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बुधवार, 18 दिसंबर 2013

महामानव होने की ओर यात्रा


हमारे एक ओर अहं है , दूसरी ओर आत्मा | अह खडाकाश की तरह है - घर के अन्दर का आकाश है |  उससे जुदा हुआ महाकाश है ,वह आकाश असीम है , विश्वव्यापी है |
        - .रवीन्द्रनाथ टैगोर
हमारी तीन जन्मभूमिया है और तीनो एक -दूसरे से मिली हुई है | पहली जन्मभूमि है पृथ्वी | मनुष्य का वासस्थान पृथ्वी पर सर्वत्र है |ठंडा हिमालय और गरम रेगिस्तान , दुर्गम उत्तुंग पर्वत - श्रेणी और बंगाल की तरह समतल भूमि -सभी जगह मानव का निवास है |
मनुष्य का वासस्थान वास्तव में एक ही है - अलग अलग देशो का नही , सारी मानव - जाति का |मनुष्य के लिए पृथ्वी का कोई अंश दुर्गम नही -पृथ्वी ने उसके सामने अपना हृदय मुक्त कर दिया है | मनुष्य का द्धितीय वासस्थान है -स्मृति जगत | अतीत से पूर्वजो का इतिहास लेकर वह काल का नीड़ तैयार करता है -यह नीड़ स्मृति की ही रचना है |स्मृति जगत में मानव -मात्र का मिलन होता है |विश्व मानव का वासस्थान एक ओर पृथ्वी है ,दूसरी ओर सारे मनुष्यों का स्म्रितिलोक | मनुष्य समस्त पृथ्वी पर जन्म ग्रहण करता है और समस्त इतिहास में भी |
उसका तृतीय वासस्थान है -आत्मलोक |इसे हम मानवचित्त का महादेश कह सकते है | यही चित्तलोक मनुष्यों के आंतरिक योग का क्षेत्र है |किसी का चित्त संकीर्ण दायरे में आबद्ध है , किसी के चित्त में विकृति है -लेकिन एक ऐसा व्यापक चित्त भी है ,जो विश्वजगत है , व्यक्तिगत नही |उसका परिचय हमें अकस्मात ही मिल जाता है - किसी दिन अचानक वह हमें आव्हान देता है |साधारण व्यक्ति में भी देखा जाता है कि झा वह स्वार्थ भूल जाता है , प्रेम करता है वहा उसके मन का एक ऐसा पक्ष है , जो 'सर्वमान्य' के चित्त की ओर प्रवृत है |
मनुष्य विशेष प्रयोजनों के कारण घर की सीमाओं में बद्ध है ,लेकिन महाकाश के साथ उसका सच्चा योग है |व्यक्तिगत मन अपने विशेष प्रयोजनों की सीमा में संकीर्ण होता है , लेकिन उसका वास्तविक विस्तार सर्वमान्य -चित्त में है | वहा की अभिव्यक्ति आश्चर्यजनक है |एक आदमी के पानी में गिरते ही दुसरा उसे बचाने के लिए कूद पड़ता है |दूसरे की प्राण - रक्षा के लिए मनुष्य अपने प्राण संकट में डाल सकता है |हम देखते है किमनुष्य अपनी रक्षा को ही सबसे बड़ी चीज नही गिनता |इसका कारण यही है कि प्रत्येक मनुष्य कि सत्ता दुसरो कि सत्ता से जुडी हुई है | मेरा जन्म ऐसे परिवार में हुआ , जिसका धर्म -साधन एक विशेष प्रकार का था | उपनिषद , मेरे पिताश्री कि अभिज्ञता और अन्य साधको कि साधना -इन सबसे मिलकर हमारी पारिवारिक साधना का निर्माण हुआ | मैं स्कूल से भागने वाला बालक था | जो भी जगह घिरी हुई होती है ,वह मेरा मन नही लगता |जो अभ्यास बाहर से लादा जाता है , उसे मैं ग्रहण नही कर पाता ,लेकिन पिताश्री ने इस विषय में कभी भर्त्सना नही की |उन्होंने स्वंय स्वाधीनता के साथ पूर्वजो के संस्कारों का त्याग किया था |गंभीर से गंभीर जीवन तत्व के सम्बन्ध में मैं आज़ादी से सोचता था |यह बात माननी होगी कि मेरी यह स्वतंत्रता कभी -कभी उन्हें दुःख पहुचाती थी -फिर भी उन्होंने कभी कुछ कहा नही |

एक दिन मैं सवेरे उठकर चौरंगी के घर के बरामदे में खड़ा था | मैंने देखा कि पेड़ के पीछे से सूर्य उदित हो रहा है | जैसे ही पेड़ से सूर्य का आविर्भाव हुआ ,मेरे मन का पर्दा खुल गया | मुझे लगा कि मनुष्य आजन्म एक आवरण लिए रहता है |उसकी स्वतंत्रता उसी तक सीमित है |इस स्वतंत्रता का लोप होने से सांसारिक प्रयोजनों कि पूर्ति में असुविधा होती है , लेकिन उस दिन सूर्योदय होते ही मेरा आवरण दूर हुआ | मैंने सोचा , अब सत्य को मुक्त दृष्टि से देख पाया हूँ |दो लोग जरा दूर एक-दूसरे के कंधो पर हाथ धरे , हँसते -हँसते चले जा रहे थे |उनको देखकर मैंने एक अनिर्वचनीय सौन्दर्य का अनुभव किया |
मैंने कहा है कि हमारे एक ओर अह है , दूसरी ओर आत्मा |अह खडाकाश कि तरह है - घर के अन्दर का आकाश है |उससे जुदा हुआ महाकाश है , एह आकाश असीम है , विश्वव्यापी है |'मानवत्व ' से जिस विराट पुरुष की ओर संकेत होता है वह हमारे खडाकाश में भी है |हममे ही चेतना के दो पक्ष है -एक हमसे बद्ध है , दुसरा सर्वत्र व्याप्त है |ये दोनों सलग्न है ,और इनको मिलाकर ही हमारी परिपूर्ण सत्ता बनती है ,इसीलिए मैंने कहा है कि जब हम अह को एकांगी भाव से पकडकर रखते है तब हम मानव -धर्म से च्युत हो जाते है |तब हमारा उस महामानव से - विराट पुरुष से - विच्छेद हो जाता है ,जो हम्मे विद्यमान है |जब अह उदात्त होकर आत्मा की ओर उन्मुख होता है तो उसे नया जीवन मिलता है |कभी उसी अह के क्रीडा -भवन में मैं गिरफ्तार था |अपने प्राण को ही मैंने पकड रखा था , वृहत सत्य रूप नही देखा था | उस दिन अन्धकार से मैं आलोक में आया - बाहर के , असीम के आलोक में | कारागृह का द्वार खोलकर बाहर निकलने के लिए , जीवन की सारी विचित्र लीलाओं के साथ सम्मलित होकर प्रवाहित होने के लिए अन्तकरण व्याकुल था | उस परवाह की गति थी महान ,विराट समुद्र की ओर | उसी को अब मैंने विराट पुरुष कहा है |उसी महामानव में जाकर नदी मिलेगी , लेकिन सबके बिच से गुजरते हुए | यह पुकार मैंने सुनि | सूर्य -प्रकाश में जागकर मन व्याकुल हो उठा |यह आव्हान कहा से आया ?यह महासमुद्र की ओर आकर्षित करता है , मानव-मात्र के बितर होकर ,संसार के भीतर होकर |भोग -त्याग किसी को भी यह अस्वीकार नही करता -सबका स्पर्श -बोद्ध करके आखिर उस स्थान पर पहुचता है जिसके प्रति मैंने कहा -
आज न जाने क्या हुआ , प्राण जाग उठा
दूर से मानो मैंने महासागर का गीत सुना |
उसी सागर की ओर हृदय दौड़ता है |
उसी तट पर जाकर जीवन शेष होना चाहता है
|
मनुष्य -मनुष्य में स्नेह , प्रेम और भक्ति के सम्बन्ध तो है ही ,लेकिन उन्हें जब हम विशेष रूप से देखते है , विशाल पृष्ठभूमि में देखते ,तौंमे ऐक्य और तात्पर्य का बोद्ध होता है |मैंने बिलकुल ही मनमाना गीत गाया हो , ऐसी बात नही है |यह गीत घड़ी दो घड़ी का नही है ,यह अंतहीन है |इसमें एक धारावाहिकता है , प्रत्येक मनुष्य के हृदय में इसकी अनुभूति है |
मेरे गान में मनुष्यमात्र का योगदान है |
 -कबीरsunil kumar dutta's profile photo

सोमवार, 6 अगस्त 2012

क्रान्तिकारियो महापुरुषों को जातीय आधार में बाटना खतरनाक है ......

विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता की सीढिया चढ़ रहे बच्चो के प्रति उनके अभिभावकों और शुभचिंतको का खुश होना एक दम स्वाभाविक है | सफलता की खुशियों में घर परिवार से लेकर मित्रो परिचितों आदि की किसी न किसी रूप में भागीदारी भी जरुर होती है | यह सब स्वाभाविक रूप से पहले भी चलता रहा है और अब भी चल रहा है | हां इन खुशियों का आज जैसा प्रचार माधय्मी प्रदर्शन पहले एक दम नही था |क्योंकि आज से 20 -- 25 साल पहले तक न ही ऐसे प्रचार माध्यम थे और न ही उन सफलताओं का श्रेय अपने कोंचिंग सेंटर या संस्थान को दिलाने लोग थे | बताने की जरूरत नही की ये लोग घर परिवार या मित्र मण्डली से अलग होते हुए भी ऐसे प्रदर्शनों में सबसे आगे रहते है ताकि प्रतिभागियों की सफलता का इस्तेमाल अपने कोचिंग विजनेस के विकास विस्तार में कर सके | इसके अलावा अब सफलता की खुशियों के आयोजनों में एक नए चलन की भी शुरुआत हो गयी है | विभिन्न जातीय संगठनों और उनके पदाधिकारियों द्वारा अपनी जाति के सफल युवको \ युवतियों को सामाजिक रूप से सम्मानित करने की नयी परम्परा चलने लग गयी है परिवारजनों के साथ कोंचिंग सेंटर के टीचर आदि का ऐसे अवसरों पर शामिल होना तो फिर भी किसी बच्चे की सफलता में उनके योगदान का एक परिलक्षण होता है | इसे सफलता प्राप्त किए बच्चे अक्सर अपने माता -- पिता व टीचरों के योगदान के रूप में कबूलते है | पर विभिन्न जातियों के जातीय संगठनों द्वारा अपनी जाति के सफल प्रतिभागियों के सम्मानित किए जाने वाले आयोजनों का कोई औचित्य नही है | अगर कोई औचित्य है तो , शुद्ध रूप से इस्तेमाली है | वह जातीय संगठनों को बढावा देने के लिए इन प्रतिभागियों और उनकी सफलताओं का इस्तेमाल मात्र है | सच्चाई यह है की किसी सफल प्रतिभागी को सफलता की उंचाइयो पर पहुचाने में केवल उसी के धर्म या जाति के लोगो का उसी जाति के टीचरों का या फिर प्रतिभागियों को विभिन्न रूप में मिले अन्य सेवाओं में उसी धर्म जाति के लोगो का हाथ नही होता है | वर्तमान दौर में तो ऐसा कदापि संभव नही है | किसी को सफलता दिलाने में बहुतेरे ज्ञात , अज्ञात लोगो का नीचे से उपर तक के लोगो का हाथ होता है | इसका सम्बन्ध उसके धर्म व जाति या आगे बढकर कहे तो उसके क्षेत्र व राष्ट्र के लोगो तक सीमित नही रहता | उदाहरण आधुनिक प्राकृतिक विज्ञान और सामाजिक विज्ञान का लगभग समूचा ज्ञान मुख्यत: यूरोपीय वैज्ञानिकों , विद्वानों खोजकर्ताओं की देन है | इसे हम नकार नही सकते है | इसी तरह से प्रत्यक्ष रूप में परिवार के लोगो , शुभचिंतको टीचरों के योगदान को भी नही नकार सकते लेकिन किसी धर्म जाति विशेष के धार्मिक या जातीयता संगठन के योगदान को जरुर नकारा जा सकता है क्योंकि वह कोई ऐसा योगदान है ही नही | अगर किसी जाति विशेष के साथ उदाहरण दलित जातियों के साथ किसी हद तक ऐसा कुछ रहा भी है तो अब वह उस रूप में बहुत कम है और वह लगातार घटता जा रहा है | इसके वावजूद सफल प्रतिभागियों को लेकर अपने जातीय गौरव , जातीय कल्याण उथान का प्रदर्शन करने में मंचो पर विभिन्न जातियों के अनपढ़ या कम शिक्षित लोग मौजूद रहते है | ऐसे में लोग स्वंय भी जातीय संगठनों द्वारा बन्दन, अभिनन्दन हासिल किए रहते है | यही काम अब जातीय संगठनों के मंचो से स्वतंत्रता आन्दोलन के शहीदों , क्रान्तिकारियो के साथ किया जाने लगा है | जाति के नाम पर उनकी स्मृतिया मनाने का काम किया जा रहा है | इसके जरिये उन्हें अपनी जाति के ( न की समूचे राष्ट्र व समाज के ) क्रांतिकारी नेता के रूप में परिलक्षित करने का काम किया जा रहा है | यह क्रान्तिकारियो को याद करना तथा उनका अभिनन्दन करना नही है | उनके कद को बढाना भी नही है | बल्कि उन्हें जातीयता के खांचे में डालकर उनके राष्ट्रीय कद को छोटा या संकुचित कर देना है | आखिरकार उनके त्याग , बलिदान विशिष्ट जातीय हितो के दायरे में कदापि सीमित नही होते | वे व्यापक होते है | राष्ट्र व व्यापक समाज के हित में होते है |
सफल प्रतिभागियों के बारे में भी यह बात इस रूप में कही जा सकती है की वे किसी जाति या धर्म के सदस्य के रूप में सफलताए नही अर्जित करते | बल्कि समाज की व्यापक उपलब्धियों के आधार पर तथा विभिन्न धर्म व जाति के लोगो के शाह्ता सहयोग से सफलता पाते रहते है | अत: उन्हें अपने धर्म जाति के रूप में गौरवान्वित करने की चल रही यह परम्परा कत्तई ठीक नही है | बल्कि सफल प्रतिभागियों के या किन्ही क्षेत्र में सफलता अर्जित किए व्यक्तियों के स्वस्थ व जनतांत्रिक विकास की विरोधी है और उसे ग्रसित करने वाली भी है |
-सुनील दत्ता ...........
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