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गुरुवार, 11 जुलाई 2013

साम्प्रदायिकता नई रणनीतियां


साम्प्रदायिक संगठन अक्सर यह प्रचार व दावा करते हैं कि चूंकि देश में कोई बड़ा दंगा नहीं हो रहा है इसलिए यहां शांति है। वे यह भी कहते हैं कि चूंकि शांति है इसलिए प्रस्तावित साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निरोधक विधेयक या साम्प्रदायिक दंगों से निपटने के लिए किसी अन्य विशेष कानून की आवश्यकता नहीं है। बल्कि, उनके अनुसार, इस तरह का कानून, साम्प्रदायिक खाई को और गहरा करेगा और उन घावों को फिर से कुरेदेगा, जो धीरे.धीरे भर रहे हैं। 
यह सच है कि सन् 2002 के बाद से गुजरात जैसे दंगे देश में नहीं हुए हैं। परन्तु यही बात अहमदाबाद के 1969 के दंगे, जिसमें आधिकारिक अनुमानों के अनुसार 2000 लोग मारे गए थे, और 1970 में हुए इतने ही भयावह भिवण्डीए जलगांव, महाड़ दंगों के बारे में भी सच है। इन दंगों के बाद, लगभग 14 साल तकए देश में कोई बड़ा दंगा नहीं हुआ। सन् 1984 में दिल्ली, अहमदाबाद, भिवण्डी और मुम्बई में दंगे भड़क उठे। सन् 1980 के दशक में गोधराए मेरठ, मलियाना, मुरादाबाद, अलीगढ़, भागलपुर आदि में छोटे.बड़े दंगे हुए। इन दंगों की पृष्ठभूमि में था उच्चतम न्यायालय के शाहबानो मामले में निर्णय का विरोध और अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिराकर उसके स्थान पर राममंदिर बनाने का आंदोलन। बाबरी मस्जिद को जमींदोज करने के अभियान के नतीजे में उत्तर और पश्चिमी भारत के कई शहरों, जिनमें मुंबई, अहमदाबाद और सूरत शामिल हैंए में दंगे हुए।
हमारे देश में विभिन्न जातियों और समुदायों को उपलब्ध अवसरों और विकास के फलों में अपनी हिस्सेदारी का दावा करने के लिए जिस ढंग से उत्प्रेरित किया जाता हैए उससे बेशक यह नतीजा निकाला जा सकता है कि साम्प्रदायिक हिंसा चक्रीय और आवर्ती है। चक्र की अवधि कम.ज्यादा हो सकती है परन्तु हिंसा की तीव्रता में केवल बढ़ोत्तरी ही होती है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि वर्तमान में देश में जो साम्प्रदायिक शांति है, वह एक तरह से तूफान के पहले की शांति है। यह महत्वपूर्ण है कि शांति के इस दौर में भी कम से कम आठ स्थानों पर दंगे हुए हैं, जिनमें उत्तरप्रदेश के कई नगर और महाराष्ट्र का धुले शामिल है। इस संदर्भ में यह भी कहा जा रहा है कि समाज का साम्प्रदायिकीकरण और धु्रवीकरण करने के लिएए साम्प्रदायिक संगठनों की दंगों पर निर्भरता कम होती जा रही है।
साम्प्रदायिक संगठन इस मिथक का भरपूर प्रचार करते हैं कि साम्प्रदायिक दंगे किसी भयावह घटनाक्रम की स्वभाविक जनप्रतिक्रिया होते हैं.वह घटना इन्दिरा गांधी या स्वामी लक्ष्मणानन्द की हत्या हो सकती है या साबरमती एक्सप्रेस के कोच में आगजनी। सच यह है कि साम्प्रदायिक हिंसा हमेशा जानते.बूझते भड़काई जाती है और इसका उद्देश्य पहले से तय लक्ष्यों को पाना होता है। पॉल ब्रास के अनुसार, स्वतंत्रता के बाद से देश के कुछ क्षेत्रों विशेषकर उत्तरी व पश्चिमी राज्यों में, एक ष्संस्थागत दंगा व्यवस्था अस्तित्व में आ गई है, जिसे चुनाव के समय या राजनैतिक आवश्यकता पड़ने परए सक्रिय किया जा सकता है। साम्प्रदायिक हिंसा कभी स्वस्फूर्त नहीं होती। एक दंगे के उत्पादन के लिएए ब्रास कहते हैं, कई काम करने होते हैं। इनमें शामिल हैं अफवाहें फैलाना, सूचनाओं का आदान.प्रदान, उत्तेजक भाषणबाजी, दंगाईयों की भर्ती और हिंसा शुरू करवाने के लिए पूर्व.नियोजित हरकत। दंगा कैसे शुरू किया जायेगा, इसकी बाकायदा रिहर्सलें होती हैं और उचित समय परए जब वातावरण हिंसा भड़काने के अनुकूल हो और रास्ते में कोई बड़ी बाधा न होए दंगे शुरू कर दिये जाते हैं। भारत में साम्प्रदायिक दंगे भड़काने के पीछे उद्देश्य होता है साम्प्रदायिक पहचान को, भाषायी, लैंगिक व नस्लीय पहचानॉ की तुलना में, अधिक मजबूती देना। इस मामले में दो व्यक्तियों का एक ही व्यवसाय में होना या किसी एक क्लब का सदस्य होना या कलाप्रेमी होना महत्व नहीं रखता। महत्व रखता है सिर्फ उनका धर्म। साम्प्रदायिक दंगे इसलिए भी करवाये जाते हैं ताकि दमित, दलित और आदिवासी, इस तथ्य को नजरअंदाज कर, कि उनके साथ जाति.आधारित पदानुक्रम के चलते किस कदर भेदभाव किया जाता है, अपनी साम्प्रदायिक पहचान को गले लगा लें और उच्च जातियों के हित में काम करें।
साम्प्रदायिक हिंसा इसलिए भी किसी व्यक्ति की साम्प्रदायिक पहचान को उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण बना देती है क्योंकि उसे लगता है कि उसके धर्म के कारण उसे मौत के घाट उतारा जा सकता है। हिंसा के दौरान दूसरे का भय अपने सबसे उच्च स्तर पर रहता है। हमारे समुदाय का हर व्यक्ति हमें मित्र नजर आता है और दूसरे समुदाय का प्रत्येक व्यक्ति, शत्रु। यही कारण है कि दंगों के दौरान लोग अजनबियों की भी धार्मिक पहचान जानने के लिए व्यग्र रहते हैं। दंगों के खत्म हो जाने के बाद भी उनके दौरान जाग्रत हुई साम्प्रदायिक चेतना और भय का भाव खत्म नहीं होता। साम्प्रदायिक शक्तियां इस चेतना को अनवरत प्रचार और कई तरह के मिथक फैलाकर जिंदा रखती हैं। दूसरे समुदाय को खतरा बताया जाता है। इस तरहए साम्प्रदायिक हिंसा से साम्प्रदायिक पहचान मजबूत होती है और सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक क्षेत्रों में अपने समुदाय के व्यक्ति को प्राथमिकता देने और दूसरे समुदाय के व्यक्तियों के साथ भेदभाव करने की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। इससे समाज बंट जाता है व साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद को वैधता मिलती है और धर्मनिरपेक्ष व समावेशी राष्ट्रवाद की परिकल्पना में लोगों का विश्वास घटता है। प्रजातंत्र और स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व के मूल्यों में विश्वास में कमी आती है। इस तरह, साम्प्रदायिक दंगे समाज का साम्प्रदायिकीकरण करते हैं।
नई रणनीति
चूँकि पहले साम्प्रदायिक ताकतों के समर्थक इतनी बड़ी संख्या में नहीं थे कि वे बिना दंगों का सहारा लिए समाज की सोच को अपनी विचारधारा के अनुरूप बना सकें इसलिए पहले बड़े और भयावह दंगे करवाना आवश्यक होता था। पॉल ब्रास के शब्दों मेंए दंगों के उत्पादन से साम्प्रदायिक संगठनों को मीडिया के एक हिस्से में कवरेज मिलता था व वे राष्ट्र का ध्यान अपनी ओर खींचने में सफल रहते थे। दंगों और मीडिया.दोनों का इस्तेमाल समाज में साम्प्रदायिकता की जड़ें मजबूत करने के लिये किया जाता था। परन्तु हाल के कुछ वर्षों में, साम्प्रदायिक संगठनों ने एक नई रणनीति अपना ली है, जिसके तहत उन्हें समाज का साम्प्रदायिकीकरण करने के लिए बड़े पैमाने पर दंगे करवाना आवश्यक नहीं रह गया है। कहना ना होगा कि दंगे करवाने के अपने खतरे थे। कई बार मीडिया हिंसा के खिलाफ हो जाता था, कई बार अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन सामने आ जाते थे, कई बार उच्च न्यायपालिका सहित देश की अन्य संस्थाएं समस्याएं खड़ी करती थीं तो कई बार प्रधानमंत्री या अन्य उच्च राष्ट्रीय पदों पर काबिज होने के महत्वाकांक्षी नेता भी परेशानी का सबब बन जाते थे।
अब साम्प्रदायिक दंगें भड़काकर, कुछ समय के लिए अल्पसंख्यकों को आतंक के साए में रखने की बजाए, साम्प्रदायिक शक्तियां, इस्लामिक आंतकवाद के भेस मेंए हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों पर आतंकी हमले कर रही हैं और इस तरह समाज को लगातार आतंक के साये में जीने पर मजबूर कर रही हैं।
हिन्दुत्व की विचारधारा से प्रेरित आतंकवादियों के अस्तित्व का पहली बार पता तब चला जब 6 अप्रैल 2006 को बम बनाने के दौरान हुए विस्फोट में  बजरंग दल के दो कार्यकर्ता मारे गए। इनमें से एक का नाम राजकोंडवार था। पुलिस को जांच के दौरान उस स्थान से कुछ मस्जिदों के नक्शे और मुसलमानों के पारम्परिक परिधान भी मिले। बम धमाके में घायल राहुल पांडे ने पुलिस के समक्ष स्वीकार किया कि उसने और उसके साथियों ने पहले भी कई बम बनाए थे। जनवरी 2008 में तमिलनाडु के तेनकासी में आरएसएस के कार्यालय और बस स्टेण्ड के समीप बम रखने के आरोप में हिन्दू मुनानी के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। उनका मानना था कि बम लगाने के लिए स्वाभाविकतः मुस्लिम संगठनों को दोषी ठहराया जायेगा और इससे हिन्दू उनके खिलाफ भड़केंगे। 24 अगस्त 2008 को कानपुर में बम बनाते समय दो बजरंग दल कार्यकर्ता मारे गए। बजरंग दल का इरादा पूरे उत्तरप्रदेश में भारी बम विस्फोट करने का था।
सन् 2010 में 30 अप्रैल को आरएसएस से लंबे समय तक जुड़े रहे देवेन्द्र गुप्ता विष्णु प्रसाद और चन्द्रशेखर पाटीदार को अक्टूबर 2007 में अजमेर शरीफ में बम रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। ऐसा कहा जाता है कि इन्हीं लोगों ने हैदराबाद की मक्का मस्जिद में भी बम विस्फोट किया था जिसके सिलसिले में कई निर्दोष मुस्लिम युवकों को पुलिस ने हिरासत में लिया और उन्हें जमकर शारीरिक यंत्रणा दी गई। गोवा के मारमागोवा में 16 अक्टूबर 2009 को हुए विस्फोट में दो व्यक्ति मारे गए। एनआईए ने इस घटना में प्रशांत जावडेकर ;रत्नागिरी सारंग कुलकर्णी ;पुणे जयप्रकाश उर्फ अन्ना ;मेंगलोर व एक अन्य अज्ञात व्यक्ति को आरोपी बनाया। मालगोंडा पाटिल और योगेश नायक नामक दो व्यक्ति एक बोरी में विस्फोटक भरकर स्कूटर से ले जा रहे थे तभी उनमें विस्फोट हो गया। यह घटना तब हुई जब मारमागोवा में एक धार्मिक पर्व चल रहा था जिसमें बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक.स्वरूप नरकासुर के पुतले जलाए जाते हैं। पुलिस ने इस घटना के लिए सनातन संस्था  नामक दक्षिणपंथी हिन्दू संगठन को दोषी ठहराया। इस संगठन का मुख्यालय गोवा के पोंडा क्षेत्र में स्थित रामनाथी नगर था जो कि अपने मंदिरों के लिए जाना जाता है।
इसी तरहए सन् 2008 में सनातन संस्था के 6 सदस्यों को वाशी ;ठाणे में एक सभागार में बम रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। 30 अगस्त 2011 को ठाणे की सेशन्स अदालत ने सनातन संस्था के रमेश गडकरी और विक्रम भावे को बम रखने का दोषी पाया और उन्हें दस वर्ष के कारावास की अधिकतम सजा सुनाई। एनआईए के अधिकारियों ने इस संस्था के मुख्यालय पर अक्टूबर 2011 में छापा मारा। संस्था की गतिविधियों की जांच जारी है। इन दोनों घटनाओं में निशाने पर मुसलमान नहीं थे परन्तु विस्फोट करने वाले यह जानते थे कि घटनाओं का दोष मुस्लिम संगठनों पर मढ़ा जायेगा।
आईबी व एटीएस के एक हिस्से का साम्प्रदायिकीकरण
जहां एक ओर साम्प्रदायिक संगठनों ने आतंकवाद और बम विस्फोटों के जरिए मुसलमानों को खलनायक और दानव सिद्ध करने की कोशिश की वहीं उन्होंने सुरक्षाबलों में ऐसे लोगों की घुसपैठ करवाई जिनकी मानसिकता साम्प्रदायिक थी। ये लोग अपने पद व शक्तियों का दुरूपयोग कर निर्दोष मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार करते उन्हें सीमा पार से आया ऐसा आतंकवादी बताते जिसके निशाने पर नरेन्द्र मोदी या कोई अन्य महत्वपूर्ण व्यक्ति या कोई सामरिक महत्व का स्थान था व मुठभेड़ के नाम पर उनकी हत्या कर देते। यह सिलसिला लम्बे समय से चल रहा था और चलता ही रहता यदि सोहराबुद्दीन के भाई ने भारी मुसीबतों को झेलते हुए लम्बी कानूनी लड़ाई न लड़ी होती। यह इस तथ्य के बावजूद कि इस घटना में शामिल व्यक्ति अत्यंत शक्तिशाली व प्रभावशाली थे और उनके हाथ बहुत लंबे थे। सोहराबुद्दीन की तरह ही इशरत जहां,जावेद शेख और दो अन्यों को, जिनमें से एक का नाम सादिक जमाल था, मौत के घाट उतार दिया गया था। इशरत जहां की हत्या की सीबीआई द्वारा की गई जांच में यह सामने आया कि उसमें गुजरात के पुलिस महानिदेशक पद से सेवानिवृत्त पीपी पाण्डेय का हाथ था। फर्जी मुठभेड़ में आई.बी. के अधिकारी राजेन्द्र कुमार की क्या भूमिका थी,इसकी जांच जारी है। राजेन्द्र कुमार ने वे गुप्तचर सूचनाएं उपलब्ध करवाईं थीं जिनके आधार पर हत्या को मुठभेड़ साबित किया गया। राजेन्द्र कुमार ने ही कथित रूप से उन एके.47 बंदूकों का इंतजाम करवाया, जिन्हें इशरत जहां व अन्य मृतकों की लाशों के पास रख दिया गया। गुजरात के गृह मंत्री और नरेन्द्र मोदी के विश्वस्त अमित शाह को सोहराबुद्दीन,कौसर बानो और तुलसीराम प्रजापति की हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया।
निर्दोष मुसलमानों की फर्जी मुठभेड़ों में हत्या को पूरे देश में मीडिया के जरिए प्रचारित करवाया जाता। जो कुछ पुलिस कहती,मीडिया उसे सौ प्रतिशत सत्य मानकर निगल लेती। इस तरह की घटनाओं के मीडिया द्वारा बिना कोई संदेह व्यक्त किए कवरेज करने और इन घटनाओं पर टीवी में बहस मुबाहिसों के लंबे सिलसिलों के चलते, टीवी का एक आम दर्शक यह मानने पर मजबूर हो जाता कि सभी आतंकवादी मुसलमान होते हैं। नरेन्द्र मोदी और एलके आडवाणी जैसे नेतागण इसी बात को लगतार दोहराते रहते हैं। इस प्रकार, मुसलमानों के प्रति घृणा पैदा करने के लिएए दंगें भड़काने की बजाए, उन पर आतंकवादी होने का लेबल चस्पा करना शुरू कर दिया गया। फर्जी मुठभेड़ों का एक और लाभ था। जो लोग कथितआतंकवादियों के निशाने पर बताये जाते थे, वे नायक के रूप में उभरते थे और उन्हंे लौहपुरूष बताया जाता था।
निष्कर्ष
साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा अब यह रणनीति अपनाई जा रही है कि गुप्तचर एजेंसियों और आतंकवाद निरोधक दस्तों के एक हिस्से और मीडिया कवरेज के सहारेए अल्पसंख्यकों को देश के लिए बड़े खतरे के रूप में प्रस्तुत किया जाए। साम्प्रदायिक ताकतों ने अपनी विचारधारा से ओतप्रोत लोगों की घुसपैठ सुरक्षाबलों में करवाने में सफलता पा ली है। होता यह है कि आईबी का एक हिस्सा झूठी गुप्त सूचनाएं देता है और इन सूचनाओं पर तुरत.फुरत कार्यवाही करते हुए आतंकवादी निरोधक दस्ते, निर्दोष मुसलमानों काए उन्हें आतंकवादी बताकर,कत्ल कर देते हैं और यह दावा करते हैं कि उन्होंने देश को एक और आतंकी हमले से बचा लिया। उत्तरप्रदेश के निमेश आयोग ने ऐसे मुस्लिम युवकों की सूची तैयार की है जिन्हें धर्मनिरपेक्ष मायावती सरकार में आतंकवादी बताकर गिरफ्तार किया गया था। निमेश आयोग के अनुसारए खालिद मुजाहिद नामक एक युवक को भी बिना किसी सुबूत के गिरफ्तार किया गया था। बाद में पुलिस हिरासत में उसकी मौत हो गई। आम जनता के दिलो.दिमाग में फिरकापरस्ती का जहर इस हद तक भर दिया गया है कि आतंकवादी होने के आरोप में मुकदमों का सामना कर रहे मुस्लिम युवकों की पैरवी करने वाले वकीलों को उनके ही हम पेशा अदालतों के परिसरों में पीट रहे हैं और इस पर न तो समाज और ना ही न्यायपालिका अपेक्षित प्रतिक्रिया व्यक्त कर रही है। कम से कम किसी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय ने अदालतों की परिसरों में हो रही इस तरह की घटनाओं पर आपत्ति दर्ज नहीं की है। कतील सिद्दीकी को यरवदा जेल में मार डाला गया क्योंकि उसकी गवाही से हिमायत बेग, जिसे जर्मन बेकरी धमाकों के सिलसिले में फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है, निर्दोष साबित हो जाता। ऐसा लगता है कि नई रणनीति काम कर रही है परन्तु ऐसा कब तक होगा, कहना मुश्किल है। जो नागरिक प्रजातंत्र और उसकी संस्थाओं का सम्मान करते हैंए वे आखिर कब इस तरह की नंगी हिंसा के विरोध में अपनी आवाज बुलंद करेंगे? इसके पहले कि भारत एक फासीवादी देश बन जाए, हम सबको इस तरह की क्रूरता और अन्याय के विरूद्ध उठ खड़ा होना चाहिए।
-इरफान इंजीनियर

मंगलवार, 25 जून 2013

पटना और वैष्णो देवी पर हमले का डर दिखाकर खुद पर उठ रहे सवालों से ध्यान हटाना चाहती है आईबी


लखनऊ : खालिद मुजाहिद के हत्यारे पुलिस अधिकारियों की गिरफ्तारी, निमेष आयोग की रिपोर्ट पर तत्काल अमल करने और आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को छोड़ने की मांग के साथ चल रहा रिहाई मंच का अनिश्चितकालीन धरना आज 34वें दिन भी जारी रहा.
आज धरने के माध्यम से रामपुर सीआरपीएफ कैंप पर हुए कथित आतंकी हमले में फंसाए गए कुंडा के कौसर फारुकी के भाई अनवर फारुकी और मुरादाबाद के जंग बहादुर खान के बेटे शेर खान ने मामले की पुनर्विवेचना और सीबीआई जांच की मांग के संदर्भ में मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा. क्रमिक उपवास पर अनवर फारुकी और शेर खान बैठे.
By issuing terror threats to Patna & Vaishno Devi IB is trying to deviate questions of its involvement in ishrat jahna caseधरने को संबोधित करते हुए अनवर फारुकी और शेर खान ने कहा कि मानवाधिकार संगठनों की जांच रिपोर्टों और मीडिया रिपोर्टों से पूरा देश जानता है कि 31 दिसंबर, 2007 की रात को रामपुर सीआरपीएफ के जवानों ने शराब के नशे में आपस में गोलीबारी की थी, जिसे तत्कालीन सरकार ने अपनी इज्जत बचाने के लिए आतंकवादी घटना के बतौर प्रचारित किया था.
उन्होंने कहा कि यह कहां का न्याय है कि शराबी जवानों की करतूत छिपाने के लिए निर्दोषों को जेल में डालकर बली का बकरा बनाया जाए. उन्होंने सपा सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह कैसा समाजवाद है जहां निर्दोष जेलों में सड़ते हैं और सरकार लैपटॉप बांटने में मशगूल है.
धरने के समर्थन में दिल्ली से आए पत्रकार विजय प्रताप ने कहा कि आतंकी घटनाओं की मीडिया रिपोर्टिंग मुस्लिम विरोधी मानसिकता से ग्रस्त है और यह देश के सौहार्द के लिए खतरनाक है. उन्होंने कहा कि बटला हाउस फर्जी मुठभेड़ के बाद हिंदी अखबारों ने जिस तरह मुस्लिम विरोधी मानसिकता के साथ रिंपोर्टिंग की, उससे देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय में हिंदी अखबारों को लेकर नाराजगी व्याप्त हुई. इसके परिणामस्वरूप मुसलमानों के बड़े हिस्से ने उर्दू अखबारों की तरफ रुख कर लिया क्योंकि वहां ऐसे मसलों पर खबरें ज्यादा तथ्यपरक और सरकार के नज़रिए पर आंख मूंद के भरोसा करने के बजाय उसपर वाजिब सवाल उठाने का रहा.
उन्होंने कहा कि बटला हाउस की घटना हिंदी मीडिया के लिए आत्म आलोचना और मंथन का वक्त था, लेकिन हिंदी मीडिया ने उस पर मंथन नहीं की और अपनी विश्वसनियता मुसलमानों और इंसाफ पसंद लोगों के बीच खो दी. इसलिए आज ज़रूरी हो जाता है कि भारतीय प्रेस परिषद आतंकी घटनाओं की रिपोर्टिंग के लिए सख्त दिशा-निर्देश बनाए और उसका सख्ती से अनुपालन सुनिश्चित करे.
धरने के समर्थन में फैजाबाद से आए साहित्यकार अनिल सिंह ने कहा कि खालिद मुजाहिद की हत्या के बाद फैजाबाद में हुए विरोध प्रदर्शनों में शामिल मुस्लिम वकीलों को जिस तरह प्रशासन की मौजूदगी में संघ परिवार से जुड़े सांप्रदायिक गुंडा वकीलों ने पीटा और उनकी चौकियां उठाकर अदालत परिसर से बाहर फेंक दी, उससे समझा जा सकता है कि खालिद की हत्या के पीछे सरकार और सांप्रदायिक गिरोहों का यही गठजोड़ काम कर रहा था.
उन्होंने कहा कि 1992 में जब बाबरी मस्जिद को तोड़ने का सांप्रदायिक आंदलोन अपने उफान पर था, तब भी फैजाबाद और अयोध्या में संघ परिवार की कोशिशों के बावजूद दंगा नहीं हुआ, जबकि पूरे देश में अयोध्या के नाम पर दंगे हुए थे. लेकिन पिछले साल सपा हुकूमत में फैजाबाद में संघ गिरोह और प्रशासन की मिलीभगत से सपा सरकार ने दंगा कराकर फैजाबाद में दंगा कराने का संघ परिवार का सपना पूरा कर दिया. इससे सपा का असली चेहरा बेनकाब हो गया है.
धरने के समर्थन में फैजाबाद से आए कवि और लेखक रघुवंश मणि ने कहा कि जिस तरह खालिद के  हत्यारों की गिरफ्तारी के लिए यह धरना पिछले के महीने से अधिक समय से जारी है, उससे साफ हो गया है कि मुसलमान अब मुलायम सिंह द्वारा सामाजिक न्याय के नाम पर ठगे जाने के लिए और तैयार नहीं है.
उन्होंने कहा कि खालिद के न्याय की लड़ाई मुसलमानों समेत तमाम इंसाफ पसंद लोगों की लड़ाई है और वह दिन दूर नहीं जब इस लड़ाई में अवाम को जीत मिलेगी और इशरत जहां को फर्जी मुठभेड़ में मारने वाले पुलिस अधिकारियों की तरह ही खालिद के हत्यारे आला पुलिस अधिकारी भी सलाखों के पीछे होंगे.
धरने को संबोधित करते हुए पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव और रिहाई मंच, इलाहाबाद के प्रभारी राघवेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि पिछले कुछ दिनों से आईबी पटना और वैष्णो देवी पर आतंकी हमले का माहौल बना रहा है जो सिर्फ इसलिए किया जा रहा है कि इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ में आईबी की हो रही बदनामी पर से लोगों का ध्यान हटाया जा सके.
उन्होंने कहा कि कई आतंकी घटनाओं में आईबी की भूमिका उजागर हो जाने पर इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि आईबी पटना, वैष्णो देवी या देश के किसी दूसरे हिस्से में विस्फोट कराकर अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा की पुनर्बहाली की कोशिश करे और देश में मुसलमानों के खिलाफ माहौल बनाए.
वक्ताओं ने कहा कि लियाकत शाह, इशरत जहां और अब खालिद की हत्या की मामले में आईबी की संलिप्तता उजागर हो जाने के बाद ज़रूरी हो जाता है कि देश में हुए सभी आतंकी घटनाओं में आईबी की भूमिका को जांच के दायरे में लाया जाए.
धरने को समर्थन देते हुए भारतीय एकता पार्टी के सैयद मोईद और मुस्लिम मजलिस के नेता जैद अहमद फारुकी ने कहा कि सपा और भाजपा मिलकर 2014 में यूपी में गुजरात जैसा माहौल बनाना चाहती हैं. इसीलिए एक तरफ सपा एक साल में 27 दंगे कराती है और खालिद जैसे निर्दोष को पुलिस अभिरक्षा में मरवा देती है. सिद्धार्थनगर, पडरौना, गोरखपुर और कुशीनगर में योगी आदित्य नाथ के सांप्रदायिक आपराधिक संगठन हिंदू युवा वाहिनी को मुस्लिम विरोधी हिंसा करने की खुली छूट दे देती है तो वहीं भाजपा गुजरात-2002 के दंगाई अमित शाह को प्रदेश का प्रभारी बना देती है. लेकिन इन दोनों पार्टियों को समझ लेना चाहिए कि यूपी गुजरात नहीं है और ना इसे गुजरात बना देने की सपा और भाजपा की कोशिशों को अवाम पूरा होने देगी.
सोशलिस्ट फ्रंट ऑफ इंडिया के मोहम्मद आफाक और हाजी फहीम सिद्दीकी ने कहा कि यह धरना सपा सरकार की ही कब्र नहीं खोदेगा, बल्कि खालिद मुजाहिद के हत्यारों को बचाने में शामिल दलाल उलेमाओं को भी बेनकाब कर देगा.
धरने के दौरान मशहूर संस्कृतिकर्मी और वरिष्ठ पत्रकार आदियोग ने जनवादी गीतों से सरकार की जनविरोधी नीतियों पर सवाल उठाया. रिहाई मंच के प्रवक्ताओं शहनवाज आलम और राजीव यादव ने बताया कि 25 जून को धरने में मुख्य तौर पर लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति और सामाजिक कार्यकर्ता प्रो. रूपरेखा वर्मा के नेतृत्व में महिलाएं शामिल होंगी.
धरने का संचालन आज़मगढ़ रिहाई मंच के प्रभारी मशीहूद्दीन संजरी ने किया. धरने को हरेराम मिश्रा, मोहम्मद फैज, सोएब, शाहनवाज आलम, राजीव यादव, शिव दास आदि ने भी संबोधित किया.

गुरुवार, 13 जून 2013

क्या प्रधानमंत्री व भाजपा अपराधी को बचा पाएंगे ?

गुजरात के इशरत जहाँ के फर्जी एनकाउंटर में आई बी के विशेष डायरेक्टर राजेंद्र कुमार को सीबीआई ने आज अभियुक्त सम्मन के द्वारा तलब किया था किन्तु उन्होंने अपने पिता की बीमारी का बहाना कर मंगलवार की तारीख उपस्थित होने के लिए ली है। वहीँ, आई बी के डायरेक्टर आसिफ इब्राहिम प्रधानमंत्री सहित देश के प्रमुख अधिकारीयों से राजेंद्र कुमार की सिफारिश की है और सीबीआई के डायरेक्टर रंजीत सिन्हा से मिलकर उनको अर्दब में लेने की भी कोशिश की है।
               सीबीआइ के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार राजेंद्र कुमार ने शुक्रवार को पूछताछ के लिए आने में असमर्थता जताई थी। इसके बाद उन्हें मंगलवार का समय दिया गया है। आशंका है कि पूछताछ के बाद राजेंद्र कुमार को गिरफ्तार भी किया जा सकता है। सीबीआइ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि फर्जी मुठभेड़ में राजेंद्र कुमार की भूमिका को लेकर उनके पास पुख्ता सुबूत हैं। मुठभेड़ के समय राजेंद्र कुमार गुजरात में आइबी के संयुक्त निदेशक के पद पर तैनात थे और मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और लालकृष्ण आडवाणी पर लश्कर-ए-तैयबा के आत्मघाती दस्ते के हमले के बारे में उन्होंने राज्य सरकार को सचेत किया था। इसी अलर्ट को आधार बनाते हुए अहमदाबाद पुलिस की क्राइम ब्रांच ने इशरत और उसके साथियों को मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया था।  
इस अपराधी को बचाने के लिए राजनितिक दलों में मात्र भारतीय जनता पार्टी आगे आई है क्यूंकि कुर्सी पर बैठे हुए अपराधियों की पैरोकारी में इसकी भूमिका हमेशा आगे रही है। भाजपा प्रवक्ता निर्मला सीतारमण ने कहा कि इस मामले में प्रधानमंत्री को तत्काल हस्तक्षेप पर राष्ट्रहित में फैसला लेना चाहिए। उनके अनुसार देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए यह अत्यंत गंभीर मामला है। किन्तु भारतीय जनता पार्टी जब यह बयान देती है तो उसे देश के नागरिकों को इन अधिकारीयों द्वारा किये जा रहे उत्पीडन व अपराध नहीं दिखाई देते हैं। उत्तर प्रदेश में भी खालिद मुजाहिद की हत्या के बाद भारतीय जनता पार्टी ने हत्या के लिए नामजद अभियुक्तों को बचाने के लिए पैरवी की थी और पूरे प्रदेश में प्रदर्शन भी किया था। देश के नागरिकों को मार डालने वाले लोग भाजपा की नजर में असली राष्ट्रप्रेमी हैं। 
         आई बी के डायरेक्टर को भी फर्जी एनकाउंटर के मामले में हस्तक्षेप नही करना चाहिए क्यूंकि आज स्तिथि यह हो गयी है कि किसी भी व्यक्ति को पकड़ कर मार डालो और आउट ऑफ़ टर्न प्रमोशन व इनाम इकराम ले लो का दौर चल रहा है। इससे लोकतंत्र व न्याय समाप्त होता है। प्रधानमंत्री को भी चाहिए की अपराधी अधिकारीयों को बचाने के बजाये कठोर कार्यवाई कराएं जिससे जनता का व्यवस्था के प्रति सम्मान बढ़ सके।

सुमन 
लो क सं घ र्ष !

बुधवार, 21 सितंबर 2011

आई बी और "रा" में कोई तुलना नहीं


मै "रा" को आई बी की श्रेणी में नहीं रखना चाहता क्यूंकि दोनों की विशेषताएं अलग हैं। और उसके निम्न कारण हैं :

1. "रा" (RAW: Research & Analyasis Wing ) की स्थापना आजादी के कोई बीस साल बाद इंदिरा गाँधी के शासन काल में हुई थी, इसलिए लगातार कोशिशों के बावजूद इस संगठन का आई बी की तरह हिंदुत्वीकरण नहीं हो सका। यूँ तो रा में भी कुछ अधिकारी हिंदुत्व वादी विचारधारा के हैं, मगर ऐसा मामला एक-आध ही हो सकता है इसलिए इस संस्था में उस प्रकार की वैचारिक घुसपैठ नहीं हो सकी जिस तरह आई बी में हो गयी है।

2. इसके अलावा यह कि "रा" का कार्य क्षेत्र पाकिस्तान, बंगला देश, चीन, अफगानिस्तान, श्रीलंका और कुछ दूसरे देशों तक सीमित है और वह देश के आंतरिक मामलों पर प्रभाव नहीं डाल सकती। इसलिए आई बी की तरह उपस्तिथि महसूस नहीं हो सकती।

3. पिछले कुछ वर्षों के दौरान इन दोनों संगठनो में प्रोफेशनल मुकाबला इस हद तक पहुँच गया है कि दोनों एक दूसरे को नीचा दिखाने का एक भी अवसर हाथ से जाने नहीं देते

इस वजह से "रा" में काफी संख्या में हिन्दुवत्व वादी अधिकारीयों की मौजूदगी के बावजूद आर एस एस और दूसरे हिन्दुवत्व वादी संगठन उसको 'अपना' नहीं समझते और उसपर ज्यादा भरोसा नहीं करते। यद्यपि समय-समय पर वे अपने उद्देश्यों के लिये उसका उपयोग भी करते हैं। नतीजे के तौर पर आई बी धीरे-धीरे सबसे ज्यादा शक्तिशाली संगठन बन गई है।


एस एम मुशरिफ़
पूर्व आई जी पुलिस
महाराष्ट्र
मो 09422530503

मंगलवार, 20 सितंबर 2011

आई बी आर एस एस से ज्यादा हिन्दुवत्व वादी


पिछले कुछ वर्षों से नई पीढ़ी की राजनीतिक आकांक्षाओं के दबाव में और कुछ अपने "हिन्दुवत्व मूल" पर हिन्दू मुखौटा चढाने की वजह से आर एस एस और उसके राजनितिक संगठन बी जे पी को पिछले वर्षों के दौरान अपने मूल एजेंडे के कुछ बिन्दुवों पर समझौता करना पड़ा जिसका एक नतीजा यह हुआ कि हिन्दुवत्व वादी एजेंडे के प्रति उनका उत्साह बड़ी हद तक कमजोर पड़ गया। लेकिन आई बी में मौजूद हिन्दुवत्व वादियों का मामला ऐसा नहीं है। वे संघ परिवार के एजेंडे को बराबर दिमाग में रखते हैं। और न केवल पहले की तरह ही उस एजेंडे के प्रति वफादार और समर्पित हैं बल्कि सरकार में लगातार बढ़ते प्रभाव और प्रशासन पर अपने दबदबे की बदौलत दिन-प्रतिदिन ज्यादा से ज्यादा दुस्साहसिक कारनामे अंजाम देने का हौसला पा रहे हैं। इस तरह धीरे-धीरे आई बी ने हिन्दुवत्व वादी के असल चैम्पियन की भूमिका अपना ली है और आर एस एस की विचारधारा और नीतियों का संरक्षक बन गई हैं। अगर हिन्दुवत्व वादी मानसिकता के आई बी अफसरों की आर एस एस एजेंडे प्रति ऐसी वफादारी और निष्ठां न होती तो आर एस एस की मूल आत्मा कब की मिट चुकी होती और अपने सारे संसाधनों और मजबूत संगठन के बावजूद समाज पर ऐसी मजबूत पकड़ वह हासिल न कर पाती जैसी कि उसने कर ली है। आर एस एस और आई बी एक दूसरे से कितने जुड़े हुए हैं, निम्न उदहारण से यह अच्छी तरह समझा जा सकता है:
दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेस्सर सैयद अब्दुर्रेह्मान गिलानी ने, जिनको दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने संसद भवन पर आतंकी हमले के आरोप से बरी कर दिया था, तहलका ( 22 नवम्बर 2008 ) में लिखा है : 'मैंने इस इंटेलिजेंस एजेंसी को बहुत करीब से देखा हैउनके साथ बैठ कर मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि मै एक लोकतांत्रिक देश के किसी सरकारी दफ्तर में बैठा हूँबल्कि हमेशा ऐसा प्रतीत हुआ कि मै आर एस एस के मुख्यालय में बैठा हूँ। "

एस एम मुशरिफ़
पूर्व आई जी पुलिस
महाराष्ट्र
मो 09422530503

सोमवार, 19 सितंबर 2011

आई बी द्वारा आर एस एस के एजेंडे का लागू करना


आई बी पर व्यावहारिक रूप से आर एस एस के पूर्ण नियंत्रण के बाद उसने आर एस एस के एजेंडे को बड़ी तत्परता के साथ इस तरह कार्यान्वित करना शुरू किया जैसे वह कोई सरकारी संगठन हो बल्कि आर एस एस का ही कोई अंग होआर एस एस को एक राष्ट्र हितैषी संगठन के रूप में सामने लाने और वामपंथियों को देशद्रोही मुसलमानों को रुढ़िवादी, आतंकवादी और देश-विरोधी संप्रदाय ठहराने के अपने उद्देश्य में वह पूरी तरह सफल हो चुकी है
उसने इसके लिये निम्न तरीके अपनाकर 'सच्चाई को दबाव, झूठ को सच बना कर प्रस्तुत करो' की नीति पर काम किया :
. आई बी ने सरकार को आर एस एस और उसके सहयोगी संगठनो की सांप्रदायिक गतिविधियों, विदेशों से भारी मात्रा में धन की प्राप्ति, सामाजिक, शैक्षिणिक और संस्कृतिक संस्थाओ और मीडिया में उनकी घुसपैठ से और उस सांप्रदायिक जहर से जो पूरे देश में वे अपनी हजारों शाखाओं के माध्यम से दिन-रात फैलाते रहे हैं, अँधेरे में रखा और इसके बजाय आर एस एस को एक 'राष्ट्र प्रेमी संगठन' के रूप में प्रस्तुत कियायह बात उन रिपोर्टों के अध्ययन और विश्लेषण से जाहिर हो जाती है जो आई बी ने पिछले कुछ सालों में सरकार को दी है

२. आई बी ने वामपंथी दलों और मुस्लिम संस्थाओं सेकुलर संगठनो के बारे में एक बिल्कुल ही उलटी नीति अपनाईउसने उनकी गतिविधियों के बारे में बहुत बढ़ा चढ़ा कर और कभी झूठी सूचनाएं सरकार को दी, हालाँकि उनकी गतिविधियाँ आर एस एस और उसके सहयोगी संगठनो की सरगरमियों के मुकाबले में राष्ट्र के लिये कुछ भी हानिकारक नहीं रहीकेंद्र में सत्ता में आने वाली हर सरकार ने, जो कि सूचनाओं के लिये पूरी तरह आई बी पर निर्भर है, उन रिपोर्टों पर भरोसा किया और वामपंथियों धर्मनिरपेक्ष संगठनो को 'चरमपंथी' या आतंकवादी ठहरा कर उनकी कानूनी गतिविधियों तक में रुकावटें कड़ी की और इस तरह उन्हें किनारे लगाया

एस एम मुशरिफ़
पूर्व आई जी पुलिस
महाराष्ट्र
मो 09422530503

रविवार, 18 सितंबर 2011

आई.बी और आर.एस.एस


आई बी भारत सरकार की गुप्त सूचनाएं प्राप्त करने की प्रमुख संस्था है। इतना ही नहीं यह हुकूमत की आँख और कान है, अत: बिलकुल शुरू से ही हिन्दुत्ववादियों ने इसमें घुसपैठ शुरू कर दी और आजादी के बाद के दस साल में इसपर पूरा कंट्रोल हासिल कर लिया। किसी सांप्रदायिक संगठन के किसी सरकारी संसथान पर योजनाबद्ध तरीके से नियंत्रण प्राप्त कर लेने का यह आदर्श उदहारण है। उन्होंने ये सब कुछ किस तरह किया, यह भी अध्ययन के लिये एक दिलचस्प विषय है।
आई बी के अधिकारी और कर्मचारी दो तरह के होते हैं। कुछ तो स्थायी रूप से नियुक्त होते हैं और कुछ ख़ास कर माध्यम व ऊँचे पदों पर, राज्यों से डेपुटेशन पर नियुक्त किया जाता है। प्रारंभ में हिन्दुत्ववादियों ने आई बी में प्रवेश किया और सबसे महत्वपूर्ण स्थाई पदों पर जम गए। उसी के साथ आर एस एस जैसे हिन्दुत्ववादी संगठनो ने विभिन्न राज्यों से तेज तर्रार नवयुवक ब्राहमण आई पी एस अधिकारीयों को डेपुटेशन पर आई बी में जाने के लिये प्रोत्साहित करना शुरू किया।
मराठी पाक्षिक पत्रिका 'बहुजन संघर्ष' ( 30 अप्रैल 2007) में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया है कि :
"इस प्रकार आई बी के प्रमुख पदों पर आर एस एस के वफादारों के आसीन हो जाने के बाद उन्होंने यह नीति अपनाई कि खुद ही राज्यों के ऐसे अधिकारीयों को चिन्हित करते जो उनकी नजर में आई बी के लिये उचित होते और उनको जी आई बी में लिया जाने लगा। इसका नतीजा यह हुआ कि आर एस एस की विचारधारा से सहमत युवा आई पी एस अधिकारी अपने सेवा काल के आरम्भ में ही आई बी में शामिल होने लगे और फिर 15, 20 साल तक आई बी में ही रहे। कुछ ने तो अपना पूरा करियर ही आई बी में गुजरा। उदहारण के लिये महाराष्ट्र कैडर के अफसर वी जी वैध सेवानिवृति तक आई बी में ही रहे और डाईरेक्टर के उच्चतम पद तक पहुंचेदिलचस्प बात यह है कि जब आई बी के डाईरेक्टर थे, उनके भाई एम जी वैध महाराष्ट्र आर एस एस के प्रमुख थेअगर आई बी के ऐसे अधिकारीयों की सूची पर, जो विभिन्न राज्यों से डेपुटेशन पर आई बी में लिये गए, गहराई से नजर डाली जाए तो यह नजर आएगा कि उनमें से अधिकतर या तो आर एस एस के वफादार रहे हैं या उनका आर एस एस से निकट सम्बन्ध रहा है और वे या तो आर एस एस के इशारे पर आई बी या रा में गए हैं या फिर उनको इन संगठनो में मौजूद आर एस एस का एजेंडा पूरा करने वाले अधिकारीयों ने लिया है। रिकॉर्ड में दिखाने के लिये कुछ ऐसे अफसर भी आई बी में लिये जाते रहे जिनका सम्बन्ध आर एस एस से नहीं रहा लेकिन उनको स्थाई रूप से गैर महत्वपूर्ण काम सौंपे गए।"

एस एम मुशरिफ़
पूर्व आई जी पुलिस
महाराष्ट्र
मो 09422530503
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