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सोमवार, 21 अप्रैल 2014

बीजेपी का खतरनाक ओबीसी कार्ड

  संघ परिवार के बारे में यह जगजाहिर है कि वह अपने उद्देश्यों को हासिल करने के लिए किसी भी झूठ-फरेब और विषैले प्रचार का सहारा ले सकता है। इस बार वह जाति का कार्ड सिद्धांत नहीं, सुविधा और अवसर के अनुसार खेल रहा है। बहुत समय नहीं गुजरा, जब भाजपा ने मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करने के लिए वी.पी. सिंह की सरकार गिरा दी थी। इसका कारण यह था कि सवर्ण मानसिकता वाले बंधु सदियों से पिछड़े वर्गों के साथ न्याय नहीं चाहते थे। एक संपूर्ण-समग्र हिंदू समाज के नाम पर वह पिछड़ी जातियों को यथास्थिति के दलदल में रखना चाहते थे। विभिन्न पिछड़े वर्गों के साथ सामाजिक न्याय की प्रक्रिया अनपलट संगठन हो  गई, तो मजबूरी में भाजपा को खामोश रहना पड़ा।
    लेकिन उनके दिल नहीं बदले। जैसे आर.एस.एस. के वरिष्ठ पदाधिकारी, सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा, ‘‘जाति के नाम पर वोट की ताकत हासिल करने वाले नेता इस बार सत्ता में आए तो हिंदुओं को और दीनहीन और उत्पीड़न का शिकार बना कर छोड़ेंगे। इनको वोट का मतलब है, देशद्रोहियों को समर्थन।’’ अर्थात, जाति के नाम पर वोट माँगना देशद्रोह की श्रेणी में आता है।
    जब फ्री स्टाइल कुश्ती की तरह चुनाव लड़ा जा रहा हो और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार, नरेंद्र मोदी को फ्री स्टाइल में बोलने की आदत हो, तो देखिए क्या अनर्थ हो जाता है। कृष्ण गोपाल ने जिसे वर्जित बताया, मोदी ने वही काम कर डाला। कांग्रेस ने और खुद राहुल गांधी ने स्पष्ट किया कि पार्टी प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार क्यों नहीं घोषित कर रही। लेकिन मोदी ने कुछ और कारण ढूँढ निकाला, क्योंकि उन्हें जाति का कार्ड खेलना था। उन्होंने कहा, ‘‘राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं बने क्योंकि उन्हें समाज के एक निम्न वर्ग से आए व्यक्ति के हाथों पराजित होना पसंद नहीं था। कांग्रेस मानती है कि निम्न जाति के जिस व्यक्ति ने चाय बेची हो, जिसकी माँ घरेलू नौकरानी रही हो, उससे लड़ना ठीक नहीं।’’
    जिस संगठन का देश की आजादी की लड़ाई से ही दूर-दराज का वास्ता न रहा हो, उसके नेता कांग्रेस की गौरवशाली परंपरा के ज्ञान से वंचित हैं तो इसमें उनका दोष नहीं। कांग्रेस में रह कर स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुए तथाकथित निम्न जाति के लोगों की सूची बहुत लंबी है। उनकी जाति का उल्लेख उन महापुरुषों का अनादर होगा। ऐसे लोगों की भी सूची बहुत लंबी है, जिन्होंने अपना सब कुछ त्याग कर आजादी की लड़ाई का रास्ता चुना। इन्हीं में से एक था नेहरू परिवार। अपने समय के सबसे
धनी वकीलों में एक, मोतीलाल नेहरू ने वकालत छोड़ दी थी। जवाहर लाल नेहरू ने आनंद भवन के  आनंद को त्याग कर गरीबी में संघर्ष का मार्ग चुना था। रोटी चलाने के लिए आनंद भवन के बर्तन-भाड़े तक बेचे गए थे। नेहरू के निधन के बाद उनकी बेटी इंदिरा गांधी दिल्ली में बेघर हो गई थीं। तब कांग्रेस के बड़े नेताओं ने लाल बहादुर शास्त्री से कह कर शोक संतप्त इंदिरा को मंत्री बनवाया था, ताकि रहने का ठिकाना हो जाए। बाद में इंदिरा गांधी ने आनंद भवन ही राष्ट्र को समर्पित कर दिया था। इसलिए नरेंद्र मोदी के मुँह से अपनी जाति और गरीबी का उल्लेख शोभा नहीं देता,    और भी अशोभनीय है कि मोदी राजनैतिक लाभ के लिए अपनी माँ का जिक्र कर रहे हैं। नारी पूज्य होती है। किसी व्यक्ति की माँ उसके लिए विशेष पूज्य होती है। माँ तो बहुत प्रतिकूल स्थितियों में भी बच्चे के मुँह में निवाला डालती है। मोदी की माँ की भी कुछ प्रतिकूल स्थितियाँ रहीं होंगी। उन्होंने माँ के धर्म का निर्वाह किया। अब चुनावी मंच से बार-बार उस परम पुनीत धर्म का उल्लेख करने वालों के बारे में क्या कहा जाए!
-प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

रविवार, 20 अप्रैल 2014

‘चाय वाले ’ की असलियत


    अपने जीवन के असली या काल्पनिक कष्टों का बार-बार बयान कर जनता की सहानुभूति हासिल करने की कोशिश अब नरेंद्र मोदी की आदत बन चुकी है। शायद ही उनकी कोई ऐसी सभा होती हो, जिसमें वह अपने को चाय बेचने वाला न बताते हों। वह किस तरह के चाय बेचने वाले थे, यह नहीं बताते। उनके कथन का यह अर्थ निकलता है कि बाल्यावस्था में वह इतना गरीब थे कि चाय बेचा करते थे। दिमाग में छवि आती है ट्रेनों में चाय बेचने वाले की या इसी तरह कुछ और। अब वरिष्ठ कांग्रेस नेता और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल ने रौशनी डाली है कि मोदी चाय बेचने वाले कोई गरीब-दुखिया नहीं थे।
    मोदी के जीवनीकार नीलांजन मुखोपाध्याय ने ‘चाय बेचने वाले’ की असलियत विस्तार से बताई है। सामग्री जुटाने के लिए नीलांजन गुजरात के मेहसाणा जिले में मोदी के गाँव वडनगर तक गए। उन्होंने उस घर को भी देखा ,जहाँ मोदी का जन्म हुआ था। वडनगर रेलवे स्टेशन के बाहर मोदी के पिता दामोदर दास की चाय की दुकान थी। छह साल के मोदी पास ही में अपने घर से पिता की दुकान तक आया करते थे। यह किसी भी बच्चे के लिए बिल्कुल स्वाभाविक बात है। आते थे तो पिता की कुछ सहायता भी कर देते थे।
    यह बात 1956 के आस-पास की है। तब अधिकांश भारत गरीब था। पूरा समाज पिछड़ा था। मध्य वर्ग और निम्न मध्य वर्ग बहुत सीमित था। उस लिहाज से मान सकते हैं कि मोदी गरीबी में रहे। लेकिन यह भी जान लेना जरूरी है कि चाय की दुकान चलाने वाला 1956 के संदर्भ में पैसे वाला भी हो सकता है, सामान्य भी हो सकता है और गरीब भी हो सकता है। जो भी हो, पेट की आग बुझाने के लिए मोदी को चाय नहीं बेचनी पड़ी और अगर मान लें कि किसी ने अपने जीवन के किसी दौर में चाय बेची है या अब भी बेच रहा है तो सार्वजनिक मंचों से इसमें प्रचार की क्या बात हो गई?
    अगर कोई इसे भुना रहा है, तो इसके पीछे कौन सी मनोदशा हुई? तय है कि वह व्यक्ति चाय बेचने के काम को सम्मानजनक नहीं मानता। यह आत्म-पीड़न का मनोविज्ञान हुआ। मोदी एक बड़े पद के दावेदार हैं। आत्म-पीड़न की तस्वीर आए दिन पेश करते रहना उन्हें शोभा नहीं देता। चाय बेचने के काम को हिकारत के दबे भाव के साथ पेश करना और भी अशोभनीय है। 
यह ईमानदारी की गारंटी नहीं है
मोदी जी!
    नरेंद्र मोदी के मीडिया सलाहकारों और स्क्रिप्ट राइटरों को कितनी मेहनत करनी पड़ती होगी। सभा स्थल के अनुसार विषय चुनना और भाषण को रसीला बनाने के लिए डायलॉग लिखना। लेकिन हर बार कुछ न कुछ गड़बड़ हो जाता है। कभी ऐतिहासिक तथ्यों में हास्यासपद दोष तो कभी कुछ। ताजा मिसाल है हिमाचल की सभा। मोदी ने भरोसा दिलाया-मेरे आगे पीछे कोई नहीं जिसके लिए मैं करप्शन करूँगा। यह बात भी जमी नहीं। आगे-पीछे का कथन सत्य पर
आधारित नहीं है। अब कोई घर से भाग खड़ा हो और अपनी जिम्मेदारी न महसूस करे तो बात दीगर है।
    जशोदाबेन से बाकायदा उनकी शादी हुई थी। तीन साल वह उनके साथ रहीं। मोदी उन्हें छोड़ कर वडनगर से निकल आए। कभी खोज-खबर नहीं ली। एक हिंदू विवाह के समय जो सात वचन देता है, मोदी ने उनका पालन नहीं किया। मोदी ने विधिवत परित्याग भी नहीं किया। राम भरोसे जशोदाबेन को छोड़ दिया। अविवाहित होने का ढोंग करते रहे।
    भ्रष्टाचार न करने का उनका तर्क भी कुतर्क है। अविवाहित रहना या घर छोड़ कर अलग रहना ईमानदारी की गारंटी नहीं है। एक उत्तरी राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री के बारे में किस्से मशहूर हैं। भ्रष्टाचार के मामलों की फाइल तैयार करने में सी.बी.आई. को महीनों लग गए होंगे। मामला सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में है। वह अविवाहित हैं। एक दक्षिणी राज्य की मुख्यमंत्री का किस्सा भी इसी तरह का है। उनकी सालियों और जूतों-चप्पलों  तक के किस्से मशहूर हो गए। उनकी तुलना फिलीपीन की लेडी मार्कोस से की जाने लगी, जिनके भ्रष्टाचार की अनगिनत कहानियाँ थीं। अगर किसी के बाल-बच्चे हैं तो इस आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि वह भ्रष्ट होगा या भ्रष्टाचार कर सकता है। भारतीय राजनीति में इसकी सैकड़ों मिसालें मिल जाएँगी।
    मोदी जी, भ्रष्टाचार का संबंध व्यवस्था से भी होता है और चारित्रिक पतन से भी। धन का लोभ मुख्य रूप से भ्रष्टाचार को पनपाता है। लोभी तथा क्रोध और झूठ मानव स्वभाव का हिस्सा है। जो इन विकारों पर  विजय पा लेते हैं, वह महात्मा हो जाते हैं (आशा है, महात्मा के उल्लेख से आप को एतराज नहीं होगा क्योंकि महात्मा से आशय महात्मा गांधी से है!)।
    अब आप सोचें इनमें से कितने विकारों पर आप ने विजय प्राप्त कर ली है। इसलिए करप्शन के बारे में आपने जो भरोसा दिलाया है, उस पर यकीन नहीं होता। 
-प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

शनिवार, 19 अप्रैल 2014

जब किसी को भार समझा जाने लगे


    अगर धर्म, जाति, रंग या नस्ल के आधार पर किसी समुदाय को देश या बहुसंख्यक वर्ग पर भार समझा जाने लगे, तो उसकी तर्कसंगत परिणति यह होती है कि उस ‘‘आश्रित’’ वर्ग को बहिष्कृत कर दिया जाना चाहिए। याद करें, पहले महायुद्ध में जर्मनी की हार के बाद क्या हुआ था। जर्मनी की हर समस्या के लिए
यहूदियों को जिम्मेदार ठहराया जाने लगा। यहूदी विरोधी भावनाएँ पहले से मौजूद थीं। हिटलर और उसका साथ देने वाली ताकतों ने यहूदियों से छुटकारा पाने का फैसला कर लिया। 60 लाख यहूदी मार डाले गए।
    अब देखिए भारत में क्या हो रहा है। संघ परिवार हमेशा मुस्लिम विरोधी रहा है। लेकिन अब नफरत के कैप्सूल खुल कर बाँटे जा रहे हैं।
    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डाॅ. कृष्ण गोपाल कहते हैं कि सच्चर कमेटी की सिफारिशों के जरिए भारत के एक और विभाजन की नींव रखी जा रही है, इससे हिंदुओं की मुसीबत और बढ़ जाएगी, हिंदुओं के पैसे और कमाई से मुसलमानों को सहूलियत देने की तैयारी चल रही है। वह यह भी कहते हैं कि भारत किसी नेता नहीं, हिंदुओं के कारण ही पंथनिरपेक्ष (सेकुलर और धर्मनिरपेक्ष शब्द संघियों का दिमाग असंतुलित कर देते हैं) है।
    संघ का जहरीला और घातक सोच बिना किसी लागलपेट के सामने आ गया। देश की दौलत किसी एक वर्ग की नहीं बल्कि पूरे देश की होती है और पूरे देश में बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक सभी शामिल होते हैं। आधुनिक राज्यसत्ता सर्वग्राही होती है। समान नागरिकता का बोध राज्य सत्ता के अस्तित्व की एक बुनियादी शर्त है। जहाँ-जहाँ, जब-जब इस समान नागरिकता को नकारा गया है, परिणाम भयानक दुखद हुए हैं।
    पाकिस्तान टूटा क्योंकि पश्चिमी हिस्से के पंजाबियों ने यह यकीन कर लिया कि वही पाकिस्तान हैं। उन्होंने पूर्वी हिस्से के बंगालियों को उनके निहायत वाजिब अधिकार देने से मना कर दिया। सर्व वर्चस्व बनाए रखने के हठ ने युगोस्लाविया के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।
    महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने भारत की अटूट एकता का फार्मूला स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ही खोज लिया था। फार्मूला था सबकी शिरकत का, सबको साथ लेकर चलने का। इंदिरा गांधी ने मिजोरम में उस फार्मूले पर अमल किया। नतीजा यह हुआ कि हथियारबंद बगावत के नेता लल डेंगा संविधान की कसम खाकर भारत की एकता के सिपाही बन गए। आपत्तिजनक कार्यों के कारण जिन शेख अब्दुल्ला को जेल में डाल दिया गया था, इंदिरा गांधी ने उन्हीं को कश्मीर की बागडोर सौंप दी। असम समझौते के बाद राजीव गांधी ने लाल किले के प्राचीर से घोषणा की थी, कांग्रेस हारी लेकिन भारत जीता। राष्ट्र की मुख्य धारा से अलग हुए लोगों को साथ लाने के इस जज्बे ने, इस सिद्धांत ने भारत को रखा है और एकता की गारंटी दी है।
    संघ भारत को उस प्राणवायु से वंचित करने में लगा है। ऐतिहासिक कारणों से भारत के कई वर्गों में गरीबी और पिछड़ापन है। इनमें मुसलमान भी हैं।
    सीधी बात है, देश के विकास का फल अगर सभी वर्गों को नहीं मिलेगा, देश का स्वामी होने का भाव अगर समान रूप से सबमें नहीं होगा और परायेपन की भावना मौजूद रहेगी तो देश मजबूत नहीं हो सकता। राज्यसत्ता में अधिकारपूर्वक जिनकी हिस्सेदारी नहीं होती, वे उस राज्यसत्ता के लिए सहर्ष प्राण न्योछावर करने के लिए भी तैयार नहीं रहते। इसलिए हे कृष्ण गोपाल जी नफरत फैला कर, ‘हम और वो’ की स्थाई दीवार खड़ी कर देश को तोड़ने का काम तो आप का संगठन कर रहा है। इसमें आप का नहीं, मानसिकता का दोष है। इसी मानसिकता ने राष्ट्रपिता की हत्या करवाई थी।
-प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

भेडि़ए की रामनामी चादर

आने वाले चुनाव की एक खास बात यह है कि इस बार फिरकापरस्ती का भेडि़या रामनामी चादर कभी उतार देता तो कभी ओढ़ लेता है। कोई स्थाई मुद्रा नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आनुषांगिक संगठनों के नेता मौका देख कर बोलते हैं। हर जगह एक रिकार्ड नहीं बजाया जा रहा। 7 फरवरी को नरेंद्र मोदी ने अहमदाबाद में तीन दिन के ‘उम्मत सम्मलेन’ को संबोधित किया। यह मुस्लिम उद्यमियों का सम्मलेन था। आधुनिक इतिहास में साबरमती नदी महात्मा गांधी के नाम से जुड़ी हुई है, इसलिए प्रतीक स्वरूप ‘उम्मत सम्मलेन’ इसी के किनारे रखवाया गया। मोदी ने मुसलमानों को रिझाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने कहा कि देश के विकास के लिए धर्म, जाति आदि का भेद किए बगैर सबको समानता के अवसर मिलने चाहिए। सबको भयहीन माहौल मिलना चाहिए। उन्होंने रेखांकित किया कि दस साल से गुजरात में ये सब मिल रहा है।
    लेकिन दो दिन बाद, 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश की राजधानी का सीन देखिए। संघ के ही सूत्रों से मीडिया को मिली जानकारी के अनुसार भगवा खेमे ने मोदी को प्रधानमंत्री की गद्दी तक पहुँचाने के लिए एक योजना बनाई है। इसके तहत मठों और मंदिरों पर देश भर में ध्यान केंद्रित किया जाएगा। भगवान की आरती और भोग में शामिल होने के लिए आने वाले भक्तों को मोदी के प्रताप की जानकारी दी जाएगी। मोदी के भाषणों के कैसेट दिए जाएँगे। पुस्तिकाएँ दी जाएँगी। मठों, मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थलों की सूची बनाने का जिम्मा भारतीय जनता पार्टी के जिलाध्यक्षों को सौंपा गया है।
    भगवान के दर्शन के लिए आने वालों को मोदी के ‘‘दिव्य रूप’’ के दर्शन कराए जाएँ और उसमें नफरत का तड़का न लगे, यह कैसे संभव है। इसलिए भक्तों को बताया जाएगा कि मिशन मोदी को सफल न बनाया तो इसलामी आतंकवाद बढ़ेगा। मुसलमानों के वोट हासिल करने की होड़ में जुटे दल हिंदुओं की भावी पीढि़यों के लिए  नए खतरे पैदा कर देंगे। तो राम मंदिर को भूल राम का इस्तेमाल इस तरह करने लगे! जाहिर है, साबरमती के किनारे नहीं, गोमती के किनारे भाजपा का असली चेहरा सामने आया। अल्पसंख्यक, उसमें भी मुख्यतः मुस्लिम विरोध पर आधारित घृणा संघ परिवार की सिफत है। उसका त्याग संघ परिवार के लिए असंभव है। लेकिन ताल ठोक रहे हैं आतंकवाद से लड़ने की, इसलिए यह याद दिलाना जरूरी है कि अहमदाबाद के अक्षरधाम मंदिर और भारत की प्रभुसत्ता की प्रतीक, संसद पर आतंकी हमलों के समय इन्हीं शूरवीरों की सरकार थी।
 -प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से



गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

धन्य है ये चाल और चरित्र!

ढाई साल के अंदर ही भाजपा में बी.एस. येदुरप्पा की वापसी के साथ ‘अलग चाल, चलन और चरित्र’ का पार्टी का दावा एक बार फिर खोखला साबित हुआ। वापसी भी सुनिश्चित हुई प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार (वैसे इस पद के प्रथम प्रत्याशी लाल कृष्ण आडवाणी अब भी घात लगाए बैठे हैं) नरेंद्र मोदी की इच्छा पर। बड़ी उम्मीदों के साथ येदुरप्पा को वापस लाया गया है। उन्होंने कर्नाटक में विधानसभा का चुनाव जीत कर दक्षिण में पार्टी का झंडा ऊँचा किया था। उन्हीं की वजह से पार्टी के मुँह पर कालिख भी लगी थी और उन्हें बेआबरू होकर पार्टी से बाहर होना पड़ा था।
    यूँ तो येदुरप्पा सरकार की छवि पहले से ही धूमिल हो रही थी, नवंबर 2010 में खुलकर आरोप लगा कि बंगलूर और शिमोगा में हुए भूमि घोटालों में उनके पुत्रों को लाभ मिला। बेलारी, तुमकुर और चित्रदुर्ग में अवैध खनन में भी येदुरप्पा परिवार की संलिप्तता रोशनी में आई। लोकायुक्त संतोष हेगड़े की रिपोर्ट से येदुरप्पा पर मर्मांतक चोट हुई। लोकायुक्त को सरेआम चुनौतियाँ दी जाने लगीं। येदुरप्पा कुर्सी पर बने रहने के लिए आखिरी वक्त तक विरोधियों से दो-दो हाथ करते रहे। पार्टी नेतृत्व का एक वर्ग भी उनके साथ खड़ा था। लेकिन वक्त उनके खिलाफ था। पार्टी लगातार कलंकित हो रही थी। 31 जुलाई 2011 को उन्होंने मुख्यमंत्री का पद छोड़ दिया। 
    येदुरप्पा के इस्तीफे के फौरन बाद पार्टी नेतृत्व अचानक नैतिकता के हिमालय पर बैठा हुआ महसूस करने लगा। उन दिनों यात्राएँ कर रहे आडवाणी ने कहा, ‘‘हम पार्टी की किसी भी कमजोरी को हलके-फुल्के नहीं लेते। कर्नाटक में हमने यह साबित कर दिया। हमने उन्हें पहले ही चेतावनी दे दी थी। लेकिन लोकायुक्त रिपोर्ट आने के फौरन बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। हम इस तथ्य से अच्छी तरह अवगत हैं कि काग्रेस के खिलाफ कोई भी पार्टी जनता का विश्वास नहीं जीत सकती, अगर वह खुद उसी तरह की कमजोरियों से ग्रस्त है।’’
    लोकायुक्त अदालत ने एक भूमि घोटाले में येदुरप्पा को जेल भेज दिया। आर.एस.एस. की इच्छा से भाजपा के अध्यक्ष बने नितिन गडकरी ने कहा, ‘‘जो भ्रष्टाचार में लिप्त रहना चाहते हैं, उनके लिए पार्टी में कोई स्थान नहीं हो सकता। उनके लिए दरवाजे बंद हैं।’’ जब बड़े नेता किसी को पीट रहे हों तो छोटों का भी हाथ साफ करने का मन हो जाता है। इसलिए शाह नवाज ने कहा, ‘‘भाजपा में भ्रष्टाचार बिल्कुल नाकाबिले बर्दाश्त है। लोकायुक्त की रिपोर्ट आने के बाद पार्टी ने कुछ दिनों नहीं, कुछ घंटों में फैसला ले लिया।’’
    उन दिनों चर्चा थी और असलियत भी यह थी कि आडवाणी और उनके समर्थक येदुरप्पा के सख्त खिलाफ हो गए थे। अनंत कुमार खुल कर बोल रहे थे। 9 जनवरी 2014 को बंगलूर में पार्टी मुख्यालय में इन्हीं अनंतजी ने येदुरप्पा को मिठाई खिलाकर पार्टी में उनका स्वागत किया। उन्होंने इस अवसर पर घोषणा की, ‘‘हम फिर अलग कभी नहीं होंगे। हम साथ-साथ रहेंगे। मिलकर संघर्ष करेंगे।’’  येदुरप्पा ने कहा, ‘‘जिस पार्टी को मैंने खड़ा किया था, मेरी अनुपस्थिति में उसे नुकसान पहुँचा। मैं पूरे राज्य का दौरा करूँगा और मोदी को मजबूत करने और प्रधानमंत्री बनवाने के लिए काम करूँगा।’’
    प्रधानमंत्री पद की लालसा क्या-क्या न करवाए। 2008 में कर्नाटक में पार्टी नेतृत्व जब येदुरप्पा के हाथों में था, भाजपा को लोकसभा की 50 में से 33 सीटें मिली थीं। 2008 में पार्टी को राज्य में 33.86 प्रतिशत मत मिले थे। 2013 के विधानसभा चुनाव में येदुरप्पा की कर्नाटक जनता पार्टी को 9.8 फीसदी वोट मिले, जिससे भाजपा 19.95 प्रतिशत पर ठहर गई। भाजपा को उम्मीद है कि येदुरप्पा की वापसी से उनके लिंगायत समुदाय के अधिकांश वोट उसे प्राप्त हो जाएँगे। पार्टी में औपचारिक वापसी से पहले ही येदुरप्पा विश्वास व्यक्त कर चुके हैं कि कम से कम 28 सांसद तो वह मोदी को उपहार में दे ही देंगे। 
यहाँ एक पेंच फँस रहा है। भाजपा अगर अन्य पार्टियों वाली कमजोरियों से ग्रस्त रही, तो वह जनता का विश्वास नहीं जीत पाएगी-आडवाणी की यह चेतावनी सही साबित हो गई तो?
-प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

नफरत का गुबार

   इस बार चूके तो लंबे समय तक हिंदुओं को प्रताडि़त होना पड़ेगा - डाॅ. कृष्ण गोपाल, सह सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। अभी चुनाव नहीं घोषित हुए हैं, मगर संघ ने असामान्य जहरीला दुष्प्रचार शुरू कर दिया है। संघ ने अपनी राजनैतिक शाखा, भारतीय जनसंघ, भारतीय जनता पार्टी के लिए चुनाव में हमेशा काम किया है। लेकिन इस बार सीन बिल्कुल बदला हुआ है। संघ के पदाधिकारी भाजपा को विजय दिलाने के लिए खुल कर मैदान में इस तरह पहली बार उतरे हैं। पहली बार उन्होंने पाखंड का यह चोला उतार फेंका है कि संघ तो समाज-राष्ट्र निर्माण को समर्पित एक सांस्कृतिक संगठन है।
    सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल का वक्तव्य संघ परिवार की आशा और चिंता, दोनों को व्यक्त कर रहा है। आशा यह कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपने विरोधियों के खिलाफ व्यापक दुष्प्रचार और कार्पोरेट जगत से लेकर आम आदमी सहित विभिन्न वर्गों को सब्ज बाग दिखाकर इस बार केंद्र की कुर्सी  तक पहुँचा जा सकता है। चिंता यह कि मोदी का व्यक्तित्व अटल बिहारी वाजपेयी की तरह नहीं है, जिसे उनसे असहमत लोग भी स्वीकार कर लें। अब अगर मोदी के विभाजक व्यक्तित्व के कारण भाजपा सत्ता से वंचित रह गई, तो फिर लंबे समय के लिए वनवास झेलना होगा। दूसरे शब्दों में, संघ परिवार मोदी को फिलहाल अपने तरकश का आखिरी तीर मान रहा है। एड़ी-चोटी का जोर लगा देने का यही कारण है।
    लोकतंत्र में सत्ता हासिल करना एक वाजिब राजनैतिक अधिकार है। लेकिन इस अधिकार पर अमल मर्यादा की जिस सीमा में होना चाहिए, संघ परिवार उसका नृशंस उल्लंघन करने में जुट गया है। देखिए सह सरकार्यवाह क्या कह रहे हैं, ‘‘इस बार चूके तो लंबे समय के लिए हिंदुओं को हिंदू विरोधी ताकतों के हाथों अपमानित और उत्पीडि़त होना पड़ेगा। जाति के नाम पर वोट की ताकत हासिल करने वाले (मानों भाजपा यूपी से लेकर कर्णाटक तक यह करती ही नहीं रही है!) यह नेता इस बार सत्ता में आए तो हिंदुओं को और दीनहीन और उत्पीड़न का शिकार बना कर छोड़ेंगे। इनको वोट का मतलब देशद्रोहियों का समर्थन है। यह सामान्य चुनाव नहीं है। यह देश को संक्रमण काल से उबारने का मौका है। संघ परिवार पर बड़ी जिम्मेदारी है।’’
    नफरत और उन्माद के बूते जब कोई अपना वजूद बनाए हो तो तर्क और विवेक के लिए गुंजाइश नहीं रह जाती। यह सोच पाने की क्षमता नष्ट हो जाती है कि कथन का भावार्थ क्या है। गौर करिए, संघ के सह सरकार्यवाह ने पूरे हिंदू समाज को देशद्रोही बता डाला! कांग्रेस और सेकुलर राजनीति के प्रति अडिग आस्था रखने वाली अन्य पार्टियाँ आखिर ‘‘विधर्मियों और म्लेच्छों’’ (इस शब्दावली पर कॉपी राइट संघ का है) के वोट के बल पर सत्ता में नहीं आती रही हैं। आखिर कश्मीर से कन्याकुमारी तक हिंदुओं के विराट बहुमत ने आज तक जनसंघ-भाजपा को वोट नहीं दिया है। तो क्या हिंदुओं की यह कोटि-कोटि संख्या अभी तक देशद्रोह का समर्थन करती रही है? देशद्रोह का समर्थन करने वाले भी तो देशद्रोही हुए!
    बात देशद्रोह तक आ गई है तो बस एक सवाल। आजादी की लड़ाई में मूक दर्शक बने रहने वालों को  किस श्रेणी में रखा जाए? संघ की स्थापना 1925 में हुई थी। 1925 से 1947 के बीच संघ के अनेक नेताओं और कार्यकर्ताओं की उम्र वही थी, जो जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद, आचार्य कृपलानी, जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, इंदिरा गांधी (कहाँ तक उल्लेख करें, बहुत लंबी लिस्ट है) खुदीराम बोस, हेमू कालाणी, चाफेकर बंधुओं, असेंबली बम कांड, काकोरी और चटगाँव के वीर सैनिकों की  थी। संघ की शाखाओं में यह गीत प्रायः गाया जाता है- शीश दिया है, मगर नहीं दी कभी देश की माटी है, युगों-युगों से यही हमारी बनी रही परिपाटी है। कृपया एक नाम बताइए जिसने 1925 से 1947 के बीच भारत माता के लिए शीश दिया हो। डमी तलवारों से खड्ग युद्ध का प्रशिक्षण लेकर और लाठियाँ भाँज-भाँज कर आखिर भारत माता के यशस्वी पुत्रों का कैसा परिवार तैयार हुआ जिससे एक भी खुदीराम बोस नहीं निकल सका? हाँ, माफीनामा लिखने वालों के नाम जरूर मिल जाएँगे!  
 -प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

नैतिकता के कटघरे में मोदी

कोई विवाहित है या अविवाहित, यह बड़ा निजी मामला होता है। दो बालिग लोगों के बीच किस प्रकार के संबंध हैं, यह भी तब तक व्यक्तिगत होता है, जब तक कानून का उल्लंघन नहीं होता या उल्लंघन का केस सार्वजनिक संज्ञान में नहीं आता। लेकिन जब आप उच्चतम सार्वजनिक पद के दावेदार होते हैं, तब एक हद के आगे व्यक्तिगत कुछ नहीं रह जाता। हर बात पड़ताल के दायरे में आ जाती है। नरेंद्र मोदी भाजपा के, प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार हैं।जसोदा बेन से इंटरव्यू छापा है, उसी अखबार के अहमदाबाद एडिशन के एक संवाददाता को 2002 के दंगों के बाद जसोदा बेन से भेंट के दौरान लोहे के चने चबाने पड़े थे। इसीलिए एक अंग्रेजी अखबार ने पहले पेज पर जसोदा बेन नामक एक महिला से इंटरव्यू छापा।
    जसोदा बेन ने इंटरव्यू में कहा, ‘‘मैं 17 साल की थी जब नरेंद्र मोदी के साथ मेरा विवाह हुआ। तीन साल के वैवाहिक जीवन में मैं मुश्किल से तीन महीने उनके साथ रही हूँगी। उनके घर जाने के बाद मेरी पढ़ाई छूट गई थी। मुझे याद है, वह मुझसे पढ़ने के लिए कहा करते थे। अलगाव बिना किसी कटुता के हुआ। मुझे उनके बारे में जो भी मिल जाता है, पढ़ती हूँ। मुझे नहीं लगता कि वह मुझे बुलाएँगे।’’ इस पर संवाददाता ने पूछा, क्या अब भी आप अपने को उनकी पत्नी मानती हैं? उन्होंने जवाब दिया, ‘‘अगर ऐसा न होता तो क्या आप मुझसे बात कर रहे होते?’’
    मोदी अपने वैवाहिक जीवन के बारे में कभी कुछ नहीं बोलते। इस इंटरव्यू पर भी उनकी तरफ से प्रतिक्रिया नहीं हुई। लेकिन यहाँ कुछ नैतिक प्रश्न पैदा होते हैं। अगर कोई अपने सामाजिक-राजनैतिक जीवन को आगे बढ़ाने के लिए वैवाहिक अवस्था को छुपाए या झूठ बोले तो उस व्यक्ति की नैतिकता और शुचिता के बारे में क्या निष्कर्ष निकाला जाएगा? भारत में विवाह, वैवाहिक जीवन और उसे भंग करने के बारे में कानूनी व्यवस्था है। अगर कोई उन कानूनी  प्रावधानों का पालन न करे तो उस व्यक्ति को किस श्रेणी में रखा जाना चाहिए? क्या वह व्यक्ति सार्वजनिक पद का पात्र हो सकता है? इस कानूनी और नैतिक पहलू को छोड़ कर, देखने की कोशिश करें कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार, मोदी अपने लक्ष्य को पूरा करने लिए क्या-क्या कर सकते हैं और किस हद तक जा सकते हैं। मोदी के जीवनीकार नीलांजन मुखोपाध्याय के अनुसार जसोदा बेन का गाँव ब्राह्मणवाड़ा, मोदी के गाँव वडनगर के पास ही है। मोदी का महत्व बढ़ते ही जसोदा बेन तक पहुँचना नामुमकिन-सा हो गया। अब जिस अखबार ने
    विवाह को गुप्त रखने का कारण यह था कि मोदी आर.एस.एस. में अपने कैरियर को ऊँचे ले जाना चाहते थे। अगर संघ नेतृत्व को सच्चाई का पता चल जाता, तो वह प्रचारक के पद तक न पहुँच पाते। लेकिन पर्दा लंबे समय तक नहीं रह पाया। नीलांजन लिखते हैं कि 1987 में मोदी को संघ से भाजपा में भेज दिया गया, क्योंकि तब तक संघ नेतृत्व को उनके विवाह का पता चल चुका था। मगर तब तक मोदी एक बड़ा लक्ष्य हासिल कर चुके थे।
-प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

हर बदनाम की हिमायत में बीजेपी

 बदरीनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी केशवन नंबूदिरी को एक गर्भवती महिला के साथ छेड़छाड़ के आरोप में दिल्ली में गिरफ्तार किया गया। महिला और उसका परिवार मुख्य पुजारी का भक्त था। महिला के पिता का कहना है ,हम जिसे भगवान मानते थे, वह शैतान निकला। मुख्य पुजारी पर इस परिवार को इतना भरोसा था कि उसने रात में महिला को होटल में मिलने के बुलाया तो परिवार को भेजने में संकोच नहीं हुआ।
    महिला की शिकायत पर कानून तो अपना काम करने ही लगा है, मंदिर समिति ने नंबूदिरी को रावल के पद से हटा दिया है। इसे यूँ कहा जा सकता है कि समिति ने महिला की शिकायत को प्रथम दृष्टया कार्रवाई  लायक माना। या मुख्य पुजारी को निर्दोष नहीं मान रही। इस बीच यमुनोत्री धाम के तीर्थ पुरोहितों ने नंबूदिरी की निंदा की है।  बदरीनाथ से आ रही खबरों के मुताबिक कई अवसरों पर नंबूदिरी का व्यवहार मर्यादा विरुद्ध पाया गया था।
    अदालती कार्यवाही शुरू होने से पहले ही भारतीय जनता पार्टी के रूप में नंबूदिरी को एक वकील मिल गया है। उत्तराखंड भाजपा के अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत ने बयान जारी कर कहा कि रावल का पद पूरे विश्व में आस्था और सम्मान का केंद्र है। रावल के निलंबन की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि किसी बड़े षड्यंत्र से इंकार नहीं किया जा सकता। तीरथ ने यह स्पष्ट नहीं किया कि किस आधार पर उन्होंने षड्यंत्र देखा।
    एक और घटना को याद करें। आसाराम बापू अपनी पुत्री तुल्य एक महिला के साथ अनाचार के आरोप में कई महीने से जेल में पड़े हैं। उनकी जमानत की नौबत नहीं आ रही। ठीक यही आरोप उनके पुत्र नारायण साईं पर लगा। कई महीने वह गिरफ्तारी से बचने के लिए भागते रहे। अब वह भी जेल में हैं। चार्जशीट दायर होने से पहले ही भाजपा के नेता उनके बचाव में उतर आए।
    आसाराम, नारायण साईं और नंबूदिरी निर्दोष हैं या नहीं, यह अदालत को तय करना है। लेकिन भाजपा ने इन सभी केसों में न्यायिक प्रक्रिया को अवरुद्ध करने की कोशिश की है। इन कोशिशों का अर्थ यह है कि अगर कोई महिला अपनी आबरू बचाने के लिए कानून का सहारा ले तो उसे यह सहारा नहीं मिलना चाहिए। हर मामले में भाजपा को हिंदू विरोधी साजिश नजर आने लगती है। ऐसा क्यों होता है?
    ऐसा इसलिए होता है कि हिंदू धर्म और दर्शन के उच्च, महान सिद्धांतों और मूल्यों से संघ परिवारियों का वास्तव में कोई संबंध नहीं है। संघ परिवारी हिंदू धर्म का नाम सिर्फ राजनैतिक लाभ के लिए लेते हैं। इसीलिए वे कालांतर में आई बुराइयों और कुरीतियों का विरोध कभी नहीं करते। इसीलिए वह सती प्रथा के समर्थकों की कतार में शामिल होने के लिए मजबूर होते हैं।  इसीलिए जब अंधविश्वास के खिलाफ कानून बनाने की बात होती है, तो वे विरोध में सड़कों पर उतर आते हैं। धर्म के उदाŸा महान मूल्यों पर चलने से वोट नहीं मिलते। वोट तो मिलते हैं कर्मकांड, अंधविश्वास और कुरीतियों के पोषण और धर्म के ठेकेदारों का समर्थन जुटाने से। भाजपा-जनसंघ ने जन्म के समय से ही
धर्म के दुकानदारों के यहाँ जुटने वाली भीड़ को अपने वोट बैंक के रूप में देखा है। हे राम!
-प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

महापुरुषों को हथियाने की राजनीति

हाल में स्वामी विवेकानंद के 150 वें जन्मोत्सव पर राजधानी दिल्ली में आयोजित समारोह में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने धार्मिक कट्टरता और नफरत से देश में पैदा हो रहे खतरे की ओर ध्यान आकर्षित किया। स्वामी विवेकानंद के जन्मोत्सव पर यह चेतावनी इस महापुरुष को बहुत प्रासंगिक श्रद्धांजलि है। हिंदू धर्म के इस मनीषी ने धर्म के वास्तविक तत्व को आम जन के सामने प्रस्तुत किया। स्वामीजी हर तरह की संकीर्णता, कट्टरपन, नफरत और धार्मिक वैमनस्य के खिलाफ थे।
    स्वामीजी की धार्मिक सहिष्णुता और आज भी उनके विचारों की प्रासंगिकता पर आगे बढ़ने से पहले देखते हैं कि जिस दिन प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष धार्मिक कट्टरपन के खिलाफ आगाह कर रहे थे, उस दिन पणजी में क्या हुआ। प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने पणजी की सभा में गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे के एक सुझाव को लेकर उन पर जमकर हमला बोला। शिंदे का सुझाव अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों की गिरफ्तारी के बारे में सतर्कता बरतने से सम्बंधित था। इसमें क्या बुरा था? यह सच है कि दर्जनों अल्पसंख्यकों की निराधार गिरफ्तारी के मामले प्रकाश में आ चुके हैं। वे अदालतों से निर्दोष साबित हुए हैं। भारतीय संविधान और वैधानिक प्रक्रिया में आस्था रखने वाला हर व्यक्ति सहमत होगा कि किसी भी वर्ग में सताए जाने का भाव नहीं पैदा होना चाहिए। अगर कोई देश विरोधी काम में लिप्त है तो बेशक कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन शिंदे का एक सकारात्मक सुझाव मोदी को बहुत नागवार गुजरा।
    इसकी वजह यह है कि मोदी और उनका संघ परिवार मूलतः मुस्लिम विरोधी है। वक्त की जरूरत और नजाकत ने मुस्लिम विरोध पर थोड़ी चाशनी डालने को मजबूर तो किया, लेकिन इस तरह के आंतरिक विकार को दूर कर देने वाली कोई औषधि अभी तक बनी ही नहीं है। गोस्वामी तुलसी दास ने लिखा है-विष रस भरे कनक घट जैसे। सैकड़ों साल बाद भी भारतीय इतिहास में जब 2002 के गुजरात दंगों को पढ़ा जाएगा, मोदी का नाम भी साथ में अनिवार्यतः आएगा। यों तो स्वामी विवेकानंद शिला स्मारक के दिनों से संघ परिवार ने स्वामी जी को हथियाने की राजनीति चला रखी है, मोदी ने छह-सात महीने से इस महान ‘योद्धा संन्यासी’ पर विशेष ध्यान दिया है।
    सच यह है कि स्वामीजी और संघ परिवार विपरीत धु्रव हैं। स्वामी जी के हिन्दुत्व और संघ के हिन्दुत्व में बुनियादी फर्क है। देखिए स्वामी जी ने पैगंबर मुहम्मद साहब और इस्लाम के बारे में क्या विचार व्यक्त किए, ‘‘इस्लाम जनसाधारण के लिए संदेश के रूप में आया। प्रथम संदेश था समानता का। एक धर्म है प्रेम। जाति, रंग या अन्य किसी वस्तु का अब कोई प्रश्न नहीं। इसे अंगीकार करो। उस व्यावहारिक गुण ने बाजी मार ली। वह महान संदेश बिल्कुल सीधा-सादा था। एक ईश्वर में विश्वास करो, जो स्वर्ग और पृथ्वी का सृष्टा है।’
    सामाजिक कार्य के संबंध में अखंडानंद ने स्वामीजी से मार्गदर्शन माँगा। समाज के सभी वर्गों को सम्मिलित करने के भाव को रेखांकित करते हुए स्वामी जी ने उन्हें बताया, ‘‘तुम्हें मुसलमान लड़कों को भी लेना चाहिए। परंतु उनके धर्म को कभी दूषित न करना। सभी धर्मों के लड़कों को लेना-हिंदू, मुसलमान, ईसाई या कुछ भी हों।’’ स्वामी जी का संदेश बहुत प्रसिद्ध हो चुका है, ‘‘आज भारत को वेदांती दिमाग और मुसलमानी जिस्म चाहिए।’’ यह एक राष्ट्रीय जाति की उनकी परिकल्पना थी। क्या मोदी और उनके सहयोगियों में स्वामी विवेकानंद के इन विचारों को अंगीकार करने का नैतिक साहस है?  स्वाभाविक रूप से वह यह साहस नहीं जुटा
सकते क्योंकि तब उन्हें  अपनी पूरी विरासत का त्याग करना पड़ेगा।
-प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

गुमराह करने में संघ परिवारियों का कोई जोड़ नहीं!

पहले यह देखते हैं कि मोरारजी देसाई की सरकार के दौर में क्या हुआ था।  विदेशमंत्री थे अटल बिहारी वाजपेयी। लाल कृष्ण आडवाणी सहित और भी मंत्री थे उस सरकार में। उधर बांग्लादेश में जनरल जियाउर्रहमान की भारत विरोधी, पाकिस्तान परस्त सरकार थी। मोरारजी की सरकार ने बांग्लादेश से भाग कर आए मुक्ति वाहिनी-अवामी लीग के राष्ट्रवादियों को खदेड़ने का ढाका के साथ समझौता किया। एक था टाइगर सिद्दीकी। 1971 में कब्जावर पाकिस्तानी फौज से टक्कर लेने में उसका बड़ा योगदान था।  इसीलिए टाइगर नाम पड़ गया। टाइगर सहित अनेक मुक्ति योद्धाओं को जनरल जिया की सरकार के हवाले कर दिया गया। सबको मौत की सजा दे दी गई। इससे भारत का नुकसान हुआ। संघ परिवारियों को उस दौर में अवैध बांग्लादेशियों को खदेड़ने की कोई फिक्र नहीं हुई। जाहिर है, सत्ता सुख अधिक मायने रखता है।
    सहोदर, गण परिषद बांग्लादेशियों के खिलाफ आंदोलन की लहर पर चढ़कर असम में सत्ता में आई। उनका दावा है कि भारत में अवैध बांग्लादेशियों की संख्या डेढ़-दो करोड़ होगी। गण परिषद की सरकार ने कितनों की पहचान की? वाजपेयी के नेतृत्व में दो बार सरकार बनी। कितने बांग्लादेशी उस दौर में हटाए गए? यह मुद्दा बड़ा संवेदनशील है। इसे हिंदू-मुस्लिम संदर्भ में नहीं देखा जा सकता है। लेकिन सांप्रदायिक राजनीति करने वालों को कहाँ चिंता।
 -प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

‘मोदी क्या हुए अलादीन का चिराग!

 हर क्षेत्र में,हर दृष्टि से नरेंद्र मोदी की ब्रांडिंग चल रही है। भाजपा और उसका समर्थन करने वाली ताकतों ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है, तो उसके लिए ब्रांडिंग जरूरी भी है। मोदी क्या हुए अलादीन का चिराग!
    तरह-तरह से मोदी का फैशियल हो रहा है। अब विकास को ही लीजिए। विकास होगा तो सभी का फायदा होगा। पूर्वोत्तर का हो या कन्याकुमारी का। दंगे करने वाला हो या उसमें नुकसान उठाने वाला। अब विकास पर एतराज किसे होगा! लेकिन मोदी एक दिन अचानक ब्रांडिंग के चक्कर में फिसल गए। हाल में संपन्न, भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में वह ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ पर बोल पड़े।
    मोदी ने कुछ संस्कृत और कुछ हिंदी में वेद, पुराण, संस्कृति एवं परंपराओं  के सूत्र वाक्यों के माध्यम से अपना ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ रखा। संघ की चिंतन बैठकों या शाखाओं में कुछ भी कहा जा सकता है। प्राचीन काल के वैभव (यह बताने की आवश्यकता नहीं पड़ती कि किस युग का, कैसा वैभव) की वापसी की इच्छा व्यक्त की जा सकती है, सनातन राष्ट्र की वंदना की जा सकती है या भारत को ‘हिंदू राष्ट्र’ का रूप देने की योजनाएँ बनाई जा सकती हैं। लेकिन सार्वजनिक संज्ञान में बोलने के कुछ खतरे होते हैं। मोदी ने ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ के बारे में जो भी कहा, वह आधुनिक भारतीय राज्य सत्ता के तकाजे पूरे नहीं करता।
    26 जनवरी 1950 से लागू गणतांत्रिक संवैधानिक व्यवस्था कुछ बुनियादी सिद्धांतों पर आधारित है। इनमें एक है सेक्युलरिज्म। संघ वालों को आपत्ति रही है कि संविधान में इस शब्द का उल्लेख नहीं है। उस तर्क को मानें तो ब्रिटेन में संवैधानिक व्यवस्था ही नहीं होनी चाहिए, क्योंकि उस देश में लिखित संविधान नहीं है। इंदिरा गांधी के शासन काल में जब 42 वें संशोधन के जरिए संविधान की प्रस्तावना में सोशलिस्ट शब्द का समावेश किया गया, तो सेक्युलरिज्म को भी शामिल किया जा सकता था। लेकिन यह नहीं किया गया क्योंकि इसकी जरूरत ही नहीं थी। सेक्युलर दर्शन हमारी संवैधानिक आस्था और जीवन पद्धति में इतना केंद्रीय स्थान जो प्राप्त कर चुका है। सेक्युलरिज्म एक नितांत आधुनिक अवधारणा है। मोदी जिस संघ के प्रचारक रहे हैं, वह सेक्युलरिज्म को नहीं मानता।
    इस नकार के खतरों की ओर सबसे ज्यादा ध्यान दिलाया था जवाहर लाल नेहरू ने। पाकिस्तान में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा हो रही थी। भारत में संघ और संघी मानसिकता
वाले कुछ कांग्रेसी भी मुसलमान भारतीयों पर पुनर्विचार का सुझाव दे रहे थे। उस माहौल
में नेहरू ने कहा, ‘‘कांग्रेस की सेक्युलर प्रतिबद्धता पर कोई समझौता नहीं हो सकता। जो निश्चित तौर पर खराब है, उसके साथ समझौता हमेशा खतरनाक होता है। संघ राष्ट्रवादी भारत के हर मूल्य को निशाना बनाता है। यह हमेशा याद रखा जाना चाहिए कि आर.एस.एस. की पूरी मानसिकता फासिस्ट है। अगर खुल कर खेलने का मौका मिला तो सांप्रदायिकता देश को तोड़ डालेगी।’’
    फिरकापरस्तों की राष्ट्र वंदना की मंशा क्या होती है? नेहरू ने आगाह किया था कि जब फिरकापरस्त राष्ट्रवाद और संस्कृति की बात करें तो सतर्क हो जाना चाहिए। नेहरू ने लिखा था, ‘‘जिन लोगों का भारत की आजादी की लड़ाई में कोई योगदान नहीं था, वह अब राष्ट्रवाद का लबादा ओढ़े घूम रहे हैं। देशभक्ति की आड़ में सांप्रदायिकता एक विध्वंसक और प्रतिक्रियावादी शक्ति होती है, वह कभी एकता नहीं स्थापित करती।’’
    नेहरू की चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। राष्ट्रवाद और राष्ट्र निर्माण की लफ्फाजी का वास्तविक अर्थ क्या है, यह हम 2002 में देख चुके हैं।
    देश हित की चिंता नहीं, मात्र स्वांग, अगर खुदा गंजे को नाखून दे दे तो? अगर बिल्ली के भाग्य से छींका टूट जाए यानी भाजपा को किसी तरह अगली सरकार बनाने का मौका मिल जाए तो पड़ोसी देशों, खासतौर से बांग्लादेश के प्रति उसकी नीति क्या होगी? वह किस तरह की नीति अपनाएगी और भारत के दूरगामी हित में होना क्या चाहिए, इस पर विचार से पहले बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति का लेखा-जोखा जरूरी है। 5 जनवरी के आम चुनाव में अवामी लीग को भारी-भरकम बहुमत मिल चुका है। 300 सदस्यों वाली संसद में उसके 154 उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए। ऐसा इसलिए हुआ कि अवामी लीग की कट्टर विरोधी, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने चुनाव का बहिष्कार किया। भारत और कुछ अन्य देशों को छोड़ अधिकतर देश अब चुनाव परिणामों की विश्वसनीयता पर अँगुली उठा रहे हैं। अवामी लीग भारत की परंपरागत मित्र है, जबकि उसके ज्यादातर विरोधी भारत के प्रबल विरोधी हैं। विरोधियों में अग्रणी हैं बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और उसकी खास सहयोगी जमात-ए-इस्लामी, बांग्लादेश।
    मनमोहन सिंह की सरकार ने मुख्यतः भारत के हितों को ध्यान में रखते हुए बांग्लादेश के साथ दो समझौते करने की कोशिश की-तीस्ता नदी के पानी के इस्तेमाल पर और भूवेष्ठित क्षेत्रों की अदलाबदली पर। भूवेष्ठित क्षेत्रों की अदला-बदली पर 1974 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और बांग्लादेश के प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर्रहमान में सहमति हुई थी। इंदिरा गांधी से बड़ा, राष्ट्रीय हितों का रखवाला कौन हो सकता है। इसलिए उनके फैसले पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। लेकिन तब से परिस्थितियाँ ऐसी बनती रहीं कि सहमति को औपचारिक समझौते में नहीं बदला जा सका। बांग्लादेश में कई साल जियाउर्रहमान और इरशाद की फौजी सरकारें रहीं तो बेगम खालिदा की असैनिक सरकार। ये सभी भारत विरोधी थीं। इंदिरा गांधी के बाद बीच-बीच में भारत में गैरकांग्रेसी सरकारों की वजह से गाड़ी आगे नहीं बढ़ पाई।
    मनमोहन सिंह की सरकार ने इस अधूरे ऐतिहासिक कार्य को पूरा करने की कोशिश की, तो भाजपा, उसकी वैचारिक सखा असमगण परिषद और तृणमूल कांग्रेस ने रोड़ा अटका दिया।
    अब चुनाव को देखते हुए संघ परिवार का राष्ट्रवाद भड़क उठा है।
आर.एस.एस. के मुखपत्र ‘आर्गनायजर’ ने लिखा है, ‘‘अगर बांग्लादेश भारत में रह रहे अवैध मुस्लिम शरणार्थियों को वापस लेने को तैयार हो जाए तो सीमा समझौते का अनुमोदन कर दिया जाना चाहिए। आखिर यह शरणार्थी हमारे संसाधनों का दोहन कर रहे हैं और असम में इनकी मौजूदगी से असमी हिंदू भारतीय संघ के खिलाफ हो रहे हैं। इन्हें वापस लेने के लिए बांग्लादेश तैयार हो तो भारत उसे आर्थिक सहायता दे सकता है। 1993 में दिल्ली के विट्ठल भाई पटेल भवन में अवैध बांग्लादेशी आव्रजकों की समस्या पर एक गोष्ठी में अटल बिहारी वाजपेयी ने भी भाग लिया था। गोष्ठी में बताया गया था कि बांग्लादेशियों पर 3000 करोड़ सालाना खर्च हो रहा है। आज के हिसाब से यह 20 हजार करोड़ सालाना हुआ।’’
 -प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

सोमवार, 7 अप्रैल 2014

गरीबों ही नहीं, राष्ट्रीयता का भी अनादर

  प्रधानमंत्री पद के लिए बीजेपी के उम्मीदवार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के वित्तमंत्री नितिन पटेल ने कहा है कि यूपी-बिहार से आए लोगों के कारण गुजरात में गरीबी बढ़ी है। इस बयान के कई दिन हो गए, नितिन पटेल ने न तो इसे वापस लेकर खेद प्रकट किया है और न मोदी ने ही कोई प्रतिक्रिया व्यक्त की है। पटेल के कहने का अर्थ एक ही हो सकता है और वह यह कि नरेंद्र मोदी के ‘‘ऑटॉनमस रिपब्लिक ऑफ गुजरात’’ में यूपी और बिहार के लोगों को, और इस तर्क के आधार पर भारत के किसी भी भाग के लोगों को काम के लिए जाने का अधिकार नहीं है।
    पटेल ने दरअसल बड़ी खतरनाक बात कही। याद करें ,संघ परिवार की लंगोटिया यार शिवसेना ने सबसे पहले मुंबई में दक्षिण भारतीयों के खिलाफ अभियान शुरू किया था। शिव सेना को हाजी मस्तान, यूसुफ पटेल और तस्करों की समूची काली दुनिया बुरा नजर नहीं आया था। मुंबई के अंडरवल्र्ड से भी कोई  परेशानी नहीं हुई थी। उसने मुंबई में हर बुराई की जड़ दक्षिण भारतीयों में देखी। कुछ वर्ष बाद नफरत के लिए मुसलमानों को निशाना बनाया जाने लगा। तब तक पूर्वोत्तर राज्यों में हिंदी भाषियों के खिलाफ अभियान नहीं शुरू हुआ था। उगांडा और केन्या से भारतीय मूल के उद्यमियों ,जिनमें अधिकतर गुजराती थे, का निष्कासन भी नहीं शुरू हुआ था।
 
    इन अलगाववादी-आतंकवादी संगठनों के विपरीत संघ परिवार अपने को एकमात्र राष्ट्रवादी मानता है। संघ की गुजरात रूपी महती प्रयोगशाला के एक वरिष्ठ कर्मी ने यूपी-बिहार के श्रमिकों के विरुद्ध विष वमन कर सिद्ध कर दिया है कि संघ के राष्ट्रवाद के सिद्धांत में राष्ट्रीय विखंडन के तत्व समाहित हैं। वैसे भी धर्म, जाति, संस्कृति, भाषा और क्षेत्र से परे एक समान भारतीय राष्ट्रीयता और नागरिकता में जिनकी आस्था नहीं होती, वह सच्चे राष्ट्रवादी नहीं हो सकते। नितिन पटेल के बयान और उस पर उनके वरिष्ठों की चुप्पी ने चेहरे बेनकाब कर दिए।
  नितिन पटेल की यू.पी.-बिहार विरोधी थिअरी पर अमल का अर्थ यह होगा कि इन राज्यों के श्रमिकों को हिंसक तरीकों से गुजरात से बाहर कर दिया जाए। असम में ‘उल्फा’ और बोडो उग्रवादी यही तो करते रहे हैं। वह मारवाड़ी उद्यमियों से लेकर साधारण हिंदी भाषी मजदूरों तक, सबको असम की आर्थिक-सामाजिक समस्याओं के लिए दोषी मानते हैं। लेकिन ‘उल्फा’ और बोडो उग्रवादी अखिल भारतीयता में आस्था नहीं रखते। ‘उल्फा’ पाकिस्तानी एजेंसी आई.एस.आई. की मदद से स्वतंत्र असम राज्य की स्थापना करना चाहता है। पूर्वोत्तर के राज्यों में सक्रिय कोई भी हथियारबंद संगठन भारतीय गणराज्य और राष्ट्रीय एकता की अवधारणा को स्वीकार नहीं करता। 
-प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से
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