बुधवार, 19 जून 2013

मोदी, आडवाणी और संघ का एजेण्डा



सन् 2014 के आमचुनाव के लिए भाजपा की चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष पद पर नरेन्द्र मोदी के मनोनयन ;जून 2013 ने प्याले में उठने वाले तूफान से कुछ बड़ा तूफान बरपा कर दिया है। यह दिलचस्प है कि पहली बार इस तरह के पद पर मनोनयन ने इतना हंगामा और विवाद खड़ा किया है। इसके लिए मोदी की प्रचार मशीनरी काफी हद तक जिम्मेदार है। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है मानो मोदी को भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया हो।  हां, यह अवश्य हो सकता है कि प्रचार प्रमुख के रूप में मोदी की नियुक्ति, उनके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित होने की ओर पहला कदम हो। मोदी के मनोनयन का सबसे कड़ा विरोध लालकृष्ण आडवाणी ने किया, जो कि मोदी के राजनैतिक आका माने जाते हैं और जिन्होंने मोदी को आगे बढ़ाने और उनका बचाव करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यदि मोदी आज भाजपा और गुजरात में इतने शक्तिशाली होकर उभरे हैं तो उसका काफी कुछ श्रेय आडवाणी और उनकी राजनीति को जाता है। आडवाणी ने ही मुख्यमंत्री बतौर मोदी का नाम प्रस्तावित किया था। गुजरात में भाजपा के गिरते  ग्राफ को मोदी ने सम्हाला। इसमें सन् 2002 के कत्लेआम ने उनकी कितनी मदद कीए यह चिंतन का विषय है।
गुजरात हिंसा में मोदी की स्पष्ट भूमिका के चलते, तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी मोदी को मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहते थे। परन्तु आडवाणी ने मोदी की कुर्सी बचा ली। मोदी को बढ़ावा देने में भी आडवाणी की महत्वपूर्ण भूमिका थी। आडवाणी के मोदी प्रेम के पीछे कोई व्यक्तिगत कारण नहीं था। इसका कारण यह था कि दोनों स्वयंसेवकों के राजनैतिक एजेण्डे एक थे। मोदी और आडवाणी, दोनों ने मिलकर देश की धमनियों में साम्प्रदायिकता का जहर प्रवाहित करने के लिए हर संभव काम किया। ये दोनों स्वयंसेवक, आरएसएस के हिन्दू राष्ट्र के वफादार सिपाही हैं।
भाजपा को 1984 में लोकसभा में दो सीटें मिलीं थीं। वहां से आडवाणी बाबरी ध्वंस के बाद हुए चुनाव में पार्टी की सदस्य संख्या को 161 तक ले गए। सन् 1999 के चुनाव मेंए साम्प्रदायिक धु्रवीकरण में और वृद्धि के चलते, भाजपा को इतिहास में सबसे ज्यादा.182.लोकसभा सीटें प्राप्त हुईं। आडवाणी की साम्प्रदायिक राजनीति ने भाजपा को पहले प्रमुख विपक्षी दल का दर्जा दिलाया और तत्पश्चात केन्द्र में सत्ता। भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन ने लगभग 6 साल तक दिल्ली में गद्दी सम्हाली। आडवाणी, राजनीति के अत्यंत चतुर खिलाड़ी हैं। वे जानते थे कि उनकी विघटनकारी राजनीति के चलते, अन्य राजनैतिक दल भाजपा के साथ गठबंधन नहीं करेंगे। इसलिए उन्होंने प्रधानमंत्री पद के लिए अपने साथी स्वयंसेवक, अटल बिहारी वाजपेयी का नाम आगे बढ़ाया। वाजपेयी का एजेण्डा भी हिन्दू राष्ट्र ही था परन्तु फर्क सिर्फ यह था कि उनकी छवि एक मध्यमार्गी, नर्म नेता की थी।
वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल के बाद आडवाणी में भी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा जागी और इसे पूरा करने के लिए उन्होंने भी अपनी छवि को मध्यमार्गीय कलेवर देने की कोशिश शुरू की। बाबरी मस्जिद के ध्वंस के इस अघोषित नेता ने पाकिस्तान की संविधान सभा में 11 अगस्त 1947 को मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा दिए गए भाषण को उद्धृत करते हुए जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष नेता घोषित कर दिया। केवल एक भाषण के आधार पर जिन्ना का आंकलन करना निश्चित रूप से अनुचित है। हम यह कैसे भूल सकते हैं कि जिन्ना, मुस्लिम लीग के मुखिया थे और उन्होंने ही द्विराष्ट्र सिद्धांत को मजबूती दी थी। द्विराष्ट्र सिद्धांत से उद्भूत साम्प्रदायिक विचारधारा, हिन्दू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के साम्प्रदायिक तत्वों को प्रिय थी। जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बताकर आडवाणी शायद कुछ ज्यादा ही बोल गए। क्योंकि तब तक संघ परिवार ने हिन्दुओं को ष्जिन्ना और मुसलमानों से नफरत करो के आधार पर धु्रवीकृत कर लिया था। ऐसे में आडवाणी के इस बयान को संघ पचा नहीं सका और उन्हें पद से हटा दिया गया। आडवाणी की बढ़ती उम्र के कारण भी आरएसएस उन्हें हटाना चाहता था परन्तु किसी नए, विश्वसनीय चेहरे के अभाव में, सन् 2009 के आम चुनाव में आडवाणी को एक बार फिर पुनर्जीवन मिल गया।
भाजपा की कमान मोदी के हाथों में सौंपने के लिए आरएसएस बहुत इच्छुक नहीं था क्योकि संघ व्यक्तियों की बजाए संगठन की प्रधानता चाहता है। जहां तक मोदी का सवाल है, वे संगटन पर हावी हो जाते हैं। परन्तु मोदी के मामले में आरएसएस, अन्ततः, शायद इसलिए राजी हो गया क्योंकि मोदी ने अत्यंत कुशलतापूर्वक गढ़े गए प्रचार अभियान और गुजरात कत्लेआम की सहायता से, गुजरात में जबरदस्त साम्प्रदायिक धु्रवीकरण करने में सफलता पाई थी। आरएसएस की राजनीति, मूलतः, धार्मिक पहचान के भेस में पूर्ण एकाधिकारवाद की राजनीति है। यह एक तरह की फासीवादी राजनीति है। फासीवादी राजनीति के लिए जरूरी होता है एक करिश्माई जननेता। मोदी इस तरह के नेता हैं और इस राजनैतिक मजबूरी के चलते, मोदी के बारे में अपनी आपत्तियों को दरकिनार कर, आरएसएस ने उनके कद में हो रही अनियंत्रित वृद्धि को स्वीकार कर लिया।
इस राजनैतिक प्रहसन के चलते, मोदी की विघटनकारी छवि के कारणए एनडीए के गठबंधन के साथी भाजपा से दूर जा रहे हैं। इन दलों को अपने अल्पसंख्यक वोट बैंक को ध्यान में रखना है और इसलिए वे मोदी के नेतृत्व को स्वीकार नहीं कर सकते। एनडीए से पहले ही कई दल बाहर जा चुके हैं और मोदी युग के उदय के बाद कई और दल एनडीए का साथ छोड़ सकते हैं। सम्भावना तो यही है कि अन्ततः भाजपा के साथ केवल हिन्दुत्ववादी शिवसेना और साम्प्रदायिक अकाली दल रह जाएंगे। आडवाणी ने विद्रोह का झण्डा उठाया अवश्य परन्तु आरएसएस प्रमुख के एक फोन ने उनके तेवर ठंडे कर दिए। आरएसएस द्वारा प्रशिक्षित स्वयंसेवक, नागपुर से आए निर्देशों का किसी भी स्थिति में उल्लंघन नहीं कर सकते। इसके कई कारण हैं। पहला यह कि स्वयंसेवकों को यह सिखाया जाता है कि मूलतः उनकी वफादारी संघ और हिन्दू राष्ट्र के प्रति है। हम सबको याद है कि जब 1977 में आपातकाल की समाप्ति के बादए भाजपा के पूर्व अवतार भारतीय जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हो गया था, तब जनता पार्टी के अन्य घटक दलों ने जनसंघ के सदस्यों से आरएसएस से उनके संबंध तोड़ने को कहा था। जनसंघ ने जनता पार्टी को तोड़ना बेहतर समझा बजाए आरएसएस से संबंध तोड़ने के। अटल बिहारी वाजपेयी, जो कि तथाकथित मध्यममार्गी और नरम नेता बताये जाते हैं ने भी अमेरिका के स्टेटन आईलैण्ड में अनिवासी भारतीयों की एक सभा को सम्बोधित करते हुए कहा था कि वे स्वयंसेवक पहले हैं, प्रधानमंत्री बाद में।
विचारधारात्मक कारकों के अलावा, चुनावी कारक भी आरएसएस के वर्चस्व के पीछे हैं। भाजपा की मुख्य शक्ति हैं आरएसएस के स्वयंसेवक, जो भाजपा के उम्मीदवारों को चुनाव जितवाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। भाजपा के कार्यकलापों पर आरएसएसए संगठन मंत्रियों द्वारा कड़ा नियंत्रण रखता है। ये संगठन मंत्री, भाजपा में, आरएसएस के प्रतिनिधि होते हैं। राम मंदिर मुद्दे के जोर पकड़ने, आडवाणी की विघटनकारी रथयात्रा, उसके बाद हुई हिंसा और साम्प्रदायिक धु्रवीकरण और इन सब से हिन्दुत्व की राजनीति को हुए लाभ से आरएसएस काफी प्रसन्न था। अब स्थिति यह हो गई है कि भाजपा की ताकत में दिन ब दिन गिरावट आ रही है और क्षेत्रीय पार्टियां मजबूत होती जा रही हैं। इन क्षेत्रीय पार्टियों को मुख्यतः केवल क्षेत्रीय मुद्दों से मतलब रहता है और इसलिए चुनाव के बाद वे किस करवट बैंठेंगी, यह कहना बहुत मुश्किल  है।
इस पूरे घटनाक्रम से मुख्यतः दो चीजें साफ होती हैं। पहली यह कि मोदी, समाज को धु्रवीकृत करने में काफी हद तक सफल रहे हैं। ऐसा माना जा रहा है कि मोदी स्वभाव से तानाशाह हैं और जब वे सत्ता में आते हैं तो सारी शक्तियां स्वयं में केन्द्रित कर लेते हैं। उनके इस तानाशाहीपूर्ण चरित्र को उनका शक्तिशाली होना बताया जा रहा है। गुजरात की अन्य पार्टियों के नेता तो मोदी के इस आंकलन से सहमत हैं ही कई पूर्व भाजपा नेताओं को भी मोदी ने हाशिए पर पटक दिया है। उनकी कोई पूछ परख नहीं हैं। मोदी को सत्ता से बाहर रखने में क्षेत्रीय पार्टियां किस हद तक आवश्यक भूमिका निभाएंगी, यह कहना मुश्किल है। इन पार्टियों की सिद्धान्तो और मूल्यों में कोई खास श्रृद्धा नहीं है।
जब सन् 1996 में भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी तब कोई दूसरी पार्टी उसके साथ गठबंधन करने को तैयार नहीं थी। परन्तु कुछ ही साल बाद, कई दल सत्ता के लोभ में भाजपा के आसपास मंडराने लगे थे। संघ.भाजपा.मोदी इसी ऐतिहासिक अनुभव के आधार पर आश्वस्त होंगे कि समय आने पर उन्हें दूसरी पार्टियों का समर्थन मिल जायेगा। यह अपेक्षाकृत कठिन है क्योंकि उस समय वाजपेयी की उपस्थिति के कारणए अन्य पार्टियों के लिए स्वयं को धोखे में रखना आसान था। वे सत्ता में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करते हुए यह दावा भी कर सकती थीं कि उन्होंने अपने सिद्धांतो से कोई समझौता नहीं किया है।
आज धर्मनिरपेक्ष आन्दोलन के सामने बहुत कठिन चुनौती है। समाज में धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरूद्ध पूर्वाग्रह जड़ पकड़ चुके हैं और अल्पसंख्यकों की हालत दिन ब दिन द्वितीय श्रेणी के नागरिकों जैसी होती जा रही है। मोदी के सत्ता में आने के अभी तो कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं परन्तु यह साफ है कि संघ और भाजपाए सत्ता में आने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। हमने पहले भी देखा है कि साम्प्रदायिक हिंसा से साम्प्रदायिक संगठनों को ताकत मिलती है। साम्प्रदायिक संगठन यह बात अच्छी तरह से समझते हैं। यह सब देश के लिए बहुत खतरनाक है। धार्मिक हिंसा के कारण साम्प्रदायिक ताकतों की जमींनी स्तर पर ताकत बढ़ रही है। जहां तक क्षेत्रीय पार्टियों के राष्ट्रव्यापी गठबंधन का सवाल है उसमें सत्ता सुख का उपभोग करने की इच्छा रखने वालों की संख्या इतनी अधिक होगी कि उसका अस्तित्व बहुत दिनों तक बना नहीं रह सकेगा। क्या तीसरे मोर्चें के लिए कोई गुंजाइश है? क्या सभी गैर.भाजपा और गैर.कांग्रेस दल एक साथ मिलक, तीसरा मोर्चा बना सकते हैं?तीसरा मोर्चा केवल प्रजातांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और गरीबों की पक्षधरता वाले कार्यक्रमों के आधार पर बनाया जा सकता है। एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी होगा कि तीसरे मोर्चे का नेतृत्व कौन करे? मोदी जैसे फासिस्ट व्यक्ति और आरएसएस जैसे घोर साम्प्रदायिक संगठन का प्रजातांत्रिक तरीकों से कड़ा विरोध किया जाना जरूरी है।
-राम पुनियानी

1 टिप्पणी:

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

मोदी जैसे फासिस्ट व्यक्ति और आरएसएस जैसे घोर साम्प्रदायिक संगठन का प्रजातांत्रिक तरीकों से कड़ा विरोध किया जाना जरूरी है।

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