शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

भेडि़ए की रामनामी चादर

आने वाले चुनाव की एक खास बात यह है कि इस बार फिरकापरस्ती का भेडि़या रामनामी चादर कभी उतार देता तो कभी ओढ़ लेता है। कोई स्थाई मुद्रा नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आनुषांगिक संगठनों के नेता मौका देख कर बोलते हैं। हर जगह एक रिकार्ड नहीं बजाया जा रहा। 7 फरवरी को नरेंद्र मोदी ने अहमदाबाद में तीन दिन के ‘उम्मत सम्मलेन’ को संबोधित किया। यह मुस्लिम उद्यमियों का सम्मलेन था। आधुनिक इतिहास में साबरमती नदी महात्मा गांधी के नाम से जुड़ी हुई है, इसलिए प्रतीक स्वरूप ‘उम्मत सम्मलेन’ इसी के किनारे रखवाया गया। मोदी ने मुसलमानों को रिझाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने कहा कि देश के विकास के लिए धर्म, जाति आदि का भेद किए बगैर सबको समानता के अवसर मिलने चाहिए। सबको भयहीन माहौल मिलना चाहिए। उन्होंने रेखांकित किया कि दस साल से गुजरात में ये सब मिल रहा है।
    लेकिन दो दिन बाद, 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश की राजधानी का सीन देखिए। संघ के ही सूत्रों से मीडिया को मिली जानकारी के अनुसार भगवा खेमे ने मोदी को प्रधानमंत्री की गद्दी तक पहुँचाने के लिए एक योजना बनाई है। इसके तहत मठों और मंदिरों पर देश भर में ध्यान केंद्रित किया जाएगा। भगवान की आरती और भोग में शामिल होने के लिए आने वाले भक्तों को मोदी के प्रताप की जानकारी दी जाएगी। मोदी के भाषणों के कैसेट दिए जाएँगे। पुस्तिकाएँ दी जाएँगी। मठों, मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थलों की सूची बनाने का जिम्मा भारतीय जनता पार्टी के जिलाध्यक्षों को सौंपा गया है।
    भगवान के दर्शन के लिए आने वालों को मोदी के ‘‘दिव्य रूप’’ के दर्शन कराए जाएँ और उसमें नफरत का तड़का न लगे, यह कैसे संभव है। इसलिए भक्तों को बताया जाएगा कि मिशन मोदी को सफल न बनाया तो इसलामी आतंकवाद बढ़ेगा। मुसलमानों के वोट हासिल करने की होड़ में जुटे दल हिंदुओं की भावी पीढि़यों के लिए  नए खतरे पैदा कर देंगे। तो राम मंदिर को भूल राम का इस्तेमाल इस तरह करने लगे! जाहिर है, साबरमती के किनारे नहीं, गोमती के किनारे भाजपा का असली चेहरा सामने आया। अल्पसंख्यक, उसमें भी मुख्यतः मुस्लिम विरोध पर आधारित घृणा संघ परिवार की सिफत है। उसका त्याग संघ परिवार के लिए असंभव है। लेकिन ताल ठोक रहे हैं आतंकवाद से लड़ने की, इसलिए यह याद दिलाना जरूरी है कि अहमदाबाद के अक्षरधाम मंदिर और भारत की प्रभुसत्ता की प्रतीक, संसद पर आतंकी हमलों के समय इन्हीं शूरवीरों की सरकार थी।
 -प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से



1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (18-04-2014) को "क्या पता था अदब को ही खाओगे" (चर्चा मंच-1586) में अद्यतन लिंक पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'