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रविवार, 30 मार्च 2014

श्रीराम सेना या आतंकी सेना


                          
  मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने देश में उत्तर को दक्षिण से जोड़ा था किन्तु ब्रिटिश साम्राज्यवाद के सेवक हिन्दुत्ववादी संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व उसके अन्य आनुषांगिक संगठनों ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम की हमेशा मर्यादा भंग की है जो अक्षम्य अपराध है। इस हिन्दुत्ववादी संगठन ने अयोध्या में ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद को तोड़कर देश को गृह  युद्ध में झोंकने  का प्रयास किया और देश की एकता और अखण्डता को खतरे में डाला।इस बहुजातीय, बहुधर्मी देश में अगर भावनात्मक एकता न होती तो यह संगठन इस देश को भी यूगोस्लाविया बना देने में कोई कसर नही छोड़ी थी।          
         अब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेताओं ने सुनियोजित साजिश कर श्री राम सेना बनायी। श्री राम सेना के प्रमुख प्रमोद मुथालिक कर्नाटक के अन्दर जगह-जगह ‘हिन्दू जन जागृति‘ समितियाॅ बनाकर उग्र भाषणबाजी कर रहे है। जिसमें वह मालेगाॅव बम विस्फोट के  आतंकियोेें की प्रशंसा में भी कसीदे पढ़ रहे है जैसे  उनकी श्री राम सेना , श्रीराम की सेना न होकर आतंकियों की सेना हो। उनकी उग्र व गैर जिम्मेदाराना भाषणबाजी से समाज में विघटन पैदा हो रहा है भगवान राम को कलंकित करने का अधिेकार किसी को नही है। लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जिनका हिन्दू धर्म से कोई लेना देना नहीं है वह हिन्दू देवताओं के नाम पर भोली -भाली जनता को उग्र्र हिन्दुत्व का पाठ पढा रही हैै। समय रहते ऐसे संगठनों के ऊपर तुरन्त रोक न लगायी गयी तो देश की एकता और अखण्डता को गम्भीर खतरा पैदा होगा। साम्राज्यवादियों की साजिश है कि देश को कमजोर करके पूर्व की भांति फिर इसे उपनिवेश बनाकर रखा जाये।इसके लिए उसके एजेण्ट संगठन तरह-तरह के देवताओं के नाम पर सेनायें बनाकर आतंकवादी कार्यवाहियाॅ कर रहे है। देश की  जनता को चाहिए कि साम्राज्यवादियों की साजिश को समझकर उनका मुँहतोड़ जवाब दे। झारखण्ड के जिला धनबाद में बजरंग दल के नेता उमाकान्त तिवारी ने 430 बोरिया अमोनियम नाइटेªट लूटकर जितेन्द्र सिंह के घर छिपाया था किन्तु पुलिस की मुश्तैदी से दोनो बजरंगी पकड़े गये और अमोनियम नाइटेªट बरामद हुआ। इस तरह पता चलता है कि यह संगठन भी उग्रवादी संगठन की भाँति खुले आम इस तरह की साजिशें कर रहे है।

-पवन वर्मा
लोकसंघर्ष  पत्रिका मार्च २००९से

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

साम्प्रदायिकता नई रणनीतियां


साम्प्रदायिक संगठन अक्सर यह प्रचार व दावा करते हैं कि चूंकि देश में कोई बड़ा दंगा नहीं हो रहा है इसलिए यहां शांति है। वे यह भी कहते हैं कि चूंकि शांति है इसलिए प्रस्तावित साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निरोधक विधेयक या साम्प्रदायिक दंगों से निपटने के लिए किसी अन्य विशेष कानून की आवश्यकता नहीं है। बल्कि, उनके अनुसार, इस तरह का कानून, साम्प्रदायिक खाई को और गहरा करेगा और उन घावों को फिर से कुरेदेगा, जो धीरे.धीरे भर रहे हैं। 
यह सच है कि सन् 2002 के बाद से गुजरात जैसे दंगे देश में नहीं हुए हैं। परन्तु यही बात अहमदाबाद के 1969 के दंगे, जिसमें आधिकारिक अनुमानों के अनुसार 2000 लोग मारे गए थे, और 1970 में हुए इतने ही भयावह भिवण्डीए जलगांव, महाड़ दंगों के बारे में भी सच है। इन दंगों के बाद, लगभग 14 साल तकए देश में कोई बड़ा दंगा नहीं हुआ। सन् 1984 में दिल्ली, अहमदाबाद, भिवण्डी और मुम्बई में दंगे भड़क उठे। सन् 1980 के दशक में गोधराए मेरठ, मलियाना, मुरादाबाद, अलीगढ़, भागलपुर आदि में छोटे.बड़े दंगे हुए। इन दंगों की पृष्ठभूमि में था उच्चतम न्यायालय के शाहबानो मामले में निर्णय का विरोध और अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिराकर उसके स्थान पर राममंदिर बनाने का आंदोलन। बाबरी मस्जिद को जमींदोज करने के अभियान के नतीजे में उत्तर और पश्चिमी भारत के कई शहरों, जिनमें मुंबई, अहमदाबाद और सूरत शामिल हैंए में दंगे हुए।
हमारे देश में विभिन्न जातियों और समुदायों को उपलब्ध अवसरों और विकास के फलों में अपनी हिस्सेदारी का दावा करने के लिए जिस ढंग से उत्प्रेरित किया जाता हैए उससे बेशक यह नतीजा निकाला जा सकता है कि साम्प्रदायिक हिंसा चक्रीय और आवर्ती है। चक्र की अवधि कम.ज्यादा हो सकती है परन्तु हिंसा की तीव्रता में केवल बढ़ोत्तरी ही होती है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि वर्तमान में देश में जो साम्प्रदायिक शांति है, वह एक तरह से तूफान के पहले की शांति है। यह महत्वपूर्ण है कि शांति के इस दौर में भी कम से कम आठ स्थानों पर दंगे हुए हैं, जिनमें उत्तरप्रदेश के कई नगर और महाराष्ट्र का धुले शामिल है। इस संदर्भ में यह भी कहा जा रहा है कि समाज का साम्प्रदायिकीकरण और धु्रवीकरण करने के लिएए साम्प्रदायिक संगठनों की दंगों पर निर्भरता कम होती जा रही है।
साम्प्रदायिक संगठन इस मिथक का भरपूर प्रचार करते हैं कि साम्प्रदायिक दंगे किसी भयावह घटनाक्रम की स्वभाविक जनप्रतिक्रिया होते हैं.वह घटना इन्दिरा गांधी या स्वामी लक्ष्मणानन्द की हत्या हो सकती है या साबरमती एक्सप्रेस के कोच में आगजनी। सच यह है कि साम्प्रदायिक हिंसा हमेशा जानते.बूझते भड़काई जाती है और इसका उद्देश्य पहले से तय लक्ष्यों को पाना होता है। पॉल ब्रास के अनुसार, स्वतंत्रता के बाद से देश के कुछ क्षेत्रों विशेषकर उत्तरी व पश्चिमी राज्यों में, एक ष्संस्थागत दंगा व्यवस्था अस्तित्व में आ गई है, जिसे चुनाव के समय या राजनैतिक आवश्यकता पड़ने परए सक्रिय किया जा सकता है। साम्प्रदायिक हिंसा कभी स्वस्फूर्त नहीं होती। एक दंगे के उत्पादन के लिएए ब्रास कहते हैं, कई काम करने होते हैं। इनमें शामिल हैं अफवाहें फैलाना, सूचनाओं का आदान.प्रदान, उत्तेजक भाषणबाजी, दंगाईयों की भर्ती और हिंसा शुरू करवाने के लिए पूर्व.नियोजित हरकत। दंगा कैसे शुरू किया जायेगा, इसकी बाकायदा रिहर्सलें होती हैं और उचित समय परए जब वातावरण हिंसा भड़काने के अनुकूल हो और रास्ते में कोई बड़ी बाधा न होए दंगे शुरू कर दिये जाते हैं। भारत में साम्प्रदायिक दंगे भड़काने के पीछे उद्देश्य होता है साम्प्रदायिक पहचान को, भाषायी, लैंगिक व नस्लीय पहचानॉ की तुलना में, अधिक मजबूती देना। इस मामले में दो व्यक्तियों का एक ही व्यवसाय में होना या किसी एक क्लब का सदस्य होना या कलाप्रेमी होना महत्व नहीं रखता। महत्व रखता है सिर्फ उनका धर्म। साम्प्रदायिक दंगे इसलिए भी करवाये जाते हैं ताकि दमित, दलित और आदिवासी, इस तथ्य को नजरअंदाज कर, कि उनके साथ जाति.आधारित पदानुक्रम के चलते किस कदर भेदभाव किया जाता है, अपनी साम्प्रदायिक पहचान को गले लगा लें और उच्च जातियों के हित में काम करें।
साम्प्रदायिक हिंसा इसलिए भी किसी व्यक्ति की साम्प्रदायिक पहचान को उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण बना देती है क्योंकि उसे लगता है कि उसके धर्म के कारण उसे मौत के घाट उतारा जा सकता है। हिंसा के दौरान दूसरे का भय अपने सबसे उच्च स्तर पर रहता है। हमारे समुदाय का हर व्यक्ति हमें मित्र नजर आता है और दूसरे समुदाय का प्रत्येक व्यक्ति, शत्रु। यही कारण है कि दंगों के दौरान लोग अजनबियों की भी धार्मिक पहचान जानने के लिए व्यग्र रहते हैं। दंगों के खत्म हो जाने के बाद भी उनके दौरान जाग्रत हुई साम्प्रदायिक चेतना और भय का भाव खत्म नहीं होता। साम्प्रदायिक शक्तियां इस चेतना को अनवरत प्रचार और कई तरह के मिथक फैलाकर जिंदा रखती हैं। दूसरे समुदाय को खतरा बताया जाता है। इस तरहए साम्प्रदायिक हिंसा से साम्प्रदायिक पहचान मजबूत होती है और सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक क्षेत्रों में अपने समुदाय के व्यक्ति को प्राथमिकता देने और दूसरे समुदाय के व्यक्तियों के साथ भेदभाव करने की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। इससे समाज बंट जाता है व साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद को वैधता मिलती है और धर्मनिरपेक्ष व समावेशी राष्ट्रवाद की परिकल्पना में लोगों का विश्वास घटता है। प्रजातंत्र और स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व के मूल्यों में विश्वास में कमी आती है। इस तरह, साम्प्रदायिक दंगे समाज का साम्प्रदायिकीकरण करते हैं।
नई रणनीति
चूँकि पहले साम्प्रदायिक ताकतों के समर्थक इतनी बड़ी संख्या में नहीं थे कि वे बिना दंगों का सहारा लिए समाज की सोच को अपनी विचारधारा के अनुरूप बना सकें इसलिए पहले बड़े और भयावह दंगे करवाना आवश्यक होता था। पॉल ब्रास के शब्दों मेंए दंगों के उत्पादन से साम्प्रदायिक संगठनों को मीडिया के एक हिस्से में कवरेज मिलता था व वे राष्ट्र का ध्यान अपनी ओर खींचने में सफल रहते थे। दंगों और मीडिया.दोनों का इस्तेमाल समाज में साम्प्रदायिकता की जड़ें मजबूत करने के लिये किया जाता था। परन्तु हाल के कुछ वर्षों में, साम्प्रदायिक संगठनों ने एक नई रणनीति अपना ली है, जिसके तहत उन्हें समाज का साम्प्रदायिकीकरण करने के लिए बड़े पैमाने पर दंगे करवाना आवश्यक नहीं रह गया है। कहना ना होगा कि दंगे करवाने के अपने खतरे थे। कई बार मीडिया हिंसा के खिलाफ हो जाता था, कई बार अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन सामने आ जाते थे, कई बार उच्च न्यायपालिका सहित देश की अन्य संस्थाएं समस्याएं खड़ी करती थीं तो कई बार प्रधानमंत्री या अन्य उच्च राष्ट्रीय पदों पर काबिज होने के महत्वाकांक्षी नेता भी परेशानी का सबब बन जाते थे।
अब साम्प्रदायिक दंगें भड़काकर, कुछ समय के लिए अल्पसंख्यकों को आतंक के साए में रखने की बजाए, साम्प्रदायिक शक्तियां, इस्लामिक आंतकवाद के भेस मेंए हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों पर आतंकी हमले कर रही हैं और इस तरह समाज को लगातार आतंक के साये में जीने पर मजबूर कर रही हैं।
हिन्दुत्व की विचारधारा से प्रेरित आतंकवादियों के अस्तित्व का पहली बार पता तब चला जब 6 अप्रैल 2006 को बम बनाने के दौरान हुए विस्फोट में  बजरंग दल के दो कार्यकर्ता मारे गए। इनमें से एक का नाम राजकोंडवार था। पुलिस को जांच के दौरान उस स्थान से कुछ मस्जिदों के नक्शे और मुसलमानों के पारम्परिक परिधान भी मिले। बम धमाके में घायल राहुल पांडे ने पुलिस के समक्ष स्वीकार किया कि उसने और उसके साथियों ने पहले भी कई बम बनाए थे। जनवरी 2008 में तमिलनाडु के तेनकासी में आरएसएस के कार्यालय और बस स्टेण्ड के समीप बम रखने के आरोप में हिन्दू मुनानी के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। उनका मानना था कि बम लगाने के लिए स्वाभाविकतः मुस्लिम संगठनों को दोषी ठहराया जायेगा और इससे हिन्दू उनके खिलाफ भड़केंगे। 24 अगस्त 2008 को कानपुर में बम बनाते समय दो बजरंग दल कार्यकर्ता मारे गए। बजरंग दल का इरादा पूरे उत्तरप्रदेश में भारी बम विस्फोट करने का था।
सन् 2010 में 30 अप्रैल को आरएसएस से लंबे समय तक जुड़े रहे देवेन्द्र गुप्ता विष्णु प्रसाद और चन्द्रशेखर पाटीदार को अक्टूबर 2007 में अजमेर शरीफ में बम रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। ऐसा कहा जाता है कि इन्हीं लोगों ने हैदराबाद की मक्का मस्जिद में भी बम विस्फोट किया था जिसके सिलसिले में कई निर्दोष मुस्लिम युवकों को पुलिस ने हिरासत में लिया और उन्हें जमकर शारीरिक यंत्रणा दी गई। गोवा के मारमागोवा में 16 अक्टूबर 2009 को हुए विस्फोट में दो व्यक्ति मारे गए। एनआईए ने इस घटना में प्रशांत जावडेकर ;रत्नागिरी सारंग कुलकर्णी ;पुणे जयप्रकाश उर्फ अन्ना ;मेंगलोर व एक अन्य अज्ञात व्यक्ति को आरोपी बनाया। मालगोंडा पाटिल और योगेश नायक नामक दो व्यक्ति एक बोरी में विस्फोटक भरकर स्कूटर से ले जा रहे थे तभी उनमें विस्फोट हो गया। यह घटना तब हुई जब मारमागोवा में एक धार्मिक पर्व चल रहा था जिसमें बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक.स्वरूप नरकासुर के पुतले जलाए जाते हैं। पुलिस ने इस घटना के लिए सनातन संस्था  नामक दक्षिणपंथी हिन्दू संगठन को दोषी ठहराया। इस संगठन का मुख्यालय गोवा के पोंडा क्षेत्र में स्थित रामनाथी नगर था जो कि अपने मंदिरों के लिए जाना जाता है।
इसी तरहए सन् 2008 में सनातन संस्था के 6 सदस्यों को वाशी ;ठाणे में एक सभागार में बम रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। 30 अगस्त 2011 को ठाणे की सेशन्स अदालत ने सनातन संस्था के रमेश गडकरी और विक्रम भावे को बम रखने का दोषी पाया और उन्हें दस वर्ष के कारावास की अधिकतम सजा सुनाई। एनआईए के अधिकारियों ने इस संस्था के मुख्यालय पर अक्टूबर 2011 में छापा मारा। संस्था की गतिविधियों की जांच जारी है। इन दोनों घटनाओं में निशाने पर मुसलमान नहीं थे परन्तु विस्फोट करने वाले यह जानते थे कि घटनाओं का दोष मुस्लिम संगठनों पर मढ़ा जायेगा।
आईबी व एटीएस के एक हिस्से का साम्प्रदायिकीकरण
जहां एक ओर साम्प्रदायिक संगठनों ने आतंकवाद और बम विस्फोटों के जरिए मुसलमानों को खलनायक और दानव सिद्ध करने की कोशिश की वहीं उन्होंने सुरक्षाबलों में ऐसे लोगों की घुसपैठ करवाई जिनकी मानसिकता साम्प्रदायिक थी। ये लोग अपने पद व शक्तियों का दुरूपयोग कर निर्दोष मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार करते उन्हें सीमा पार से आया ऐसा आतंकवादी बताते जिसके निशाने पर नरेन्द्र मोदी या कोई अन्य महत्वपूर्ण व्यक्ति या कोई सामरिक महत्व का स्थान था व मुठभेड़ के नाम पर उनकी हत्या कर देते। यह सिलसिला लम्बे समय से चल रहा था और चलता ही रहता यदि सोहराबुद्दीन के भाई ने भारी मुसीबतों को झेलते हुए लम्बी कानूनी लड़ाई न लड़ी होती। यह इस तथ्य के बावजूद कि इस घटना में शामिल व्यक्ति अत्यंत शक्तिशाली व प्रभावशाली थे और उनके हाथ बहुत लंबे थे। सोहराबुद्दीन की तरह ही इशरत जहां,जावेद शेख और दो अन्यों को, जिनमें से एक का नाम सादिक जमाल था, मौत के घाट उतार दिया गया था। इशरत जहां की हत्या की सीबीआई द्वारा की गई जांच में यह सामने आया कि उसमें गुजरात के पुलिस महानिदेशक पद से सेवानिवृत्त पीपी पाण्डेय का हाथ था। फर्जी मुठभेड़ में आई.बी. के अधिकारी राजेन्द्र कुमार की क्या भूमिका थी,इसकी जांच जारी है। राजेन्द्र कुमार ने वे गुप्तचर सूचनाएं उपलब्ध करवाईं थीं जिनके आधार पर हत्या को मुठभेड़ साबित किया गया। राजेन्द्र कुमार ने ही कथित रूप से उन एके.47 बंदूकों का इंतजाम करवाया, जिन्हें इशरत जहां व अन्य मृतकों की लाशों के पास रख दिया गया। गुजरात के गृह मंत्री और नरेन्द्र मोदी के विश्वस्त अमित शाह को सोहराबुद्दीन,कौसर बानो और तुलसीराम प्रजापति की हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया।
निर्दोष मुसलमानों की फर्जी मुठभेड़ों में हत्या को पूरे देश में मीडिया के जरिए प्रचारित करवाया जाता। जो कुछ पुलिस कहती,मीडिया उसे सौ प्रतिशत सत्य मानकर निगल लेती। इस तरह की घटनाओं के मीडिया द्वारा बिना कोई संदेह व्यक्त किए कवरेज करने और इन घटनाओं पर टीवी में बहस मुबाहिसों के लंबे सिलसिलों के चलते, टीवी का एक आम दर्शक यह मानने पर मजबूर हो जाता कि सभी आतंकवादी मुसलमान होते हैं। नरेन्द्र मोदी और एलके आडवाणी जैसे नेतागण इसी बात को लगतार दोहराते रहते हैं। इस प्रकार, मुसलमानों के प्रति घृणा पैदा करने के लिएए दंगें भड़काने की बजाए, उन पर आतंकवादी होने का लेबल चस्पा करना शुरू कर दिया गया। फर्जी मुठभेड़ों का एक और लाभ था। जो लोग कथितआतंकवादियों के निशाने पर बताये जाते थे, वे नायक के रूप में उभरते थे और उन्हंे लौहपुरूष बताया जाता था।
निष्कर्ष
साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा अब यह रणनीति अपनाई जा रही है कि गुप्तचर एजेंसियों और आतंकवाद निरोधक दस्तों के एक हिस्से और मीडिया कवरेज के सहारेए अल्पसंख्यकों को देश के लिए बड़े खतरे के रूप में प्रस्तुत किया जाए। साम्प्रदायिक ताकतों ने अपनी विचारधारा से ओतप्रोत लोगों की घुसपैठ सुरक्षाबलों में करवाने में सफलता पा ली है। होता यह है कि आईबी का एक हिस्सा झूठी गुप्त सूचनाएं देता है और इन सूचनाओं पर तुरत.फुरत कार्यवाही करते हुए आतंकवादी निरोधक दस्ते, निर्दोष मुसलमानों काए उन्हें आतंकवादी बताकर,कत्ल कर देते हैं और यह दावा करते हैं कि उन्होंने देश को एक और आतंकी हमले से बचा लिया। उत्तरप्रदेश के निमेश आयोग ने ऐसे मुस्लिम युवकों की सूची तैयार की है जिन्हें धर्मनिरपेक्ष मायावती सरकार में आतंकवादी बताकर गिरफ्तार किया गया था। निमेश आयोग के अनुसारए खालिद मुजाहिद नामक एक युवक को भी बिना किसी सुबूत के गिरफ्तार किया गया था। बाद में पुलिस हिरासत में उसकी मौत हो गई। आम जनता के दिलो.दिमाग में फिरकापरस्ती का जहर इस हद तक भर दिया गया है कि आतंकवादी होने के आरोप में मुकदमों का सामना कर रहे मुस्लिम युवकों की पैरवी करने वाले वकीलों को उनके ही हम पेशा अदालतों के परिसरों में पीट रहे हैं और इस पर न तो समाज और ना ही न्यायपालिका अपेक्षित प्रतिक्रिया व्यक्त कर रही है। कम से कम किसी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय ने अदालतों की परिसरों में हो रही इस तरह की घटनाओं पर आपत्ति दर्ज नहीं की है। कतील सिद्दीकी को यरवदा जेल में मार डाला गया क्योंकि उसकी गवाही से हिमायत बेग, जिसे जर्मन बेकरी धमाकों के सिलसिले में फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है, निर्दोष साबित हो जाता। ऐसा लगता है कि नई रणनीति काम कर रही है परन्तु ऐसा कब तक होगा, कहना मुश्किल है। जो नागरिक प्रजातंत्र और उसकी संस्थाओं का सम्मान करते हैंए वे आखिर कब इस तरह की नंगी हिंसा के विरोध में अपनी आवाज बुलंद करेंगे? इसके पहले कि भारत एक फासीवादी देश बन जाए, हम सबको इस तरह की क्रूरता और अन्याय के विरूद्ध उठ खड़ा होना चाहिए।
-इरफान इंजीनियर

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

मानवाधिकार हनन की बढ़ती घटनाएँ और हमारा तन्त्र-3

                                     देश में मानवाधिकार हनन की समस्या कितनी गम्भीर है इसका अंदाजा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा सूचना के अधिकार के तहत दिए गए आँकड़ों से लगाया जा सकता है। आयोग के सूचना अधिकारी जेमिनी कुमार श्रीवास्तव द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार 1 जनवरी 2011 और 15 सितंबर 2011 के बीच मानवाधिकार हनन की कुल 66304 शिकायतें प्राप्त हुईं जिनमें से 34448 का ही निस्तारण हो पाया। इस सूची में उत्तर प्रदेश 38760 मामलों के साथ पहले स्थान पर है इसमें से 19899 का निस्तारण हो पाया है। दिल्ली में कुल 5037 मामले सामने आए हैं और वह दूसरे नम्बर पर है। निश्चित रूप से आयोग ने वही आँकड़े दिए हैं जिनकी शिकायतें उस तक पहुँच सकी हैं। वास्तविक आँकड़ा इससे कितना अधिक होगा इसका अंदाजा कर पाना बहुत मुश्किल है। ज़मीन से जुड़े मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि अशिक्षा और अज्ञानता के कारण देश की एक बड़ी आबादी को स्वयं अपने मानवाधिकारों के बारे में जानकारी ही नहीं है। उसे यह भी नहीं मालूम कि देश के अन्दर मानवाधिकार आयोग जैसी कोई संस्था भी मौजूद है। मानवाधिकार हनन की ज्यादातर घटनाओं में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पुलिस की भूमिका होती है और शिकायतों के निस्तारण के लिए जाँच का काम भी आम तौर पर किसी पुलिस अधिकारी को ही सौंपा जाता है। इसलिए जिन लोगों को इसकी जानकारी भी है उनमें से अक्सर इस डर से आयोग के पास शिकायत दर्ज नहीं करवाते कि बाद में उन्हें परेशान किया जा सकता है। आतंकवाद और माओवाद के सम्बंध में उत्पीड़न के मामले मे स्वयं आयोग द्वारा संज्ञान न लेने की भी शिकायतें हैं। जयपुर सेंट्रल कारागार में बन्द आज़मगढ़ के सरवर व अन्य को बगैर बल्ब और पंखे वाली एक छोटी सी सेल में 23 घंटे कैद रखा जाता है। उन्हें मात्र एक घंटे के लिए बाहर निकाला जाता है। जेल अधिकारियों के इस अमानवीय और गैर कानूनी व्यवहार की आयोग सहित कई जगहों पर शिकायत की जा चुकी है परन्तु तीन साल से भी अधिक समय बीत जाने के बावजूद उसकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया है। ऐसे कई मामले मेरी जानकारी में हैं जिनमें मानवाधिकार आयोग को लिखित शिकायतें भेजी गई हैं परन्तु सालों बीत जाने के बाद भी अब तक न तो उनका निस्तारण हुआ और न ही आयोग की तरफ से कोई सूचना ही दी गई।
    एक तरफ देश में मानवाधिकार की यह स्थिति है तो दूसरी ओर शासन और प्रशासन के स्तर पर मानवाधिकार हनन की घटनाओं पर काबू पाने के लिए ठोस प्रयास करने के बजाय उन पर परदा डालने की खातिर हर तरह के नाजायज, अनैतिक और गैरकानूनी हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ में जब हिमान्शु कुमार ने आदिवासियों पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ शिकायतें दर्ज करवाने का सिलसिला शुरू किया तो वहाँ की सरकार और पुलिस ने उनके खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया। उनके आश्रम पर बुलडोज़र चलवा दिया और उन्हें छत्तीस गढ़ छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। विनायक सेन के साथ जो कुछ हुआ उसे सम्पूर्ण भारत ही नहीं पूरी दुनिया जानती है। ये तो कुछ बड़े नाम हैं जिन्हें दुनिया जानती है पर ऐसे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की एक लम्बी सूची है जिन्हें बेगुनाहों की आवाज़ उठाने के जुर्म में प्रताडि़त किया गया है और उनपर फर्जी मुकदमे कायम किए गए हैं। वर्तमान व्यवस्था में मानवाधिकार उत्पीड़न की शिकार अशिक्षित और असहाय गरीब जनता के सामने विकल्प सिमटते जारहे हैंै। वह यह कहने पर मजबूर है कि ‘‘उसी से शिकायत उसी पर क़ेनाअत अजब दास्तां है मेरी दास्तां भी।’’ यदि इस स्थिति को जारी रहने दिया गया तो इसके दुष्परिणामों का बोझ इतना बढ़ जाएगा कि सुधार के सारे रास्ते बन्द हो जाएँगे। हमें इससे पहले जागना होगा। 

  -मसीहुद्दीन संजरी
  मो. 09455571488

बुधवार, 11 अप्रैल 2012

मानवाधिकार हनन की बढ़ती घटनाएँ और हमारा तन्त्र-2

इस पर भी विडंबना यह है कि मानवाधिकार उत्पीड़न के मामलों में विभिन्न सरकारों, राजनेताओं और उच्च प्रशासनिकअधिकारियों का रवैया काफी नकारात्मक रहा है। कई बार ऐसा भी होता है कि स्वयं नेता, मन्त्री या अफसर उत्पीड़न का कारण बनते हैं या फिर उत्पीड़न करने वालों का बचाव करने की भूमिका में नजर आते हैं। यदि किसी व्यक्ति का नाम आतंकवाद या माओवाद से जोड़ दिया जाय तो आरोप लगते ही सारे नियम कानून ताक पर रखकर यह मान लिया जाता है कि अब मानव होने की हैसियत से उसके जो भी अधिकार हैं सब समाप्त हो गए। यहाँ तक कि पुलिस व विशेष पुलिस बल की दमनात्मक एवं संविधान और कानून विरोधी कार्रवाइयों से लेकर फर्जी मुठभेड़ों में की जाने वाली हत्याओं तक को तर्क संगत और सही ठहराए जाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी जाती। विगत में यदि कुछ फर्जी मुठभेड़ों का खुलासा हुआ भी है तो उसका कारण संयोग से एस0पी0 तमंग जैसा कोई ईमानदार मजिस्ट्रेट भी रहा है परन्तु ज्यादातर मामलों में बदकिस्मती से विशेष पुलिस बलों की आपसी प्रतिद्वंद्विता या राजनैतिक प्रतिस्पर्धा के कारण ही ऐसा सम्भव हो पाया है। यदि ऐसा न होकर ये खुलासे संविधान और कानून की हुक्मरानी को स्थापित करने हेतु उठाए गए किसी कदम की वजह से हुए होते तो इससे पुलिस बलों को सकारात्मक संदेश जाता जिससे भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति पर अंकुश लगाने में मदद मिलती  परन्तु ऐसा नही हुआ।
                                                 फर्जी मुठभेड़ों की घटनाएँ हों या उनके खुलासे की दिशा में प्रगति का मामला पहले से कुछ बेहतरी जरूर आई है परन्तु अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। खास तौर से माओवाद के नाम पर होने वाली ज्यादतियों के मामलों में। यह भी सही है कि इस छोटी सी कामयाबी के पीछे भी वही कारक हैं जिनका उल्लेख पहले किया जा चुका है। अगर हम गुजरात में होने वाले इनकाउन्टरों का ही उदाहरण लें तो अंदाजा होता है कि ज्यादा तर मामलों में मोदी के तानाशाही रवैये को लेकर क्षुब्ध कुछ प्रशासनिक अधिकारियों के सहयोग से ही इस दिशा में प्रगति हो पाई। बाद में गुजरात उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप से कुछ और इनकाउन्टरों की जाँच का मार्ग प्रशस्त हुआ। यहाँ इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि यदि राजनैतिक स्तर पर कांग्रेस ने विपक्ष की भूमिका न निभाई होती तो शायद गुजरात के वह प्रशासनिक अधिकारी भी सहयोग करने की हिम्मत न जुटा पाते। फिर भी हम यह मानते है कि ऐसे मामलों में भंडाफोड़ के कारणों की जितनी अहमियत है उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है उसका परिणाम। हम साफ तौर पर यह महसूस कर सकते हैं कि जब से इशरत जहाँ, सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापति आदि की फर्जी मुठभेड़ों के नायक कानून के शिकंजे में फँस कर सलाखों के पीछे पहुँचे हैं न सिर्फ मुठभेड़ों में कमी आई है बल्कि मोदी, अडवाणी, राहुल गांधी और मायावती जैसे नेताओं को मारने के लिए आने वाले कथित आतंकियों के आने की खबरों में भी कमी आगई है। हालाँकि इन बहादुरों की अनुपस्थिति में आतंकियों का मनोबल और बढ़ जाना चाहिए था। परन्तु देश के अन्य भागों मे होने वाली संदिग्ध मुठभेड़ों के मामले में गुजरात के इन्हीं कारकों का व्यवहार कुछ अलग तरह का रहा। बटला हाउस मामले में कांग्रेस सरकार को घेरने के लिए भाजपा आगे नहीं आई। शायद संघ की मुस्लिम विरोधी नीतियाँ उसे ऐसा करने की इजाज़त नहीं दे रही थीं। माननीय उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय ने भी गुजरात सरकार व पुलिस की तुलना में दिल्ली सरकार (केन्द्र व राज्य) और उसकी स्पेशल सेल की थ्योरी को ज्यादा विश्वसनीय माना। कांग्रेस बटला हाउस इनकाउन्टर के सही या गलत होने के मुद्दे पर बँटी दिखाई पड़ती है। कई अन्य राजनैतिक दल इसे संदिग्ध मानते हैं। देश के प्रतिष्ठित मानवाधिकार संगठन इसे फर्जी मानते हैं और लगातार इसकी जाँच की माँग कर रहे हैं। उनके द्वारा उठाए गए सवालों का सरकार और पुलिस के पास कोई सन्तोषजनक उत्तर भी नहीं है। कुल मिलाकर इन्सपेक्टर मोहनचन्द्र शर्मा की मौत को ही इन्काउन्टर के सही होने के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। स्वयं शर्मा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से कई प्रकार के सवाल पैदा होते हैं। करकरे की जैकेट की तरह ही इन्सपेक्टर शर्मा के कपड़े भी गायब हैं। खुद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पहले इनकाउन्टर को सही ठहराया था परन्तु बाद में उसे फर्जी मुठभेड़ों की सूची में डाल दिया। कुल मिलाकर हर स्तर पर इतना विरोधाभास मौजूद है कि अपने आप में यह स्वयं किसी निस्पक्ष जाँच के लिए मज़बूत आधार है परन्तु इसके बावजूद सरकार अडि़यल रवैया अपनाए हुए है। यही हाल दिल्ली और उत्तर प्रदेश में आतंकवाद के नाम पर होने वाले दर्जनों इनकाउन्टरों का भी है। संदिग्ध इसलिए कि जैसे ही गुजरात इनकाउन्टरों के सूरमा सलाखों के पीछे गए देश के अन्य भागों में होने वाले इनकाउन्टरों की संख्या में भी भारी कमी आई है। अब यह साफ तौर पर कहा जा सकता है कि यदि फर्जी मुठभेड़ों मे मारे गए निर्दोषों को जल्दी न्याय मिला होता तो कुछ बेकसूरों की जान बचाई जा सकती थी।


-मसीहुद्दीन संजरी
 क्रमश:

मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

मानवाधिकार हनन की बढ़ती घटनाएँ और हमारा तन्त्र-1



       राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले एक साल में पुलिस एवं न्यायिक हिरासत में कुल 1574 मौतें हुई हैं। आयोग ने इसका राज्यवार ब्योरा भी दिया है जिसमें उत्तर प्रदेश पहले नम्बर पर है। यहाँ इस तरह से होने वाली मौतों की कुल संख्या 216 है। मानवाधिकार हनन की घटनाओं पर नजर रखने वाले संगठन पीपुल्स ग्रुप आन ह्यूमन राइटस का दावा है कि
                                                मानवाधिकार आयोग ने जो आँकड़े अपनी रिपोर्ट में दिए हैं वे वास्तविकता से बहुत कम हैं। हकीकत तो यह है कि आँकड़ा आयोग की रिपोर्ट के दोगुने से भी ज्यादा है। ग्रुप का मानना है कि अक्सर पुलिस हिरासत में होने वाली मृत्यु की रिपोर्ट ही दर्ज नहीं की जाती जिसके कारण आधिकारिक तौर पर बहुत से मामले सामने नहीं आ पाते और न ही आयोग जैसी संस्था की रिपोर्ट का हिस्सा बन पाते हैं। पुलिस इस तरह के मामलों को भी आत्महत्या का रूप देने का प्रयास करती है तो कभी अपनी मर्जी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट प्राप्त कर कोई अन्य कारण बताने की कोशिश करती है। इन आँकड़ों में पहले से गैरकानूनी तौर पर पुलिस हिरासत में रखकर फर्जी मुठभेड़ों में की गई हत्याओं का लेखा जोखा भी शामिल नहीं है। जबकि पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों की तरह ही अपवाद स्वरूप फर्जी मुठभेड़ों में होने वाली हत्याओं के कुछ मामले ही सामने आ पाते हैं। विगत वर्षों में होने वाली जिन फर्जी मुठभेड़ों के खुलासे हुए हैं उनसे पता चलता है कि आम तौर पर ऐसे मामलों में उच्च पुलिस अधिकारी या तो स्वयं शामिल रहे हैं या फिर इनकाउन्टर टीम को उनका आशीर्वाद प्राप्त रहा है। मारे गए व्यक्ति की यदि कोई आपराधिक पृष्ठभूमि रही है तो ऐसी मुठभेड़ों को आसानी से वैधता प्राप्त हो जाती है। अगर मृतक को माओवादी या आतंकवादी घोषित कर दिया जाए तो फर्जी मुठभेड़ के खिलाफ आवाज बुलन्द करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को भी इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। यदि इन सब को एक साथ जमा कर दिया जाए तो एक ऐसी भयावह और क्रूर तस्वीर उभर कर सामने आती है जिसकी किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कल्पना भी नहीं की जा सकती। वह पुलिस तंत्र जिस पर कानून व्यवस्था बनाए रखने तथा आम जन की सुरक्षा की जिम्मेदारी है वह स्वंय इतने बड़े पैमाने पर अपने ही नागरिकों को जीवन के अधिकार से वंचित कर देता है।
    जनपद आज़मगढ़ में पुलिस हिरासत में होने वाली दो अलग-अलग मौतों के मामलों मे मैंने पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज़ के अपने साथियों विनोद यादव तथा तारिक शफीक के साथ मिलकर तथ्य संकलन का काम किया। उस अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि वकर्स ग्रुप आन ह्यूमन राइट्स का दावा निराधार नहीं है। पहला मामला ग्राम तमौली निवासी सुरेश यादव पुत्र मुन्नर यादव का है जिन्हें थाना रानी की सराय की पुलिस सुबह उनके घर से बगैर कोई कारण बताए गिरफ्तार कर थाने लाई। जब शाम तक उसकी रिहाई नहीं हुई तो परिजनों के पूछने पर थानाध्यक्ष ने बताया कि किसी अन्य थाना की पुलिस उससे पूछताछ करने वाली है और यह कि उसके बाद उसे छोड़ दिया जाएगा। सुरेश शाम तक बिल्कुल ठीक था। सुबह जब उसके पिता थाने पर पहुँचे तो उन्हें बताया गया कि सुरेश की तबीयत खराब हो गई थी उसे उपचार के लिए स्थानीय बाज़ार में चिकित्सक के पास ले जाया गया है। जब उसके पिता वहाँ पहुँचे तो देखते हैं कि सुरेश के शरीर पर कई जगहों पर चोट के निशान थे। पीठ की खाल जगह-जगह उधड़ी हुई थी। वह ठीक से बात भी नहीं कर पा रहा था। उसकी इस हालत को देख पुलिस वाले पहले ही खिसक चुके थे। परिजन उसे जिला अस्पताल ले गए जहाँ उसकी मृत्यु हो गई। सुरेश की मौत की खबर फैलते ही जनता में आक्रोश पैदा हो गया। दोषी पुलिस कर्मियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा कायम करने की माँग शुरू हो गई। उच्च पुलिस अधिकारियों द्वारा हीला हवाली करने पर आक्रोशित जनता ने चक्का जाम कर दिया। इस तरह भारी दबाव और पी0यू0सी0एल0 नेताओं के हस्तक्षेप के बाद ही हत्या की रिपोर्ट दर्ज की गई। 2005 में सुरेश के भाई सुभाष यादव की सिधारी थाना के पास पानी से भरे गड्ढे में डूब जाने के कारण संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। पुलिस ने उसे दुर्घटना बताया था। परन्तु परिजनों का आरोप था कि पानी में डूबने से पहले पुलिस ने सुभाष की पिटाई की थी और उसे पानी में कूदने के लिए मजबूर किया था। इस घटना की रिपोर्ट भी दर्ज नहीं की गई थी। एक अन्य मामले में ग्राम बढ़या निवासी कमलेश सिंह पुत्र राम मिलन सिंह को 13 अप्रैल 2011 को गम्भीर पुर थाना की पुलिस ने रानी की सराय बाज़ार से गिरफ्तार किया। 14 अप्रैल की शाम तक वह बिल्कुल ठीक था। करीब 40 घंटे से भी अधिक समय तक अवैध हिरासत में रखने के बाद 15 अप्रैल की सुबह मृत अवस्था में पुलिस उसे सदर अस्पताल ले गई। गला दबा कर कमलेश की हत्या की गई थी। पुलिस ने इसे आत्महत्या का रूप देने के लिए एक एफ0आई0आर0 भी दर्ज कर ली जिसमें कहा गया था कि कमलेश ने अपने पाजामे के नाड़े की रस्सी बना कर बल्ब के होलडर से लटक कर आत्महत्या का प्रयास किया जिसके कारण उसकी मौत हो गई। हालाँकि कमलेश ने पैन्ट शर्ट पहन रखी थी और बल्ब के होल्डर से लटक कर आत्महत्या की कहानी अपने आप में कितनी हास्यास्पद है। कमलेश सिंह की हत्या की रिपोर्ट दर्ज करवाने में भी वही मशक्कत करनी पड़ी जो सुरेश यादव के मामले में करनी पड़ी थी।

-मसीहुद्दीन संजरी
 क्रमश:

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

हर हिंदू शांतिप्रिय होता है लेकिन हिंदूव्त्व वाला हिंदू आतंकी होता है

आज कुछ मित्रों के साथ बैठे हुए चाय के साथ गपशप हो रही थी किी एक मित्र ने नया जुमला ढूँढ निकाला किी हर हिंदू शांतिप्रिय होता है लेकिन हिंदूव्त्व वाला हिंदू आतंकी होता है. इस पर कई मित्रो ने तस्दीक़ करते हुए कहा किी जब कोई आतंकी घटना होती तो उसकी जाँच मदरसों से शुरू होती है जबकि यह भी वास्तविकता है किी संघ क कार्यालय और उसके सहयोगी संगठन आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त रहे हैं और लिप्त हैं. जाँच उनकी भी होनी चाहिए और अगर द्विपक्षिशेय जाँच हो तो सही आतंकी पकड़े जाएँगे और और आतंकी घटनाओं पर रोक लग सकती है. प्रगया ठाकुर से लेकर असीमनंद तक भगवा आतंकवाद के एक लंबी श्रंखला है. और अपने आकाओं को खुश करने क लिए यह लोग आतंकी घटनायें करते रहते हैं और पाकिस्तान विरोध क नाम पर पूर्व मानसिकता क आधार पर ज़बरदस्ती एक दिशा में जाँच कर कुछ प्रतिफल ना मिलने पर भी कुछ लोगों को जेल भेज कर घटना का खुलासा कर इतिश्रि कर लेते हैं हद तो यहाँ तक हो गयी किी 15 अगस्त 2000 की पूर्व संध्या पर साबरमती बम विस्फोट कांड में कोई पुख़्ता सबूत ना होने क बावजूद भी अभियुक्तों क बयान के आधार पर आरोप पत्र दाखिल कर दिए गये क्योंकि जिस वाद की जाँच की दिशा ही मदरसे की ओर से ही शुरू की गयी थी यदि सही विवेचना हुई होती तो वास्तविक आतंकी पकड़े जाते और आतंकवाद क ख़ात्मे की ओर हमारा एक कदम होता.

सुमन
लोकसंघर्ष
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