिहासिक अनुभव के आधार पर आश्वस्त होंगे कि समय आने पर उन्हें दूसरी पार्टियों का समर्थन मिल जायेगा। यह अपेक्षाकृत कठिन है क्योंकि उस समय वाजपेयी की उपस्थिति के कारणए अन्य पार्टियों के लिए स्वयं को धोखे में रखना आसान था। वे सत्ता में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करते हुए यह दावा भी कर सकती थीं कि उन्होंने अपने सिद्धांतो से कोई समझौता नहीं किया है।
आज धर्मनिरपेक्ष आन्दोलन के सामने बहुत कठिन चुनौती है। समाज में धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरूद्ध पूर्वाग्रह जड़ पकड़ चुके हैं और अल्पसंख्यकों की हालत दिन ब दिन द्वितीय श्रेणी के नागरिकों जैसी होती जा रही है। मोदी के सत्ता में आने के अभी तो कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं परन्तु यह साफ है कि संघ और भाजपाए सत्ता में आने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। हमने पहले भी देखा है कि साम्प्रदायिक हिंसा से साम्प्रदायिक संगठनों को ताकत मिलती है। साम्प्रदायिक संगठन यह बात अच्छी तरह से समझते हैं। यह सब देश के लिए बहुत खतरनाक है। धार्मिक हिंसा के कारण साम्प्रदायिक ताकतों की जमींनी स्तर पर ताकत बढ़ रही है। जहां तक क्षेत्रीय पार्टियों के राष्ट्रव्यापी गठबंधन का सवाल है उसमें सत्ता सुख का उपभोग करने की इच्छा रखने वालों की संख्या इतनी अधिक होगी कि उसका अस्तित्व बहुत दिनों तक बना नहीं रह सकेगा। क्या तीसरे मोर्चें के लिए कोई गुंजाइश है? क्या सभी गैर.भाजपा और गैर.कांग्रेस दल एक साथ मिलक, तीसरा मोर्चा बना सकते हैं?तीसरा मोर्चा केवल प्रजातांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और गरीबों की पक्षधरता वाले कार्यक्रमों के आधार पर बनाया जा सकता है। एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी होगा कि तीसरे मोर्चे का नेतृत्व कौन करे? मोदी जैसे फासिस्ट व्यक्ति और आरएसएस जैसे घोर साम्प्रदायिक संगठन का प्रजातांत्रिक तरीकों से कड़ा विरोध किया जाना जरूरी है।
-राम पुनियानी
शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013
क्या नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री होंगे ?
सोमवार, 3 दिसंबर 2012
हिन्दुवत्व और 20 हजार करोड़
सोमवार, 30 जुलाई 2012
इसलिए मांगनी चाहिए मोदी को माफी
नरेन्द्र मोदी से शायद ही कोई यह अपेक्षा करेगा कि वे किसी से क्षमा मांगेगे। क्षमा मांगने का नैतिक साहस और शक्ति उनमें होती है जो उदार होते हैं, जिनका दिल बड़ा होता है. और दुनिया जानती है कि नरेन्द्र मोदी का दिल बड़ा नहीं है।
दुनिया के इतिहास में अनेक महान और प्रतिष्ठित लोगों ने क्षमा मांगी है या उनको माफ किया है जिन्होंने उन पर तरह-तरह की ज्यादतियां की थीं। दक्षिण अफ्रीका में गोरों का शासन समाप्त हुआ और नेल्सन मंडेला, आजाद दक्षिण अफ्रीका के प्रथम राष्ट्रपति बने। एक भव्य समारोह में उन्होंने शपथ ली। समारोह में विभिन्न देशों के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राजे-महाराजे आदि शामिल हुये। समारोह के अंत में नेल्सन मंडेला ने घोषणा की कि “मैं आपका परिचय दो विशिष्ट अतिथियों से कराना चाहता हूँ“। सभी विशिष्ट अतिथियों ने सोचा कि ऐसे कौन से विशिष्ट अतिथि हैं जो हमसे भी ज्यादा विशिष्ट हैं और जिनका परिचय मंडेला कराना चाहते हैं। मंडेला की घोषणा के बाद दो गोरे व्यक्ति मंच आये। दोनों को मंडेला ने अपने दोनों ओर खड़ा किया। उन्होंने कहा कि “मैं जब जेल मे था उस समय इन दोनों ने मुझ पर तरह-तरह के जुल्म किए। परन्तु आज मैं इन्हें क्षमा कर रहा हूँ और इनके माध्यम से मैं दक्षिण अफ्रीका के उन सभी गोरों को माफ कर रहा हूँ जिन्होनें यहां के मूल निवासियों पर वर्षों तक अत्याचार किये थे”। इस तरह का क्षमादान नेल्सन मंडेला जैसा महान हृदय व्यक्ति ही कर सकता है। क्षुद्र हृदय नरेन्द्र मोदी के पास इतना बड़ा दिल नहीं है।
कुछ वर्षों पहले, ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ भारत आईं थीं। अपनी भारत यात्रा के दौरान वे अमृतसर भी गयीं थीं। अमृतसर प्रवास के दौरान उन्होनें जलियांवाला बाग गोलीकांड के लिये क्षमा मांगी। एक अंग्रेज सैन्य अधिकारी जनरल डायर ने जलियांवाला बाग में एकत्रित हजारों लोगों पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं थीं जिससे सैकड़ो लोग मारे गये थे। जनरल डायर की करतूत की निंदा भारत में तो की ही गई थी ब्रिटेन में भी की गई थी। इसलिए महारानी एलिजाबेथ ने अपने भारत प्रवास के दौरान जलियांवाला बाग में हुई हत्याओं के लिये माफी मांगी। सन् 1984 में सिक्खों के कत्लेआम के लिये प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सहित अनेक कांग्रेस नेताओं ने माफी मांगी।
हेम बरूआ एक प्रखर समाजवादी नेता थे। लोकसभा में चीनी आक्रमण की निन्दा करते हुये उन्होने नेहरू को गधा और देशद्रोही कह दिया। थोड़े समय बाद नेहरू जी की मृत्यु हो गई। हेम बरूआ भी उनकी अंत्येष्टि में शामिल हुये। हेम बरूआ ने तीन बार नेहरू जी के पैर छुए। उन्होंने ऐसा क्यों किया, इसका स्पष्टीकरण देते हुये उन्होने “धर्मयुग“ साप्ताहिक में एक लेख लिखा था। उन्होने लेख में कहा कि “मैंने एक बार नेहरू जी के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाते पैर छुए, दूसरी बार मैंने एक महान प्रधानमंत्री का नमन किया और तीसरी बार मैंने नेहरू जी से क्षमा मांगी-उन्हें गधा कहने के लिए“। हेम बरूआ एक महान नेता थे। इसलिये उनका दिल भी महान था।
पर मोदी तो किसी से भी माफी मांगने को तैयार नहीं हैं। जब भी कोई दंगा होता है या आगजनी में लोग मारे जाते हैं, बाढ़ और भूकम्प में अपना सब कुछ खो देते हैं तो प्रधानमंत्री और मंत्रीगण पीड़ितों की खबर लेने जाते हैं। वे प्रायः इस बात के लिये खेद व्यक्त करते हैं कि उन्हें पीड़ित व्यक्तियों की जितनी सहायता करनी चाहिए थी वे. नही कर पाये। वे मृत व्यक्तियों के परिवारवालों से मिलते हैं। वे दुःखी लोगों का दुःख बांटने का प्रयास करते हैं। जबकि उस प्राकृतिक विभीषिका के लिए वे स्वयं किसी भी तरह से दोषी नहीं होते।
इसके विपरीत, नरेन्द्र मोदी एक भी दंगा पीड़ित के पास नही गये। उनका हाल चाल पूछने का प्रयास तक नहीं किया। क्या उनका यह कर्तव्य नहीं था कि वे पूर्व सांसद एहसान जाफरी, जिनकी बड़ी क्रूरता से हत्या की गई थी, की पत्नी से मिलकर शोक व्यक्त करते, और क्षमा मांगते कि पुलिस सही समय पर उनकी रक्षा के लिए नहीं आ सकी? क्या नरेन्द्र मोदी का यह फर्ज नहीं था कि वे उन पुलिसकर्मियों को दंडित करते जो जाफरी को आश्वासन तो देते रहे परंतु उनकी सहायता के लिये नहीं पहुंचे? क्या उन्हें उन हजारों लोगों से मिलकर माफी नहीं मांगनी थी जो राहत शिविरों में नारकीय जीवन बिता रहे थे। शिविर में रह रहे पीड़ितो से मिलना तो दूर की बात है, उलटे नरेन्द्र मोदी ने इन पीड़ितों के बारे में अत्यधिक घटिया टिप्पणी की। नरेन्द्र मोदी ने कहा कि ये शिविर बच्चे पैदा करने के कारखाने बन गए हैं। क्या इस तरह की घटिया बात करने वाले व्यक्ति से क्षमा मांगने की अपेक्षा की जानी चाहिए?
कुछ लोग तो यहां तक कहते हैं कि गोधरा में जो कुछ हुआ था वह मोदी द्वारा रचे गये षड़यंत्र का हिस्सा था। क्या मोदी को इस बात का पता नही था कि गोधरा स्टेशन पर लगभग प्रतिदिन अयोध्या से वापिस आने वाले कारसेवकों और स्थानीय मुसलमानों के बीच टकराव की घटनाएं हो रहीं थीं? इन घटनाओ के मद्देनजर क्या गोधरा में व विशेषकर रेलवे स्टेशन पर पुलिस की तैनाती बढ़ाई नहीं जानी थी? जिस दिन, जैसा कि आरोपित है, मुसलमान एस-6 कोच में आग लगा रहे थे तब पुलिस ने उन्हें रोका नहीं? क्या पुलिस को ऐसे तत्वो पर गोली नहीं चलानी थी? परन्तु ऐसा नहीं हुआ और अनेक
कारसेवक मारे गये। उसके बाद मोदी ने लाशों पर राजनीति की। सभी लाशों को अहमदाबाद ले जाया गया और क्षत-विक्षत शरीरों का सार्वजनिक प्रदर्शन किया गया। हिन्दू धर्म की परम्परा के अनुसार मृत व्यक्ति की अंतिम क्रिया जल्दी से जल्दी की जानी चाहिये। ऐसा न करना, मृत व्यक्ति का अपमान माना जाता है। क्या लाशों पर राजनीति करना उचित था? कम से कम नरेन्द्र मोदी को उन परिवारों के पास जाकर क्षमा मांगनी थी जिन्होंने अपने प्रियजनों को गोधरा के अग्निकांड में खोया था।
गुजरात दंगे के दौरान अनेक लोगों के घर जला दिये गये थे। जिनके घर जले वे अपने घरो को छोड़कर चले गये। उनमें से कई आज तक वापस नहीं आये हैं। क्या उन्हें वापस लाने का प्रयास मोदी को नही करना था? कश्मीर में अनेक पंडित परिवार घर-बार छोड़कर चले गये हैं। उन्हें वापस लाने का प्रयास कश्मीर की जनता और सरकार कर रही है। अभी हाल में अनेक पंडित एक धार्मिक समारोह में शामिल हुये। इस समारोह मे आने वाले पंडितों का भव्य स्वागत स्थानीय मुसलमानों ने किया। ऐसा कुछ गुजरात की सरकार और वहां के हिन्दू क्यों नही कर रहे हैं? क्यों वे उन मुसलमानों से फिर से अपने शहर और गांव में बसने की अपील नहीं कर सकते जो दंगों के बाद भाग गए थे? क्या इस तरह के हजारों लोगों से क्षमा मांगने की आवश्यकता नहीं है जो आतंकित होकर अपने गांवो और घरों को छोड़कर चले गये? क्या मोदी को यह स्वीकार करने मे हिचक है कि उनकी पुलिस और प्रशासन की लापरवाही और दंगाईयों से मिलीभगत के चलते इन लोगों को अपने घरों को छोड़ना पड़ा।
मोदी जी, आपने एक नहीं सैकड़ों गलतियां की हैं जिनके लिये आपको क्षमा मांगना चाहिये। लेकिन आप तो बेशर्मी से कहते हैं कि मैं माफी क्यों मांगूं।- एल. एस. हरदेनिया
रविवार, 20 मई 2012
एसआईटी प्रमुख श्री आर. के. राघवन के नाम खुला पत्र

प्रिय श्री आर. के. राघवन,
इन दिनांे मीडिया में गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को आपकी “क्लीन चिट“ की जमकर चर्चा हो रही है। आपने गुजरात दंगों व विशेषकर गुलबर्ग सोसायटी में पूर्व सांसद श्री एहसान जाफरी की क्रूर हत्या के लिए श्री मोदी के किसी भी तरह से जिम्मेदार होने से स्पष्ट इंकार किया है। उच्चतम न्यायालय ने एसआईटी के प्रमुख के रूप में आपकी नियुक्ति इसलिए की थी क्योंकि आपकी छवि एक निष्पक्ष, कर्तव्यनिष्ठ एवं ईमानदार पुलिस अधिकारी की थी।
हम सबको आपकी काबिलियत और निष्पक्षता पर पूरा भरोसा है। हमें विश्वास है कि आपकी जांच रपट से गुजरात के घटनाक्रम का सच देश के सामने आएगा और हम सब यह जान सकेंगे कि क्या सही था और क्या गलत, क्या उचित था और क्या अनुचित। यहां यह कहना समीचीन होगा कि आपके द्वारा की गई जांच से कई विवाद उठ खड़े हुए हैं। यह आश्चर्यजनक है कि आपकी सन् 2010 की अंतरिम रपट और सन् 2012 की अंतिम रपट के निष्कर्षों में काफी अंतर है। आपने अपनी अंतिम रपट में श्री मोदी को “क्लीन चिट“ दे दी है।
इससे भी ज्यादा आश्चर्चाजनक यह है कि आपने अपनी जांच और उससे उजागर हुए “सत्य“ के बचाव में ऐसे-ऐसे तर्क दिए हैं जो शायद भाजपा भी नहीं दे सकती थी। बल्कि, शायद श्री मोदी भी अपना बचाव इतने अच्छे से नहीं कर पाते जितना कि आपने किया है। ऐसा लगता है मानो आपकी नियुक्ति उच्चतम न्यायालय ने नहीं वरन् गुजरात सरकार ने की हो। एमीकस क्यूरे श्री राजू रामचन्द्रन द्वारा आपकी जांच रपट के विष्लेषण के आपके द्वारा किए गए बिन्दुवार खण्डन का मैंने अत्यंत ध्यानपूर्वक अध्ययन किया है।
उच्चतम न्यायालय द्वारा एमीकस क्यूरे की नियुक्ति अपने आप में इस बात का सुबूत है कि आपकी रपट विवादों के घेरे में है। श्री राघवन जी, आप देश की शीर्ष जांच एजेन्सी सीबीआई के प्रमुख रह चुके हैं और आपकी रपट ने गुजरात दंगा पीडि़तों की न्याय पाने की आखिरी आषा भी खत्म कर दी है। वैसे भी हम राजनेताओं से न्याय की उम्मीद नहीं कर सकते परंतु हम सीबीआई जैसी शीर्ष जांच एजेन्सियों से यह उम्मीद अवष्य कर सकते हैं और करते भी हैं कि वे अपना काम निष्पक्षता से और देश के कानून के अनुरूप करेंगी।
राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थी और राजनैतिक विष्लेषक होने के नाते मेरा जो सीमित ज्ञान है, उसके आधार पर मैं बिना किसी संदेह के कह सकता हूं कि गुजरात दंगों के पीछे राजनीति और केवल राजनीति थी। दंगों के ठीक पहले तक भाजपा, गुजरात में लगातार चुनाव हार रही थी। स्थानीय निकायों के चुनाव और विधानसभा उपचुनावों में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था। दिसम्बर 2002 में राज्य में विधानसभा चुनाव होने थे और इन परिस्थितियों में भाजपा का चिंतित होना और घबराना स्वाभाविक था। एक के बाद एक सामने आ रहे भ्रष्टाचार के मामलों ने भाजपा की छवि को धूमिल कर दिया था। आमजन पार्टी की सरकार के काम करने के तरीके से घोर अंसतुष्ट थे। भाजपा नेताआंे को यह भय सता रहा था कि विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी को धूल चाटनी पड़ेगी।
दुर्भाग्यवश, हमारे देश में मतदाताओं को धु्रवीकृत कर देना चुनाव जीतने का पुराना और आजमाया हुआ तरीका है। भाजपा ने भी धर्म और जातिगत आधार पर मतदाताओं को धु्रवीकृत करने की कई कोशिशें कीं परंतु राज्य के भाजपा नेताओं को शनैः-शनैः यह समझ में आने लगा कि छोटे-मोटे उपायों से काम चलने वाला नहीं है और चुनाव जीतने के लिए कोई बड़ा कांड करना होगा। इसके लिए वे किसी उपयुक्त अवसर की तलाश में थे और गोधरा ने उन्हें वह मौका दे दिया। 27 फरवरी 2002 को गोधरा में 59 कारसेवक आग में जलकर मारे गए और भाजपा नेतृत्व की बांछे खिल गईं।
आप तो यह जानते ही होंगे कि गोधरा कांड क्यों और कैसे हुआ, यह आज भी साफ नहीं हो सका है। क्या इस कांड के लिए वे 120 लोग जिम्मेदार थे, जिन्हें गुजरात पुलिस ने गिरफ्तार किया था? गोधरा मामले में अदालत के निर्णय में घटना के पीछे कोई सुनियोजित षड़यंत्र होने की संभावना से इंकार किया गया है। पुलिस ने हुसैन उमरजी को “मुख्य षड़यंत्रकर्ता“ घोषित किया था परंतु अदालत ने उनके खिलाफ कोई सुबूत नहीं पाए और उन्हें निर्दोष घोषित कर बरी कर दिया गया। कुछ लोगों को सजा दी गई परंतु इनमें से अधिकाँश प्लेटफार्म पर खाने-पीने की चीजें बेचने वाले गरीब वेन्डर थे और इस बात की संभावना न के बराबर है कि उन्होंने इतना बड़ा षड़यंत्र रचा होगा। इस लोमहर्षक घटना के लिए कोई भी जिम्मेदार रहा हो परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि गोधरा ने मोदी सरकार को मुसलमानों के खिलाफ माहौल बनाने का सुनहरा मौका दे दिया।
विहिप द्वारा किए गए बंद के आव्हान को गुजरात सरकार ने पर्दे के पीछे से पूरा समर्थन दिया। मृतकों के शव जुलूस के रूप में शहर में घुमाने की इजाजत दी गई। ये दोनों तथ्य अपने आप में नरेन्द्र मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा करने के लिए पर्याप्त हैं। कोई कितनी भी निकम्मी और नासमझ सरकार-बशर्ते वह शान्ति बनाए रखने की इच्छुक हो-कभी लाशों के जुलूस निकालने की इजाजत नहीं देगी। लाशों पर कौन अपना दावा जता रहा है, इसका तनिक भी महत्व नहीं है। असली प्रश्न तो यह है कि अहमदाबाद की सड़कों पर जले हुए वीभत्स शवों को जूलूस में ले जाने की इजाजत किसने और क्यों दी। इससे पहले से ही उत्तेजित जनता और आक्रामक हो गई। तरह-तरह की अफवाहों ने आग में घी का काम किया। एक उच्च पुलिस अधिकारी होने के नाते आप यह अच्छी तरह से समझ सकते हैं कि इस तरह के जुलूस निकलने के क्या नतीजे होंगे।
आपकी जानकारी के लिए, श्री राघवनजी, मैं यह बता दूं कि मैंने जबलपुर के सन् 1961 के साम्प्रदायिक दंगे से लेकर आज तक हुए सभी दंगों की जांच और अध्ययन किया है। और मैं इस बात को बहुत अच्छी तरह से जानता हूं कि अगर किसी शहर में तनाव हो तो सरकार को कौन से कदम उठाने चाहिए। ऐसी परिस्थितियों में सरकार तुरंत धारा 144 या कफ्र्यू लागू कर देती है और अफवाहों व हिंसा को नियंत्रित करने के लिए हर संभव कदम उठाती है।
मोदी सरकार ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। गुजराती समाचारपत्र अत्यंत भड़काऊ समाचार प्रकाषित कर रहे थे। अफवाहों को खबरों के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा था। ऐसे संपादकीय लिखे जा रहे थे जिन्हें पढ़कर किसी का भी उत्तेजित हो जाना स्वाभाविक था। आपको तो ज्ञात ही होगा कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 153(ए) के तहत इन समाचारपत्रों के खिलाफ कार्यवाही की जा सकती थी। सरकार ने ऐसा करना भी उचित नहीं समझा। समाचारपत्रों को दंगे भड़काने का पूरा मौका मुहैय्या कराया गया।
आपने फरमाया है कि ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि श्री मोदी ने उच्चाधिकारियों की एक बैठक में यह निर्देश दिया था कि हिन्दुओं को अपने गुस्से का इज़हार करने से रोका नहीं जाना चाहिए। आपका तो यहां तक कहना है कि अगर ऐसी बैठक हुई भी थी और मोदी ने वही कहा था जो आरोपित है तब भी वे दोषी नहीं हैं क्योंकि उन्होंने ये निर्देश बंद कमरे में दिए थे। राघवनजी, क्या आप यह भूल नहीं रहे हैं कि उन्होंने यह बात बंद कमरे में आमजनों से नहीं वरन् उन उच्च पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों से कही थी, दंगे रोकना जिनकी जिम्मेदारी थी। यह तो किसी आमसभा में ऐसी बात कहने से भी ज्यादा खतरनाक है।
आप तो श्री मोदी का बचाव करने के लिए इतने आतुर हैं कि आपको कई चीजें दिखलाई ही नहीं दे रही हैं। आप यह भूल रहे हैं कि मोदी की इस कथित बैठक के बाद गुजरात में क्या हुआ। आप “तहलका“ द्वारा किए गए उस स्टिंग आपरेशन को पूरी तरह नजरअंदाज कर रहे हैं जिसमें कुछ नेताओं ने छाती ठोक कर कहा था कि सरकार की ओर से उन्हें यह आश्वासन दिया गया था कि वे चाहे जितने लोगों को मौत के घाट उतार दें, उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। उन्होंने स्टिंग आपरेशन के दौरान यह भी कहा कि सरकार ने उन्हें छिपने के स्थान उपलब्ध कराए थे।
अदालतंे स्टिंग आपरेशन को विष्वसनीय सुबूत मानती हैं। स्टिंग आपरेशन के आधार पर ही हाल में दिल्ली के एक न्यायालय ने पूर्व भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को जेल की सजा सुनाई है। आप यदि इस स्टिंग आपरेशन को धु्रव सत्य न भी मानते तो कम से कम वह आगे की जांच का आधार तो बन ही सकता था। एमीकस क्यूरे राजू रामचन्द्रन का मत है कि चाहे मोदी ने उच्चाधिकारियों को आरोपित निर्देश दिया हो या नहीं, चाहे बैठक में संजीव भट्ट उपस्थित रहे हों या नहीं परंतु भट्ट के दावे को एक सिरे से खारिज किया जाना उचित नहीं था। आपने न जाने किस कारणवश भट्ट से पूछताछ करना तक उचित नहीं समझा।
आपने तो एहसान जाफरी की हत्या के लिए भी मोदी या उनकी सरकार को जिम्मेदार मानने से इंकार कर दिया है। उल्टे, आप तो यह कह रहे हैं कि जाफरी अपनी मौत के लिए खुद जिम्मेदार थे क्योंकि उन्होंने भीड़ पर गोली चलाई थी। जाफरी ने गोली चलाई थी या नहीं, यह अभी भी साफ नहीं है परंतु राघवनजी, कृपया मुझे बताएं कि यदि आपके खून की प्यासी, हथियारों से लैस भीड़ से घिर जाने पर आप क्या करेंगे? विशेषकर तब जब प्रशासन से मदद पाने के आपके सभी प्रयास असफल हो गए हों, जब आपको बचाने के लिए कोई आगे आने को तैयार न हो। मैंने गुजरात दंगों की गहराई से जांच की है और मैं इस बात से वाकिफ हूं कि जाफरी और उनके बंगले में शरण लिए हुए 60 निर्दोष लोग कितने आतंकित, कितने संशकित और कितने असहाय रहे होंगे। मैं आपकी तरह शीर्ष पुलिस अधिकारी तो नहीं हूं परंतु मुझमे भी थोड़ी-बहुत बुद्धि है और मैं मौत से पहले जाफरी की मनःस्थिति का काफी हद तक अंदाजा लगा सकता हूं।
उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्याय्मूर्ति सामंत व न्यायमूर्ति सुरेश की अध्यक्षता में गठित जन न्यायाधिकरण के निष्कर्ष भी आपकी रपट के ठीक विपरीत हैं। इन दोनों पूर्व न्यायाधीशों की छवि बेदाग है और ये उस वर्ग के हैं जो आप जैसे पुलिस कर्मियों द्वारा की गई जांच पर निर्णय लेते हैं। मुझसे व्यक्तिगत बातचीत में न्यायमूर्ति सुरेश ने जोर देकर कहा था कि गुजरात में सन् 2002 में जो कुछ हुआ उसके लिए मोदी पूरी तरह जिम्मेदार हैं।
आपने स्वयं भी अपनी 2010 की रपट में, जिसे आपके एक साथी श्री मल्होत्रा ने तैयार किया था, मोदी को कुछ आधारों पर दोषी ठहराया था। जाने-माने पाक्षिक “तहलका“ ने आपकी उस रपट को छापा भी था। वह रपट आपकी 2012 की रपट की अपेक्षा सत्य के अधिक नजदीक थी। “तहलका“ ने यह आरोप भी लगाया था कि किसी व्यक्तिगत कार्य से आपकी लंदन यात्रा का खर्च गुजरात सरकार ने उठाया था। मैं नहीं जानता कि यह आरोप सही था या गलत, परंतु निःसंदेह यह एक गंभीर आरोप था।
मैंने गुजरात दंगों के दर्जनों चश्मदीदों से बातचीत की है। इनमें पुलिस अधिकारी, दंगा पीडि़त व राजनैतिक कार्यकर्ता शामिल हैं। इन सबने एक मत से मोदी को दंगों के लिए दोषी बताया। मैंने मोदी के कई भाषणों की वीडियो रिकार्डिग भी देखी हंै। इनमें वह भाषण भी शामिल है, जिसमें मोदी ने न्यूटन के गतिकी के तीसरे नियम को उद्धत कर मुसलमानों के कत्लेआम को उचित ठहराया था। न्यूटन का यह नियम कहता है कि प्रत्येक क्रिया की समान एवं विपरीत प्रतिक्रिया होती है। परंतु गुजरात में तो प्रतिक्रिया, क्रिया से सैकड़ों गुना
बड़ी थी-मृतकों की संख्या की दृष्टि से भी और दंगाईयों की क्रूरता के पैमाने पर भी। मैंने श्री मोदी का वह भाषण भी सुना है जिसमें उन्होंने दंगा पीडि़तों के राहत शिविरों को “बच्चे पैदा करने वाली फैक्ट्रियां“ बताया था।
ये भाषण भले ही श्री मोदी के विरूद्ध ठोस सुबूत न हों परंतु इनसे उनकी सोच तो जाहिर होती ही है। मोदी दंगों के लिए जिम्मादार थे या नहीं इस विषय पर शायद मतभिन्नता की गुंजाइश हो भी परंतु इसमें तो कोई संदेह नहीं कि मुख्यमंत्री के रूप में दंगों को नियंत्रित करने की अपनी जिम्मेदारी को निभाने में मोदी पूरी तरह असफल रहे। दंगे रोकना उनकी वैधानिक व नैतिक जिम्मेदारी थी जिसे उन्होंने नहीं निभाया। आपने शायद अखबारों में पढ़ा होगा कि दंगों के बाद अहमदाबाद में भाषण देते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी ने कहा था कि “मैं अब कौनसा मुंह लेकर विदेश जाऊंगा“। मोदी की तरफ पलटकर वाजपेयी ने उनसे राजधर्म निभाने की अपेक्षा भी की थी। कोई भी मुख्यमंत्री, जो हफ्तों तक दंगों को न रोक पाये, जो सैकड़ों बेकसूरों का खून बहता देखता रहे, उसे एक क्षण के लिए भी अपने पद पर बने रहने का हक नहीं है। परंतु आज दस साल बाद भी मोदी न केवल मुख्यमंत्री बने हुए हैं वरन् सद्भावना यात्राएं भी निकाल रहे हैं!
राघवनजी, ऐसे लोगों के लिए भारत जैसे बहुधार्मिक प्रजातंत्र में कोई स्थान नहीं है जिन्हें हजारों लोगों की लाशों पर चढ़कर सिंहासन तक पहंुचने में कोई गुरेज नहीं है। हमें उम्मीद थी कि आप जैसा ईमानदार अधिकारी ऐसे दुर्जन राजनेताओं को बेकनकाब करेगा। परंतु हमें बहुत दुःख है कि हमारी सभी उम्मीदों पर पानी फिर गया है।
भवदीय
- डॉ . असगर अली इंजीनियर,
अध्यक्ष, सेंटर स्टडी ऑफ सोसायटी एण्ड सेक्युलरिज्म, मुंबई


