रविवार, 22 सितंबर 2013

मुजफ्फरनगर दंगे और उनके बाद


 देश में साल दर साल साम्प्रदायिक दंगें हो रहे हैं। इसके बाद भी, यूपीए सरकार ने साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक को ठंडे बस्ते में डाला हुआ है। आखिर कितनी जिंदगियां तबाह होने के बाद यूपीए सरकार को यह अहसास होगा कि विशेष परिस्थितियों से निपटने के लिए विशेष कानूनों की आवश्यकता होती है? सन 1950 से लेकर अब तक देश में हिन्दू.मुस्लिम दंगों में 40 हजार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं परन्तु सड़कों पर आगजनी और खून.खराबा करने वालों में से भी बहुत कम को उनके किए की सजा मिल सकी है। जहां तक दंगों का षड़यंत्र रचने वालों, दंगे भड़काने वालों और हिंसक भीड़ को पर्दे के पीछे से नियंत्रित करने वालों का प्रश्न हैए उनका तो बाल तक बांका नहीं हुआ है। उल्टे, उनमें से अनेक राजनीति की सीढ़ियाँ चढ़कर मंत्री और मुख्यमंत्री बन गए हैं। उनमें से एक भी सीखचों के पीछे नहीं है। जब बम विस्फोटों के कारण सभी भारतीयों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है तब राज्य तुरंत टाडा, पोटा व यूएपीए जैसे विशेष कानून लागू कर देता है। सुरक्षाबलों को सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम व उपद्रवग्रस्त क्षेत्र अधिनियम जैसे कानूनों की आड़ मेंए अल्पसंख्यक समुदाय के निर्दोष सदस्यों को निशाना बनाने की खुली छूट दे दी जाती है। जब महिलाओं के विरूद्ध सेक्स.संबंधी अपराध बढ़ते हैं तो राज्य तुरंत एक विशेष अध्यादेश जारी कर देता है ;और यह बिल्कुल ठीक कदम है, जिसे यदि ठीक ढंग से लागू किया जाए,तो दोषियों को सजा मिलना सुनिश्चित हो सकेगा। परन्तु जब अल्पसंख्यकों की सुरक्षा खतरे में होती है तो उन्हें यह सलाह दी जाती है कि वे अपना व्यवहार सुधारें और राष्ट्रीय एकीकरण व शांति की खातिर अपने साथ हुए अन्याय को भुला दें। दंगा पीडि़तों को उचित और पर्याप्त राहत नहीं मिलती। उनको हुए नुकसान का उन्हें नाममात्र का मुआवजा मिलता है और दंगों की तिजारत करने वालों को सजा दिलवाने के कोई प्रयास नहीं किए जाते। नतीजे में दंगा व्यवसायियों का मनोबल बढ़ता है व वे और बड़े, और भयावह दंगों की योजनाएं बनाकर, उन्हें अंजाम देने में जुट जाते हैं। दंगों के व्यवसायियों की ताकत इतनी बढ़ चुकी है कि वे सत्ता में रहें या न रहेंए वे बहुत कम समय में जानोमाल का भारी नुकसान करने में सक्षम हो गए हैं।
पिछले साल ;2012 देश में असम के बोडो इलाके में बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक हिंसा हुई। उत्तरप्रदेश में नौ दंगे हुए . कोसीकला, प्रतापगढ़, सीतापुर, बरेली व बिजनौर में और फैजाबाद व गाजियाबाद में दो.दो बार । महाराष्ट्र में पछोरा, बुलढ़ाना, रावेर ;जलगांवद्ध व आकोट में दंगे हुए। आंध्रप्रदेश में संगारेड्डी और हैदराबाद में साम्प्रदायिक हिंसा हुई। गुजरात में बड़ौदा और दामनगर ;अमरेली में दंगे हुए।
इस साल भी दंगों में कोई कमी नहीं आई। धुले ;महाराष्ट्र, नवादा ;बिहार, किश्तवार ;जम्मू एवं कश्मीर व उत्तरप्रदेश के कई शहरों में दंगे हो चुके हैं। जैसे.जैसे आमचुनाव नजदीक आ रहे हैंए  दंगों की संख्या और उनकी तीव्रता,दोनों में वृद्धि हो रही है। इस साल किश्तवार व मुजफ्फरनगर के दंगों ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया। ऐसा लगता है कि हर चुनाव के पहले अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ सदस्यों को अपनी जान की कुर्बानी देना आवश्यक है ताकि साम्प्रदायिक दलों की सीटों में इजाफा हो सके। एक ओर नरेन्द्र मोदी यह ढोंग कर रहे हैं कि उनका चुनाव अभियान केवल विकास से जुड़े मुददों और सुशासन पर केन्द्रित हैए वहीं संघ परिवार के विहिप सहित सभी सदस्य, मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने के नए.नए उपाय खोज रहे हैं। उनका लक्ष्य है विविधवर्णी हिन्दू समुदाय को राजनैतिक रूप से एक कर उसे वोट बैंक में परिवर्तित करना। विहिप द्वारा शुरू की गई 84 कोसी परिक्रमा का यही उद्देश्य था। इस तरह की परिक्रमा की कोई धार्मिक परम्परा न होने के बावजूद, विहिप ने इस कार्यक्रम का आयोजन किया। संघ परिवार, साम्प्रदायिक हिंसा का उपयोग अपने जनाधार को विस्तार और अपने संगठन को मजबूती देने के लिए करता रहा है। और यह उसकी नीति है।
मुजफ्फरनगर दंगे
दिनांक 17 सितम्बर 2013 के द टाईम्स ऑफ इण्डियाके अनुसार, 27 अगस्त को मुजफ्फरनगर के कवांल गांव में शाहनवाज की मोटरसाईकिल और गौरव की साईकिल में भिडंत हो गई। इसके बाद, दोनों के बीच हुए विवाद के दौरान शाहनवाज ने गौरव को एक थप्पड़ मार दिया। गौरव के साथी जल्दी ही वहां इकट्ठा हो गए और उन्होंने शाहनवाज की हत्या कर दी। वहां उपस्थित लोगों ने गौरव और उसके एक साथी सचिन को पकड़ लिया और पीट.पीट कर मार डाला। इसके बाद, किसी अन्य घटना का एक फर्जी वीडियो, जो पुलिस के अनुसार दो साल पुराना है, को सोशल नेटवर्किंग साइटों और मोबाइल फोनों के जरिए बड़े पैमाने पर प्रसारित किया गया। यह कहा गया कि यह वीडियो भीड़ द्वारा सचिन और गौरव को पीट.पीट कर मार डालने की घटना का है। इस नकली वीडियो, जिसे कथित रूप से भाजपा विधायकों द्वारा जारी किया गया था,से इलाके में अल्पसंख्यकों के विरूद्ध घृणा का वातावरण पैदा हो गया और दूसरे समुदाय के लोग बदला लेने पर उतारू हो गए। दिलचस्प यह है कि इस घटना पर जाट समुदाय ने पहले प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। भाजपा के पारंपरिक समर्थक सैनियो ने गौरव और सचिन की हत्या का बदला लेने के लिए जाटों को उकसाया। एक बसपा नेता और कुछ अन्य राजनेताओं ने, 30 अगस्त को, मुसलमानों की बैठक आयोजित कीए जिसमें खून का बदला खून से लेने का निर्णय लिया गया। चार भाजपा विधायकों ने जाट महापंचायत का आयोजन किया। प्रतिबंधात्मक धाराएं लागू होने के बावजूद, महापंचायत में बंदूकों, तलवारों व अन्य घातक हथियारों से लैस हजारों जाटों ने भाग लिया। किसी भी प्रकार की सभा के आयोजन पर प्रतिबंध के बावजूद, बड़ी संख्या में हथियारबंद जाटों को इकट्ठा होने क्यों दिया गया, इसका जवाब पुलिस ही दे सकती है। कुल तीन महापंचायतें हुईं और उनमें निहायत भड़काऊ भाषण दिए गए। ऐसा आरोपित है कि जाट महापंचायतों में लगाए गए नारों में से एक था मुसलमान के दो ही स्थान, पाकिस्तान या कब्रिस्तान। इसके बाद जो कुछ हुआ, वह सबके सामने है। दर्जनों मकानों में आग लगा दी गई,  40,000 लोगों को अपने घर.बार छोड़कर राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी और उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय में दाखिल एक शपथपत्र के अनुसारए 43 लोग मारे गए। दिनांक 15 सितम्बर के द टाइम्स आफ इंडिया  ने दंगों में मारे गए 53 लोगो की लाशों का पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों के हवाले से लिखा कि जिस वहशियाना तरीके से ये हत्याएं की गयीं थींए उसे देखकर डाक्टर भी कांप उठे। कई मामलों में महिलाओं के गुप्तांग कटे.फटे पाए गए। पुलिस, हमेशा की तरह,हिंसा की मूकदर्शक बनी रही। पुलिस और प्रशासन ने जाट महापंचायतों का आयोजन होने देकर और उनमें हुई उत्तेजक भाषणबाजी को न रूकवाकर, आपराधिक लापरवाही बरती है। मोटरसाईकिल और साईकिल की भिड़ंत की एक मामूली सी घटना को लेकर हुई तीन हत्याओं का इस्तेमाल भाजपा नेताओं ने साम्प्रदायिक जुनून पैदा करने के लिए किया। उनका उद्देश्य चुनाव में लाभ उठाना था। सत्ताधारी समाजवादी पार्टी ने भी चुनाव में फायदा होने की उम्मीद में हिंसा को रोकने की कोशिश नहीं की।
मुददे और चिंताएं
दंगाई हमेशा इस सिद्धांत पर काम करते हैं कि दूसरे समुदाय के किसी एक या कुछ सदस्यों की गलत हरकत के लिए वह पूरा समुदाय जिम्मेदार है। जाहिर है कि किसी एक की गलती की सजा किसी दूसरे को देना, बर्बर और आदिम सोच का प्रतीक है। किसी भी पूरे समुदाय को अनैतिक नहीं बताया जा सकता क्योंकि क्या सही है और क्या गलत, इसका निर्णय व्यक्ति विशेष करते हैं न कि पूरा समुदाय। इसी सिद्धांत के अन्तर्गत, सैंकड़ों वर्ष पहले किसी मुस्लिम राजा द्वारा हिन्दू मंदिरों को ढहाने के लिए आज के मुसलमानों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। साफ है कि आज के मुसलमानों का उस राजा और उसके कर्मों से कोई लेनादेना नहीं है। साम्प्रदायिक दंगों के दौरान दूसरे समुदाय को सामूहिक सजा दी जाती है ताकि दोनों समुदायों के बीच घृणा,भय और संदेह का वातावरण उत्पन्न हो और समाजए साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत हो जाए। आखिर कब साम्प्रदायिक ताकतें अपनी इस आदिम प्रवृत्ति पर नियंत्रण स्थापित करेंगी?
सामूहिक दण्ड, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद व एकाधिकारवादी राज्य
साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा सामूहिक दण्ड इसलिए दिया जाता है ताकि नागरिकों की बहुविध पहचानों को मिटाया जा सके। यही पहचानें हर व्यक्ति को दूसरे से अलग बनाती हैं। उदाहरणार्थ, इन पंक्तियों का लेखक एक गुजराती अशरफ मुसलमान हैए जिसका जन्म महाराष्ट्र में हुआ और जो इसी राज्य का निवासी है। वह भारतीय है, पुरूष है, वकील है, पुस्तक प्रेमी है और उदारवादी वामपंथी विचारधारा में विश्वास रखता है। कोई भी व्यक्ति अपने आसपास की दुनिया को अपनी इन्हीं विविध पहचानों के चश्मे से देखता.समझता है।  कब.जब कुछ व्यक्ति इनमें से कुछ जन्मजात या अर्जित पहचानों से ऊपर भी उठ जाते हैं। हर व्यक्ति की कई पहचानें होती हैंए यही नागरिकता की अवधारणा का आधार है। नागरिकों को वे स्वतंत्रताएं और अधिकार दिए जाते हैं जो उन्हें अपनी इन बहुविध पहचानों के साथ जीवन बिताने का हक दें और जब तक वे किसी कानून का उल्लंघन न करें, तब तक उनकी किसी भी पहचान या विचार के कारण उनके साथ भेदभाव न किया जाए। साम्प्रदायिक ताकतों की कोशिश रहती है कि वे किसी व्यक्ति की जन्मजात पहचान को सबसे महत्वपूर्ण बना दें और उसकी अन्य पहचानों को हाशिए पर खिसका दें। उदाहरणार्थ, अगर मुसलमानों को केवल उनके मुसलमान होने के कारण निशाना बनाया जाता है तो इस लेखक की अन्य सभी पहचानें ;जैसे गुजराती, महाराष्ट्र का निवासी, पुरूषए पुस्तक प्रेमी, वकील, अशरफ आदि गौण हो जाती हैं और महत्व सिर्फ इस एक तथ्य का रह जाता है कि वह मुसलमान है।
मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाकर, साम्प्रदायिक ताकतें हिन्दुओं के लिए उनकी धार्मिक पहचान को सबसे महत्वपूर्ण बनाना चाहती हैं और उनकी अन्य पहचानों, जैसे उनकी जातिए रहवास का क्षेत्र, नस्ल, लिंग, व्यवसायए आर्थिक स्तर व उनके शौक आदि को हाशिए पर पटकना चाहती हैं। इस प्रक्रिया में धार्मिक हिन्दू को राजनैतिक हिन्दू में बदल दिया जाता है, जो एक ऐसे एकाधिकारवादी सांस्कृतिक राज्य का निर्माण करना चाहता है जिसमें किसी एक धर्म को प्रमुखता दी जाएगी और अन्य धर्मों का दमन किया जाएगा। यही कारण है कि दंगाग्रस्त क्षेत्र के जाट और मुसलमानए जो एक ही भाषा बोलते हैंए एक.से कपड़े पहनते हैंए जिनकी अनेक परंपराएं समान हैं और जो एक.से नैतिक मूल्यों में विश्वास करते हैंए आज एक दूसरे से डरने लगे हैं। मुजफ्फरनगर के दंगों ने जाट मुसलमान और जाट हिन्दू नामक दो समुदायों का निर्माण कर दिया है जो अपनी समान परंपराओं और संस्कृति को भूलकर, एक दूसरे के शत्रु बन बैठे हैं। जाट मुसलमानों को अब और ज्यादा मुसलमान बनना होगा और उस क्षेत्र के रहवासी सैय्यदों और पठानों से नजदीकियां बढ़ानी होंगी और जाट हिन्दुओं को घृणा की दृष्टि से देखना होगा। उसी तरहए जाट हिन्दुओं को सैनियों और हिन्दू उच्च जातियों से जुड़ना होगा। इस प्रक्रिया से केवल दोनों पक्षों की साम्प्रदायिक ताकतों को फायदा होगा . एक ओर आरएसएस व भाजपा सहित संघ परिवार और दूसरी ओर मजलिसें, जमायतें और मुश्वीरातें। इनमें से पहले हिन्दू वोटों के मालिक बन जाएंगे और दूसरे मुसलमान वोटों के।
साम्प्रदायिकता का ग्रामीण क्षेत्रों में फैलाव
भागलपुर, नैल्ली, गुजरात और असम के बोडो इलाके में हुए दंगों में ग्रामीण क्षेत्रों में साम्प्रदायिक हिंसा हुई थी परंतु यह मूलत शहरी क्षेत्रों में हिंसा का आसपास के गांवों में विस्तार भर था। परंतु मुजफ्फरनगरए शामली और मेरठ में हिंसा मुख्यत ग्रामीण क्षेत्रों में हुई। मुजफ्फरनगर दंगों में घर से बेघर हुए लोगों की संख्या, उत्तरप्रदेश में अब तक हुए किसी भी दंगे से कहीं ज्यादा है। भयग्रस्त विस्थापितों का कहना है कि वे अब कभी अपने गांवों में वापिस नहीं जा पाएंगे। यह एक अत्यंत खतरनाक व चिंताजनक घटनाक्रम है।
महिलाओं का शरीर, साम्प्रदायिक हिंसा के खिलाडि़यों की रणभूमि बन चुका है। जाट महापंचायतों ने महिलाओं के बारे में प्रतिगामी सोच को और मजबूत किया है। जाट.बहुल क्षेत्रों में महिलाओं पर पहले से ही कई तालिबानी प्रतिबंध लागू हैं। वे मोबाईल फोन नहीं रख सकतीं, अपनी इच्छानुसार कपड़े नहीं पहन सकतीं व उन्हें पुरूषों से मित्रता रखने की इजाजत नहीं है। वे कहां जा सकती हैं और कहां नहीं, वे किस समय घर से निकल सकती हैं और कब नहीं, इसका निर्धारण भी परिवार के पुरूष करते हैं। इस क्षेत्र में लिंगानुपात पहले से ही बहुत कम है और व्यावहारिक दृष्टि से महिलाएं संपत्ति के उत्तराधिकार से वंचित हैं। इन दंगों से महिलाओं की कठिनाइयां और बढ़ेंगी। ऐसी खबरें लगातार आ रही हैं कि महिलाओं, विशेषकर मुस्लिम लड़कियों, की पढ़ाई बंद करवाई जा रही है क्योंकि उनके परिवारजनों को लगता है कि साम्प्रदायिक घृणा से लबरेज वातावरण में घर से बाहर वे सुरक्षित नहीं रह सकेंगी।
इस दंगे से जातिगत आधार पर वोट देने की प्रवृति पर क्या असर पड़ेगा और विभिन्न जातियों के हिन्दू मतदाता एक होंगे या नहींए यह भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से मोदी के चुनाव प्रचारकों को लाभ होगा। वातावरण में घुल चुके साम्प्रदायिकता के जहर के कारण लोगों के भावनाओं में बह जाने और मोदी के प्रचार मैनेजरों के अतिश्योक्तिपूर्ण और झूठे दावों पर विश्वास करने की संभावना बढ़ जाएगी। मोदी की प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए यह आवश्यक है कि इस बार उत्तरप्रदेश में भाजपा का प्रदर्शनए पिछले चुनाव से बेहतर हो। मुजरफ्फरनगर दंगों से सबसे ज्यादा लाभ भाजपा को हुआ है और जाटों के बीच उसकी लोकप्रियता में जबरदस्त उछाल आया है। भाजपा, उत्तरप्रदेश के सत्ताधारी दल समाजवादी पार्टी पर लगातार प्रहार कर रही है। उसे आशा है कि वह बीएसपी की जगह राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी बन जाएगी। यद्दपि ऐसा होने की संभावना बहुत कम है।
धर्मनिरपेक्ष और प्रजातांत्रिक शक्तियों की मुख्य चिंता यह है कि पीड़ितों के राहत शिविरों में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हों, जिन लोगों ने दंगों में नुकसान उठाया है उन्हें पर्याप्त मुआवजा मिले व उनका पुनर्वास हो। क्षेत्र में दोनों समुदायों के संबंध फिर से मधुर बनाने और न्याय के साथ शान्ति की स्थापना की आवश्यकता भी है। साम्प्रदायिक ताकतों के शैतानी इरादों से आमजनों को परिचित करवाना, इन शक्तियों की प्राथमिकता होनी चाहिए। सभी धर्मों के व्यक्तियों को स्वतंत्रताए समानता और सामाजिक न्याय का अधिकार है व ये अधिकार उन्हें मिलने चाहिएए इस भावना के लिए देश के प्रत्येक नागरिक के मन में जगह बनानी होगी। जहां तक न्याय का प्रश्न है, उसके लिए आवश्यक है कि साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक कानून को जल्द से जल्द लागू करने के सघन प्रयास किए जाएं।
.-इरफान इंजीनियर

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