शनिवार, 19 अप्रैल 2014

जब किसी को भार समझा जाने लगे


    अगर धर्म, जाति, रंग या नस्ल के आधार पर किसी समुदाय को देश या बहुसंख्यक वर्ग पर भार समझा जाने लगे, तो उसकी तर्कसंगत परिणति यह होती है कि उस ‘‘आश्रित’’ वर्ग को बहिष्कृत कर दिया जाना चाहिए। याद करें, पहले महायुद्ध में जर्मनी की हार के बाद क्या हुआ था। जर्मनी की हर समस्या के लिए
यहूदियों को जिम्मेदार ठहराया जाने लगा। यहूदी विरोधी भावनाएँ पहले से मौजूद थीं। हिटलर और उसका साथ देने वाली ताकतों ने यहूदियों से छुटकारा पाने का फैसला कर लिया। 60 लाख यहूदी मार डाले गए।
    अब देखिए भारत में क्या हो रहा है। संघ परिवार हमेशा मुस्लिम विरोधी रहा है। लेकिन अब नफरत के कैप्सूल खुल कर बाँटे जा रहे हैं।
    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डाॅ. कृष्ण गोपाल कहते हैं कि सच्चर कमेटी की सिफारिशों के जरिए भारत के एक और विभाजन की नींव रखी जा रही है, इससे हिंदुओं की मुसीबत और बढ़ जाएगी, हिंदुओं के पैसे और कमाई से मुसलमानों को सहूलियत देने की तैयारी चल रही है। वह यह भी कहते हैं कि भारत किसी नेता नहीं, हिंदुओं के कारण ही पंथनिरपेक्ष (सेकुलर और धर्मनिरपेक्ष शब्द संघियों का दिमाग असंतुलित कर देते हैं) है।
    संघ का जहरीला और घातक सोच बिना किसी लागलपेट के सामने आ गया। देश की दौलत किसी एक वर्ग की नहीं बल्कि पूरे देश की होती है और पूरे देश में बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक सभी शामिल होते हैं। आधुनिक राज्यसत्ता सर्वग्राही होती है। समान नागरिकता का बोध राज्य सत्ता के अस्तित्व की एक बुनियादी शर्त है। जहाँ-जहाँ, जब-जब इस समान नागरिकता को नकारा गया है, परिणाम भयानक दुखद हुए हैं।
    पाकिस्तान टूटा क्योंकि पश्चिमी हिस्से के पंजाबियों ने यह यकीन कर लिया कि वही पाकिस्तान हैं। उन्होंने पूर्वी हिस्से के बंगालियों को उनके निहायत वाजिब अधिकार देने से मना कर दिया। सर्व वर्चस्व बनाए रखने के हठ ने युगोस्लाविया के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।
    महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने भारत की अटूट एकता का फार्मूला स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ही खोज लिया था। फार्मूला था सबकी शिरकत का, सबको साथ लेकर चलने का। इंदिरा गांधी ने मिजोरम में उस फार्मूले पर अमल किया। नतीजा यह हुआ कि हथियारबंद बगावत के नेता लल डेंगा संविधान की कसम खाकर भारत की एकता के सिपाही बन गए। आपत्तिजनक कार्यों के कारण जिन शेख अब्दुल्ला को जेल में डाल दिया गया था, इंदिरा गांधी ने उन्हीं को कश्मीर की बागडोर सौंप दी। असम समझौते के बाद राजीव गांधी ने लाल किले के प्राचीर से घोषणा की थी, कांग्रेस हारी लेकिन भारत जीता। राष्ट्र की मुख्य धारा से अलग हुए लोगों को साथ लाने के इस जज्बे ने, इस सिद्धांत ने भारत को रखा है और एकता की गारंटी दी है।
    संघ भारत को उस प्राणवायु से वंचित करने में लगा है। ऐतिहासिक कारणों से भारत के कई वर्गों में गरीबी और पिछड़ापन है। इनमें मुसलमान भी हैं।
    सीधी बात है, देश के विकास का फल अगर सभी वर्गों को नहीं मिलेगा, देश का स्वामी होने का भाव अगर समान रूप से सबमें नहीं होगा और परायेपन की भावना मौजूद रहेगी तो देश मजबूत नहीं हो सकता। राज्यसत्ता में अधिकारपूर्वक जिनकी हिस्सेदारी नहीं होती, वे उस राज्यसत्ता के लिए सहर्ष प्राण न्योछावर करने के लिए भी तैयार नहीं रहते। इसलिए हे कृष्ण गोपाल जी नफरत फैला कर, ‘हम और वो’ की स्थाई दीवार खड़ी कर देश को तोड़ने का काम तो आप का संगठन कर रहा है। इसमें आप का नहीं, मानसिकता का दोष है। इसी मानसिकता ने राष्ट्रपिता की हत्या करवाई थी।
-प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

कोई टिप्पणी नहीं: