शनिवार, 19 नवंबर 2011

इतिहास से कटता- जुड़ता वर्तमान समाज

हम अपने को सदियों पुराने धार्मिक ,जातीय व इलाकाई महापुरुषों से जोडकर तो देख ले रहे है , पर वर्तमान दौर में पुराने ऐतिहासिक सामाजिक संबंधो की टूटन को नही देख पा रहे हैं और ना ही आधुनिक युग के नये खड़े होते रहे सामाजिक संबंधो से अपने जुड़ाव को देख पा रहे है | हम वर्तमान युग के सामाजिक संबंधो को बहुत कम महत्व दे पा रहे हैं
किसी राष्ट्र का इतिहास उसे अपने देश व समाज की परिस्तिथियों से , उसके धरोहरों से उसके सामाजिक विशेषताओं गुणों , अवगुणों से परिचित कराता हैं | साथ ही वह उसे इतिहास का सबक भी सिखाता है | वर्तमान एवं भविष्य को बेहतर बनाने के प्रेरणाए देता हैं | मुख्यत: इसीलिए राष्ट्र व समाज के इतिहास को जानना जरूरी हैं | पर उससे भी ज्यादा जरूरी है की वर्तमान युग के राष्ट्र व समाज को , उसकी स्थितियों , परिस्थितियों एवं गतिविधियों को जाना जाय | क्योंकि हमे इतिहास का सबक वर्तमान युग में लागू करना है | उसी सीख - शिक्षा से वर्तमान और भविष्य को बेहतर बनाना है |अगर वर्तमान को जानने का गम्भीर प्रयास नही करते तो इतिहास हमारे लिए केवल शिक्षा का पढने - पढाने का प्रशंसा या निंदा आदि का ही विषय बनकर रह जाएगा | बदकिस्मती से आज कल हमारे समाज में यही कुछ हो रहा है | आज यह कहने वाले लोग मिल जायेगे की विगत इतिहास में हमारा देश सुख - वैभव ,धन - धान्य से भरा - पूरा रहा है , तो दूसरी तरफ यह कहने वाले भी मिल जायेगे की वर्तमान युग से पहले तो ज्यादातर लोगो को दोनों समय का भोजन भी नही नसीब हो पाता था | यह कहते हुए लोग मिल जायेगे कि हमारा इतिहास विदेशी शक्तियों को अपने अन्दर समाहित कर लेने का तथा शान्ति , सहृदयता व सहनशीलता का इतिहास रहा है , तो यह कहते हुए लोग मिल जायेगे कि हमारा इतिहास विदेशी शक्तियों के पराजय का कायरता का , सामाजिक जड़ता , कट्टरता और असहनशीलता का इतिहास रहा है |
इतिहास के इन्ही पाठो , प्रचारों और चर्चाओं के साथ अब एक नया दौर भी शुरू हुआ है |इतिहास को समाज व राष्ट्र के इतिहास के रूप में देखने तथा उसके राष्ट्रीय व सामाजिक गुणों , अवगुणों को समग्रता में जानने की जगह अब उसे धार्मिक , जातीय व इलाकाई समुदायों के रूप में देखने - बताने का दौर चल पड़ा है | ऐसा नही है कि इन आधारों पर इतिहास को देखने का काम पहले नही था | पहले भी था , पर उसका दायरा सीमित था | फिर ब्रिटिश राज के दौरान खड़े होते रहे राष्ट्रवादियो व क्रान्तिकारियो ने राष्ट्र व समाज कि ऐतिहासिक कमियों को बताते हुए उसे ठीक करने का कुछ न कुछ प्रयास भी किया |
वर्तमान दौर में इतिहास को समूचे राष्ट्र व समाज के इतिहास में प्रस्तुत करने की जगह मुख्यत:विभिन्न धार्मिक , जातीय , इलाकाई के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है |इतिहास के वास्तविक या कल्पित व्यक्तियों , घटनाओं को महिमामंडित कर विभिन्न सामाजिक समुदायों को अपने - अपने इतिहास पर गर्व करने का पाठ -प्रचार चलाया जा रहा है | वर्तमान दौर के सामाजिक समुदायों की विशिष्टता को इतिहास से जोडकर देखा व बताया जा रहा है | विडम्बना यह है कि वर्तमान दौर में इतिहास से जोडकर देखने पहचानने की सामाजिक प्रक्रिया बढने - बढाने के साथ वर्तमान युग की स्थितियों में अपने को देखने पहचानने की प्रक्रिया धूमिल पडती जा रही है |हम अपने को सदियों पुराने धार्मिक , जातीय व इलाकाई महापुरुषों से जोडकर तो देख ले रहे है , पर वर्तमान दौर में पुराने ऐतिहासिक सामाजिक संबंधो की टूटन को नही देख पा रहे है और न ही आधुनिक युग के नये खड़े होते रहे सामाजिक संबंधो से अपने जुड़ाव को देख पा रहे है | दूसरे शब्दों में कहे तो हम वर्तमान युग के सामाजिक सम्बन्धो को बहुत कम महत्व दे पा रहे है | सभी जानते है कि इस देश में आधुनिक युग की शुरुआत ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के समय से हुई थी |कम्पनी राज और फिर 1858 के बाद के ब्रिटिश राज ने न केवल आधुनिक युग कि दासता को थोपे रखा अपितु इस देश को उसके पुराने इतिहास से , सामाजिक सम्बन्धो से भी काटकर अलग कर देने का काम शुरू कर दिया | उन्होंने राजशाही के दौर के राजकाज , शासन - प्रशासन को खत्म कर दिया | पुरानी कृषि व दस्तकारी पर आधारित अर्थव्यवस्था को भी छिन्न - भिन्न कर दिया समाज के पुराने सामाजिक सम्बन्धो को तोड़ते हुए आधुनिक युग के खरीद फरोख्त के बाजारवादी सम्बन्धो में बदलाव कि प्रक्रिया को आगे बढाने का काम किया | क्या ब्रिटिश दासता से पहले के इतिहास में राज व समाज के बदलाव का काम नही होता रहा है ? जरुर होता रहा है | पर अत्यंत धीमी गति से और थोड़े बहुत परिवर्तनों या कहिये सतही परिवर्तनों के साथ | उदाहरणार्थ ------इस देश कि प्राचीन कृषि , ग्रामीण एवं हस्तशिल्प कि व्यवस्था सदियों तक ज्यो क़ी त्यों या थोड़े बहुत विकास के साथ चलती रही | हिन्दू राजाओं ,बौद्ध राजाओं मुस्लिम बादशाहों का दौर आता जाता रहा , पर समाज व्यवस्था जस क़ी तस बनी रही | सत्ता के बदलाव के साथ समाज के सम्बन्धो में वस्तुत:कोई बदलाव नही हो पाया था | हिन्दू बोद्ध और मुस्लिम धर्म के बढ़ते प्रभावों के चलते समाज में धार्मिक बदलाव तो होता रहा पर समाज क़ी सदियों पुरानी अर्थव्यवस्था और उसमे कामो पेशो के विभाजन के साथ सदियों पुरानी उंचाई - निचाई , छोटे - बड़ाई तथा धार्मिक जातीय व इलाकाई अलगाव दुराव चलता रहा |इसकी जड़ता इस हद तक बनी रही क़ी मुस्लिम शासको के दौर्र में इस्लाम के फैलाव के वावजूद विभिन्न जातियों के रूप में मौजूदसामाजिक सम्बन्ध नही टूट पाए | इस्लाम के अनुयायियों तक में भी कुछ सुधारों के बावजूद सदियों पुरानी जातीय उचाई - निचाई बदस्तूर चलती रही | राज से लेकर समाज तक में यह स्थिति सदियों तक बनी रही | मध्य युग के इतिहास में राजाओं , बादशाहों के नाम चेहरे बदलने के साथ कोई महत्वपूर्ण सामाजिक बदलाव नही हो पाया | इसलिए लोगो का यह कहना मध्ययुग तक के लिए एकदम ठीक है कि कई बाहरी आक्रमणकारी आये गये पर हमारी सभ्यता संस्कृति ज्यो की त्यों बनी रही | यह न केवल इस भूभाग के सामाजिक जड़ता को बताती है बल्कि किसी महत्वपूर्ण सामाजिक बदलाव के प्रति बाहर से यहा आने वाले आक्रमणकारी की अक्षमता को भी दर्शाती है | फिर जब इतिहास की इसी सामाजिक जड़ता को समाज की खूबी बनाकर गाया सुनाया जाए तो वह वर्तमान युग में हमारी कूपमंडूकता को भी प्रदर्शित कर देती है | क्योंकि ढाई सौ साल पहले विदेशी यूरोपीय विशेषकर व्यापारियों के आगमन के बाद तथा उनकी आर्थिक , राजनीतिक, सैन्य शैक्षणिक व सांस्कृतिक प्रणालियों के लागू होने के बाद देश व समाज का चेहरा बदलने लग गया था और आज तक बदलता ही जा रहा है | हां यह बात एकदम ठीक है जिस तरह से उन्होंने आधुनिक औधोगिक व्यापारिक प्रणाली की स्थापना के साथ अपने देश के पुराने सामाजिक संबंधो का बदलाव किया था , वैसा उन्होंने इस देश को अपनी औपनिवेशिक लूट के लिए गुलाम बनाये रखना था | लेकिन इसके वावजूद अब सदियों पुरानी समाज व्यवस्था व उसके अंतर्गत चलते रहे सामाजिक संबंधो को टूटना बदलना अनिवार्य हो उठा था | बदलाव की वही प्रक्रिया निरंतर आगे बढती रही है | वह चाहे जितनी धीमी हो , विकृत हो , कष्टदायक हो , पर वह प्रक्रिया रुकने वाली नही हैं | इतिहास का पुराना दौर वापस लौटने वाला नही है |पुराने सम्बन्ध चलने वाले नही है और उनका टूटना व समाप्त होना अनिवार्य एवं अपरिहार्य हैं | इसीलिए अपने आप को इतिहास के सामुदायिक पहचानो , संबंधो के आधुनिक प्रतिनिधि के रूप में देखना कही से ठीक नही है | क्योंकि हम आधुनिक युग के प्रतिनिधि है |पुराने इतिहास से हम जुड़े जरुर है पर हम उसके प्रतिनिधि नही है | वर्तमान दौर की आवश्यकता यह है कि पुराने युगों के इतिहास कि टूटन से उसकी बढती दिशा दशा से प्रेरणा लेकर हम आधुनिक युग के सामाजिक पहचानो संबंधो को महत्व दें | किसी राजा , महाराजा या पुराने युग के योद्धा व विद्वान् से अपना रिश्ता जोडकर और उसे आगे कर हम समाज को आगे नही बढ़ा सकते | पर आधुनिक युग के संबंधो पहचानो को महत्व देकर और उसके लिए पुराने युगों से प्रेरणा लेकर हम उसे जरुर आगे बढ़ा सकते है |ब्रिटिश काल में देश के राष्ट्रवादियो ने अपने जाति धर्म की पहचान को नही बल्कि आधुनिक युग के राष्ट्रवादी पहचान को आगे करके स्वतंत्रता संघर्ष के लिए राष्ट्र को एकजुट करने का प्रयास किया था और उसमे काफी हद तक सफल भी हुए थे | आज हम वही प्रयास देश के शोषित - शासित जनसाधारण समाज के लिए कर सकते हैं | इतिहास से वर्तमान में चली आई सामाजिक दूरियों अलगावो को बनाये रखने या उस पर पर्दा डालने की जगह उसे स्पष्टतया स्वीकार करते हुए तथा जनसाधारण की वर्तमान दौर घराती समस्याओं के लिए देश के जनसाधारण को एकजुट करते हुए ही कर सकते है।
सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

3 टिप्‍पणियां:

पत्रकार-अख्तर खान "अकेला" ने कहा…

shi frmaya jnab ne .akhtar khan akela kota rasjthan

khalid a khan ने कहा…

bahut hi jaandar lekh smaaj ka ithaash hamare itshhas se gayaad hai jan shdhad ka ithaash abhi likha jana hai jo hum padte hai woh sirf rja hmaharaja ka itehash hai

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

सुनील जी
आपके लेखो का तो मैं हमेशा ही प्रशंशक रहा हूँ . और हमेशा की तरह, इस बार भी आपने बहुत सार्थक लेख लिखा है .

सत्ता के बदलाव का ये मतलब नहीं है कि विचार भी बदले और यही होता आया है .. बहुत सटीक बात कही आपने.

आपका धन्यवाद.
विजय