रविवार, 20 मई 2012

एसआईटी प्रमुख श्री आर. के. राघवन के नाम खुला पत्र









प्रिय श्री आर. के. राघवन,

इन दिनांे मीडिया में गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को आपकी “क्लीन चिट“ की जमकर चर्चा हो रही है। आपने गुजरात दंगों व विशेषकर गुलबर्ग सोसायटी में पूर्व सांसद श्री एहसान जाफरी की क्रूर हत्या के लिए श्री मोदी के किसी भी तरह से जिम्मेदार होने से स्पष्ट इंकार किया है। उच्चतम न्यायालय ने एसआईटी के प्रमुख के रूप में आपकी नियुक्ति इसलिए की थी क्योंकि आपकी छवि एक निष्पक्ष, कर्तव्यनिष्ठ एवं ईमानदार पुलिस अधिकारी की थी।
हम सबको आपकी काबिलियत और निष्पक्षता पर पूरा भरोसा है। हमें विश्वास है कि आपकी जांच रपट से गुजरात के घटनाक्रम का सच देश के सामने आएगा और हम सब यह जान सकेंगे कि क्या सही था और क्या गलत, क्या उचित था और क्या अनुचित। यहां यह कहना समीचीन होगा कि आपके द्वारा की गई जांच से कई विवाद उठ खड़े हुए हैं। यह आश्चर्यजनक है कि आपकी सन् 2010 की अंतरिम रपट और सन् 2012 की अंतिम रपट के निष्कर्षों में काफी अंतर है। आपने अपनी अंतिम रपट में श्री मोदी को “क्लीन चिट“ दे दी है।
इससे भी ज्यादा आश्चर्चाजनक यह है कि आपने अपनी जांच और उससे उजागर हुए “सत्य“ के बचाव में ऐसे-ऐसे तर्क दिए हैं जो शायद भाजपा भी नहीं दे सकती थी। बल्कि, शायद श्री मोदी भी अपना बचाव इतने अच्छे से नहीं कर पाते जितना कि आपने किया है। ऐसा लगता है मानो आपकी नियुक्ति उच्चतम न्यायालय ने नहीं वरन् गुजरात सरकार ने की हो। एमीकस क्यूरे श्री राजू रामचन्द्रन द्वारा आपकी जांच रपट के विष्लेषण के आपके द्वारा किए गए बिन्दुवार खण्डन का मैंने अत्यंत ध्यानपूर्वक अध्ययन किया है।
उच्चतम न्यायालय द्वारा एमीकस क्यूरे की नियुक्ति अपने आप में इस बात का सुबूत है कि आपकी रपट विवादों के घेरे में है। श्री राघवन जी, आप देश की शीर्ष जांच एजेन्सी सीबीआई के प्रमुख रह चुके हैं और आपकी रपट ने गुजरात दंगा पीडि़तों की न्याय पाने की आखिरी आषा भी खत्म कर दी है। वैसे भी हम राजनेताओं से न्याय की उम्मीद नहीं कर सकते परंतु हम सीबीआई जैसी शीर्ष जांच एजेन्सियों से यह उम्मीद अवष्य कर सकते हैं और करते भी हैं कि वे अपना काम निष्पक्षता से और देश के कानून के अनुरूप करेंगी।
राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थी और राजनैतिक विष्लेषक होने के नाते मेरा जो सीमित ज्ञान है, उसके आधार पर मैं बिना किसी संदेह के कह सकता हूं कि गुजरात दंगों के पीछे राजनीति और केवल राजनीति थी। दंगों के ठीक पहले तक भाजपा, गुजरात में लगातार चुनाव हार रही थी। स्थानीय निकायों के चुनाव और विधानसभा उपचुनावों में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था। दिसम्बर 2002 में राज्य में विधानसभा चुनाव होने थे और इन परिस्थितियों में भाजपा का चिंतित होना और घबराना स्वाभाविक था। एक के बाद एक सामने आ रहे भ्रष्टाचार के मामलों ने भाजपा की छवि को धूमिल कर दिया था। आमजन पार्टी की सरकार के काम करने के तरीके से घोर अंसतुष्ट थे। भाजपा नेताआंे को यह भय सता रहा था कि विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी को धूल चाटनी पड़ेगी।
दुर्भाग्यवश, हमारे देश में मतदाताओं को धु्रवीकृत कर देना चुनाव जीतने का पुराना और आजमाया हुआ तरीका है। भाजपा ने भी धर्म और जातिगत आधार पर मतदाताओं को धु्रवीकृत करने की कई कोशिशें कीं परंतु राज्य के भाजपा नेताओं को शनैः-शनैः यह समझ में आने लगा कि छोटे-मोटे उपायों से काम चलने वाला नहीं है और चुनाव जीतने के लिए कोई बड़ा कांड करना होगा। इसके लिए वे किसी उपयुक्त अवसर की तलाश में थे और गोधरा ने उन्हें वह मौका दे दिया। 27 फरवरी 2002 को गोधरा में 59 कारसेवक आग में जलकर मारे गए और भाजपा नेतृत्व की बांछे खिल गईं।
आप तो यह जानते ही होंगे कि गोधरा कांड क्यों और कैसे हुआ, यह आज भी साफ नहीं हो सका है। क्या इस कांड के लिए वे 120 लोग जिम्मेदार थे, जिन्हें गुजरात पुलिस ने गिरफ्तार किया था? गोधरा मामले में अदालत के निर्णय में घटना के पीछे कोई सुनियोजित षड़यंत्र होने की संभावना से इंकार किया गया है। पुलिस ने हुसैन उमरजी को “मुख्य षड़यंत्रकर्ता“ घोषित किया था परंतु अदालत ने उनके खिलाफ कोई सुबूत नहीं पाए और उन्हें निर्दोष घोषित कर बरी कर दिया गया। कुछ लोगों को सजा दी गई परंतु इनमें से अधिकाँश प्लेटफार्म पर खाने-पीने की चीजें बेचने वाले गरीब वेन्डर थे और इस बात की संभावना न के बराबर है कि उन्होंने इतना बड़ा षड़यंत्र रचा होगा। इस लोमहर्षक घटना के लिए कोई भी जिम्मेदार रहा हो परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि गोधरा ने मोदी सरकार को मुसलमानों के खिलाफ माहौल बनाने का सुनहरा मौका दे दिया।
विहिप द्वारा किए गए बंद के आव्हान को गुजरात सरकार ने पर्दे के पीछे से पूरा समर्थन दिया। मृतकों के शव जुलूस के रूप में शहर में घुमाने की इजाजत दी गई। ये दोनों तथ्य अपने आप में नरेन्द्र मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा करने के लिए पर्याप्त हैं। कोई कितनी भी निकम्मी और नासमझ सरकार-बशर्ते वह शान्ति बनाए रखने की इच्छुक हो-कभी लाशों के जुलूस निकालने की इजाजत नहीं देगी। लाशों पर कौन अपना दावा जता रहा है, इसका तनिक भी महत्व नहीं है। असली प्रश्न तो यह है कि अहमदाबाद की सड़कों पर जले हुए वीभत्स शवों को जूलूस में ले जाने की इजाजत किसने और क्यों दी। इससे पहले से ही उत्तेजित जनता और आक्रामक हो गई। तरह-तरह की अफवाहों ने आग में घी का काम किया। एक उच्च पुलिस अधिकारी होने के नाते आप यह अच्छी तरह से समझ सकते हैं कि इस तरह के जुलूस निकलने के क्या नतीजे होंगे।
आपकी जानकारी के लिए, श्री राघवनजी, मैं यह बता दूं कि मैंने जबलपुर के सन् 1961 के साम्प्रदायिक दंगे से लेकर आज तक हुए सभी दंगों की जांच और अध्ययन किया है। और मैं इस बात को बहुत अच्छी तरह से जानता हूं कि अगर किसी शहर में तनाव हो तो सरकार को कौन से कदम उठाने चाहिए। ऐसी परिस्थितियों में सरकार तुरंत धारा 144 या कफ्र्यू लागू कर देती है और अफवाहों व हिंसा को नियंत्रित करने के लिए हर संभव कदम उठाती है।
मोदी सरकार ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। गुजराती समाचारपत्र अत्यंत भड़काऊ समाचार प्रकाषित कर रहे थे। अफवाहों को खबरों के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा था। ऐसे संपादकीय लिखे जा रहे थे जिन्हें पढ़कर किसी का भी उत्तेजित हो जाना स्वाभाविक था। आपको तो ज्ञात ही होगा कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 153(ए) के तहत इन समाचारपत्रों के खिलाफ कार्यवाही की जा सकती थी। सरकार ने ऐसा करना भी उचित नहीं समझा। समाचारपत्रों को दंगे भड़काने का पूरा मौका मुहैय्या कराया गया।
आपने फरमाया है कि ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि श्री मोदी ने उच्चाधिकारियों की एक बैठक में यह निर्देश दिया था कि हिन्दुओं को अपने गुस्से का इज़हार करने से रोका नहीं जाना चाहिए। आपका तो यहां तक कहना है कि अगर ऐसी बैठक हुई भी थी और मोदी ने वही कहा था जो आरोपित है तब भी वे दोषी नहीं हैं क्योंकि उन्होंने ये निर्देश बंद कमरे में दिए थे। राघवनजी, क्या आप यह भूल नहीं रहे हैं कि उन्होंने यह बात बंद कमरे में आमजनों से नहीं वरन् उन उच्च पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों से कही थी, दंगे रोकना जिनकी जिम्मेदारी थी। यह तो किसी आमसभा में ऐसी बात कहने से भी ज्यादा खतरनाक है।
आप तो श्री मोदी का बचाव करने के लिए इतने आतुर हैं कि आपको कई चीजें दिखलाई ही नहीं दे रही हैं। आप यह भूल रहे हैं कि मोदी की इस कथित बैठक के बाद गुजरात में क्या हुआ। आप “तहलका“ द्वारा किए गए उस स्टिंग आपरेशन को पूरी तरह नजरअंदाज कर रहे हैं जिसमें कुछ नेताओं ने छाती ठोक कर कहा था कि सरकार की ओर से उन्हें यह आश्वासन दिया गया था कि वे चाहे जितने लोगों को मौत के घाट उतार दें, उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। उन्होंने स्टिंग आपरेशन के दौरान यह भी कहा कि सरकार ने उन्हें छिपने के स्थान उपलब्ध कराए थे।
अदालतंे स्टिंग आपरेशन को विष्वसनीय सुबूत मानती हैं। स्टिंग आपरेशन के आधार पर ही हाल में दिल्ली के एक न्यायालय ने पूर्व भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को जेल की सजा सुनाई है। आप यदि इस स्टिंग आपरेशन को धु्रव सत्य न भी मानते तो कम से कम वह आगे की जांच का आधार तो बन ही सकता था। एमीकस क्यूरे राजू रामचन्द्रन का मत है कि चाहे मोदी ने उच्चाधिकारियों को आरोपित निर्देश दिया हो या नहीं, चाहे बैठक में संजीव भट्ट उपस्थित रहे हों या नहीं परंतु भट्ट के दावे को एक सिरे से खारिज किया जाना उचित नहीं था। आपने न जाने किस कारणवश भट्ट से पूछताछ करना तक उचित नहीं समझा।
आपने तो एहसान जाफरी की हत्या के लिए भी मोदी या उनकी सरकार को जिम्मेदार मानने से इंकार कर दिया है। उल्टे, आप तो यह कह रहे हैं कि जाफरी अपनी मौत के लिए खुद जिम्मेदार थे क्योंकि उन्होंने भीड़ पर गोली चलाई थी। जाफरी ने गोली चलाई थी या नहीं, यह अभी भी साफ नहीं है परंतु राघवनजी, कृपया मुझे बताएं कि यदि आपके खून की प्यासी, हथियारों से लैस भीड़ से घिर जाने पर आप क्या करेंगे? विशेषकर तब जब प्रशासन से मदद पाने के आपके सभी प्रयास असफल हो गए हों, जब आपको बचाने के लिए कोई आगे आने को तैयार न हो। मैंने गुजरात दंगों की गहराई से जांच की है और मैं इस बात से वाकिफ हूं कि जाफरी और उनके बंगले में शरण लिए हुए 60 निर्दोष लोग कितने आतंकित, कितने संशकित और कितने असहाय रहे होंगे। मैं आपकी तरह शीर्ष पुलिस अधिकारी तो नहीं हूं परंतु मुझमे भी थोड़ी-बहुत बुद्धि है और मैं मौत से पहले जाफरी की मनःस्थिति का काफी हद तक अंदाजा लगा सकता हूं।
उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्याय्मूर्ति सामंत व न्यायमूर्ति सुरेश की अध्यक्षता में गठित जन न्यायाधिकरण के निष्कर्ष भी आपकी रपट के ठीक विपरीत हैं। इन दोनों पूर्व न्यायाधीशों की छवि बेदाग है और ये उस वर्ग के हैं जो आप जैसे पुलिस कर्मियों द्वारा की गई जांच पर निर्णय लेते हैं। मुझसे व्यक्तिगत बातचीत में न्यायमूर्ति सुरेश ने जोर देकर कहा था कि गुजरात में सन् 2002 में जो कुछ हुआ उसके लिए मोदी पूरी तरह जिम्मेदार हैं।
आपने स्वयं भी अपनी 2010 की रपट में, जिसे आपके एक साथी श्री मल्होत्रा ने तैयार किया था, मोदी को कुछ आधारों पर दोषी ठहराया था। जाने-माने पाक्षिक “तहलका“ ने आपकी उस रपट को छापा भी था। वह रपट आपकी 2012 की रपट की अपेक्षा सत्य के अधिक नजदीक थी। “तहलका“ ने यह आरोप भी लगाया था कि किसी व्यक्तिगत कार्य से आपकी लंदन यात्रा का खर्च गुजरात सरकार ने उठाया था। मैं नहीं जानता कि यह आरोप सही था या गलत, परंतु निःसंदेह यह एक गंभीर आरोप था।
मैंने गुजरात दंगों के दर्जनों चश्मदीदों से बातचीत की है। इनमें पुलिस अधिकारी, दंगा पीडि़त व राजनैतिक कार्यकर्ता शामिल हैं। इन सबने एक मत से मोदी को दंगों के लिए दोषी बताया। मैंने मोदी के कई भाषणों की वीडियो रिकार्डिग भी देखी हंै। इनमें वह भाषण भी शामिल है, जिसमें मोदी ने न्यूटन के गतिकी के तीसरे नियम को उद्धत कर मुसलमानों के कत्लेआम को उचित ठहराया था न्यूटन का यह नियम कहता है कि प्रत्येक क्रिया की समान एवं विपरीत प्रतिक्रिया होती है। परंतु गुजरात में तो प्रतिक्रिया, क्रिया से सैकड़ों गुना
बड़ी थी-मृतकों की संख्या की दृष्टि से भी और दंगाईयों की क्रूरता के पैमाने पर भी। मैंने श्री मोदी का वह भाषण भी सुना है जिसमें उन्होंने दंगा पीडि़तों के राहत शिविरों को “बच्चे पैदा करने वाली फैक्ट्रियां“ बताया था।
ये भाषण भले ही श्री मोदी के विरूद्ध ठोस सुबूत न हों परंतु इनसे उनकी सोच तो जाहिर होती ही है। मोदी दंगों के लिए जिम्मादार थे या नहीं इस विषय पर शायद मतभिन्नता की गुंजाइश हो भी परंतु इसमें तो कोई संदेह नहीं कि मुख्यमंत्री के रूप में दंगों को नियंत्रित करने की अपनी जिम्मेदारी को निभाने में मोदी पूरी तरह असफल रहे। दंगे रोकना उनकी वैधानिक व नैतिक जिम्मेदारी थी जिसे उन्होंने नहीं निभाया। आपने शायद अखबारों में पढ़ा होगा कि दंगों के बाद अहमदाबाद में भाषण देते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी ने कहा था कि “मैं अब कौनसा मुंह लेकर विदेश जाऊंगा“। मोदी की तरफ पलटकर वाजपेयी ने उनसे राजधर्म निभाने की अपेक्षा भी की थी। कोई भी मुख्यमंत्री, जो हफ्तों तक दंगों को न रोक पाये, जो सैकड़ों बेकसूरों का खून बहता देखता रहे, उसे एक क्षण के लिए भी अपने पद पर बने रहने का हक नहीं है। परंतु आज दस साल बाद भी मोदी न केवल मुख्यमंत्री बने हुए हैं वरन् सद्भावना यात्राएं भी निकाल रहे हैं!
राघवनजी, ऐसे लोगों के लिए भारत जैसे बहुधार्मिक प्रजातंत्र में कोई स्थान नहीं है जिन्हें हजारों लोगों की लाशों पर चढ़कर सिंहासन तक पहंुचने में कोई गुरेज नहीं है। हमें उम्मीद थी कि आप जैसा ईमानदार अधिकारी ऐसे दुर्जन राजनेताओं को बेकनकाब करेगा। परंतु हमें बहुत दुःख है कि हमारी सभी उम्मीदों पर पानी फिर गया है।

भवदीय

- डॉ . असगर अली इंजीनियर,
अध्यक्ष, सेंटर स्टडी ऑफ सोसायटी एण्ड सेक्युलरिज्म, मुंबई

1 टिप्पणी:

G.N.SHAW ने कहा…

एस.आई.टी.की रिपोर्ट आप के पक्ष में आती तो शायद खुश होते ?