गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

मानवाधिकार हनन की बढ़ती घटनाएँ और हमारा तन्त्र-3

                                     देश में मानवाधिकार हनन की समस्या कितनी गम्भीर है इसका अंदाजा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा सूचना के अधिकार के तहत दिए गए आँकड़ों से लगाया जा सकता है। आयोग के सूचना अधिकारी जेमिनी कुमार श्रीवास्तव द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार 1 जनवरी 2011 और 15 सितंबर 2011 के बीच मानवाधिकार हनन की कुल 66304 शिकायतें प्राप्त हुईं जिनमें से 34448 का ही निस्तारण हो पाया। इस सूची में उत्तर प्रदेश 38760 मामलों के साथ पहले स्थान पर है इसमें से 19899 का निस्तारण हो पाया है। दिल्ली में कुल 5037 मामले सामने आए हैं और वह दूसरे नम्बर पर है। निश्चित रूप से आयोग ने वही आँकड़े दिए हैं जिनकी शिकायतें उस तक पहुँच सकी हैं। वास्तविक आँकड़ा इससे कितना अधिक होगा इसका अंदाजा कर पाना बहुत मुश्किल है। ज़मीन से जुड़े मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि अशिक्षा और अज्ञानता के कारण देश की एक बड़ी आबादी को स्वयं अपने मानवाधिकारों के बारे में जानकारी ही नहीं है। उसे यह भी नहीं मालूम कि देश के अन्दर मानवाधिकार आयोग जैसी कोई संस्था भी मौजूद है। मानवाधिकार हनन की ज्यादातर घटनाओं में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पुलिस की भूमिका होती है और शिकायतों के निस्तारण के लिए जाँच का काम भी आम तौर पर किसी पुलिस अधिकारी को ही सौंपा जाता है। इसलिए जिन लोगों को इसकी जानकारी भी है उनमें से अक्सर इस डर से आयोग के पास शिकायत दर्ज नहीं करवाते कि बाद में उन्हें परेशान किया जा सकता है। आतंकवाद और माओवाद के सम्बंध में उत्पीड़न के मामले मे स्वयं आयोग द्वारा संज्ञान न लेने की भी शिकायतें हैं। जयपुर सेंट्रल कारागार में बन्द आज़मगढ़ के सरवर व अन्य को बगैर बल्ब और पंखे वाली एक छोटी सी सेल में 23 घंटे कैद रखा जाता है। उन्हें मात्र एक घंटे के लिए बाहर निकाला जाता है। जेल अधिकारियों के इस अमानवीय और गैर कानूनी व्यवहार की आयोग सहित कई जगहों पर शिकायत की जा चुकी है परन्तु तीन साल से भी अधिक समय बीत जाने के बावजूद उसकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया है। ऐसे कई मामले मेरी जानकारी में हैं जिनमें मानवाधिकार आयोग को लिखित शिकायतें भेजी गई हैं परन्तु सालों बीत जाने के बाद भी अब तक न तो उनका निस्तारण हुआ और न ही आयोग की तरफ से कोई सूचना ही दी गई।
    एक तरफ देश में मानवाधिकार की यह स्थिति है तो दूसरी ओर शासन और प्रशासन के स्तर पर मानवाधिकार हनन की घटनाओं पर काबू पाने के लिए ठोस प्रयास करने के बजाय उन पर परदा डालने की खातिर हर तरह के नाजायज, अनैतिक और गैरकानूनी हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ में जब हिमान्शु कुमार ने आदिवासियों पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ शिकायतें दर्ज करवाने का सिलसिला शुरू किया तो वहाँ की सरकार और पुलिस ने उनके खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया। उनके आश्रम पर बुलडोज़र चलवा दिया और उन्हें छत्तीस गढ़ छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। विनायक सेन के साथ जो कुछ हुआ उसे सम्पूर्ण भारत ही नहीं पूरी दुनिया जानती है। ये तो कुछ बड़े नाम हैं जिन्हें दुनिया जानती है पर ऐसे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की एक लम्बी सूची है जिन्हें बेगुनाहों की आवाज़ उठाने के जुर्म में प्रताडि़त किया गया है और उनपर फर्जी मुकदमे कायम किए गए हैं। वर्तमान व्यवस्था में मानवाधिकार उत्पीड़न की शिकार अशिक्षित और असहाय गरीब जनता के सामने विकल्प सिमटते जारहे हैंै। वह यह कहने पर मजबूर है कि ‘‘उसी से शिकायत उसी पर क़ेनाअत अजब दास्तां है मेरी दास्तां भी।’’ यदि इस स्थिति को जारी रहने दिया गया तो इसके दुष्परिणामों का बोझ इतना बढ़ जाएगा कि सुधार के सारे रास्ते बन्द हो जाएँगे। हमें इससे पहले जागना होगा। 

  -मसीहुद्दीन संजरी
  मो. 09455571488

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