मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

मानवाधिकार हनन की बढ़ती घटनाएँ और हमारा तन्त्र-1



       राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले एक साल में पुलिस एवं न्यायिक हिरासत में कुल 1574 मौतें हुई हैं। आयोग ने इसका राज्यवार ब्योरा भी दिया है जिसमें उत्तर प्रदेश पहले नम्बर पर है। यहाँ इस तरह से होने वाली मौतों की कुल संख्या 216 है। मानवाधिकार हनन की घटनाओं पर नजर रखने वाले संगठन पीपुल्स ग्रुप आन ह्यूमन राइटस का दावा है कि
                                                मानवाधिकार आयोग ने जो आँकड़े अपनी रिपोर्ट में दिए हैं वे वास्तविकता से बहुत कम हैं। हकीकत तो यह है कि आँकड़ा आयोग की रिपोर्ट के दोगुने से भी ज्यादा है। ग्रुप का मानना है कि अक्सर पुलिस हिरासत में होने वाली मृत्यु की रिपोर्ट ही दर्ज नहीं की जाती जिसके कारण आधिकारिक तौर पर बहुत से मामले सामने नहीं आ पाते और न ही आयोग जैसी संस्था की रिपोर्ट का हिस्सा बन पाते हैं। पुलिस इस तरह के मामलों को भी आत्महत्या का रूप देने का प्रयास करती है तो कभी अपनी मर्जी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट प्राप्त कर कोई अन्य कारण बताने की कोशिश करती है। इन आँकड़ों में पहले से गैरकानूनी तौर पर पुलिस हिरासत में रखकर फर्जी मुठभेड़ों में की गई हत्याओं का लेखा जोखा भी शामिल नहीं है। जबकि पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों की तरह ही अपवाद स्वरूप फर्जी मुठभेड़ों में होने वाली हत्याओं के कुछ मामले ही सामने आ पाते हैं। विगत वर्षों में होने वाली जिन फर्जी मुठभेड़ों के खुलासे हुए हैं उनसे पता चलता है कि आम तौर पर ऐसे मामलों में उच्च पुलिस अधिकारी या तो स्वयं शामिल रहे हैं या फिर इनकाउन्टर टीम को उनका आशीर्वाद प्राप्त रहा है। मारे गए व्यक्ति की यदि कोई आपराधिक पृष्ठभूमि रही है तो ऐसी मुठभेड़ों को आसानी से वैधता प्राप्त हो जाती है। अगर मृतक को माओवादी या आतंकवादी घोषित कर दिया जाए तो फर्जी मुठभेड़ के खिलाफ आवाज बुलन्द करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को भी इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। यदि इन सब को एक साथ जमा कर दिया जाए तो एक ऐसी भयावह और क्रूर तस्वीर उभर कर सामने आती है जिसकी किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कल्पना भी नहीं की जा सकती। वह पुलिस तंत्र जिस पर कानून व्यवस्था बनाए रखने तथा आम जन की सुरक्षा की जिम्मेदारी है वह स्वंय इतने बड़े पैमाने पर अपने ही नागरिकों को जीवन के अधिकार से वंचित कर देता है।
    जनपद आज़मगढ़ में पुलिस हिरासत में होने वाली दो अलग-अलग मौतों के मामलों मे मैंने पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज़ के अपने साथियों विनोद यादव तथा तारिक शफीक के साथ मिलकर तथ्य संकलन का काम किया। उस अनुभव के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि वकर्स ग्रुप आन ह्यूमन राइट्स का दावा निराधार नहीं है। पहला मामला ग्राम तमौली निवासी सुरेश यादव पुत्र मुन्नर यादव का है जिन्हें थाना रानी की सराय की पुलिस सुबह उनके घर से बगैर कोई कारण बताए गिरफ्तार कर थाने लाई। जब शाम तक उसकी रिहाई नहीं हुई तो परिजनों के पूछने पर थानाध्यक्ष ने बताया कि किसी अन्य थाना की पुलिस उससे पूछताछ करने वाली है और यह कि उसके बाद उसे छोड़ दिया जाएगा। सुरेश शाम तक बिल्कुल ठीक था। सुबह जब उसके पिता थाने पर पहुँचे तो उन्हें बताया गया कि सुरेश की तबीयत खराब हो गई थी उसे उपचार के लिए स्थानीय बाज़ार में चिकित्सक के पास ले जाया गया है। जब उसके पिता वहाँ पहुँचे तो देखते हैं कि सुरेश के शरीर पर कई जगहों पर चोट के निशान थे। पीठ की खाल जगह-जगह उधड़ी हुई थी। वह ठीक से बात भी नहीं कर पा रहा था। उसकी इस हालत को देख पुलिस वाले पहले ही खिसक चुके थे। परिजन उसे जिला अस्पताल ले गए जहाँ उसकी मृत्यु हो गई। सुरेश की मौत की खबर फैलते ही जनता में आक्रोश पैदा हो गया। दोषी पुलिस कर्मियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा कायम करने की माँग शुरू हो गई। उच्च पुलिस अधिकारियों द्वारा हीला हवाली करने पर आक्रोशित जनता ने चक्का जाम कर दिया। इस तरह भारी दबाव और पी0यू0सी0एल0 नेताओं के हस्तक्षेप के बाद ही हत्या की रिपोर्ट दर्ज की गई। 2005 में सुरेश के भाई सुभाष यादव की सिधारी थाना के पास पानी से भरे गड्ढे में डूब जाने के कारण संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। पुलिस ने उसे दुर्घटना बताया था। परन्तु परिजनों का आरोप था कि पानी में डूबने से पहले पुलिस ने सुभाष की पिटाई की थी और उसे पानी में कूदने के लिए मजबूर किया था। इस घटना की रिपोर्ट भी दर्ज नहीं की गई थी। एक अन्य मामले में ग्राम बढ़या निवासी कमलेश सिंह पुत्र राम मिलन सिंह को 13 अप्रैल 2011 को गम्भीर पुर थाना की पुलिस ने रानी की सराय बाज़ार से गिरफ्तार किया। 14 अप्रैल की शाम तक वह बिल्कुल ठीक था। करीब 40 घंटे से भी अधिक समय तक अवैध हिरासत में रखने के बाद 15 अप्रैल की सुबह मृत अवस्था में पुलिस उसे सदर अस्पताल ले गई। गला दबा कर कमलेश की हत्या की गई थी। पुलिस ने इसे आत्महत्या का रूप देने के लिए एक एफ0आई0आर0 भी दर्ज कर ली जिसमें कहा गया था कि कमलेश ने अपने पाजामे के नाड़े की रस्सी बना कर बल्ब के होलडर से लटक कर आत्महत्या का प्रयास किया जिसके कारण उसकी मौत हो गई। हालाँकि कमलेश ने पैन्ट शर्ट पहन रखी थी और बल्ब के होल्डर से लटक कर आत्महत्या की कहानी अपने आप में कितनी हास्यास्पद है। कमलेश सिंह की हत्या की रिपोर्ट दर्ज करवाने में भी वही मशक्कत करनी पड़ी जो सुरेश यादव के मामले में करनी पड़ी थी।

-मसीहुद्दीन संजरी
 क्रमश:

2 टिप्‍पणियां:

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

ख़ुदा को याद रखो और उसके हुक्म पर चलो
ऐसा करो तो मानवाधिकार का हनन न होगा और
अगर आप ख़ुदा के अधिकार का हनन करोगे तो फिर तुम्हारे अधिकार का हनन भी होकर रहेगा।

...और ख़ुदा का हुक्म यह है कि ज़ुल्म न तो ख़ुद करो और न ही ज़ालिम का साथ दो।
हाल यह है कि लोग अपनी ही बेटी को पेट में मार रहे हैं और अपनी बेटियों को अपनी ही जायदाद में हिस्सा नहीं देते।
हर आदमी ज़ालिम बना घूम रहा है, इस पर तो तबाही आकर ही रहेगी।

क़ानून और न्याय के दरवाज़े पर दस्तक भी बलवान का हाथ ही दिया करता है।

मनीराम शर्मा ने कहा…

कहानियां गढने के लिए तो देश की पुलिस प्रसिद्द है |