सोमवार, 26 अक्तूबर 2015

पर्सनल लॉ में सुधार लैंगिक समानता के लिए हो


राष्ट्रीय एकीकरण के लिए नहीं
उच्चतम न्यायालय ने एक बार फिर केंद्र सरकार से कहा है कि वह शपथपत्र दाखिल कर बताये कि क्या वह देश में समान नागरिक संहिता  लागू करेगी। शाहबानो मामले में,उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि 'यह खेद का विषय है कि संविधान के अनुच्छेद 41 को लागू नहीं किया जा रहा है'। यद्यपि, शायद यह मानते हुए कि राजनेताओं में हिम्मत से सही निर्णय लेने की क्षमता का अभाव है, उच्चतम न्यायालय ने समाज सुधार का बीड़ा उठा लिया हैए तथापि यह साफ है कि केवल विधायिका ही यूसीसी लागू कर सकती है।
उच्चतम न्यायालय, संविधान के अनुच्छेद 44 के आधार पर बार.बार यूसीसी की बात कर रहा है। संविधान का अनुच्छेद 44 कहता है कि, राज्य, भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा'। अनुच्छेद 44, संविधान के भाग चार का हिस्सा है, जो राज्य के नीति निदेशक तत्वों के बारे में है। भाग चार के प्रावधान केवल पथप्रदर्शक सिद्धांत हैं और उन्हें अदालतों द्वारा लागू नहीं किया सकता। उच्चतम न्यायालय, भाग चार के अन्य प्रावधानों को नजरअंदाज कर रहा है, जिनमें यह शामिल है कि 'राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था की, जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय राज्य की सभी संस्थाओं को अनुप्रमाणित करे, भरसक प्रभावी रूप में स्थापना और संरक्षण करेगाय कि 'राज्य आय की असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा य कि राज्य अपनी नीति का इस प्रकार संचालन करेगा कि जिससे समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बंटा हो, जिससे सामूहिक हित का सर्वोत्तम रूप से साधन हो' इत्यादि। ये पथप्रदर्शक सिद्धांत आज और अधिक महत्वपूर्ण बन गए हैं क्योंकि वर्तमान सरकार इनकी उपेक्षा कर रही है। हम केवल यह आशा कर सकते हैं कि उच्चतम न्यायालय, सरकार को शपथपत्र प्रस्तुत कर यह बताने को कहेगी कि वह ऐसे कौनसे कानून या नीतियां बनाएगी जिनसे भाग चार के न्याय व समानता से सम्बंधित उपबंध लागू हो सकें।
उच्चतम न्यायालय सदियों पुरानी परम्पराओं और मान्यताओं को एक झटके में खत्म कर देना चाहता है। 'द मुस्लिम पर्सनल लॉ ;शरियत; एप्लीकेशन एक्टए 1937' के लागू होने से पहलेए भारत के मुसलमानों पर अलग.अलग पारंपरिक व धार्मिक कानून लागू होते थे। सल्तनत काल से ही, शरिया कानून केवल अभिजात मुसलमानों पर लागू होते थे। कारीगर जातियों से धर्मपरिवर्तित कर मुसलमान बनने वाले उनके पारंपरिक कानूनों का ही पालन करते थे। इनमें शामिल हैं राजस्थान के मेव, गुजरात के प्रनाम व पीर पंथी, मध्यप्रदेश के सतपंथी व गुजरात के खोजा, बोहरा व कच्छी मेमन आदि। सल्तनत के संस्थापक अलाउद्दीन खिलजी द्वारा शरिया में किये गए परिवर्तनों से बियाना के काजी मुगीस.उद.दीन नाराज थे। खिलजी ने उनसे कहा, 'मैं तो अज्ञानी आदमी हूँ और मैं इस देश के अधिकतम हित के लिए इस पर शासन कर रहा हूँ। मुझे विश्वास है कि मेरी अज्ञानता और सच्चे इरादों के मद्देनजर, अगर मैं शरिया का उल्लंघन भी करूंगा, तो अल्लाह मुझे माफ कर देगा।'
जटिल पारंपरिक प्रथाओं को समझना भारत के औपनिवेशिक शासकों के लिए आसान नहीं था और इसलिए उन्होंने धार्मिक ग्रंथों का सहारा लेना बेहतर समझा। 'मनुस्मृति' का 1776 में अनुवाद किया गया। हेस्टिंग्स के निर्देशन मेंए चार्ल्स हेमिल्टन ने 1791 में 'हिदाया' का अरबी से अंग्रेजी में अनुवाद शुरू किया परन्तु इस काम को अधूरा ही छोड़ दिया गया। सन 1857 के विद्रोह के बाद, इंग्लैंड के शासक ने घोषणा की कि उसके अधीन सभी अधिकारी............हमारी प्रजा के धार्मिक विश्वासों और आराधना पद्धति में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेगी । अतःए यद्यपि औपनिवेशिक सरकार ने दंड संहिताए टैक्स व व्यापार.व्यवसाय से सम्बंधित कानूनों का एकीकरण किया तथापि उसने परिवार व उत्तराधिकार सम्बन्धी कानूनों से छेड़.छाड़ नहीं की,जब तक कि राजनैतिक कारणों से ऐसा करना उसे आवश्यक नहीं लगा।
राष्ट्रवादी आन्दोलन में शामिल कई महिला नेताओं ने यह मांग उठाई कि विवाह, तलाक व उत्तराधिकार के सम्बन्ध में विस्तृत कानून बनाए जाएं। ऑल इंडिया विमेंस कांफ्रेंस की कमलादेवी चट्टोपाध्याय, सरोजिनी नायडूए मुथुलक्ष्मी रेड्डी व बेगम शाह नवाज़ ने सम्मलेन के 1933 में आयोजित अधिवेशन में समान नागरिक संहिता की मांग की थी।
समान नागरिक संहिता पर संविधानसभा में बहस
इस पृष्ठभूमि मेंए संविधान के मसविदे के अनुच्छेद 35 ;जो अब संविधान का अनुच्छेद 41 है; पर संविधानसभा में बहस हुई। मुहम्मद इस्माइल साहेब व नजीरुद्दीन अहमद चाहते थे कि अनुच्छेद 35 में इस तरह का संशोधन किया जाये जिससे किसी भी समुदाय को उसके पर्सनल लॉ को त्यागने पर मजबूर न किया जा सके।
उनका तर्क यह था कि हर समुदाय का पर्सनल लॉ, अपने धर्म का पालन करने की उसकी आज़ादी का भाग है। नागरिकों को केवल इस आधार पर उनके पर्सनल लॉ को छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए कि इससे देश में सद्भाव या एकता बढ़ेगी। अहमद का तर्क था कि अनुच्छेद 35, संविधान के मसविदे के अनुच्छेद 19 ;अब अनुच्छेद 25, जो सभी नागरिकों को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है, से असंगत है। अहमद का कहना था कि धार्मिक मसलों में राज्य का हस्तक्षेप आहिस्ता.आहिस्ता होना चाहिए। हिन्दू भी समान नागरिक संहिता के खिलाफ थे। यूसीसी के एक ज़बरदस्त समर्थक केएम मुंशी ने कहा, 'मैं जानता हूँ कि कई हिन्दू भी यूसीसी के विरोध में है........उन्हें लगता है कि उत्तराधिकार व विवाह आदि से सम्बंधित व्यक्तिगत कानून, उनके धर्म का हिस्सा हैं। अगर ऐसा है तो हम कई काम कभी नहीं कर पायेंगे, जैसे महिलाओं को बराबरी का दर्जा देना'। मुंशी, लैंगिक समानता और राष्ट्रीय एकता के लिए यूसीसी के पक्षधर थे।
डॉ. अम्बेडकर ने कहाए 'यह ;अनुच्छेद 35:कहीं नहीं कहता कि कोड तैयार होने के बादए राज्य उसे सभी नागरिकों पर लागू करेगा।'भविष्य की संसदए अम्बेडकर ने कहा, ऐसा परिवार कानून बना सकती है जो उन नागरिकों पर लागू होंए जो स्वेच्छा से ऐसा चाहें। विशेष विवाह अधिनियम 1954 ऐसा ही एक कानून है। अनुच्छेद 35 को संविधानसभा द्वारा बिना किसी संशोधन के पारित कर दिया गया। उसमें यह प्रावधान नहीं किया गया कि नागरिकों को उनके पर्सनल लॉ त्यागने पर मजबूर नहीं किया जा सकेगा।
भाजपा और यूसीसी
जहाँ संविधान के मसविदे में अनुच्छेद 35 को शामिल करने का उद्देश्य,परिवार कानूनों को धर्म से विलग करना और लैंगिक न्याय हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ना था, वहीं हिन्दू राष्ट्रवादी, यूसीसी की मांग इसलिए करते हैं ताकि वे अल्पसंख्यकों के मन में यह डर बिठा सकें कि बहुसंख्यकों का वर्चस्व स्थापित होने को है। इसका नतीजा यह होता है कि अल्पसंख्यक, यूसीसी का विरोध करने लगते हैं और फिर इस विरोध का इस्तेमालए यह बताने के लिए किया जाता है कि अल्पसंख्यकों की मूल मानसिकता ही अलगाववादी है। भाजपा कहती आ रही है कि यूसीसीए से राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा मिलेगा। केंद्रीय कानून मंत्री डीवी सदानंद गौड़ा का कहना है कि राष्ट्रीय एकता के लिए यूसीसी आवश्यक है।
परन्तु यहाँ सवाल यह है कि इस देश में परम्पराओं और प्रथाओं की विभिन्नताओं को देखते हुए, समान नागरिक संहिता तैयार करने के लिए विभिन्न धार्मिक समुदायों के साथ कितनी कठिन वार्ताएं करनी होंगी, ये वार्ताएं कितनी लंबी चलेंगी और क्या इनसे कोई सार्थक नतीजा निकलेगा? फिर, क्या यूसीसी हमारी विभिन्नता को संरक्षित रख सकेगी? क्या हमारी विविधवर्णी परम्पराएं, उस यूसीसी का आधार होंगी?
धार्मिक विविधता
द्रविड़ दक्षिण भारत में भी कई अलग.अलग परम्पराएं हैं जो कि संपत्ति में उत्तराधिकार के मामले में, उत्तर भारत की तुलना में लैंगिक दृष्टि से अधिक न्यायपूर्ण हैं। मद्रास प्रेसिडेंसी में यह प्रथा थी कि लड़कियों को उनके विवाह के समय ज़मीन का एक टुकड़ा दिया जाता था, जिससे होने वाली आय केवल उनके इस्तेमाल के लिए होती थी और वह ज़मीन बाद में उनकी महिला उत्तराधिकारियों को मिलती थी। अगर पति का लंबे समय तक पता न चले तो महिलाओं को पुनर्विवाह करने का अधिकार था और अगर पहला पति बाद में लौट आएए तो महिलाएं ही यह तय करती थीं कि वे दोनों में से किसके साथ रहेंगी। नायर, नम्बूदरी और मलाबार मुसलमानों में मातृवंशीय परंपराएं थीं। लक्षद्वीप, जहां के 99 प्रतिशत रहवासी मुसलमान हैं, में मरूमाकाथ्यम नामक मातृवंशीय व्यवस्था का पालन किया जाता है। केरल के मुसलमानों की भी अपनी मरूमूकाथ्यम प्रथा है।
केरल में मिताक्षरा संयुक्त परिवार व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया है। केरल ने मातृवंशीय मलाबार संयुक्त परिवार व्यवस्था को भी समाप्त कर दिया है यद्यपि कर्नाटक, तमिलनाडु और आन्ध्रप्रदेश में यह अब भी जारी है।
गोवा में अब भी पुर्तगाली सिविल लॉ लागू है। पुडुचेरी के हिंदू, ईसाई और मुसलमान दो भागों में विभाजित हैं.रेनोनकेंट व अन्य। रेनोनकेंटो पर अब भी फ्रांसीसी नागरिक संहिता लागू होती है और अन्यों पर भारतीय कानून। 
जम्मू कश्मीर विधानसभा ने हिंदू विवाह अधिनियम 1955 का पुनः अधिनियमन किया। जम्मू कश्मीर का अपना हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम है, जिसे बौद्ध उत्तराधिकार अधिनियम 1943 को रद्द किए बिना लागू किया गया है। हाल तक कश्मीर में मुस्लिम कानूनों के होते हुए भी उत्तराधिकार के मामले में स्थानीय परंपराओं का ही पालन होता था। मुस्लिम पर्सनल लॉ ;शरियत; एप्लीकेशन एक्टए 1973, जम्मू कश्मीर में अभी हाल में ही लागू किया गया।
मेघालय, मिजोरम,नागालैंड व सिक्किम में पारंपरिक आदिवासी कानूनों को विधायिका ने मान्यता दी है।  ईसाई धर्म अपनाने के बाद भी खासी, जयंतिया और गारो जनजातियां मातृवंशीय उत्तराधिकार की व्यवस्था का पालन करती हैं।
धार्मिक समुदायों, जातियों व अनुसूचित जनजातियों में विविधता
भारत के तीन दक्षिणी राज्योंए तमिलनाडुए आंध्रप्रदेश व केरल में हिंदू परिवार कानूनों में व्यापक संशोधन किए गए हैं। वहां शरियत अधिनियमए खेती योग्य ज़मीन पर लागू नहीं होता। इन तीन दक्षिणी राज्यों में शरियत अधिनियम सन 1963 में लागू किया गया।
पूरे देश के ईसाई आदिवासियों को भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम से बाहर रखा गया है। चार अन्य हिंदू कानून भी अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होते। विशिष्ट हिंदू, बौद्धए जैन व सिक्ख प्रथाएं, जो सामान्य कानूनों के विरूद्ध हैं, को विधि का संरक्षण प्राप्त है।
मुसलमानों के मामले में वसीयत, उत्तराधिकार व गोद लेने संबंधी प्रथाओं को शरियत अधिनियम के तहत भी मान्यता दी गई है। सुन्नी, बोहरा और खोजाओं पर हिंदू प्रथाएं और प्रचलन लागू होते हैं।
यह संदेह करने के पर्याप्त कारण हैं कि यूसीसी इस समृद्ध विविधता के लिए खतरा बन जाएगी।
मुस्लिम पर्सनल लॉ में भी विविधताएं हैं, जैसा कि ऊपर दिए गए विवरण से स्पष्ट है। यही कारण है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, पर्सनल लॉ को संहिताबद्ध करने से हिचकिचा रहा है। और ऐसी आशंका है कि यदि संहिताबद्ध करने का काम किया गया तो वहाबी.हनाफी समूह इस प्रक्रिया पर हावी हो जाएंगे इसलिए नहीं क्योंकि यह समुदाय के हित में होगा बल्कि इसलिए क्योंकि वे बेहतर ढंग से संगठित हैं और प्रक्रिया को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
हमें समान नागरिक संहिता की आवश्यकता नहीं है। डॉ. अंबेडकर ने संविधानसभा में कहा था अनिच्छुक नागरिकों पर यूसीसी नहीं लादी जानी चाहिए। हमें लैंगिक न्याय करने वाले परिवार कानूनों की आवश्यकता है परंतु इनका आधार हमारी विविध परंपराएं होनी चाहिए और इनमें विविधिता के लिए जगह होनी चाहिए। केवल और केवल लैंगिक समानता के लक्ष्य को सामने रखकर वर्तमान परिवार कानूनों में शनै: शनै: सुधार लाने की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए। 
-इरफान इंजीनियर

1 टिप्पणी:

Prabhakar ने कहा…

ठीक है कि विविधता के लिए जगह होनी चाहिए. लेकिन अगर कानून कुछ मूलभूत बातों पर सामान नहीं होंगे तो जो आप चाहते हैं वह भी शायद मुश्किल होगा.