मंगलवार, 20 सितंबर 2011

आई बी आर एस एस से ज्यादा हिन्दुवत्व वादी


पिछले कुछ वर्षों से नई पीढ़ी की राजनीतिक आकांक्षाओं के दबाव में और कुछ अपने "हिन्दुवत्व मूल" पर हिन्दू मुखौटा चढाने की वजह से आर एस एस और उसके राजनितिक संगठन बी जे पी को पिछले वर्षों के दौरान अपने मूल एजेंडे के कुछ बिन्दुवों पर समझौता करना पड़ा जिसका एक नतीजा यह हुआ कि हिन्दुवत्व वादी एजेंडे के प्रति उनका उत्साह बड़ी हद तक कमजोर पड़ गया। लेकिन आई बी में मौजूद हिन्दुवत्व वादियों का मामला ऐसा नहीं है। वे संघ परिवार के एजेंडे को बराबर दिमाग में रखते हैं। और न केवल पहले की तरह ही उस एजेंडे के प्रति वफादार और समर्पित हैं बल्कि सरकार में लगातार बढ़ते प्रभाव और प्रशासन पर अपने दबदबे की बदौलत दिन-प्रतिदिन ज्यादा से ज्यादा दुस्साहसिक कारनामे अंजाम देने का हौसला पा रहे हैं। इस तरह धीरे-धीरे आई बी ने हिन्दुवत्व वादी के असल चैम्पियन की भूमिका अपना ली है और आर एस एस की विचारधारा और नीतियों का संरक्षक बन गई हैं। अगर हिन्दुवत्व वादी मानसिकता के आई बी अफसरों की आर एस एस एजेंडे प्रति ऐसी वफादारी और निष्ठां न होती तो आर एस एस की मूल आत्मा कब की मिट चुकी होती और अपने सारे संसाधनों और मजबूत संगठन के बावजूद समाज पर ऐसी मजबूत पकड़ वह हासिल न कर पाती जैसी कि उसने कर ली है। आर एस एस और आई बी एक दूसरे से कितने जुड़े हुए हैं, निम्न उदहारण से यह अच्छी तरह समझा जा सकता है:
दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेस्सर सैयद अब्दुर्रेह्मान गिलानी ने, जिनको दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने संसद भवन पर आतंकी हमले के आरोप से बरी कर दिया था, तहलका ( 22 नवम्बर 2008 ) में लिखा है : 'मैंने इस इंटेलिजेंस एजेंसी को बहुत करीब से देखा हैउनके साथ बैठ कर मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि मै एक लोकतांत्रिक देश के किसी सरकारी दफ्तर में बैठा हूँबल्कि हमेशा ऐसा प्रतीत हुआ कि मै आर एस एस के मुख्यालय में बैठा हूँ। "

एस एम मुशरिफ़
पूर्व आई जी पुलिस
महाराष्ट्र
मो 09422530503