रविवार, 11 अगस्त 2013

धर्म, नास्तिकता और धर्मनिरपेक्षता


पिछले कोई तीन दशकों से सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्रों में धर्म, काफी दबंगता से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। कहीं आतंकवादी हमलों तो कहीं साम्प्रदायिक हिंसा और कहीं धार्मिक दक्षिणपंथियों की बढ़ती ताकत ने आम आदमी के लिए अधिक महत्वपूर्ण मुद्दों जैसे सामाजिक असमानता और  गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार को नेपथ्य में धकेल दिया है।
इस सिलसिले में हालिया प्रकाशित एक पुस्तक कुछ दिलचस्प भविष्यवाणियां करती है। पुस्तक के अनुसार, सन् 2040 के दशक तक दुनिया में धर्म के मानने वाले अल्पसंख्यक हो जाएंगे और धर्म के प्रति उदासीन लोगों की संख्या में कई गुना वृद्धि होगी। पुस्तक के लेखक हैं नाईजल बार्बर और उसका शीर्षक है ‘वाय एथियेज्म विल रिप्लेस रिलीजनः द ट्राइम्फ आॅफ अर्थली प्लेजर्स ओवर पाय इन द स्काय‘ (क्यों लेगी नास्तिकता धर्म का स्थान: इस दुनिया की उस दुनिया पर जीत)। पुस्तक, धर्म के उदय और पतन को आर्थिक विकास से जोड़ती है और इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि विकसित देशों में नास्तिकों की संख्या अधिक होती है।
यह पुस्तक लेखक द्वारा 137 राष्ट्रों के अध्ययन पर आधारित है। इस अध्ययन का निष्कर्ष यह है कि जिस देश में जितनी अधिक और व्यापक जनकल्याण योजनाएं लागू हैं और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था जितनी बेहतर है, वहां नास्तिकों की संख्या उतनी ही अधिक है। दूसरे शब्दों में, पुस्तक मूलतः यह कहती है कि जिन देशों में आय का वितरण जितना समान है, वहां धार्मिक लोगों की संख्या उतनी ही कम है। लेखक जानेमाने मनोविज्ञानी हैं। लेखक की भविष्यवाणी यह है कि अगर फानी दुनिया उनकी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करने लगेगी, तो लोगों को पराभौतिक शक्तियों पर विश्वास करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी। ज्ञातव्य है कि अमेरिका में हाल में कराए गए एक सर्वेक्षण में 20 प्रतिशत लोगों ने स्वयं को नास्तिक बताया।
यद्यपि यह अध्ययन अत्यंत तार्किक है तथापि शब्दों के अर्थ को लेकर कुछ भ्रमित भी प्रतीत होता है। जैसे, हम इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि नास्तिकता, कुछ धर्मों के ढांचे का हिस्सा है। इनमें शामिल हैं हिन्दू धर्म के कुछ पंथ जैसे चार्वाक-लोकायत परंपरा। जैन और बौद्ध धर्म भी किसी दैवीय शक्ति के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करते। यह अलग बात है कि बौद्ध और जैन धर्मों के अनुयायियों ने इन धर्मों के पैगम्बरों को ही ईश्वर का दर्जा दे दिया है और उनकी पूजा करने लगे हैं। हिन्दू धर्म में कई धाराएं हैं जिनमें शामिल हैं ब्राहम्णवाद, नाथ, तंत्र, भक्ति, सिद्ध आदि। हिन्दू धर्म में ईश्वर की अवधारणा में भी बहुत विविधता है। कुछ धाराएं बहुईश्वरवादी हैं, जो सैकड़ों देवी-देवताओं में आस्था रखती हैं तो कुछ धाराओं के आराध्य त्रिदेव (ब्रहा, विष्णु, महेश) हैं। कुछ धाराएं केवल एक ईश्वर में विश्वास करती हैं तो कुछ निराकार ब्रम्ह में। और ये सभी अवधारणाएं, एकसाथ हिन्दू धर्म में जीवित हैं।
भारत में चार्वाक को नास्तिकता का पितामह कहा जा सकता है। इस परंपरा को आधुनिक युग में साम्यवादियों ने आगे बढ़ाया। इस सिलसिले में भगतसिंह का प्रसिद्ध लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं?‘ महत्वपूर्ण है। कई क्रांतिकारी समाजसुधारक जैसे पेरियार रामास्वमी नायकर भी नास्तिकता के जबरदस्त पक्षधर थे। रेशनलिस्ट्स (तार्किकतावादियों) की संस्थाएं भी इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।
अन्य धर्म, जो एक ईश्वर में विश्वास करते हैं, वहां भी ईश्वर की अवधारणा निराकार और साकार के बीच झूलती रही है। कुछ दशकों पहले तक ऐसी पुस्तकें और लेख आम थे जिनमें ईश्वर के अस्तित्व को ही चुनौती दी जाती थी। परंतु पिछले तीन दशकों में, यथास्थितिवादी राजनैतिक ताकतों द्वारा धार्मिक पहचान का दुरूपयोग तेजी से बढ़ा है। इसके पहले, बीसवीं सदी की शुरूआत में, विशेषकर सन् 1920 के दशक में, औद्योगिकरण व शिक्षा के प्रसार के कारण, अफ्रीकी-अमेरिकनों व महिलाओं ने सामाजिक जीवन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना शुरू की। इससे समाज का कुलीन वर्ग स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगा और नतीजे में ईसाई धर्म में एक कट्टरपंथी धारा उभरी। इस्लामिक कट्टरवाद के राजनैतिक अवतार को सबसे पहले आकार मिला ईरान में अयातुल्लाह खौमेनी के शासन में आने के बाद। शनैः-शनैः इस्लामिक कट्टरवाद के कई स्वरूप उभरकर समाने आने लगे, जिनमें से सबसे बदतर था तालिबान। इसी दौर में आमजनों में प्रजातांत्रिक आकांक्षाओं के उदय से भयभीत कुछ शासकों ने इस्लाम के कट्टरवादी संस्करणों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। सऊदी अरब में आम जनता की राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं को कुचलने के लिए इस्लाम के सलाफी संस्करण का इस्तेमाल किया गया, ताकि अमेरिका और इंग्लैंड की बहुराष्ट्रीय तेल कंपनियों के टैंकरों में सऊदी तेल का प्रवाह अबाध रूप से जारी रह सके।
इस्लाम के सलाफी संस्करण का अमेरिका ने मध्यपूर्व के तेल भंडारों पर अपना कब्जा बनाए रखने के लिए भी इस्तेमाल किया। अमेरिका के निर्देशन में उसके द्वारा पोषित मदरसे पाकिस्तान में स्थापित किए गए, जिनमें अंकल सैम द्वारा तैयार किए गए पाठ्यक्रम को पढ़कर, मुजाहिदीन, तालिबान और अल्कायदा लड़ाके उभरे। इन लड़ाकों ने अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं को खदेड़ने के अमेरिकी लक्ष्य को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत में दलितों और महिलाओं के सशक्तिकरण ने मध्यम वर्ग के एक हिस्से के मन में यह आशंका पैदा कर दी कि समाज पर उसका दबदबा कम हो जाएगा। इससे उपजे असुरक्षा के भाव को भाजपा ने राम मंदिर जैसे मुद्दे उछालकर जमकर भुनाया। जहां इस पुस्तक के लेखक का कहना यह है कि बढ़ती समृद्धि के साथ लोगों के दिलोदिमाग से ईश्वर और धार्मिकता का रंग उतरने लगता है वहीं दक्षिण एशिया में हालात बिल्कुल उलट दिखलाई पड़ते हैं। पाकिस्तान में सामाजिक मसलों में मुल्लाओं का हस्तक्षेप वहां प्रजातंत्र के जड़ें पकड़ने में सबसे बड़ी बाधा है। श्रीलंका,  जहां लिट्टे का सफाया करने के नाम पर हजारों तमिलों को मौत के घाट उतार दिया गया, में पिछले कुछ समय से ईसाईयों और मुसलमानों पर हमले हो रहे हैं। म्यांनमार में बौद्ध धर्म के नाम पर प्रतिगामी राजनैतिक ताकतें गरीब रोंहिग्या मुसलमानों पर हमले कर रही हैं।
यहां हम यह साफ करना चाहेंगे कि धर्म और धर्मनिरपेक्षता में कोई विरोधाभास नहीं है। पुस्तक के लेखक को यह बात स्पष्ट करनी चाहिए थी। समाज के धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया से पुरोहित वर्ग की भूमिका लोगों के व्यक्तिगत जीवन तक सीमित हो गई परंतु इससे न तो धर्म समाप्त हुआ और ना ही ईश्वर। अब समाज में समृद्धि बढ़ने के साथ अधिकाधिक लोगों की सुरक्षित जीवन पानेे के लिए ईश्वर का सहारा लेने की आवश्यकता कम होती जा रही है। दक्षिण एशियाई देश इस दौरान एक जटिल प्रक्रिया से गुजरे। जहां एक ओर अत्यंत धार्मिक और ईश्वर में विश्वास करने वाले महात्मा गांधी और मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे लोगों ने धर्मनिरपेक्ष राज्य की वकालत की वहीं जिन्ना-जो न नमाज पढ़ते थे और न रोजे रखते थे-ने इस्लाम के नाम पर अलग देश बनाने के आंदोलन का नेतृत्व किया और नास्तिक सावरकर ने हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को आकार दिया।  हिन्दूवादी राजनीति के कई बड़े नेता अपने निजी जीवन में धार्मिक नहीं हैं परंतु राजनीति के क्षेत्र में वे धर्म और ईश्वर के नाम पर जुनून पैदा करने में सिद्धहस्त हैं।
हमारी तो इच्छा यही है कि लेखक की भविष्यवाणी सही सिद्ध हो और हम आशा करते हैं कि यह प्रक्रिया केवल पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं रहेगी। यह समझना महत्वपूर्ण है कि धार्मिकता का तेजी से बढ़ता प्रभाव, दरअसल, सामाजिक असुरक्षा का प्रकटीकरण है जिसका उपयोग यथास्थितिवादी राजनैतिक नेता यह सुनिश्चित करने के लिए कर रहे हैं कि सामाजिक संसाधनों के समाज के कमजोर वर्गों में समान वितरण की प्रक्रिया को बाधित किया जा सके। आज के भारत में हम दो राजनैतिक ताकतों के बीच चल रहे संघर्ष को स्पष्ट देख सकते हैं। एक ओर वे ताकतें हैं जो पूरे समाज के कल्याण की हामी हैं तो दूसरी ओर वे हैं जो धार्मिक आधार पर पूरे समाज का धु्रवीकरण करना चाहती हैं। दूसरी श्रेणी की राजनैतिक ताकतों का   आधार असुरक्षा के भाव से ग्रस्त मध्यम वर्ग में है और उन्हें बड़े औद्योगिक घरानों का समर्थन प्राप्त है। इस संघर्ष को देखकर कबजब मन में अत्यंत निराशा का भाव उत्पन्न होता है और ऐसा लगता है कि क्या कभी वह दिन आएगा जब दक्षिण एशिया में राजनीति के क्षेत्र को ईश्वर व धर्म से मुक्ति मिल सकेगी और फोकस संसाधनों के समान वितरण पर हो सकेगा। मोदी- भाजपा और उनकी जैसी अन्य शक्तियां जिस आर्थिक प्रगति की बात कर रही हैं उसमें समाज के  सभी वर्गों की उन्नति शामिल नहीं है। प्रगति की असली परिभाषा यही है कि वह समाज के सभी वर्गों के जीवन को बेहतर बनाए। साम्प्रदायिक ताकतों के विकास के खोखले दावों का पर्दाफाश करना आवश्यक है और उतना ही आवश्यक है ऐसी प्रगति पर जोर देना जिसमें समानता हो और जिसमें धार्मिक अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों की भलाई के लिए सकारात्मक कार्यक्रमों का समावेश हो। इसके साथ ही, यह भी आवश्यक है कि अंधधार्मिकता और धर्म के नाम पर राजनीति के खिलाफ मोर्चा खोला जाए।
पश्चिमी राष्ट्रों में भी समृद्धि और  प्रगति के फल समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंुच रहे हैं परंतु कम से कम ये देश धार्मिक पहचान की राजनीति से मुक्त हैं, जिसने दक्षिण और पश्चिम एशिया को अपने खूनी पंजे में जकड़ रखा है। यह पुस्तक हमें आशा का संदेश देती है। हम उम्मीद करते हैं कि इस पुस्तक की भविष्यवाणी उन देशों के मामले मंे भी सही सिद्ध होगी जिनमें धार्मिक पहचान की राजनीति, मानवाधिकारों की अवधारणा को कुचल रही है और समाज के दमित और वंचित तबकों के समक्ष अस्त्तिव का संकट खड़ा कर रही है। 


-राम पुनियानी

2 टिप्‍पणियां:

Devdutta Prasoon ने कहा…

बहित अच्छी समीक्षा है !

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

बहुत सुंदर समीक्षा ,,,

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