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सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

पर्सनल लॉ में सुधार लैंगिक समानता के लिए हो


राष्ट्रीय एकीकरण के लिए नहीं
उच्चतम न्यायालय ने एक बार फिर केंद्र सरकार से कहा है कि वह शपथपत्र दाखिल कर बताये कि क्या वह देश में समान नागरिक संहिता  लागू करेगी। शाहबानो मामले में,उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि 'यह खेद का विषय है कि संविधान के अनुच्छेद 41 को लागू नहीं किया जा रहा है'। यद्यपि, शायद यह मानते हुए कि राजनेताओं में हिम्मत से सही निर्णय लेने की क्षमता का अभाव है, उच्चतम न्यायालय ने समाज सुधार का बीड़ा उठा लिया हैए तथापि यह साफ है कि केवल विधायिका ही यूसीसी लागू कर सकती है।
उच्चतम न्यायालय, संविधान के अनुच्छेद 44 के आधार पर बार.बार यूसीसी की बात कर रहा है। संविधान का अनुच्छेद 44 कहता है कि, राज्य, भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा'। अनुच्छेद 44, संविधान के भाग चार का हिस्सा है, जो राज्य के नीति निदेशक तत्वों के बारे में है। भाग चार के प्रावधान केवल पथप्रदर्शक सिद्धांत हैं और उन्हें अदालतों द्वारा लागू नहीं किया सकता। उच्चतम न्यायालय, भाग चार के अन्य प्रावधानों को नजरअंदाज कर रहा है, जिनमें यह शामिल है कि 'राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था की, जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय राज्य की सभी संस्थाओं को अनुप्रमाणित करे, भरसक प्रभावी रूप में स्थापना और संरक्षण करेगाय कि 'राज्य आय की असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा य कि राज्य अपनी नीति का इस प्रकार संचालन करेगा कि जिससे समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बंटा हो, जिससे सामूहिक हित का सर्वोत्तम रूप से साधन हो' इत्यादि। ये पथप्रदर्शक सिद्धांत आज और अधिक महत्वपूर्ण बन गए हैं क्योंकि वर्तमान सरकार इनकी उपेक्षा कर रही है। हम केवल यह आशा कर सकते हैं कि उच्चतम न्यायालय, सरकार को शपथपत्र प्रस्तुत कर यह बताने को कहेगी कि वह ऐसे कौनसे कानून या नीतियां बनाएगी जिनसे भाग चार के न्याय व समानता से सम्बंधित उपबंध लागू हो सकें।
उच्चतम न्यायालय सदियों पुरानी परम्पराओं और मान्यताओं को एक झटके में खत्म कर देना चाहता है। 'द मुस्लिम पर्सनल लॉ ;शरियत; एप्लीकेशन एक्टए 1937' के लागू होने से पहलेए भारत के मुसलमानों पर अलग.अलग पारंपरिक व धार्मिक कानून लागू होते थे। सल्तनत काल से ही, शरिया कानून केवल अभिजात मुसलमानों पर लागू होते थे। कारीगर जातियों से धर्मपरिवर्तित कर मुसलमान बनने वाले उनके पारंपरिक कानूनों का ही पालन करते थे। इनमें शामिल हैं राजस्थान के मेव, गुजरात के प्रनाम व पीर पंथी, मध्यप्रदेश के सतपंथी व गुजरात के खोजा, बोहरा व कच्छी मेमन आदि। सल्तनत के संस्थापक अलाउद्दीन खिलजी द्वारा शरिया में किये गए परिवर्तनों से बियाना के काजी मुगीस.उद.दीन नाराज थे। खिलजी ने उनसे कहा, 'मैं तो अज्ञानी आदमी हूँ और मैं इस देश के अधिकतम हित के लिए इस पर शासन कर रहा हूँ। मुझे विश्वास है कि मेरी अज्ञानता और सच्चे इरादों के मद्देनजर, अगर मैं शरिया का उल्लंघन भी करूंगा, तो अल्लाह मुझे माफ कर देगा।'
जटिल पारंपरिक प्रथाओं को समझना भारत के औपनिवेशिक शासकों के लिए आसान नहीं था और इसलिए उन्होंने धार्मिक ग्रंथों का सहारा लेना बेहतर समझा। 'मनुस्मृति' का 1776 में अनुवाद किया गया। हेस्टिंग्स के निर्देशन मेंए चार्ल्स हेमिल्टन ने 1791 में 'हिदाया' का अरबी से अंग्रेजी में अनुवाद शुरू किया परन्तु इस काम को अधूरा ही छोड़ दिया गया। सन 1857 के विद्रोह के बाद, इंग्लैंड के शासक ने घोषणा की कि उसके अधीन सभी अधिकारी............हमारी प्रजा के धार्मिक विश्वासों और आराधना पद्धति में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेगी । अतःए यद्यपि औपनिवेशिक सरकार ने दंड संहिताए टैक्स व व्यापार.व्यवसाय से सम्बंधित कानूनों का एकीकरण किया तथापि उसने परिवार व उत्तराधिकार सम्बन्धी कानूनों से छेड़.छाड़ नहीं की,जब तक कि राजनैतिक कारणों से ऐसा करना उसे आवश्यक नहीं लगा।
राष्ट्रवादी आन्दोलन में शामिल कई महिला नेताओं ने यह मांग उठाई कि विवाह, तलाक व उत्तराधिकार के सम्बन्ध में विस्तृत कानून बनाए जाएं। ऑल इंडिया विमेंस कांफ्रेंस की कमलादेवी चट्टोपाध्याय, सरोजिनी नायडूए मुथुलक्ष्मी रेड्डी व बेगम शाह नवाज़ ने सम्मलेन के 1933 में आयोजित अधिवेशन में समान नागरिक संहिता की मांग की थी।
समान नागरिक संहिता पर संविधानसभा में बहस
इस पृष्ठभूमि मेंए संविधान के मसविदे के अनुच्छेद 35 ;जो अब संविधान का अनुच्छेद 41 है; पर संविधानसभा में बहस हुई। मुहम्मद इस्माइल साहेब व नजीरुद्दीन अहमद चाहते थे कि अनुच्छेद 35 में इस तरह का संशोधन किया जाये जिससे किसी भी समुदाय को उसके पर्सनल लॉ को त्यागने पर मजबूर न किया जा सके।
उनका तर्क यह था कि हर समुदाय का पर्सनल लॉ, अपने धर्म का पालन करने की उसकी आज़ादी का भाग है। नागरिकों को केवल इस आधार पर उनके पर्सनल लॉ को छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए कि इससे देश में सद्भाव या एकता बढ़ेगी। अहमद का तर्क था कि अनुच्छेद 35, संविधान के मसविदे के अनुच्छेद 19 ;अब अनुच्छेद 25, जो सभी नागरिकों को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है, से असंगत है। अहमद का कहना था कि धार्मिक मसलों में राज्य का हस्तक्षेप आहिस्ता.आहिस्ता होना चाहिए। हिन्दू भी समान नागरिक संहिता के खिलाफ थे। यूसीसी के एक ज़बरदस्त समर्थक केएम मुंशी ने कहा, 'मैं जानता हूँ कि कई हिन्दू भी यूसीसी के विरोध में है........उन्हें लगता है कि उत्तराधिकार व विवाह आदि से सम्बंधित व्यक्तिगत कानून, उनके धर्म का हिस्सा हैं। अगर ऐसा है तो हम कई काम कभी नहीं कर पायेंगे, जैसे महिलाओं को बराबरी का दर्जा देना'। मुंशी, लैंगिक समानता और राष्ट्रीय एकता के लिए यूसीसी के पक्षधर थे।
डॉ. अम्बेडकर ने कहाए 'यह ;अनुच्छेद 35:कहीं नहीं कहता कि कोड तैयार होने के बादए राज्य उसे सभी नागरिकों पर लागू करेगा।'भविष्य की संसदए अम्बेडकर ने कहा, ऐसा परिवार कानून बना सकती है जो उन नागरिकों पर लागू होंए जो स्वेच्छा से ऐसा चाहें। विशेष विवाह अधिनियम 1954 ऐसा ही एक कानून है। अनुच्छेद 35 को संविधानसभा द्वारा बिना किसी संशोधन के पारित कर दिया गया। उसमें यह प्रावधान नहीं किया गया कि नागरिकों को उनके पर्सनल लॉ त्यागने पर मजबूर नहीं किया जा सकेगा।
भाजपा और यूसीसी
जहाँ संविधान के मसविदे में अनुच्छेद 35 को शामिल करने का उद्देश्य,परिवार कानूनों को धर्म से विलग करना और लैंगिक न्याय हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ना था, वहीं हिन्दू राष्ट्रवादी, यूसीसी की मांग इसलिए करते हैं ताकि वे अल्पसंख्यकों के मन में यह डर बिठा सकें कि बहुसंख्यकों का वर्चस्व स्थापित होने को है। इसका नतीजा यह होता है कि अल्पसंख्यक, यूसीसी का विरोध करने लगते हैं और फिर इस विरोध का इस्तेमालए यह बताने के लिए किया जाता है कि अल्पसंख्यकों की मूल मानसिकता ही अलगाववादी है। भाजपा कहती आ रही है कि यूसीसीए से राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा मिलेगा। केंद्रीय कानून मंत्री डीवी सदानंद गौड़ा का कहना है कि राष्ट्रीय एकता के लिए यूसीसी आवश्यक है।
परन्तु यहाँ सवाल यह है कि इस देश में परम्पराओं और प्रथाओं की विभिन्नताओं को देखते हुए, समान नागरिक संहिता तैयार करने के लिए विभिन्न धार्मिक समुदायों के साथ कितनी कठिन वार्ताएं करनी होंगी, ये वार्ताएं कितनी लंबी चलेंगी और क्या इनसे कोई सार्थक नतीजा निकलेगा? फिर, क्या यूसीसी हमारी विभिन्नता को संरक्षित रख सकेगी? क्या हमारी विविधवर्णी परम्पराएं, उस यूसीसी का आधार होंगी?
धार्मिक विविधता
द्रविड़ दक्षिण भारत में भी कई अलग.अलग परम्पराएं हैं जो कि संपत्ति में उत्तराधिकार के मामले में, उत्तर भारत की तुलना में लैंगिक दृष्टि से अधिक न्यायपूर्ण हैं। मद्रास प्रेसिडेंसी में यह प्रथा थी कि लड़कियों को उनके विवाह के समय ज़मीन का एक टुकड़ा दिया जाता था, जिससे होने वाली आय केवल उनके इस्तेमाल के लिए होती थी और वह ज़मीन बाद में उनकी महिला उत्तराधिकारियों को मिलती थी। अगर पति का लंबे समय तक पता न चले तो महिलाओं को पुनर्विवाह करने का अधिकार था और अगर पहला पति बाद में लौट आएए तो महिलाएं ही यह तय करती थीं कि वे दोनों में से किसके साथ रहेंगी। नायर, नम्बूदरी और मलाबार मुसलमानों में मातृवंशीय परंपराएं थीं। लक्षद्वीप, जहां के 99 प्रतिशत रहवासी मुसलमान हैं, में मरूमाकाथ्यम नामक मातृवंशीय व्यवस्था का पालन किया जाता है। केरल के मुसलमानों की भी अपनी मरूमूकाथ्यम प्रथा है।
केरल में मिताक्षरा संयुक्त परिवार व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया है। केरल ने मातृवंशीय मलाबार संयुक्त परिवार व्यवस्था को भी समाप्त कर दिया है यद्यपि कर्नाटक, तमिलनाडु और आन्ध्रप्रदेश में यह अब भी जारी है।
गोवा में अब भी पुर्तगाली सिविल लॉ लागू है। पुडुचेरी के हिंदू, ईसाई और मुसलमान दो भागों में विभाजित हैं.रेनोनकेंट व अन्य। रेनोनकेंटो पर अब भी फ्रांसीसी नागरिक संहिता लागू होती है और अन्यों पर भारतीय कानून। 
जम्मू कश्मीर विधानसभा ने हिंदू विवाह अधिनियम 1955 का पुनः अधिनियमन किया। जम्मू कश्मीर का अपना हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम है, जिसे बौद्ध उत्तराधिकार अधिनियम 1943 को रद्द किए बिना लागू किया गया है। हाल तक कश्मीर में मुस्लिम कानूनों के होते हुए भी उत्तराधिकार के मामले में स्थानीय परंपराओं का ही पालन होता था। मुस्लिम पर्सनल लॉ ;शरियत; एप्लीकेशन एक्टए 1973, जम्मू कश्मीर में अभी हाल में ही लागू किया गया।
मेघालय, मिजोरम,नागालैंड व सिक्किम में पारंपरिक आदिवासी कानूनों को विधायिका ने मान्यता दी है।  ईसाई धर्म अपनाने के बाद भी खासी, जयंतिया और गारो जनजातियां मातृवंशीय उत्तराधिकार की व्यवस्था का पालन करती हैं।
धार्मिक समुदायों, जातियों व अनुसूचित जनजातियों में विविधता
भारत के तीन दक्षिणी राज्योंए तमिलनाडुए आंध्रप्रदेश व केरल में हिंदू परिवार कानूनों में व्यापक संशोधन किए गए हैं। वहां शरियत अधिनियमए खेती योग्य ज़मीन पर लागू नहीं होता। इन तीन दक्षिणी राज्यों में शरियत अधिनियम सन 1963 में लागू किया गया।
पूरे देश के ईसाई आदिवासियों को भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम से बाहर रखा गया है। चार अन्य हिंदू कानून भी अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होते। विशिष्ट हिंदू, बौद्धए जैन व सिक्ख प्रथाएं, जो सामान्य कानूनों के विरूद्ध हैं, को विधि का संरक्षण प्राप्त है।
मुसलमानों के मामले में वसीयत, उत्तराधिकार व गोद लेने संबंधी प्रथाओं को शरियत अधिनियम के तहत भी मान्यता दी गई है। सुन्नी, बोहरा और खोजाओं पर हिंदू प्रथाएं और प्रचलन लागू होते हैं।
यह संदेह करने के पर्याप्त कारण हैं कि यूसीसी इस समृद्ध विविधता के लिए खतरा बन जाएगी।
मुस्लिम पर्सनल लॉ में भी विविधताएं हैं, जैसा कि ऊपर दिए गए विवरण से स्पष्ट है। यही कारण है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, पर्सनल लॉ को संहिताबद्ध करने से हिचकिचा रहा है। और ऐसी आशंका है कि यदि संहिताबद्ध करने का काम किया गया तो वहाबी.हनाफी समूह इस प्रक्रिया पर हावी हो जाएंगे इसलिए नहीं क्योंकि यह समुदाय के हित में होगा बल्कि इसलिए क्योंकि वे बेहतर ढंग से संगठित हैं और प्रक्रिया को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
हमें समान नागरिक संहिता की आवश्यकता नहीं है। डॉ. अंबेडकर ने संविधानसभा में कहा था अनिच्छुक नागरिकों पर यूसीसी नहीं लादी जानी चाहिए। हमें लैंगिक न्याय करने वाले परिवार कानूनों की आवश्यकता है परंतु इनका आधार हमारी विविध परंपराएं होनी चाहिए और इनमें विविधिता के लिए जगह होनी चाहिए। केवल और केवल लैंगिक समानता के लक्ष्य को सामने रखकर वर्तमान परिवार कानूनों में शनै: शनै: सुधार लाने की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए। 
-इरफान इंजीनियर

रविवार, 22 सितंबर 2013

मुजफ्फरनगर दंगे और उनके बाद


 देश में साल दर साल साम्प्रदायिक दंगें हो रहे हैं। इसके बाद भी, यूपीए सरकार ने साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक को ठंडे बस्ते में डाला हुआ है। आखिर कितनी जिंदगियां तबाह होने के बाद यूपीए सरकार को यह अहसास होगा कि विशेष परिस्थितियों से निपटने के लिए विशेष कानूनों की आवश्यकता होती है? सन 1950 से लेकर अब तक देश में हिन्दू.मुस्लिम दंगों में 40 हजार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं परन्तु सड़कों पर आगजनी और खून.खराबा करने वालों में से भी बहुत कम को उनके किए की सजा मिल सकी है। जहां तक दंगों का षड़यंत्र रचने वालों, दंगे भड़काने वालों और हिंसक भीड़ को पर्दे के पीछे से नियंत्रित करने वालों का प्रश्न हैए उनका तो बाल तक बांका नहीं हुआ है। उल्टे, उनमें से अनेक राजनीति की सीढ़ियाँ चढ़कर मंत्री और मुख्यमंत्री बन गए हैं। उनमें से एक भी सीखचों के पीछे नहीं है। जब बम विस्फोटों के कारण सभी भारतीयों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है तब राज्य तुरंत टाडा, पोटा व यूएपीए जैसे विशेष कानून लागू कर देता है। सुरक्षाबलों को सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम व उपद्रवग्रस्त क्षेत्र अधिनियम जैसे कानूनों की आड़ मेंए अल्पसंख्यक समुदाय के निर्दोष सदस्यों को निशाना बनाने की खुली छूट दे दी जाती है। जब महिलाओं के विरूद्ध सेक्स.संबंधी अपराध बढ़ते हैं तो राज्य तुरंत एक विशेष अध्यादेश जारी कर देता है ;और यह बिल्कुल ठीक कदम है, जिसे यदि ठीक ढंग से लागू किया जाए,तो दोषियों को सजा मिलना सुनिश्चित हो सकेगा। परन्तु जब अल्पसंख्यकों की सुरक्षा खतरे में होती है तो उन्हें यह सलाह दी जाती है कि वे अपना व्यवहार सुधारें और राष्ट्रीय एकीकरण व शांति की खातिर अपने साथ हुए अन्याय को भुला दें। दंगा पीडि़तों को उचित और पर्याप्त राहत नहीं मिलती। उनको हुए नुकसान का उन्हें नाममात्र का मुआवजा मिलता है और दंगों की तिजारत करने वालों को सजा दिलवाने के कोई प्रयास नहीं किए जाते। नतीजे में दंगा व्यवसायियों का मनोबल बढ़ता है व वे और बड़े, और भयावह दंगों की योजनाएं बनाकर, उन्हें अंजाम देने में जुट जाते हैं। दंगों के व्यवसायियों की ताकत इतनी बढ़ चुकी है कि वे सत्ता में रहें या न रहेंए वे बहुत कम समय में जानोमाल का भारी नुकसान करने में सक्षम हो गए हैं।
पिछले साल ;2012 देश में असम के बोडो इलाके में बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक हिंसा हुई। उत्तरप्रदेश में नौ दंगे हुए . कोसीकला, प्रतापगढ़, सीतापुर, बरेली व बिजनौर में और फैजाबाद व गाजियाबाद में दो.दो बार । महाराष्ट्र में पछोरा, बुलढ़ाना, रावेर ;जलगांवद्ध व आकोट में दंगे हुए। आंध्रप्रदेश में संगारेड्डी और हैदराबाद में साम्प्रदायिक हिंसा हुई। गुजरात में बड़ौदा और दामनगर ;अमरेली में दंगे हुए।
इस साल भी दंगों में कोई कमी नहीं आई। धुले ;महाराष्ट्र, नवादा ;बिहार, किश्तवार ;जम्मू एवं कश्मीर व उत्तरप्रदेश के कई शहरों में दंगे हो चुके हैं। जैसे.जैसे आमचुनाव नजदीक आ रहे हैंए  दंगों की संख्या और उनकी तीव्रता,दोनों में वृद्धि हो रही है। इस साल किश्तवार व मुजफ्फरनगर के दंगों ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया। ऐसा लगता है कि हर चुनाव के पहले अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ सदस्यों को अपनी जान की कुर्बानी देना आवश्यक है ताकि साम्प्रदायिक दलों की सीटों में इजाफा हो सके। एक ओर नरेन्द्र मोदी यह ढोंग कर रहे हैं कि उनका चुनाव अभियान केवल विकास से जुड़े मुददों और सुशासन पर केन्द्रित हैए वहीं संघ परिवार के विहिप सहित सभी सदस्य, मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने के नए.नए उपाय खोज रहे हैं। उनका लक्ष्य है विविधवर्णी हिन्दू समुदाय को राजनैतिक रूप से एक कर उसे वोट बैंक में परिवर्तित करना। विहिप द्वारा शुरू की गई 84 कोसी परिक्रमा का यही उद्देश्य था। इस तरह की परिक्रमा की कोई धार्मिक परम्परा न होने के बावजूद, विहिप ने इस कार्यक्रम का आयोजन किया। संघ परिवार, साम्प्रदायिक हिंसा का उपयोग अपने जनाधार को विस्तार और अपने संगठन को मजबूती देने के लिए करता रहा है। और यह उसकी नीति है।
मुजफ्फरनगर दंगे
दिनांक 17 सितम्बर 2013 के द टाईम्स ऑफ इण्डियाके अनुसार, 27 अगस्त को मुजफ्फरनगर के कवांल गांव में शाहनवाज की मोटरसाईकिल और गौरव की साईकिल में भिडंत हो गई। इसके बाद, दोनों के बीच हुए विवाद के दौरान शाहनवाज ने गौरव को एक थप्पड़ मार दिया। गौरव के साथी जल्दी ही वहां इकट्ठा हो गए और उन्होंने शाहनवाज की हत्या कर दी। वहां उपस्थित लोगों ने गौरव और उसके एक साथी सचिन को पकड़ लिया और पीट.पीट कर मार डाला। इसके बाद, किसी अन्य घटना का एक फर्जी वीडियो, जो पुलिस के अनुसार दो साल पुराना है, को सोशल नेटवर्किंग साइटों और मोबाइल फोनों के जरिए बड़े पैमाने पर प्रसारित किया गया। यह कहा गया कि यह वीडियो भीड़ द्वारा सचिन और गौरव को पीट.पीट कर मार डालने की घटना का है। इस नकली वीडियो, जिसे कथित रूप से भाजपा विधायकों द्वारा जारी किया गया था,से इलाके में अल्पसंख्यकों के विरूद्ध घृणा का वातावरण पैदा हो गया और दूसरे समुदाय के लोग बदला लेने पर उतारू हो गए। दिलचस्प यह है कि इस घटना पर जाट समुदाय ने पहले प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। भाजपा के पारंपरिक समर्थक सैनियो ने गौरव और सचिन की हत्या का बदला लेने के लिए जाटों को उकसाया। एक बसपा नेता और कुछ अन्य राजनेताओं ने, 30 अगस्त को, मुसलमानों की बैठक आयोजित कीए जिसमें खून का बदला खून से लेने का निर्णय लिया गया। चार भाजपा विधायकों ने जाट महापंचायत का आयोजन किया। प्रतिबंधात्मक धाराएं लागू होने के बावजूद, महापंचायत में बंदूकों, तलवारों व अन्य घातक हथियारों से लैस हजारों जाटों ने भाग लिया। किसी भी प्रकार की सभा के आयोजन पर प्रतिबंध के बावजूद, बड़ी संख्या में हथियारबंद जाटों को इकट्ठा होने क्यों दिया गया, इसका जवाब पुलिस ही दे सकती है। कुल तीन महापंचायतें हुईं और उनमें निहायत भड़काऊ भाषण दिए गए। ऐसा आरोपित है कि जाट महापंचायतों में लगाए गए नारों में से एक था मुसलमान के दो ही स्थान, पाकिस्तान या कब्रिस्तान। इसके बाद जो कुछ हुआ, वह सबके सामने है। दर्जनों मकानों में आग लगा दी गई,  40,000 लोगों को अपने घर.बार छोड़कर राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी और उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय में दाखिल एक शपथपत्र के अनुसारए 43 लोग मारे गए। दिनांक 15 सितम्बर के द टाइम्स आफ इंडिया  ने दंगों में मारे गए 53 लोगो की लाशों का पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों के हवाले से लिखा कि जिस वहशियाना तरीके से ये हत्याएं की गयीं थींए उसे देखकर डाक्टर भी कांप उठे। कई मामलों में महिलाओं के गुप्तांग कटे.फटे पाए गए। पुलिस, हमेशा की तरह,हिंसा की मूकदर्शक बनी रही। पुलिस और प्रशासन ने जाट महापंचायतों का आयोजन होने देकर और उनमें हुई उत्तेजक भाषणबाजी को न रूकवाकर, आपराधिक लापरवाही बरती है। मोटरसाईकिल और साईकिल की भिड़ंत की एक मामूली सी घटना को लेकर हुई तीन हत्याओं का इस्तेमाल भाजपा नेताओं ने साम्प्रदायिक जुनून पैदा करने के लिए किया। उनका उद्देश्य चुनाव में लाभ उठाना था। सत्ताधारी समाजवादी पार्टी ने भी चुनाव में फायदा होने की उम्मीद में हिंसा को रोकने की कोशिश नहीं की।
मुददे और चिंताएं
दंगाई हमेशा इस सिद्धांत पर काम करते हैं कि दूसरे समुदाय के किसी एक या कुछ सदस्यों की गलत हरकत के लिए वह पूरा समुदाय जिम्मेदार है। जाहिर है कि किसी एक की गलती की सजा किसी दूसरे को देना, बर्बर और आदिम सोच का प्रतीक है। किसी भी पूरे समुदाय को अनैतिक नहीं बताया जा सकता क्योंकि क्या सही है और क्या गलत, इसका निर्णय व्यक्ति विशेष करते हैं न कि पूरा समुदाय। इसी सिद्धांत के अन्तर्गत, सैंकड़ों वर्ष पहले किसी मुस्लिम राजा द्वारा हिन्दू मंदिरों को ढहाने के लिए आज के मुसलमानों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। साफ है कि आज के मुसलमानों का उस राजा और उसके कर्मों से कोई लेनादेना नहीं है। साम्प्रदायिक दंगों के दौरान दूसरे समुदाय को सामूहिक सजा दी जाती है ताकि दोनों समुदायों के बीच घृणा,भय और संदेह का वातावरण उत्पन्न हो और समाजए साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत हो जाए। आखिर कब साम्प्रदायिक ताकतें अपनी इस आदिम प्रवृत्ति पर नियंत्रण स्थापित करेंगी?
सामूहिक दण्ड, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद व एकाधिकारवादी राज्य
साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा सामूहिक दण्ड इसलिए दिया जाता है ताकि नागरिकों की बहुविध पहचानों को मिटाया जा सके। यही पहचानें हर व्यक्ति को दूसरे से अलग बनाती हैं। उदाहरणार्थ, इन पंक्तियों का लेखक एक गुजराती अशरफ मुसलमान हैए जिसका जन्म महाराष्ट्र में हुआ और जो इसी राज्य का निवासी है। वह भारतीय है, पुरूष है, वकील है, पुस्तक प्रेमी है और उदारवादी वामपंथी विचारधारा में विश्वास रखता है। कोई भी व्यक्ति अपने आसपास की दुनिया को अपनी इन्हीं विविध पहचानों के चश्मे से देखता.समझता है।  कब.जब कुछ व्यक्ति इनमें से कुछ जन्मजात या अर्जित पहचानों से ऊपर भी उठ जाते हैं। हर व्यक्ति की कई पहचानें होती हैंए यही नागरिकता की अवधारणा का आधार है। नागरिकों को वे स्वतंत्रताएं और अधिकार दिए जाते हैं जो उन्हें अपनी इन बहुविध पहचानों के साथ जीवन बिताने का हक दें और जब तक वे किसी कानून का उल्लंघन न करें, तब तक उनकी किसी भी पहचान या विचार के कारण उनके साथ भेदभाव न किया जाए। साम्प्रदायिक ताकतों की कोशिश रहती है कि वे किसी व्यक्ति की जन्मजात पहचान को सबसे महत्वपूर्ण बना दें और उसकी अन्य पहचानों को हाशिए पर खिसका दें। उदाहरणार्थ, अगर मुसलमानों को केवल उनके मुसलमान होने के कारण निशाना बनाया जाता है तो इस लेखक की अन्य सभी पहचानें ;जैसे गुजराती, महाराष्ट्र का निवासी, पुरूषए पुस्तक प्रेमी, वकील, अशरफ आदि गौण हो जाती हैं और महत्व सिर्फ इस एक तथ्य का रह जाता है कि वह मुसलमान है।
मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाकर, साम्प्रदायिक ताकतें हिन्दुओं के लिए उनकी धार्मिक पहचान को सबसे महत्वपूर्ण बनाना चाहती हैं और उनकी अन्य पहचानों, जैसे उनकी जातिए रहवास का क्षेत्र, नस्ल, लिंग, व्यवसायए आर्थिक स्तर व उनके शौक आदि को हाशिए पर पटकना चाहती हैं। इस प्रक्रिया में धार्मिक हिन्दू को राजनैतिक हिन्दू में बदल दिया जाता है, जो एक ऐसे एकाधिकारवादी सांस्कृतिक राज्य का निर्माण करना चाहता है जिसमें किसी एक धर्म को प्रमुखता दी जाएगी और अन्य धर्मों का दमन किया जाएगा। यही कारण है कि दंगाग्रस्त क्षेत्र के जाट और मुसलमानए जो एक ही भाषा बोलते हैंए एक.से कपड़े पहनते हैंए जिनकी अनेक परंपराएं समान हैं और जो एक.से नैतिक मूल्यों में विश्वास करते हैंए आज एक दूसरे से डरने लगे हैं। मुजफ्फरनगर के दंगों ने जाट मुसलमान और जाट हिन्दू नामक दो समुदायों का निर्माण कर दिया है जो अपनी समान परंपराओं और संस्कृति को भूलकर, एक दूसरे के शत्रु बन बैठे हैं। जाट मुसलमानों को अब और ज्यादा मुसलमान बनना होगा और उस क्षेत्र के रहवासी सैय्यदों और पठानों से नजदीकियां बढ़ानी होंगी और जाट हिन्दुओं को घृणा की दृष्टि से देखना होगा। उसी तरहए जाट हिन्दुओं को सैनियों और हिन्दू उच्च जातियों से जुड़ना होगा। इस प्रक्रिया से केवल दोनों पक्षों की साम्प्रदायिक ताकतों को फायदा होगा . एक ओर आरएसएस व भाजपा सहित संघ परिवार और दूसरी ओर मजलिसें, जमायतें और मुश्वीरातें। इनमें से पहले हिन्दू वोटों के मालिक बन जाएंगे और दूसरे मुसलमान वोटों के।
साम्प्रदायिकता का ग्रामीण क्षेत्रों में फैलाव
भागलपुर, नैल्ली, गुजरात और असम के बोडो इलाके में हुए दंगों में ग्रामीण क्षेत्रों में साम्प्रदायिक हिंसा हुई थी परंतु यह मूलत शहरी क्षेत्रों में हिंसा का आसपास के गांवों में विस्तार भर था। परंतु मुजफ्फरनगरए शामली और मेरठ में हिंसा मुख्यत ग्रामीण क्षेत्रों में हुई। मुजफ्फरनगर दंगों में घर से बेघर हुए लोगों की संख्या, उत्तरप्रदेश में अब तक हुए किसी भी दंगे से कहीं ज्यादा है। भयग्रस्त विस्थापितों का कहना है कि वे अब कभी अपने गांवों में वापिस नहीं जा पाएंगे। यह एक अत्यंत खतरनाक व चिंताजनक घटनाक्रम है।
महिलाओं का शरीर, साम्प्रदायिक हिंसा के खिलाडि़यों की रणभूमि बन चुका है। जाट महापंचायतों ने महिलाओं के बारे में प्रतिगामी सोच को और मजबूत किया है। जाट.बहुल क्षेत्रों में महिलाओं पर पहले से ही कई तालिबानी प्रतिबंध लागू हैं। वे मोबाईल फोन नहीं रख सकतीं, अपनी इच्छानुसार कपड़े नहीं पहन सकतीं व उन्हें पुरूषों से मित्रता रखने की इजाजत नहीं है। वे कहां जा सकती हैं और कहां नहीं, वे किस समय घर से निकल सकती हैं और कब नहीं, इसका निर्धारण भी परिवार के पुरूष करते हैं। इस क्षेत्र में लिंगानुपात पहले से ही बहुत कम है और व्यावहारिक दृष्टि से महिलाएं संपत्ति के उत्तराधिकार से वंचित हैं। इन दंगों से महिलाओं की कठिनाइयां और बढ़ेंगी। ऐसी खबरें लगातार आ रही हैं कि महिलाओं, विशेषकर मुस्लिम लड़कियों, की पढ़ाई बंद करवाई जा रही है क्योंकि उनके परिवारजनों को लगता है कि साम्प्रदायिक घृणा से लबरेज वातावरण में घर से बाहर वे सुरक्षित नहीं रह सकेंगी।
इस दंगे से जातिगत आधार पर वोट देने की प्रवृति पर क्या असर पड़ेगा और विभिन्न जातियों के हिन्दू मतदाता एक होंगे या नहींए यह भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से मोदी के चुनाव प्रचारकों को लाभ होगा। वातावरण में घुल चुके साम्प्रदायिकता के जहर के कारण लोगों के भावनाओं में बह जाने और मोदी के प्रचार मैनेजरों के अतिश्योक्तिपूर्ण और झूठे दावों पर विश्वास करने की संभावना बढ़ जाएगी। मोदी की प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए यह आवश्यक है कि इस बार उत्तरप्रदेश में भाजपा का प्रदर्शनए पिछले चुनाव से बेहतर हो। मुजरफ्फरनगर दंगों से सबसे ज्यादा लाभ भाजपा को हुआ है और जाटों के बीच उसकी लोकप्रियता में जबरदस्त उछाल आया है। भाजपा, उत्तरप्रदेश के सत्ताधारी दल समाजवादी पार्टी पर लगातार प्रहार कर रही है। उसे आशा है कि वह बीएसपी की जगह राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी बन जाएगी। यद्दपि ऐसा होने की संभावना बहुत कम है।
धर्मनिरपेक्ष और प्रजातांत्रिक शक्तियों की मुख्य चिंता यह है कि पीड़ितों के राहत शिविरों में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हों, जिन लोगों ने दंगों में नुकसान उठाया है उन्हें पर्याप्त मुआवजा मिले व उनका पुनर्वास हो। क्षेत्र में दोनों समुदायों के संबंध फिर से मधुर बनाने और न्याय के साथ शान्ति की स्थापना की आवश्यकता भी है। साम्प्रदायिक ताकतों के शैतानी इरादों से आमजनों को परिचित करवाना, इन शक्तियों की प्राथमिकता होनी चाहिए। सभी धर्मों के व्यक्तियों को स्वतंत्रताए समानता और सामाजिक न्याय का अधिकार है व ये अधिकार उन्हें मिलने चाहिएए इस भावना के लिए देश के प्रत्येक नागरिक के मन में जगह बनानी होगी। जहां तक न्याय का प्रश्न है, उसके लिए आवश्यक है कि साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक कानून को जल्द से जल्द लागू करने के सघन प्रयास किए जाएं।
.-इरफान इंजीनियर

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

साम्प्रदायिकता नई रणनीतियां


साम्प्रदायिक संगठन अक्सर यह प्रचार व दावा करते हैं कि चूंकि देश में कोई बड़ा दंगा नहीं हो रहा है इसलिए यहां शांति है। वे यह भी कहते हैं कि चूंकि शांति है इसलिए प्रस्तावित साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निरोधक विधेयक या साम्प्रदायिक दंगों से निपटने के लिए किसी अन्य विशेष कानून की आवश्यकता नहीं है। बल्कि, उनके अनुसार, इस तरह का कानून, साम्प्रदायिक खाई को और गहरा करेगा और उन घावों को फिर से कुरेदेगा, जो धीरे.धीरे भर रहे हैं। 
यह सच है कि सन् 2002 के बाद से गुजरात जैसे दंगे देश में नहीं हुए हैं। परन्तु यही बात अहमदाबाद के 1969 के दंगे, जिसमें आधिकारिक अनुमानों के अनुसार 2000 लोग मारे गए थे, और 1970 में हुए इतने ही भयावह भिवण्डीए जलगांव, महाड़ दंगों के बारे में भी सच है। इन दंगों के बाद, लगभग 14 साल तकए देश में कोई बड़ा दंगा नहीं हुआ। सन् 1984 में दिल्ली, अहमदाबाद, भिवण्डी और मुम्बई में दंगे भड़क उठे। सन् 1980 के दशक में गोधराए मेरठ, मलियाना, मुरादाबाद, अलीगढ़, भागलपुर आदि में छोटे.बड़े दंगे हुए। इन दंगों की पृष्ठभूमि में था उच्चतम न्यायालय के शाहबानो मामले में निर्णय का विरोध और अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिराकर उसके स्थान पर राममंदिर बनाने का आंदोलन। बाबरी मस्जिद को जमींदोज करने के अभियान के नतीजे में उत्तर और पश्चिमी भारत के कई शहरों, जिनमें मुंबई, अहमदाबाद और सूरत शामिल हैंए में दंगे हुए।
हमारे देश में विभिन्न जातियों और समुदायों को उपलब्ध अवसरों और विकास के फलों में अपनी हिस्सेदारी का दावा करने के लिए जिस ढंग से उत्प्रेरित किया जाता हैए उससे बेशक यह नतीजा निकाला जा सकता है कि साम्प्रदायिक हिंसा चक्रीय और आवर्ती है। चक्र की अवधि कम.ज्यादा हो सकती है परन्तु हिंसा की तीव्रता में केवल बढ़ोत्तरी ही होती है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि वर्तमान में देश में जो साम्प्रदायिक शांति है, वह एक तरह से तूफान के पहले की शांति है। यह महत्वपूर्ण है कि शांति के इस दौर में भी कम से कम आठ स्थानों पर दंगे हुए हैं, जिनमें उत्तरप्रदेश के कई नगर और महाराष्ट्र का धुले शामिल है। इस संदर्भ में यह भी कहा जा रहा है कि समाज का साम्प्रदायिकीकरण और धु्रवीकरण करने के लिएए साम्प्रदायिक संगठनों की दंगों पर निर्भरता कम होती जा रही है।
साम्प्रदायिक संगठन इस मिथक का भरपूर प्रचार करते हैं कि साम्प्रदायिक दंगे किसी भयावह घटनाक्रम की स्वभाविक जनप्रतिक्रिया होते हैं.वह घटना इन्दिरा गांधी या स्वामी लक्ष्मणानन्द की हत्या हो सकती है या साबरमती एक्सप्रेस के कोच में आगजनी। सच यह है कि साम्प्रदायिक हिंसा हमेशा जानते.बूझते भड़काई जाती है और इसका उद्देश्य पहले से तय लक्ष्यों को पाना होता है। पॉल ब्रास के अनुसार, स्वतंत्रता के बाद से देश के कुछ क्षेत्रों विशेषकर उत्तरी व पश्चिमी राज्यों में, एक ष्संस्थागत दंगा व्यवस्था अस्तित्व में आ गई है, जिसे चुनाव के समय या राजनैतिक आवश्यकता पड़ने परए सक्रिय किया जा सकता है। साम्प्रदायिक हिंसा कभी स्वस्फूर्त नहीं होती। एक दंगे के उत्पादन के लिएए ब्रास कहते हैं, कई काम करने होते हैं। इनमें शामिल हैं अफवाहें फैलाना, सूचनाओं का आदान.प्रदान, उत्तेजक भाषणबाजी, दंगाईयों की भर्ती और हिंसा शुरू करवाने के लिए पूर्व.नियोजित हरकत। दंगा कैसे शुरू किया जायेगा, इसकी बाकायदा रिहर्सलें होती हैं और उचित समय परए जब वातावरण हिंसा भड़काने के अनुकूल हो और रास्ते में कोई बड़ी बाधा न होए दंगे शुरू कर दिये जाते हैं। भारत में साम्प्रदायिक दंगे भड़काने के पीछे उद्देश्य होता है साम्प्रदायिक पहचान को, भाषायी, लैंगिक व नस्लीय पहचानॉ की तुलना में, अधिक मजबूती देना। इस मामले में दो व्यक्तियों का एक ही व्यवसाय में होना या किसी एक क्लब का सदस्य होना या कलाप्रेमी होना महत्व नहीं रखता। महत्व रखता है सिर्फ उनका धर्म। साम्प्रदायिक दंगे इसलिए भी करवाये जाते हैं ताकि दमित, दलित और आदिवासी, इस तथ्य को नजरअंदाज कर, कि उनके साथ जाति.आधारित पदानुक्रम के चलते किस कदर भेदभाव किया जाता है, अपनी साम्प्रदायिक पहचान को गले लगा लें और उच्च जातियों के हित में काम करें।
साम्प्रदायिक हिंसा इसलिए भी किसी व्यक्ति की साम्प्रदायिक पहचान को उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण बना देती है क्योंकि उसे लगता है कि उसके धर्म के कारण उसे मौत के घाट उतारा जा सकता है। हिंसा के दौरान दूसरे का भय अपने सबसे उच्च स्तर पर रहता है। हमारे समुदाय का हर व्यक्ति हमें मित्र नजर आता है और दूसरे समुदाय का प्रत्येक व्यक्ति, शत्रु। यही कारण है कि दंगों के दौरान लोग अजनबियों की भी धार्मिक पहचान जानने के लिए व्यग्र रहते हैं। दंगों के खत्म हो जाने के बाद भी उनके दौरान जाग्रत हुई साम्प्रदायिक चेतना और भय का भाव खत्म नहीं होता। साम्प्रदायिक शक्तियां इस चेतना को अनवरत प्रचार और कई तरह के मिथक फैलाकर जिंदा रखती हैं। दूसरे समुदाय को खतरा बताया जाता है। इस तरहए साम्प्रदायिक हिंसा से साम्प्रदायिक पहचान मजबूत होती है और सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक क्षेत्रों में अपने समुदाय के व्यक्ति को प्राथमिकता देने और दूसरे समुदाय के व्यक्तियों के साथ भेदभाव करने की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। इससे समाज बंट जाता है व साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद को वैधता मिलती है और धर्मनिरपेक्ष व समावेशी राष्ट्रवाद की परिकल्पना में लोगों का विश्वास घटता है। प्रजातंत्र और स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व के मूल्यों में विश्वास में कमी आती है। इस तरह, साम्प्रदायिक दंगे समाज का साम्प्रदायिकीकरण करते हैं।
नई रणनीति
चूँकि पहले साम्प्रदायिक ताकतों के समर्थक इतनी बड़ी संख्या में नहीं थे कि वे बिना दंगों का सहारा लिए समाज की सोच को अपनी विचारधारा के अनुरूप बना सकें इसलिए पहले बड़े और भयावह दंगे करवाना आवश्यक होता था। पॉल ब्रास के शब्दों मेंए दंगों के उत्पादन से साम्प्रदायिक संगठनों को मीडिया के एक हिस्से में कवरेज मिलता था व वे राष्ट्र का ध्यान अपनी ओर खींचने में सफल रहते थे। दंगों और मीडिया.दोनों का इस्तेमाल समाज में साम्प्रदायिकता की जड़ें मजबूत करने के लिये किया जाता था। परन्तु हाल के कुछ वर्षों में, साम्प्रदायिक संगठनों ने एक नई रणनीति अपना ली है, जिसके तहत उन्हें समाज का साम्प्रदायिकीकरण करने के लिए बड़े पैमाने पर दंगे करवाना आवश्यक नहीं रह गया है। कहना ना होगा कि दंगे करवाने के अपने खतरे थे। कई बार मीडिया हिंसा के खिलाफ हो जाता था, कई बार अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन सामने आ जाते थे, कई बार उच्च न्यायपालिका सहित देश की अन्य संस्थाएं समस्याएं खड़ी करती थीं तो कई बार प्रधानमंत्री या अन्य उच्च राष्ट्रीय पदों पर काबिज होने के महत्वाकांक्षी नेता भी परेशानी का सबब बन जाते थे।
अब साम्प्रदायिक दंगें भड़काकर, कुछ समय के लिए अल्पसंख्यकों को आतंक के साए में रखने की बजाए, साम्प्रदायिक शक्तियां, इस्लामिक आंतकवाद के भेस मेंए हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों पर आतंकी हमले कर रही हैं और इस तरह समाज को लगातार आतंक के साये में जीने पर मजबूर कर रही हैं।
हिन्दुत्व की विचारधारा से प्रेरित आतंकवादियों के अस्तित्व का पहली बार पता तब चला जब 6 अप्रैल 2006 को बम बनाने के दौरान हुए विस्फोट में  बजरंग दल के दो कार्यकर्ता मारे गए। इनमें से एक का नाम राजकोंडवार था। पुलिस को जांच के दौरान उस स्थान से कुछ मस्जिदों के नक्शे और मुसलमानों के पारम्परिक परिधान भी मिले। बम धमाके में घायल राहुल पांडे ने पुलिस के समक्ष स्वीकार किया कि उसने और उसके साथियों ने पहले भी कई बम बनाए थे। जनवरी 2008 में तमिलनाडु के तेनकासी में आरएसएस के कार्यालय और बस स्टेण्ड के समीप बम रखने के आरोप में हिन्दू मुनानी के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। उनका मानना था कि बम लगाने के लिए स्वाभाविकतः मुस्लिम संगठनों को दोषी ठहराया जायेगा और इससे हिन्दू उनके खिलाफ भड़केंगे। 24 अगस्त 2008 को कानपुर में बम बनाते समय दो बजरंग दल कार्यकर्ता मारे गए। बजरंग दल का इरादा पूरे उत्तरप्रदेश में भारी बम विस्फोट करने का था।
सन् 2010 में 30 अप्रैल को आरएसएस से लंबे समय तक जुड़े रहे देवेन्द्र गुप्ता विष्णु प्रसाद और चन्द्रशेखर पाटीदार को अक्टूबर 2007 में अजमेर शरीफ में बम रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। ऐसा कहा जाता है कि इन्हीं लोगों ने हैदराबाद की मक्का मस्जिद में भी बम विस्फोट किया था जिसके सिलसिले में कई निर्दोष मुस्लिम युवकों को पुलिस ने हिरासत में लिया और उन्हें जमकर शारीरिक यंत्रणा दी गई। गोवा के मारमागोवा में 16 अक्टूबर 2009 को हुए विस्फोट में दो व्यक्ति मारे गए। एनआईए ने इस घटना में प्रशांत जावडेकर ;रत्नागिरी सारंग कुलकर्णी ;पुणे जयप्रकाश उर्फ अन्ना ;मेंगलोर व एक अन्य अज्ञात व्यक्ति को आरोपी बनाया। मालगोंडा पाटिल और योगेश नायक नामक दो व्यक्ति एक बोरी में विस्फोटक भरकर स्कूटर से ले जा रहे थे तभी उनमें विस्फोट हो गया। यह घटना तब हुई जब मारमागोवा में एक धार्मिक पर्व चल रहा था जिसमें बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक.स्वरूप नरकासुर के पुतले जलाए जाते हैं। पुलिस ने इस घटना के लिए सनातन संस्था  नामक दक्षिणपंथी हिन्दू संगठन को दोषी ठहराया। इस संगठन का मुख्यालय गोवा के पोंडा क्षेत्र में स्थित रामनाथी नगर था जो कि अपने मंदिरों के लिए जाना जाता है।
इसी तरहए सन् 2008 में सनातन संस्था के 6 सदस्यों को वाशी ;ठाणे में एक सभागार में बम रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। 30 अगस्त 2011 को ठाणे की सेशन्स अदालत ने सनातन संस्था के रमेश गडकरी और विक्रम भावे को बम रखने का दोषी पाया और उन्हें दस वर्ष के कारावास की अधिकतम सजा सुनाई। एनआईए के अधिकारियों ने इस संस्था के मुख्यालय पर अक्टूबर 2011 में छापा मारा। संस्था की गतिविधियों की जांच जारी है। इन दोनों घटनाओं में निशाने पर मुसलमान नहीं थे परन्तु विस्फोट करने वाले यह जानते थे कि घटनाओं का दोष मुस्लिम संगठनों पर मढ़ा जायेगा।
आईबी व एटीएस के एक हिस्से का साम्प्रदायिकीकरण
जहां एक ओर साम्प्रदायिक संगठनों ने आतंकवाद और बम विस्फोटों के जरिए मुसलमानों को खलनायक और दानव सिद्ध करने की कोशिश की वहीं उन्होंने सुरक्षाबलों में ऐसे लोगों की घुसपैठ करवाई जिनकी मानसिकता साम्प्रदायिक थी। ये लोग अपने पद व शक्तियों का दुरूपयोग कर निर्दोष मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार करते उन्हें सीमा पार से आया ऐसा आतंकवादी बताते जिसके निशाने पर नरेन्द्र मोदी या कोई अन्य महत्वपूर्ण व्यक्ति या कोई सामरिक महत्व का स्थान था व मुठभेड़ के नाम पर उनकी हत्या कर देते। यह सिलसिला लम्बे समय से चल रहा था और चलता ही रहता यदि सोहराबुद्दीन के भाई ने भारी मुसीबतों को झेलते हुए लम्बी कानूनी लड़ाई न लड़ी होती। यह इस तथ्य के बावजूद कि इस घटना में शामिल व्यक्ति अत्यंत शक्तिशाली व प्रभावशाली थे और उनके हाथ बहुत लंबे थे। सोहराबुद्दीन की तरह ही इशरत जहां,जावेद शेख और दो अन्यों को, जिनमें से एक का नाम सादिक जमाल था, मौत के घाट उतार दिया गया था। इशरत जहां की हत्या की सीबीआई द्वारा की गई जांच में यह सामने आया कि उसमें गुजरात के पुलिस महानिदेशक पद से सेवानिवृत्त पीपी पाण्डेय का हाथ था। फर्जी मुठभेड़ में आई.बी. के अधिकारी राजेन्द्र कुमार की क्या भूमिका थी,इसकी जांच जारी है। राजेन्द्र कुमार ने वे गुप्तचर सूचनाएं उपलब्ध करवाईं थीं जिनके आधार पर हत्या को मुठभेड़ साबित किया गया। राजेन्द्र कुमार ने ही कथित रूप से उन एके.47 बंदूकों का इंतजाम करवाया, जिन्हें इशरत जहां व अन्य मृतकों की लाशों के पास रख दिया गया। गुजरात के गृह मंत्री और नरेन्द्र मोदी के विश्वस्त अमित शाह को सोहराबुद्दीन,कौसर बानो और तुलसीराम प्रजापति की हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया।
निर्दोष मुसलमानों की फर्जी मुठभेड़ों में हत्या को पूरे देश में मीडिया के जरिए प्रचारित करवाया जाता। जो कुछ पुलिस कहती,मीडिया उसे सौ प्रतिशत सत्य मानकर निगल लेती। इस तरह की घटनाओं के मीडिया द्वारा बिना कोई संदेह व्यक्त किए कवरेज करने और इन घटनाओं पर टीवी में बहस मुबाहिसों के लंबे सिलसिलों के चलते, टीवी का एक आम दर्शक यह मानने पर मजबूर हो जाता कि सभी आतंकवादी मुसलमान होते हैं। नरेन्द्र मोदी और एलके आडवाणी जैसे नेतागण इसी बात को लगतार दोहराते रहते हैं। इस प्रकार, मुसलमानों के प्रति घृणा पैदा करने के लिएए दंगें भड़काने की बजाए, उन पर आतंकवादी होने का लेबल चस्पा करना शुरू कर दिया गया। फर्जी मुठभेड़ों का एक और लाभ था। जो लोग कथितआतंकवादियों के निशाने पर बताये जाते थे, वे नायक के रूप में उभरते थे और उन्हंे लौहपुरूष बताया जाता था।
निष्कर्ष
साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा अब यह रणनीति अपनाई जा रही है कि गुप्तचर एजेंसियों और आतंकवाद निरोधक दस्तों के एक हिस्से और मीडिया कवरेज के सहारेए अल्पसंख्यकों को देश के लिए बड़े खतरे के रूप में प्रस्तुत किया जाए। साम्प्रदायिक ताकतों ने अपनी विचारधारा से ओतप्रोत लोगों की घुसपैठ सुरक्षाबलों में करवाने में सफलता पा ली है। होता यह है कि आईबी का एक हिस्सा झूठी गुप्त सूचनाएं देता है और इन सूचनाओं पर तुरत.फुरत कार्यवाही करते हुए आतंकवादी निरोधक दस्ते, निर्दोष मुसलमानों काए उन्हें आतंकवादी बताकर,कत्ल कर देते हैं और यह दावा करते हैं कि उन्होंने देश को एक और आतंकी हमले से बचा लिया। उत्तरप्रदेश के निमेश आयोग ने ऐसे मुस्लिम युवकों की सूची तैयार की है जिन्हें धर्मनिरपेक्ष मायावती सरकार में आतंकवादी बताकर गिरफ्तार किया गया था। निमेश आयोग के अनुसारए खालिद मुजाहिद नामक एक युवक को भी बिना किसी सुबूत के गिरफ्तार किया गया था। बाद में पुलिस हिरासत में उसकी मौत हो गई। आम जनता के दिलो.दिमाग में फिरकापरस्ती का जहर इस हद तक भर दिया गया है कि आतंकवादी होने के आरोप में मुकदमों का सामना कर रहे मुस्लिम युवकों की पैरवी करने वाले वकीलों को उनके ही हम पेशा अदालतों के परिसरों में पीट रहे हैं और इस पर न तो समाज और ना ही न्यायपालिका अपेक्षित प्रतिक्रिया व्यक्त कर रही है। कम से कम किसी उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय ने अदालतों की परिसरों में हो रही इस तरह की घटनाओं पर आपत्ति दर्ज नहीं की है। कतील सिद्दीकी को यरवदा जेल में मार डाला गया क्योंकि उसकी गवाही से हिमायत बेग, जिसे जर्मन बेकरी धमाकों के सिलसिले में फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है, निर्दोष साबित हो जाता। ऐसा लगता है कि नई रणनीति काम कर रही है परन्तु ऐसा कब तक होगा, कहना मुश्किल है। जो नागरिक प्रजातंत्र और उसकी संस्थाओं का सम्मान करते हैंए वे आखिर कब इस तरह की नंगी हिंसा के विरोध में अपनी आवाज बुलंद करेंगे? इसके पहले कि भारत एक फासीवादी देश बन जाए, हम सबको इस तरह की क्रूरता और अन्याय के विरूद्ध उठ खड़ा होना चाहिए।
-इरफान इंजीनियर
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