बुधवार, 16 अप्रैल 2014

गुमराह करने में संघ परिवारियों का कोई जोड़ नहीं!

पहले यह देखते हैं कि मोरारजी देसाई की सरकार के दौर में क्या हुआ था।  विदेशमंत्री थे अटल बिहारी वाजपेयी। लाल कृष्ण आडवाणी सहित और भी मंत्री थे उस सरकार में। उधर बांग्लादेश में जनरल जियाउर्रहमान की भारत विरोधी, पाकिस्तान परस्त सरकार थी। मोरारजी की सरकार ने बांग्लादेश से भाग कर आए मुक्ति वाहिनी-अवामी लीग के राष्ट्रवादियों को खदेड़ने का ढाका के साथ समझौता किया। एक था टाइगर सिद्दीकी। 1971 में कब्जावर पाकिस्तानी फौज से टक्कर लेने में उसका बड़ा योगदान था।  इसीलिए टाइगर नाम पड़ गया। टाइगर सहित अनेक मुक्ति योद्धाओं को जनरल जिया की सरकार के हवाले कर दिया गया। सबको मौत की सजा दे दी गई। इससे भारत का नुकसान हुआ। संघ परिवारियों को उस दौर में अवैध बांग्लादेशियों को खदेड़ने की कोई फिक्र नहीं हुई। जाहिर है, सत्ता सुख अधिक मायने रखता है।
    सहोदर, गण परिषद बांग्लादेशियों के खिलाफ आंदोलन की लहर पर चढ़कर असम में सत्ता में आई। उनका दावा है कि भारत में अवैध बांग्लादेशियों की संख्या डेढ़-दो करोड़ होगी। गण परिषद की सरकार ने कितनों की पहचान की? वाजपेयी के नेतृत्व में दो बार सरकार बनी। कितने बांग्लादेशी उस दौर में हटाए गए? यह मुद्दा बड़ा संवेदनशील है। इसे हिंदू-मुस्लिम संदर्भ में नहीं देखा जा सकता है। लेकिन सांप्रदायिक राजनीति करने वालों को कहाँ चिंता।
 -प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

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