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शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

दोराहे पर ठिठका भारतीय प्रजातंत्र

असगर अली इंजीनियर स्मृति व्याख्यान
मैं अपने इस व्याख्यान की शुरूआत, अपने अभिन्न मित्र डाॅ. अस़गर अली इंजीनियर को श्रद्धांजलि देकर करना चाहूंगा, जिनके साथ लगभग दो दशक तक काम करने का सौभाग्य मुझे मिला। डाॅ. इंजीनियर एक बेमिसाल अध्येता-कार्यकर्ता थे। वे एक ऐसे मानवीय समाज के निर्माण के स्वप्न के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध थे, जो विविधता के मूल्यों का आदर और अपने सभी नागरिकों के मानवाधिकारों की रक्षा करे।
इस संदर्भ में वे उन चंद लोगों में से थे जिन्हें सबसे पहले यह एहसास हुआ कि सांप्रदायिकता की विघटनकारी राजनीति, देश और समाज के लिए कितनी घातक है। उन्होंने सांप्रदायिक हिंसा के कारकों के अध्ययन और विष्लेषण की परंपरा शुरू की। वे हर सांप्रदायिक दंगे का अत्यंत गंभीरता और सूक्ष्मता से अध्ययन किया करते थे। बोहरा समाज, जिससे वे थे, में सुधार लाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस्लाम की शिक्षाओं की उनकी व्याख्या के लिए उन्हें दुनियाभर में जाना जाता है। अगर हम एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते हैं जो शान्ति, सद्भाव, सहिष्णुता और करूणा पर आधारित हो, तो हम उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं।
राष्ट्र के रूप में हम आज कहां खड़े हैं? भारतीय प्रजातंत्र के समक्ष कौन-से खतरे हैं और क्या मोदी सरकार के आने के बाद से ये खतरे बढ़े हैं?
आमचुनाव में मोदी की जीत कई कारणों से हुई। उन्हें भारतीय उद्योग जगत का पूर्ण समर्थन मिला, लाखों की संख्या में आरएसएस के जुनूनी कार्यकर्ताओं ने उनके चुनाव अभियान को मजबूती दी, कार्पोरेट द्वारा नियंत्रित मीडिया ने उनका महिमामंडन किया और ‘‘गुजरात के विकास के माॅडल’’ को एक आदर्श के रूप मे प्रचारित किया। समाज को धार्मिक आधार पर धु्रवीकृत किया गया और अन्ना हजारे, बाबा रामदेव व अरविंद केजरीवाल के आंदोलनों के जरिये, कांग्रेस की साख मिट्टी में मिला दी गई। इस आंदोलन का अंत, आप के गठन के साथ हुआ।
मोदी का ‘अच्छे दिन‘ लाने का वायदा हवा हो गया है। कच्चे तेल की कीमतों में भारी कमी आने के बावजूद, भारत में महंगाई बढ़ती जा रही है। लोगों के लिए अपनी जरूरतें पूरी करना मुष्किल होता जा रहा है। मोदी ने वायदा किया था कि विदेशों में जमा कालाधन, छः माह के भीतर वापस लाया जायेगा और हम सब अपने बैंक खातों में 15-15 लाख रूपये जमा देखकर चकित हो जायेंगे। यह वायदा भुला दिया गया है। जहां तक सुशासन का सवाल है, मोदी की दृष्टि में शायद उसका अर्थ अपने हाथों में सत्ता केंद्रित करना है। केबिनेट प्रणाली की जगह, देश  पर एक व्यक्ति का एकाधिकारी शासन कायम हो गया है। भारत सरकार के सचिवों कोे निर्देश दिया गया है कि वे सीधे प्रधानमंत्री के संपर्क में रहें। मंत्रियों की तो मानो कोई अहमियत ही नहीं रह गई है।
स्वयंसेवी संस्थाओं के लिए आर्थिक संसाधन जुटाना कठिन होता जा रहा है। ‘ग्रीन पीस’ सरकार की इस नीति का प्रमुख शिकार बनी है। पिछली सरकार द्वारा शुरू की गई कल्याण योजनाओं को एक-एक कर बंद किया जा रहा है। वे कुबेरपति, जिन्होंने मोदी के चुनाव अभियान को प्रायोजित किया था, अपने खजाने भरने में जुटे हुए हैं। पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को परे रखकर, उन्हें देश का अंधाधुंध औद्योगिकरण करने की खुली छूट दे दी गई है। नये प्रधानमंत्री को न भूतो न भविष्यति नेता के रूप में प्रचारित किया जा रहा है और उनके चारों ओर एक आभामंडल का निर्माण करने की कोशिश हो रही है।
इन सब नीतियों और कार्यक्रमों से सबसे अधिक नुकसान समाज के कमजोर वर्गों को उठाना पड़ रहा है। ‘श्रम कानूनों मंे सुधार’ के नाम पर श्रमिकों को जो भी थोड़ी-बहुत सुरक्षा प्राप्त थी, उससे भी उन्हें वंचित करने की तैयारी हो रही है। उद्योगपतियों के लिए भूमि अधिग्रहण करना आसान बना दिया गया है। किसानों से येन-केन-प्रकारेण उनकी जमीनें छीनी जा रही हैं। गरीबों के लिए चल रही समाज कल्याण योजनाओं व भोजन और स्वास्थ्य के अधिकार को खत्म करने की तैयारी है।
धार्मिक अल्पसंख्यकों को आतंकित करने का सिलसिला जारी है। एक केंदीय  मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति की हिम्मत इतनी बढ़ गई कि उन्होंने सभी गैर-हिंदुओं को हरामजादे बता दिया। एक अन्य भगवाधारी भाजपा नेता, नाथूराम गोडसे को ‘देशभक्त’ बता रहे हैं और हिंदू महिलाओं से ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपील कर रहे हैं। हिंदुत्ववादी, महात्मा गांधी के हत्यारे गोडसे का महिमामंडन कर रहे हैं। वे हमेशा से गोडसे के प्रशसक थे परंतु नई सरकार आने के बाद से उनकी हिम्मत बढ़ गई है। क्रिसमस पर ‘सुशासन दिवस’ मनाने की घोषणा कर इस त्योहार के महत्व को कम करने की कोशिश की गई। ऐसी मांग की जा रही है कि हिंदू धर्मगं्रथ गीता को देश की राष्ट्रीय पुस्तक घोषित किया जाये। चर्चों और मस्जिदों पर हमले हो रहे हैं। अनेक नेता बिना किसी संकोच या डर के चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि हम सब हिंदू हैं और भारत, एक हिंदू राष्ट्र है।
इस सबके बीच नरेन्द्र मोदी चुप्पी ओढ़े हुए हैं। शायद इसलिए क्योंकि जो कुछ हो रहा है, वह भाजपा और उसके पितृ संगठन आरएसएस के एजेन्डे का हिस्सा है। संघ का मूल लक्ष्य देश को संकीर्ण हिन्दू राष्ट्रवाद की ओर ले जाना है। हिन्दू राष्ट्रवाद, मुस्लिम अतिवाद और ईसाई कट्टरवाद से मिलती-जुलती अवधारणा है। इस संदर्भ में यह याद रखना समीचीन होगा कि भारत में ‘धार्मिक राष्ट्रवाद’ की धाराओं का जन्म, भारतीय राष्ट्रवाद के उदय की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ। सन् 1888 में सामंतों और राजाओं-नवाबों ने मिलकर युनाईटेड इंडिया पेट्रियाटिक एसोसिएशन का गठन किया। बाद में मध्यम वर्ग और उच्च जातियों का श्रेष्ठि तबका भी इस संगठन से जुड़ गया। इसी संगठन के गर्भ से उत्पन्न हुए मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा, जो अपने-अपने धर्म का झंडा उठाए हुए थे।
हिन्दू महासभा के सावरकर ने सबसे पहले हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना प्रस्तुत की और सन् 1925 में गठित आरएसएस ने इसे अपना लक्ष्य बना लिया। उसने लोगों के दिमागों में यह जहर भरना शुरू किया कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और यहां रहने वाले ईसाई और मुसलमान विदेशी हैं। यह विचार महात्मा गांधी, भगतसिंह व डाॅ. अम्बेडकर की समावेशी राष्ट्रवाद की अवधारणा के धुर विपरीत था।
हमें यह याद रखना चाहिए कि साम्प्रदायिक संगठनों ने स्वाधीनता संग्राम से सुरक्षित दूरी बनाए रखी और जब देश अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त होने के लिए संघर्षरत था तब ये संगठन देश में घृणा फैलाकर दंगे करवाने में जुटे हुए थे। साम्प्रदायिक हिंसा की आग शनैः-शनैः तेज होती गई और इसके कारण राष्ट्र के रूप में हमें भारी नुकसान झेलना पड़ा।  साम्प्रदायिकता के दानव ने ही देश का विभाजन करवाया और नई सीमा के दोनों ओर के करोड़ों लोगों को घोर पीड़ा और संत्रास के दौर से गुजरना पड़ा।
हमें यह भी याद रखना चाहिए कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों की उनकी फूट डालो और राज करो की नीति को लागू करने में साम्प्रदायिक संगठनों ने काफी मदद की। इनमें हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मों के साम्प्रदायिक संगठन शामिल थे। आरएसएस की विचारधारा में रचे-बसे उसके प्रचारक नाथूराम गोड़से ने महात्मा गांधी की हत्या की। यह व्यापक भारतीय राष्ट्रवाद पर हिन्दू राष्ट्रवाद का पहला बड़ा आक्रमण था।
जहां एक ओर आरएसएस ने स्वाधीनता संग्राम को नजरअंदाज किया वहीं दूसरी ओर उसने अपने स्वयंसेवकों को हिन्दू राष्ट्रवाद की संकीर्ण विचारधारा की घुट्टी पिलाई। इन स्वयंसेवकों ने समय के साथ पुलिस, नौकरशाही और राज्यतंत्र के अन्य हिस्सों में घुसपैठ कर ली। आरएसएस ने अपने अनुषांगिक संगठनों का एक बहुत बड़ा ढांचा खड़ा किया। इनमें शामिल हैं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, वनवासी कल्याण आश्रम, विष्व हिन्दू परिषद व बजरंग दल। संघ के स्वयंसेवकों के परिवारों की महिलाओं ने राष्ट्र सेविका समिति नामक संगठन बनाया।
आरएसएस लगातार ‘पहचान’ से जुड़े मुद्दे उठाता रहा है। ‘गौरक्षा‘ और ‘मुसलमानों के भारतीयकरण‘ के अभियानों के जरिए अल्पसंख्यकों को आतंकित किया जाता रहा है और व्यापक समाज में यह संदेश पहुंचाया जाता रहा है कि मुसलमान, भारतीय नहीं हैं और देश के प्रति उनकी वफादारी संदिग्ध है।
सन् 1980 का दशक आते-आते हिन्दुत्व ब्रिगेड के मुंहजुबानी प्रचार, मीडिया के एक हिस्से के उससे जुड़ाव और इतिहास की स्कूली पाठ्यपुस्तकों के पुनर्लेखन के नतीजे में समाज के बहुत बड़े तबके में मुसलमानों के प्रति संदेह और घृणा का भाव उत्पन्न हो गया। हिन्दुत्ववादी ताकतों ने ही बहुत बेशर्मी से बाबरी मस्जिद को ढहाया। उसके पहले, आडवानी ने रथ यात्रा निकाली, जो अपने पीछे खून की लकीर छोड़ती गई।
इसके बाद साम्प्रदायिक हिंसा में और बढ़ोत्तरी हुई। हिन्दू ‘पहचान‘ को देश की एकमात्र वैध पहचान घोषित कर दिया गया। धार्मिक आधार पर धु्रवीकरण इतना बढ़ गया कि 1992-93 में मुंबई, सूरत और भोपाल में भयावह खूनखराबा हुआ। गुजरात में सन् 2002 में हुई साम्प्रदायिक विभीषिका के बारे में तो हम सब जानते ही हैं।
सन् 1980 के दशक का अंत आते-आते साम्प्रदायिक ताकतों ने मुसलमानों के अलावा ईसाईयों को भी अपने निशाने पर ले लिया। यह कहा जाने लगा कि वे हिन्दुओं का धर्मपरिवर्तन करवा रहे हैं। आदिवासी इलाकों में हिंसा भड़क उठी और इसके नतीजे में सन् 1999 में पाॅस्टर ग्राहम स्टेन्स और उनके दो मासूम बच्चों को जिंदा जला दिया गया। सन् 2008 में कंधमाल में अनेक निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया।
यह सब उस सोच का नतीजा था, जिसे संघ चिंतक एम. एस. गोलवलकर ने आकार दिया था। उनका दावा था कि भारत हमेश से हिन्दू राष्ट्र है व धार्मिक अल्पसंख्यकों को यहां या तो बहुसंख्यकों की दया पर जीना होगा और या फिर उन्हें नागरिक के तौर पर उनके सभी अधिकारों से वंचित कर दिया जाएगा।
सन् 2014 में भाजपा दूसरी बार सत्ता में आई। इसके पहले, सन् 1998 में वह सत्ताधारी एनडीए गठबंधन का हिस्सा थी। उस समय भाजपा को लोकसभा में बहुमत प्राप्त नहीं था इसलिए वह अपना एजेन्डा खुलकर लागू नहीं कर सकी। परंतु फिर भी उसने सफलतापूर्वक स्कूली पाठ्यपुस्तकों का भगवाकरण किया और पुरोहिताई व ज्योतिष जैसे अवैज्ञानिक विषयों को कालेजों और विष्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल करवाया। उसने हवा का रूख भांपने के लिए संविधान का पुनरावलोकन करने के लिए एक समिति का गठन भी किया।
अब, जबकि भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में है, वह बिना किसी लागलपेट के अपना एजेन्डा लागू कर रही है। लगभग सारे राष्ट्रीय संस्थानों में साम्प्रदायिक सोच वाले लोगोें का कब्जा हो गया है। प्रोफेसर के. सुदर्शन राव, जो भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष नियुक्त किए गए हैं, का कहना है कि जाति व्यवस्था से देश बहुत लाभान्वित हुआ है। वे महाभारत और रामायण की ऐतिहासिकता में भी विष्वास करते हैं। यह अलग बात है कि इतिहासविदों की जमात में राव को बहुत सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता। नई सरकार संस्कृत भाषा को प्रोत्साहन दे रही है। ऐसा इस तथ्य के बावजूद किया जा रहा है कि संस्कृत कभी आमजनों की भाषा नहीं रही है।
हमारा संविधान सरकार को यह जिम्मेदारी देता है कि वह वैज्ञानिक सोच को प्रोत्साहन दे। इसके ठीक उलट, सरकार विज्ञान में रूढि़वादी और अतार्किक परिकल्पनाओं को ठूंस रही है। हमें अब बताया जा रहा है कि प्राचीन भारत में 200 फीट लंबे विमान थे और प्लास्टिक सर्जरी होती थी। इस महिमामंडन का उद्धेष्यशायद यह साबित करना है कि भारत, हजारों साल पहले विज्ञान के क्षेत्र में इतना उन्नत था जितना कि आज भी विष्व के विकसित देश नहीं हैं। निःसंदेह, भारत के चरक, सुश्रुत और आर्यभट्ट जैसे प्राचीन वैज्ञानिकों ने विज्ञान के क्षेत्र में कई उपलब्धियां हासिल कीं थीं परंतु यह मानना मूर्खता होगी कि प्राचीन भारतीय विज्ञान, आज के विज्ञान से भी अधिक विकसित था। यह, दरअसल, भारतीयों में श्रेष्ठता का दंभ भरने का बचकाना प्रयास है।
किसी भी प्रजातंत्र के लिए स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्य सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। अपने हिन्दुत्ववादी एजेन्डे के तहत, भाजपा सरकार संविधान से ‘धर्मनिरपेक्ष‘ व ‘समाजवादी‘ शब्दों को हटाने की कवायद कर रही है। उसे अल्पसंख्यकों की आशंकाओं और चिंताओं की तनिक भी परवाह नहीं है। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के मूल्य गंभीर खतरे में हैं। हम आज इतिहास के ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जब भारतीय संविधान के अस्तित्व को ही खतरा पैदा हो गया है।
हम अगर अब भी नहीं जागे तो बहुत देर हो जायेगी। हमें इस खतरे का मुकाबला करने के लिए कई कदम उठाने होंगे। हमें दलितों, महिलाओं, श्रमिकों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के हकों के लिए लड़ना होगा। हमें अपने प्रजातांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए समान विचारों वाले संगठनों के साथ गठबंधन कर, एक मंच पर आना होगा। प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता के पैरोकारों में एकता, समय की मांग है। हमें हाथों में हाथ डाल, एक साथ आगे बढ़ना होगा। गैर-सांप्रदायिक राजनैतिक दलों का गठबंधन बनाकर, सांप्रदायिक शक्तियों को अलग-थलग करना होगा।
हिंदू राष्ट्रवाद की संकीर्ण राजनीति, फासीवादी और धार्मिक कट्टरपंथी शासन व्यवस्था का मिलजुला स्वरूप है। इस तरह के सन में प्रजातांत्रिक स्वतंत्रताएं सिकुड़ती जाती हैं। इसकी शुरूआत भी हो गई है। कुछ पुस्तकों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और कुछ नई पुस्तकें, जिनमें दीनानाथ बत्रा की किताबें शामिल हैं, को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
अब समय आ गया है कि हम सोशल, प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया में अपने लिए जगह बनायें। हमें विविधता, बहुवाद और उदारवादी मूल्यों को प्रोत्साहन देना है। ये ही हमें मानवीय, प्रजातांत्रिक समाज का निर्माण करने में मदद करेंगे।
-राम पुनियानी

मंगलवार, 23 सितंबर 2014

हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों का'विदेशियों' से घृणा करो जिहाद-भाग.2


यह तथ्य कि 'लव जिहाद' शब्द काफी बाद में प्रचलन में आयाए इंगित करता है कि इस नामकरण के पीछे के उद्धेश्य पवित्र नहीं हैं। जिहाद शब्द को मीडिया ने लोकप्रियता दी है। सामान्य तौर पर सिमी, इंडियन मुजाहिदीन व ऐसे ही अन्य संगठनों द्वारा, कथित रूप से किए जाने वाले आतंकी हमलों को जिहाद कहा जाता है। किसी चतुर हिन्दुत्ववादी ने इस शब्द का इस्तेमाल, अंतर्धार्मिक विवाहों . विशेषकर मुस्लिम पुरूषों व हिन्दू महिलाओं के बीच . को कलंकित करने के लिए करना शुरू किया। कई इस्लामिक विद्वानों का मत है कि जिहाद का अर्थ है कोशिश या संघर्ष करना और यह संघर्ष अपने अहं, इच्छाओं, लालच और ईर्ष्या व भय जैसे नकारात्मक भावों को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है.ऐसे भावों को जो व्यक्ति को ईश्वर की राह से विमुख करते हैं। परंतु मध्यकालीन मुस्लिम शासकों और ऐसे राजनैतिक संगठनों, जो इस्लाम के नाम का दुरूपयोग करते हैं,के कारण जिहाद का अर्थ, गैर.मुसलमानों के खिलाफ युद्ध, जिनमें आतंकी हमले शामिल हैं, बन गया है। अंतर्धार्मिक विवाहों को कलंकित करने के लिए जिहाद शब्द का उपयोग, सबसे पहलेए कुछ वर्ष पूर्व केरल में किया गया था। सन् 2009 में इसका निर्यात पड़ोसी कर्नाटक में हुआ, जहां हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों ने मुस्लिम लड़कों व हिन्दू लड़कियों के बीच दोस्ती के विरूद्ध अभियान चलाया। पुलिस ने इन संगठनों के इस आरोप में कोई दम नहीं पाया कि मुस्लिम युवक, केवल उनका धर्मपरिवर्तन करवाने के उद्धेश्य से,हिन्दू लड़कियों से दोस्ती कर रहे हैं। पुलिस ने नवम्बर 2009 में इस मसले की जांच बंद कर दी। सन् 2012 में केरल पुलिस ने भी लव जिहाद की जांच की और यह पाया कि 'ऐसा कोई अभियान अस्तित्व में नहीं है'।
परंतु हिन्दू संगठन अपनी बात पर अड़े रहे। उनके अनुसार, सन् 2006 से लेकर अब तक, केरल में मुस्लिम लड़कों और हिन्दू लड़कियों के बीच 25 हजार विवाह हुए हैं। उनके इस आरोप की पुष्टि के लिए उनके पास कोई प्रमाण नहीं है परंतु वे इसे लगातार दुहराते जा रहे हैं। सन् 2001 की जनगणना के अनुसार, देश में एक हजार पुरूषों पर 931 महिलाएं थीं। उत्तरप्रदेश में लिंगानुपात और कम.898.था। परिवार बेटियां नहीं चाहते परंतु पुरूष, महिलाएं चाहते हैं और अपने समुदाय की महिलाओं को अपनी संपत्ति मानते हैं। जाहिर है कि इस तरह के दावों के कारण,समुदाय के पुरूषों को लगता है कि उनकी 'संपत्ति' तेजी से घट रही है और वे उस संपत्ति को लूटने वाले दुश्मन के खिलाफ लामबंद हो जाते हैं। यही कारण है कि'बहू.बेटी बचाओ महापंचायत'में एक लाख हथियारबंद लोग इकट्ठा हो गए थे। मुसलमानों में लिंगानुपात थोड़ा बेहतर.936.था। अगर मुस्लिम युवक लव जिहाद में जुट जाएंगे तो मुस्लिम नवयुवतियों का क्या होगा?जाहिर है,उन्हें हिन्दू पुरूषों से विवाह करना पड़ेगा और तब तो यह मैच ड्रा हो जाएगा।
उत्तरप्रदेश में हालिया उपचुनावों में भाजपा का अभियान इसी तरह के बेसिरपैर के आरोपों पर आधारित था। यद्यपि पार्टी ने अपने आधिकारिक वक्तव्यों और दस्तावेजों में कहीं भी लव जिहाद शब्द का प्रयोग नहीं किया परंतु भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ और उत्तरप्रदेश भाजपा अध्यक्ष डॉक्टर लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने अपने भड़काऊ भाषणों में लव जिहादियों को जमकर कोसा। उमा भारती ने इस मुद्दे पर बहस की जरूरत बताई। शायद ये नेता जनता का ध्यान उन 'अच्छे दिनों' से हटाना चाहते हैं, जिनका कहीं अतापता नहीं है।
भाजपा को अपनी भलाई इसमें ही नजर आती है कि आम आदमी लगातार बांटने वाले मुद्दों को लेकर लड़ता.भिड़ता रहे। जहां एक ओर आम लोग धर्म, जाति आदि से जुड़े गैर.जरूरी व महत्वहीन मुद्दों में उलझे हुए हैं वहीं कारपोरेट जगत, अपना खजाना भरने में जुटा हुआ है। हाल में श्रम कानूनों में किए गए बदलावों पर देश में बहुत कम चर्चा हुई। इन बदलावों ने मजदूरों को संगठित करना बहुत कठिन बना दिया है। भू.अधिग्रहण कानूनों में ऐसे परिवर्तन किए जाने प्रस्तावित हैं जिनसे पूंजीपति उद्योगपतियों को मिट्टी के मोल जमीन मिल सकेगी।
उत्तरप्रदेश चुनाव
भाजपा को उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में कोई खास सफलता हाथ नहीं लगी थी। पार्टी को यह भान था कि अगर 16वीं लोकसभा के चुनाव के बाद उसे सत्ता में आना है तो उसे उत्तरप्रदेश में जबरदस्त प्रदर्शन करना होगा। बाबरी मस्जिद का मुद्दा मृतप्रायः था। ऐसे में, हिन्दू संगठनों को लगा कि युवाओं के बीच अंतर्धार्मिक संबंधों को लेकर तूफान खड़ा किया जा सकता है। इस अभियान का फोकस पश्चिमी उत्तरप्रदेश पर था जहां के विभिन्न समुदाय, महिलाओं के 'सम्मान' के प्रति अतिसंवेदनशील हैं और जहां खाप पंचायतों का बोलबाला है। पश्चिमी उत्तरप्रदेश में जाटों और मुसलमानों के बीच मधुर संबंध थे। सन् 1857 के विद्रोह में मुसलमानों और जाटों ने कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया था।  परंतु भाजपा और उसके साथी संगठनों ने अपने लव जिहाद अभियान के जरिए कुछ ही वर्षों में इन मधुर संबंधों को शत्रुता में बदल दिया और दोनों समुदायों को ध्रुवीकृत करने में सफलता हासिल कर ली। लोकसभा चुनाव के ठीक पहले,भाजपा ने मतदाताओं को ध्रुवीकृत करने के लिए अत्यंत आक्रामक अभियान चलाया। मुसलमानों के खिलाफ भावनाएं भड़काने में जो हथियार सबसे कारगर सिद्ध हुआ वह था मुस्लिम लड़कों और हिन्दू लड़कियों के बीच दोस्ती या मुस्लिम लड़कों द्वारा हिन्दू लड़कियों के साथ छेड़छाड़ को मुद्दा बनाना। तथ्य यह है कि सभी धर्मों, जातियों और समुदायों के लड़के, लड़कियों पर फब्तियां कसते हैं और उनके साथ छेड़छाड़ करते हैं।
मुजफ्फरनगर,उत्तरप्रदेश के सर्वाधिक विकसित और समृद्ध जिलों में से एक है। वहां के शक्कर, स्टील व कागज उद्योग के कारण, जिले का औद्योगिक विकासए राज्य के अन्य इलाकों की तुलना में बहुत तेजी से हुआ है। संपन्नता बढ़ने के साथ.साथ शिक्षा का प्रसार भी हुआ। जाहिर है कि शैक्षणिक संस्थानों में विभिन्न धर्मों व जातियों के लड़के.लड़कियों के बीच मेलजोल बढ़ा। इससे पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं और नए विचारों के बीच टकराव अवश्यंभावी था। विभिन्न जातियों की खाप पंचायतों द्वारा युवाओं, विशेषकर लड़कियों, पर तरह.तरह के प्रतिबंध लगाने की कोशिशए इसी टकराव का नतीजा थी। ऐसे वातावरण में, लव जिहाद का मुद्दा उछाला गया और जाट समुदाय के बुजुर्ग वर्ग में इसकी सकारात्मक प्रतिक्रिया हुई। मुद्दे को महिलाओं के सम्मान से जोड़कर उसका राजनीतिकरण कर दिया गया। अनवरत प्रचार के कारण मुस्लिम.विरोधी भावनाओं में तेजी से उबाल आया और अंततः, सितंबर 2013 में जाट.मुस्लिम दंगे भड़क उठे। इससे धार्मिक ध्रुवीकरण और बढ़ा। भाजपा को लोकसभा चुनाव में इस ध्रुवीकरण से जबरदस्त लाभ हुआ।
जाति, लिंग व हिन्दू संगठनों का लव जिहाद अभियान
हिन्दू संगठनों का लव जिहाद अभियान, मुसलमानों द्वारा हिन्दू लड़कियों के अपहरण,उनके साथ बलात्कार अथवा उनको बहलाने.फुसलाने के विरोध तक सीमित नहीं है। यहए दरअसल, दोनों समुदायों और विभिन्न जातियों के बीच खून के रिश्ते बनने का विरोध है। जाति व्यवस्थाए अंतर्जातीय विवाहों को इसलिए प्रतिबंधित करती है क्योंकि उनसे जन्म पर आधारित सामाजिक भेदभाव के किले के ढ़ह जाने की आशंका होती है।
यद्यपि सतही तौर पर ऐसा लग सकता है कि लव जिहाद अभियानए बुरी नजर रखने वाले 'शत्रु समुदाय' के विरूद्ध है। परंतु असल में, यह हिन्दू महिलाओं पर अधिक कड़ा नियंत्रण स्थापित करने का अभियान है। किसी लड़की को किससे शादी करनी चाहिए, इसका निर्णय उसकी जाति और परिवार करते हैं और इसमें दोनों परिवारों के गोत्र,उनकी आर्थिक हैसियत, दहेज देने की क्षमता आदि जैसे मुद्दे निर्णायक भूमिका अदा करते हैं। खाप पंचायतें इन सामाजिक नियमों को लागू करती हैं और जो लोग इनका पालन नहीं करते, उनको घोर अनैतिक व हिंसक सजाएं दी जाती हैं, जिनमें यौन हिंसा और यहां तक किए संबंधित महिला की हत्या तक शामिल है। विडंबना यह है कि इन हत्याओं को 'आनर किलिंग' कहा जाता है। खाप पंचायतें महिलाओं के लिए लक्ष्मण रेखा का निर्धारण करती हैं।। उनका कहना है कि अविवाहित महिलाओं को मोबाईल फोन का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए और दिन ढ़लने के बाद केवल किसी पुरूष रिश्तेदार के साथ ही घर से बाहर निकलना चाहिए। खाप पंचायतें, लड़कियों के इंटरनेट इस्तेमाल करने पर भी प्रतिबंध लगाना चाहती हैं। वे यह भी तय करना चाहती हैं कि लड़कियां कैसे कपड़े पहनें और किन स्थानों पर जाएं या न जाएं। मुस्लिम समुदाय और उसकी खाप पंचायतें भी अपनी महिलाओं पर इसी तरह के प्रतिबंध लगाती हैं।
हिन्दू संगठन, अंतर्धार्मिक प्रेम के विरूद्ध आक्रामक अभियान चलाते हैंए उनका अतिश्योक्तिपूर्ण विवरण पेश करते हैं और यह आरोप भी लगाते हैं कि हिन्दू लड़कियों से दोस्ती करने के पीछे मुस्लिम युवकों के विशिष्ट उद्धेश्य होते हैं।  परंतु असल में उनके निशाने पर महिलाओं की स्वतंत्रता है, विशेषकर उनके अपना जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता। वे तो लड़कों और लड़कियों के मेलमिलाप के भी खिलाफ हैं और उनकी दृष्टि में आदर्श पुत्र या पुत्री वह है जो आंख मूंदकर अपने माता.पिता की आज्ञा माने और उन्हें अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार दे। आश्चर्य नहीं कि प्रेम विवाह के खिलाफ इस अभियान को सभी समुदायों के अभिभावकों में भारी लोकप्रियता मिली। लव जिहाद अभियान की सफलता इस तथ्य से आंकी जा सकती है कि कालेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले युवा, जिनसे स्वाभाविकतः विद्रोही होने की उम्मीद की जाती है,भी अंतर्धार्मिक विवाहों के खिलाफ हो गए। हमारे संगठन सीएसएसएस ने हाल में एक नए विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के लिए कार्यशाला का आयोजन किया। इन पंक्तियों के लेखक को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि युवा छात्र.छात्राओं में भी अंतर्धार्मिक विवाह के प्रति जबरदस्त प्रतिरोध है।
हिन्दू संगठनों के लव जिहाद अभियान का असली उद्धेश्य यह है कि हिन्दू महिलाएं, स्वमेव, पुरूषों द्वारा उन पर थोपे जा रहे प्रतिबंधों को स्वीकार कर लें और उन्हें अपना रक्षक मान लें। जबकि तथ्य यह है कि हिन्दू महिलाओं को हिन्दू पुरूषों से सुरक्षा की उतनी ही जरूरत है जितनी कि मुस्लिम महिलाओं को मुस्लिम पुरूषों से। कन्या भ्रूड हत्याए दहेज हत्याए परिवार के सदस्यों या रिश्तेदारों द्वारा बलात्कार व घरेलू हिंसा आदि आखिरकार पुरूषों द्वारा अपने ही समुदाय की महिलाओं के विरूद्ध किए जाने वाले अपराध हैं। महिलाओं को उस संपत्ति से वंचित करना,जो उत्तराधिकार में उन्हें मिलनी चाहिए भी ऐसा ही एक उदाहरण है। हिन्दू राष्ट्रवादी संगठन कभी लैंगिक न्याय की बात नहीं करते और ना ही वे कभी महिलाओं को उनके परिवारों के पुरूषों से सुरक्षा दिलवाने के मसले पर कुछ बोलते हैं।
भारतीय प्रजातंत्र और अंतर्धार्मिक विवाह
    हिन्दू संगठन चाहते हैं कि हम यह स्वीकार कर लें कि युवाओं का एक.दूसरे के प्रति आकर्षित होना, उनके बीच मित्रता होना व उनके द्वारा अपने जीवनसाथी का स्वयं चुनाव करना शैतानी वृति है। क्या जिन सौ 'स्मार्ट सिटी' का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विकास करना चाहते हैंए उनमें अलग.अलग लिंगों और धर्मों के लोगों को अलग.अलग रखा जाएगा?जब दो समुदायों के लोग एक साथ रहते हैं तो वे एक.दूसरे से मिलते.जुलते हैं और ऐसे में युवाओं का एक.दूसरे के प्रति आकर्षित हो जाना स्वाभाविक और सामान्य है। विभिन्न धार्मिक समुदायों और अलग.अलग सांस्कृतिक परंपराओं के लोगों के आपसी संव्यवहार से वे स्वयं को और दूसरों को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं और एक.दूसरे से अच्छी बातें सीखते हैं। आपसी मेलजोल न सिर्फ सभी संस्कृतियों को समृद्ध बनाता है वरन वह सांस्कृतिक विविधता को भी जन्म देता है। शहरों में इस तरह के मेलजोल के लिए कई स्थान होते हैं जिनमें मोहल्ले, बाजार, शैक्षणिक संस्थाएं, मनोरंजन के स्थल,कार्यस्थल,सार्वजनिक परिवहन व नागरिक सुविधाएं हासिल करने के लिए एक साथ मिलकर किए जाने वाले संघर्ष शामिल हैं। जब तक ये स्थान रहेंगे तब तक विभिन्न समुदायों और लिंगों के लोगों को एक.दूसरे से पृथक रखना असंभव नहीं तो बहुत कठिन अवश्य होगा।
भारतीय संविधान अपने सभी नागरिकों को उनकी पसंद के धर्म में आस्था रखने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का हक देता है। कानून की हदों के भीतर रहते हुए हर व्यक्ति को अपने जीवन के बारे में स्वयं निर्णय लेने का पूरा अधिकार और स्वतंत्रता है। ब्रिटिश राज से मुक्ति के बाद हमने एक ऐसे भारत के निर्माण का संकल्प लिया था जो प्रजातांत्रिक होगा, जिसमें सामाजिक न्याय होगा और जो विविधता और बहुवाद को सम्मान देगा। खाप और अन्य साम्प्रदायिक संगठनों की सोच के विरूद्ध, हमारा संविधान हर वयस्क को उसका जीवनसाथी चुनने का हक देता है। यही कारण है कि सन् 1954 में विशेष विवाह अधिनियम लागू किया गया। इसके अंतर्गत, विपरीत लिंग के कोई भी दो व्यक्ति, चाहे वे किसी भी धर्म, जाति या नस्ल के होंए बिना किसी धार्मिक या पारंपरिक रीतिरिवाज के, एक.दूसरे से विवाह कर सकते हैं। उन्हें केवल यह शपथ लेनी होती है कि वे एक.दूसरे को जीवनसाथी के रूप में स्वीकार करते हैं। इस विवाह के लिए केवल एक माह के नोटिस और तीन गवाहों की आवश्यकता होती है। जाहिर है कि विवाह की प्रक्रिया का यह सरलीकरण,अंतर्धामिक व अंतर्जातीय विवाहों को प्रोत्साहित करने के लिए ही किया गया था।
हिन्दू राष्ट्रवादियों व अन्य धर्मों के साम्प्रदायिक व जातिवादी श्रेष्ठि वर्ग की इच्छा यह है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगा,जाएं और ऐसे संगठनोंए संस्थाओं व प्रक्रियाओं की स्थापना की जाए जिनसे युवाओं पर उनका समुदाय व परिवार अपनी इच्छाएं थोप सके। गुजरात मॉडल में राजस्व अधिकारियों को यह अधिकार दिया गया है कि वे यह निर्णय करें कि किसी के लिए उसकी पसंद का व्यक्ति उपयुक्त जीवनसाथी होगा या नहीं। जब तक हम वयस्कों को उनके जीवन के संबंध में निर्णय लेने का अधिकार नहीं देंगे तब तक भारत एक मजबूत प्रजातंत्र नहीं बन सकेगा।
इस उद्धेश्य की पूर्ति के लिए हमें सबसे पहले ऐसी शैक्षणिक संस्थाओं की आवश्यकता है जो विद्यार्थियों में आलोचनात्मक दृष्टि का विकास करें। लोगों को शिक्षित और जागरूक बनाने का काम केवल शैक्षणिक संस्थाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि यह हर उस क्षेत्र में होना चाहिए जहां सामंती शक्तियां,धार्मिक और जातिगत पहचान को मजबूती देने की कोशिश कर रही हैं। हमें युवाओं से यह पूछना ही होगा कि वे क्या चाहते हैं। तभी हम सच्चे प्रजातंत्र की स्थापना की ओर बढ़ सकेंगे और समाज के दबे.कुचले वर्ग को स्वर दे सकेंगे। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि आज का महत्वाकांक्षी युवावर्ग किसी को यह इजाजत नहीं देगा कि वह उस पर हुक्म चलाए।
-इरफान इंजीनियर

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

भारतीय सेना और प्रजातंत्र

भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के लगभग सभी राष्ट्रों के नागरिक, अपनी-अपनी सेनाओं को गर्व और श्रद्धा की नजर से देखते हैं। सेना को अराजनैतिक, अनुषासित सदस्यों वाली एक पवित्र संस्था माना जाता है। यह भी माना जाता है कि सेना के अधिकारी और कर्मचारी देषभक्त और ईमानदार होते हैं। आन्ध्रप्रदेष में सेना के दो अधिकारियों द्वारा जमीन पर कब्जा और आदर्ष हाउसिंग सोसायटी घोटाले को उन चन्द अपवादात्मक परिस्थितियों में गिना जाता है, जब धन की लिप्सा कुछ सैनिक अधिकारियों पर हावी हो गई थी। तहलका का वह स्टिंग आपरेषन, जिसके तहत खबरनवीसों ने हथियारों के सौदागर के भेस में सेना के अधिकारियों से मुलाकात की थी, ने भी सैनिकों की ईमानदारी और देषभक्ति में हमारे भरोसे को नहीं डिगाया। हम यह मानते रहे कि सैनिक स्वार्थपरता जैसी मानवीय कमजोरियों पर विजय हासिल कर लेते हैं। हम यह मानते रहे कि सैनिक जिसे एक व एकमात्र षत्रु मानते हैं वे हैं विदेषी हमलावर सेनाएं। हम यह भी मानते रहे कि ‘षत्रु’ से युद्ध करना आवष्यक है और यह भी कि सैनिक, हमारी सीमाओं की रक्षा और हमारे नागरिकों की सुरक्षा की खातिर युद्ध करते हैं।
मध्यमवर्गीय भारतीय, राजनेताओं को गिरी हुई दृष्टि से देखते हैं। वे यह मानते हैं कि अधिकांष राजनेता ग्रामीण पृष्ठभूमि के हैं व भ्रष्ट और स्वार्थी हैं। मध्यमवर्ग एक अन्य कारण से भी राजनेताओं को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखता-वह यह कि वे चुनाव जीतने के लिए सस्ती कीमत पर अनाज, टी.वी. सेट और लेपटाॅप आदि जैसी सुविधाएं उन लोगांे को उपलब्ध करवाते हैं, जो उन्हें पाने के लायक नहीं हैं। राजनेताओं को हमारा मध्यमवर्ग एक आवष्यक बुराई की तरह सहन भर करता है।
सेवानिवृत्त सेना प्रमुख जनरल व्ही.के. सिंह के हालिया खुलासे, इन सभी मान्यताओं को चुनौती देते हैं-विषेषकर मध्यमवर्गीय भारतीयों की मान्यताओं को। जनरल सिंह का कहना है कि सेना, जम्मू-कष्मीर राज्य के मंत्रियों को लम्बे समय से धन देती रही है। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाषित एक रपट के अनुसार, ‘आर्मी इंटेलिजेंस यूनिट’ के धन का उपयोग, जम्मू-कष्मीर की चुनी हुई सरकार का तख्ता पलट करने की कोषिष में किया गया था। परन्तु जनरल ने यह स्पष्टीकरण दिया है कि मंत्रियों को धन, राजनैतिक स्थायित्व को बढ़ावा देने और लोगों के दिलो-दिमाग को जीतने के लिए दिया गया था। विभिन्न समाचारपत्रों में प्रकाषित रपटों में कई अन्य सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों के हवाले से यह बताया गया है कि ‘‘लोगों का दिलो-दिमाग जीतने’’ के अभियान पर जो खर्च हुआ, वह ‘सद्भावना योजना’ के अन्तर्गत किया गया और सेना ने विभिन्न कल्याणकारी कार्यक्रमों पर सीधे धन खर्च किया। लेफ्टिनंेट जर्नल अर्जुन रे, जो लद्दाख स्थित 14 कोर के कमांडर थे, ने अपनी पुस्तक, ‘पीस इज़ एव्रीबडीज बिजनेस: स्ट्रेटेजी फाॅर कनफ्लिक्ट प्रिवेंषन’ में उनके द्वारा लागू की गई सद्भावना योजना का विवरण दिया है। उनके नेतृत्व में सद्भावना एक नागरिक पहल थी, जिसके अंतर्गत नागरिकों को मानवीय सहायता उपलब्ध करवाई जाती थी और यह कोषिष की जाती थी कि सेना का मानवीय चेहरा लोगों के सामने आए। रे के अनुसार, उनकी सोच यह थी कि अभियान सब से नीचे के स्तर से षुरू होना चाहिए ताकि नागरिकों की मानवीय गरिमा की पुनस्र्थापना हो सके और वे अपने भविष्य के निर्माता स्वयं बन सकें। इस प्रकार, मीडिया रपटों से ऐसा लगता है कि ‘‘लोगों के दिलो-दिमाग जीतने’’ के लिए चलाई गई सद्भावना योजना अलग थी और कष्मीर के मंत्रियों को धन दिए जाने का मसला अलग था। जनरल व्ही. के. सिंह पूर्व सेनाप्रमुख हैं और जब वे यह कहते हैं कि सेना कष्मीर में मंत्रियों को धन देती थी, तब उनके वक्तव्य को आसानी से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह बात कहने से उनका कोई हित साधन हो रहा हो, ऐसा भी नहीं लगता। झूठी कहने से उन्हें क्या हासिल होगा? हम यह भी नहीं कह सकते कि जनरल सिंह अधूरी या गलत सूचनाओं के आधार पर यह बात कह रहे हैं। चूँकि वे सेना प्रमुख थे अतः सेना द्वारा की जाने वाली हर कार्यवाही की पूरी और सही-सही जानकारी उन्हें उपलब्ध रहती ही होगी। केवल निष्पक्ष जांच के जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि किसे पैसा दिया गया और कितना।
भाजपा से जुड़े नेता और जनरल स्वयं, केवल इस जानकारी के लीक होने को महत्व दे रहे हैं और उसकी जांच की मांग कर रहे हैं। भाजपा नेता मिलेट्री इन्टेलिजेंस की रिपोर्ट में जो कहा गया है, उस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते। वे केवल इस बात की जांच चाहते हैं कि यह रपट मीडिया के पास कैसे पहुंची। दूसरी ओर, नेषनल कान्फ्रेन्स की मांग है कि रपट में कही गई बातों की गहन जांच होनी चाहिए और सही तथ्यों को लोगों के सामने लाया जाना चाहिए। जनरल ने यह मांग की है कि ‘टेक्निकल सर्विसेज डिवीजन’ और उसकी भूमिका के बारे में एक ष्वेतपत्र प्रकाषित किया जाए। यह पूरा मसला सार्वजनिक इसलिए हुआ क्योंकि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार, जनरल का समर्थन चाहते थे और पूर्व सैनिकों के वोट कबाड़ने के अतिरिक्त, अपने राजनैतिक एजेण्डा को सेना तक पहुंचाना भी चाहते थे। बहरहाल, इस सब का नतीजा यह हुआ कि जनरल ने पूरे देष को यह बता दिया कि सेना देष की राजनीति को प्रभावित करने की कोषिष करती रही है।
सेना की भूमिकाएं
प्राचीनकाल में युद्ध कबीलों के बीच होते थे और कबीले के हर सदस्य को लड़ाई में भाग लेना होता था। परंतु सामाजिक प्रगति के साथ, जब उत्पादन की मात्रा, समाज की मूलभूत आवष्यकताओं से अधिक होने लगी, अर्थात अर्थव्यवस्था में अधिषेष मूल्य का सृजन होने लगा, तब समाज में ऐसे प्रषिक्षित या अर्धप्रषिक्षित सैनिकों का खर्च उठाने की क्षमता आ गई, जिनका काम केवल युद्ध लड़ना था। राज्य के खजाने, हथियारों और राजा के महल की रक्षा के लिए न्यूनतम संख्या में नियमित सैनिक रहते थे परन्तु युद्ध लड़ने के लिए बड़ी सेनाएं, दूसरे राजाओं के साथ गठबंधन कर जुटाई जाती थीं। युद्ध के लिए हमेषा तैयार रहने वाली विषाल सेनाएं, जैसी कि हम आज देख रहे हैं, बहुत पुरानी नहीं हैं।
आधुनिक सेनाएं तीन प्रकार की भूमिकाएं निभाती हैं:  बाहरी खतरों से सीमा की रक्षा। देष में आन्तरिक हिंसक संघर्ष या गड़बडि़यों से निपटना व किसी इलाके पर देष का कब्जा बनाए रखना। कब जब सेना को एक चैथी भूमिका भी निभानी पड़ती है। वह है प्राकृतिक या मानव-निर्मित हादसों के समय राहत व बचाव कार्य। कई बार सेना को इनमें से एक या अधिक भूमिकाएं एक साथ निभानी पड़ती हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि देष के नागरिकों का अलग-अलग तबका, सेना को अलग-अलग भूमिकाओं में देखता है।
भारत के नागरिकों के विभिन्न तबके, सेना को अलग-अलग समय में उपरोक्त चारों भूमिकाओं में देख चुके हैं। पाकिस्तान और चीन के साथ युद्ध के दौरान भारतीय सेना ने सीमाओं की रक्षा की और कई बार बहुत कठिन परिस्थितियों में उसने यह काम किया। हादसों, जैसे हाल में उत्तराखंड में बादल फटने, गुजरात व महराष्ट्र में भूकंप, सूनामी, बाढ़ आदि में लोगों को बचाने के लिए सैनिकों की सहायता ली जाती रही है। भारतीय सेना की साम्प्रदायिक दंगांे के दौरान भी तैनाती होती रही है। अल्पसंख्यक अक्सर यह मांग करते हैं कि उपद्रवग्रस्त इलाकों में जल्द से जल्द सेना की तैनाती कर दी जाए क्योंकि पुलिस की भूमिका अक्सर पक्षपातपूर्ण रहती है। विभिन्न तथ्यान्वेषण रपटों से यह साफ है कि पुलिस, अल्पसंख्यकों के विरूद्ध जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल करती है। अल्पसंख्यकों को एक ओर दंगाई मारते हैं तो दूसरी ओर पुलिस। पुलिसकर्मी मुसलमानों के व्यवसायिक संस्थानों की लूटपाट में भी हिस्सा लेते हैं। जो राजनेता दंगे करवाते हैं या जिन्हें उनसे राजनैतिक लाभ की उम्मीद होती है, वे सेना की तैनाती में जितनी संभव हो, उतनी देरी करने की कोषिष करते हैं। किसी ऐसे इलाके में सेना की तैनाती होते ही हिंसा में तेजी से कमी आ जाती है। सेना यह सुनिष्चित करती है कि अल्पसंख्यकों को बचाकर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया जाए। सन् 2002 में गुजरात और सन् 1984 में दिल्ली में सम्बंधित सरकारों ने सेना की तैनाती में 72 घंटे से भी अधिक की देरी की और इस दौरान दोनों राज्यों में मौत का नंगा नाच होता रहा।
ए.एफ.एस.पी.ए. बना सैनिकों का कवच
आन्तरिक संघर्ष के क्षेत्रों जैसे जम्मू-कष्मीर, नागालैण्ड व मणिपुर में सेना की लंबी अवधि के लिए तैनाती आम हो गई है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि सेना वहां से कभी जाएगी ही नहीं। इस लंबी तैनाती की वजह से सेना, स्थानीय राजनीति में उलझ जाती है। नागालैण्ड, मणिपुर और जम्मू-कष्मीर के नागरिकों का एक बड़ा तबका, सेना को मानवाधिकारों के उल्लघंनकर्ता के रूप में देखता है। स्वाधीनता चाहने वाले हथियारबंद गिरोहों से मुकाबला करने में सैनिकों को भी जानें गंवानी पड़ती हैं और प्रतिक्रिया स्वरूप, वे निष्ठुरता से बल का इस्तेमाल करने पर आमादा हो जाते हैं। वे हथियारबंद लड़ाकों के मानवाधिकारों का उल्लघंन तो करते ही हैं, समुदाय के निहत्थे सदस्यों को भी अपना निषाना बनाने लगते हैं। बल प्रयोग अक्सर बदला लेने की इच्छा व भावना से किया जाता है। हथियारबंद लड़ाके तो मिलते नहीं हैं परन्तु उनके बदले समुदाय के आम सदस्यों को प्रताडि़त किया जाता है। यह माना जाता है कि हथियारबंद लड़ाकों के अपराधों के लिए उनके समुदाय को सजा देने से लड़ाकों पर हथियार डालने का दबाव पड़ेगा। मणिपुर व जम्मू कष्मीर में समुदाय की महिलाओं पर सेक्स संबंधी अत्याचारों का भी हथियार के रूप में प्रयोग किया जाता है। मणिपुर में कुछ समय पहले, महिलाआंे ने निर्वस्त्र होकर सेना के षिविर के सामने प्रदर्षन किया था। वे सैनिकों को उनके साथ बलात्कार करने की चुनौती दे रही थीं। छत्रीसिंहपुरा हत्याकांड, युवकों का उनके घरों से गायब हो जाना, वीरता पदक और नकद इनाम के लालच में फर्जी मुठभेड़ें आदि जैसी घटनाएं होती रहती हैं। जम्मू कष्मीर में कई स्थानों पर सामूहिक कब्रें मिली हैं जो पीडि़तों के मानवाधिकारों के उल्लंघन का सुबूत तो हैं ही, उनसे यह भी साबित होता है कि सैनिकों को किसी का डर नहीं हैै। सैनिकों को इस तरह की घटनाओं के लिए जवाबदेह इसलिए नहीं बनाया जाता क्योंकि इससे ‘‘उनका मनोबल गिरेगा‘‘। ऐसे कुछ मामलों की जांच सीबीआई को सौंपी गई और जांच एजेन्सी को फर्जी मुठभेड़ों और सैनिकों द्वारा आम लोगों के मानवाधिकारों के उल्लंघन के पुख्ता सुबूत मिले। परंतु सेना, सषस्त्र बल विषेषाधिकार अधिनियम का सहारा लेकर दोषी अधिकारियों को बचाने की कोषिष कर रही है। इस कानून के संरक्षण के कारण जनता के मानवाधिकारांे के उल्लंघन को प्रोत्साहन मिलता है और सैनिक बिना किसी डर के आमजनों के मानवाधिकारों को रौंदते हैं। जब समुदाय और उसके राजनैतिक प्रतिनिधियों को यह एहसास होता है कि वे दोषी सैनिकों को उनके कुकर्मों की सजा दिलवाने में असमर्थ हैं तो वे उसे एक ऐसी सेना के रूप में देखने लगते हैं जिसने उनके इलाके पर कब्जा किया हुआ है। ऐसी सेना का विरोध, चाहे वह कितना ही कमजोर क्यों न हो, जनता के लिए एकमात्र विकल्प बचता है व इससे हथियारबंद लड़ाकेे लोकप्रिय नायक बन जाते हैं।
इस मामले में राजनैतिक वर्ग की दो प्रमुख गलतियां हैं। पहली, वह समस्याओं का राजनैतिक हल निकालने की पर्याप्त व गंभीर कोषिष नहीं करना व दूसरी, सेना से संबंधित सभी जानकारियों को रहस्य के आवरण में रखना। जहां तक सैन्य रणनीति या इसी तरह की अन्य जानकारियों का सवाल है, उन्हें गुप्त रखना पूर्णतः उचित है परंतु क्या यह आवष्यक है कि हम सेना से संबंधित हर चीज को गुप्त बताने लगें? ऐसा करने से सेना के उच्चाधिकारियों को निरंकुष षक्तियां हासिल हो जाती हैं और उनकी जवाबदेही किसी के प्रति नहीं रहती। सेना के षीर्ष नेतृत्व को असीमित अधिकार देने के लिए मीडिया के जरिए सेना के आसपास एक आभामंडल का निर्माण कर दिया जाता है। तहलका के उस स्टिंग आपरेषन, जिसके जरिए उसने सेना में भ्रष्टाचार का पर्दाफाष किया था, की काफी आलोचना हुई थी। मीडिया भी सेना और उससे संबंधित खबरों की बहुत जांच-पड़ताल नहीं करता और ना ही उनकी गहराई से समीक्षा करता है।
भाजपा जैसी पार्टियों द्वारा पैदा किया जा रहा युद्धोन्मादी राष्ट्रवाद का जुनून भी सेना को एक ऊँचे पायदान पर रखता है। युद्धोन्मादी राष्ट्रवाद का चरित्र विस्तारवादी होता है और वह सैन्य षक्ति और प्रभुता की भाषा में बात करता है न कि न्याय और समावेषिता की भाषा में। यही युद्धोन्मादी राष्ट्रवाद, सुषमा स्वराज को यह कहने के लिए प्रेरित करता है कि सीमा पर मारे गए हर भारतीय सैनिक के बदले वे दस पाकिस्तानी सैनिकों के सिर चाहती हैं। इस तरह की सोच व मानसिकता, देष को सेना पर जरूरत से ज्यादा निर्भर बना देती है। विवादों का निपटारा करने के लिए संवाद और समझाने-बुझाने के तरीकों को कोई महत्व ही नहीं दिया जाता। सेना पर निर्भरता का अर्थ होता है सैनिकों और सैनिक साजोसामान पर अधिक खर्च। इससे षिक्षा, स्वास्थ्य व अधोसंरचना विकास के कार्यक्रम प्रभावित होते हैं। इस तरह, मोदी की आक्रामक राजनीति को सेना की जरूरत है और सेना को ऐसे आक्रामक नेताओं की। इसलिए मोदी के मंच पर पूर्व सैनिकों की उपस्थिति आष्चर्य नहीं बल्कि चिंता को जन्म देती है क्योंकि इससे सेना को राजनीति में हस्तक्षेप करने की प्रेरणा मिलती है। अगर सैनिक अफसर पर्दे के पीछे से राजनेताओं को धन दंेगे और वह भी बिना किसी हिसाब-किताब के, तो यह प्रजातंत्र के लिए अच्छा लक्षण नहीं है। राजनेताओं को धन देने से लोगों के दिलोदिमाग नहीं जीते जा सकते। और वैसे भी, लोगों का दिलोदिमाग जीतना सेना का काम नहीं है। यह राजनेताओं का काम है। राजनेताओं को सबको साथ लेकर, संवाद के जरिए, समस्याओं का राजनैतिक हल ढूढ़ना होगा। राजनेताओं और सेना के बीच गठजोड़ न केवल सैनिक अफसरों और राजनेताओं दोनों को भ्रष्ट करेगा वरन् यह देष के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकता है। एएफएसपीए जैसे कानूनों को तुरंत हटाए जाने की जरूरत है ताकि सैनिक अफसर व सैन्यकर्मी मानवाधिकारों का सम्मान करना सीखें। इससे प्रजातंत्र मजबूत होगा।

- इरफान इंजीनियर


शनिवार, 6 अप्रैल 2013

कांग्रेस और भाजपा में कई समानताएं






यू.पी.ए-2 अब अल्पमत में है और एसपी, बीएसपी व आरजेडी द्वारा बाहर से दिए जा रहे समर्थन पर उसकी सरकार जिन्दा है। अब से लगभग एक साल बाद, उसे आमचुनाव का सामना करना है। अपने आखिरी साल में सरकार को अपने गठबंधन के साथियों और मित्र दलों के भारी दबाव और खींचातानी का सामना करना पड़ रहा है। यू.पी.ए-2 का सबसे बड़ा दल कांग्रेस, आर्थिक सुधारों के अपने एजेन्डे को लागू करने के लिए बेचैन है। इन सुधारों से मूलतः उच्च आर्थिक वर्ग और कारपोरेट जगत को लाभ मिलेगा, जो कि अपनी संपत्ति व आमदनी में दिन-दूनी, रात-चैगुनी वृद्धि करना चाहता है। इसे ही अर्थशास्त्री व राजनीतिज्ञ आर्थिक प्रगति बता रहे हैं।
क्षेत्रीय क्षत्रप, यू.पी.ए सरकार को जीवनदान देने और मध्यावधि चुनाव टालने के बदले लूट में अपना हिस्सा मांग रहे हैं। नीतीश कुमार ने केंद्र सरकार को इस बात के लिए मजबूर कर दिया है कि वह पिछड़े राज्य की परिभाषा पर पुनर्विचार करे, ताकि इन राज्यों की सूची में बिहार शामिल हो सके और वे अपने राज्य के विकास के लिए केंद्र से विशेष पैकेज प्राप्त कर सकें। मुलायम सिंह यादव भी अपने राज्य के लिए अधिक केंद्रीय सहायता प्राप्त करने के लिए रूठने-मनाने का खेल खेल रहे हैं।
यू.पी.ए-2 का गठन, सांप्रदायिक ताकतों से मुकाबला करने और उन्हें सत्ता से दूर रखने के लिए किया गया था। यू.पी.ए-2 सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण और उसे विदेशी निवेशकों के लिए खोलने की दिशा में आक्रामक प्रयास किये। भारतीय बाजार के उदारीकरण और उसमें  कॉर्पोरेट जगत का दबदबा बढ़ने से आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे देशों की कंपनियों को, भारत में निवेश कर, यहाँ की श्रमशक्ति का शोषण करने और यहाँ के बाजार से मुनाफा कमाने का मौका मिला। यह भी सही है कि यू.पी.ए ने सरकार की जवाबदेही बढ़ाने के लिए कुछ कानून भी बनाये यद्यपि अब वह सूचना के अधिकार को सीमित करने का प्रयास कर रही है। कुछ और कल्याणकारी विधिनिर्माण भी हुआ, जिसमें शामिल है खाद्य सुरक्षा अधिनियम। परन्तु इन नए कानूनों को उतने अच्छे ढंग से लागू नहीं किया गया जितना कि किया जा सकता था। विभिन्न घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोपों ने यू.पी.ए की छवि को गहरी चोट पहुंचाई।
यद्यपि यू.पी.ए का गठन फिरकापरस्ती से लड़ने के लिए किया गया था तथापि उसने इस दिशा में कुछ भी नहीं किया। फर्जी मुठभेड़ों में मुसलमानों को मारने का सिलसिला जारी रहा। कांग्रेस-शासित राज्यों में भी, हर बम धमाके के बाद, बिना किसी सुबूत के, बड़ी संख्या में मुसलमान  युवकों को गिरतार किया जाता रहा। जांच खत्म होने तक इंतजार करना तो दूर की बात रही, जांच शुरू होने से पहले ही आतंकी हमलों के लिए मुसलमानों को दोषी करार दे देना आम बात बनी रही। अफजल गुरु को चोरी-छुपे फांसी दे दी गयी ताकि वह फांसी में विलम्ब के आधार पर, अपनी मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदलने की अपील न कर सके। उसे उसके कानूनी अधिकारों से वंचित किया गया। अफजल गुरु को जल्दी से जल्दी फांसी देने की मांग सांप्रदायिक ताकतें कर रहीं थीं। धुले में दंगों के दौरान, पुलिस ने निर्दोष मुसलमानों को निशाना बनाया। असम में हिंसा में 70 से अधिक लोग मारे गए और 4 लाख को अपने घरबार छोड़ कर भागना पड़ा। अभी भी बोडोलैंड में मुसलमान स्वयं को असुरक्षित अनुभव कर रहे हैं।
यूपीए शासनकाल में मुसलमानों और ईसाईयों के साथ भेदभाव जारी रहा और वे दूसरे दर्जे के नागरिकों का जीवन बिताने पर मजबूर रहे। सच्चर समिति की सिफारिशों को नजरअंदाज कर दिया गया और केवल प्रधानमंत्री के 15-सूत्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत, बहुत मामूली राशि, अल्पसंख्यकों के अत्यंत गरीब तबके को उपलब्ध करवाई गई। यह वह तबका है जिसे अपने ही समुदाय में भी भेदभाव का शिकार होना पड़ रहा है। अल्पसंख्यक-बहुल जिलों के विकास के लिए धनराशि तो आवंटित की गई परंतु इससे अल्पसंख्यकों को कोई खास लाभ नहीं पहुंचा क्योंकि गलत नीतियों और पर्यवेक्षण की कमी के कारण, इस धनराशि को उन जिलों में अन्य विकास कार्यों पर खर्च कर दिया गया। मुस्लिम-बहुल इलाकों में शैक्षणिक संस्थाओं की कमी और गरीबी के चलते मुसलमान, शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े बने रहे। यूपीए ने साम्प्रदायिक दंगे और चिन्हित हिंसा रोकने के लिए कानून बनाने के अपने चुनावी वायदे को इस तथ्य के बावजूद पूरा नहीं किया कि राष्ट्रीय सलाहकार  परिषद ने इस कानून का एक मसविदा तैयार कर दिया था।
कांग्रेस पर यह आरोप भी है कि उसने राज्यों की शक्तियों और अधिकारों पर अतिक्रमण किया और देश के संघीय ढांचे को कमजोर किया। एनआईए व एनसीटीसी का गठन इसी दिशा में उठाया गया कदम था। खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मामले में लिए गए निर्णय भी राज्यों के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण थे। यूपीए के कुछ गठबंधन साथियों ने कांग्रेस पर यह आरोप भी लगाया कि वह उनके हितों को नुकसान पहुंचा रही है।
दोनांे बड़े राजनैतिक गुट-यूपीए 2 और एनडीए-परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं। इसमें सबसे ज्यादा नुकसान यूपीए का हुआ है। छोटे दल अपने मतदाताओं को संतुष्ट करने के लिए ऐसी मांगें कर रहे हैं जिन्हें पूरा करना असंभव है। गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के छोटे दलों की विरोधाभासी मांगों के बीच संतुलन स्थापित करने की हर संभव कोशिश के बाद भी, असंतुष्ट दलों और व्यक्तियों की संख्या बढ़ती जा रही है। परंतु इस संदर्भ में हमें यह भी याद रखना होगा कि एनडीए जब शासन में आई थी तब वह 23 पार्टियों का गठबंधन थी परंतु जब वह सत्ताच्युत हुई, तब उसमें मात्र 6 पार्टियां बचीं थीं।
यूपीए-2 से टीआरएस ने स्वयं को इसलिए अलग कर लिया क्योंकि उसका मानना था कि कांग्रेस, तेलंगाना राज्य की स्थापना के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं कर रही है। तमिलनाडू में चुनाव के ठीक पहले, एमडीएमके ने गठबंधन को इसलिए अलविदा कह दिया क्योंकि उसकी शिकायत थी कि डीएमके उसे पर्याप्त सीटें नहीं दे रही है। पीडीपी ने कांगे्रस का साथ इसलिए छोड़ दिया क्योंकि कांग्रेस ने जम्मू-कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस के साथ गठबंधन कर लिया। मुस्लिम इत्तेहादुल मुसलमीन इसलिए अलग हो गई क्योंकि उसके विचार में कांग्रेस, साम्प्रदायिक हो गई थी। टीएमसी और झारखण्ड विकास मोर्चा ने खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्यों में वृद्धि के मुद्दों पर यूपीए से नाता तोड़ लिया। और अभी हाल में, डीएमके ने यूपीए से अलग होने की घोषणा कर दी क्योंकि वह श्रीलंका सरकार के एलटीटीई के विरूद्ध चलाए गए सैन्य अभियान के दौरान किए गए युद्ध अपराधों के विरोध में, संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार आयोग में प्रस्तुत प्रस्ताव पर भारत सरकार के रूख से प्रसन्न नहीं थी।
एनडीए भ्रष्टाचार, अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण, देश की सुरक्षा से समझौता और अकुशल शासन के मुद्दों को लेकर यूपीए पर लगातार हमले कर रही है। वह आक्रामक राष्ट्रीयता की हामी है, जिसका उद्धेश्य है आर्थिक और सामाजिक श्रेष्ठिवर्ग, अर्थात उत्तर भारतीय उच्च जाति के पुरूषों, का प्रभुत्व बनाए रखना। एनडीए चाहती है कि दलित, महिलाएं, आदिवासी, श्रमिक व अल्पसंख्यक जो कि शैक्षणिक, सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से कमजोर हैं, वंचित और दमित बने रहें। नितिन गडकरी और येदियुरप्पा के बारे में मीडिया द्वारा किए गए खुलासों से भाजपा का भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान कुछ कमजोर पड़ा है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं भाजपा को अयोध्या का राम मंदिर फिर से याद आने लगा है। हाल में विहिप ने अहमदाबाद में एक बैठक आयोजित कर राम मंदिर के जिन्न को बोतल से निकालने का भरपूर प्रयास किया।
यद्यपि एनडीए ने प्रधानमंत्री पद के अपने उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है तथापि यह साफ है कि चूंकि भाजपा इस गठबंधन का सबसे बड़ा दल है इसलिए उसी का कोई नेता प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार होगा। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भाजपा, नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का अपना उम्मीदवार घोषित करने की दिशा में बढ़ रही है। परंतु अंततः ऐसा होगा या नहीं, यह केवल समय ही बताएगा। नरेन्द्र मोदी के रास्ते में कई भाजपा नेता और एनडीए के अनेक सदस्य दल रोड़ा बने हुए हैं। नरेन्द्र मोदी ने और अधिक आक्रामक निजीकरण-उदारीकरण नीतियां अपनाने का वायदा किया है, जिनसे विकास के नाम पर मुख्यतः कारपोरेट जगत को लाभ पहुुंचेगा।

कांग्रेस और भाजपा में कई समानताएं हैं, यह बिना किसी संदेह के कहा जा सकता है। परंतु यह भी साफ है कि दोनों दलों में महत्वपूर्ण अंतर भी हैं। दोनों उदारीकरण के हामी हैं यद्यपि कांग्रेस ‘मानवीय चेहरे‘ के साथ उदारीकरण की बात करती रही है जिसमें सूचना का अधिकार, खाद्य सुरक्षा अधिनियम, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना व दलितों और आदिवासियों के हितार्थ कई अन्य कदम शामिल हैं। कांग्रेस की नीति यह है कि इन योजनाओं के जरिए दलित और आदिवासी नेतृत्व के एक हिस्से को ‘राष्ट्रीय मुख्यधारा‘ में शामिल कर लिया जाए।
भाजपा ने ‘शाईनिंग इंडिया‘ का अपना नारा त्याग दिया है परंतु उसकी रीति-नीति वही पुरानी है। कुछ चुनिंदा क्षेत्रों का विकास करो, कारपोरेट जगत के हितों को पर्याप्त तरजीह दो और सावरकर की ‘भारत का हिन्दूकरण और हिन्दुओं का सैन्यीकरण‘ की नीति के अनुरूप, भारतीय समाज को एकसार और संस्कृतनिष्ठ बनाने का प्रयास करो।
दोनों के साम्प्रदायिक एजेन्डा हैं। दोनों साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद को बढावा दे रही हैं और दोनों बहुसंख्यक समुदाय का विशेष ध्यान रखती हैं। परंतु इनमें कुछ अंतर भी हैं। भाजपा ने अब तक अपने विस्तारवादी राष्ट्रवाद (अखंड भारत) को त्यागा नहीं है। इस अखंड भारत की सीमाएं, संपूर्ण दक्षिण एशिया और उसके भी आगे तक फैली हुई हैं। जहां तक कांग्रेस का सवाल है, उसके विस्तारवादी राष्ट्रीय एजेन्डा में अधिक से अधिक पाक-अधिकृत कश्मीर को भारत में शामिल करना है।
कांग्रेस के एकसार राष्ट्रवाद और अल्पसंख्यकों को ‘‘राष्ट्रीय मुख्यधारा’’ में शामिल करने के नारों का ही यह परिणाम है कि अल्पसंख्यक, समाज के हाशिए पर पटक दिये गये हैं। राष्ट्रीय मुख्यधारा में शामिल करने का असली अर्थ है विभिन्नताओं को हतोत्साहित करना और अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों की तरह जीने के लिए प्रेरित करना। अधिकारों का केन्द्रीयकरण और देश के संघीय ढांचे को कमजोर करने की कोशिश भी समाज को एकसार बनाने की नीति के अनुरूप है। विभिन्नता के संरक्षण के लिये बहुवादी और संघीय ढांचा आवश्यक है।
भाजपा, सŸाा के केन्द्रीयकरण, समाज को एकसार बनाने और हिन्दू धर्म के सैन्यीकरण के लिए बल के इस्तेमाल से विभिन्नता को कुचलना चाहती है। इसके लिए वह ‘‘अलगाववादी अल्पसंख्यको’’ और ‘‘राष्ट्रविरोधी अल्पसंख्यकों’’ पर निशाना साध रही है। अल्पसंख्यकों के मुंह पर कालिख पोतने के लिए उन्हें आतंकवादी, कई पत्नियां रखने वाले, राष्ट्रविरोधी और बर्बर बताया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि उनके अस्तित्व मात्र से अन्यों के हितों को खतरा है। ऐसा आरोप लगाया जाता है कि जिस दौर में देश की सŸाा अल्पसंख्यकों के हाथों में थी, उन्होंने हिन्दू संस्कृति को नष्ट करने की हर संभव कोशिश की। यह भी प्रचारित किया जाता है कि हिन्दुओं और अल्पसंख्यकों के बीच अनवरत् युद्ध जारी है और इस युद्ध का अन्त तभी होगा जब दोनों में से केवल एक समुदाय ही बचेगा। यह भी आरोपित है कि अल्पसंख्यक इस युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए धर्मपरिवर्तन को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।
दोनों ही सरकारों के शासनकाल में साम्प्रदायिक दंगे हुए और दोनों ने ही दंगा करने वालों और भड़काने वालों के खिलाफ कार्यवाही करने में हिचकिचाहट दिखायी। अगर अल्पसंख्यक समुदाय का कोई सदस्य नफरत फैलाने वाले भाषण देता है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जाती है। परन्तु यही काम जब बहुसंख्यक समुदाय का कोई सदस्य करता है तो उसे चुपचाप स्वीकार कर लिया जाता है। और कई मामलों में तो उसे समर्थन भी मिलता है। कांग्रेस नेतृत्व ने भी कभी इस परिभाषा को साफ शब्दों में खारिज नहीं किया कि हिन्दू-भारतीय वह है जिसकी पितृभूमि और पुण्यभूमि, सिन्धु नदी से लेकर हिन्द महासागर के बीच फैली पवित्र भूमि में है।
भाजपा, इससे भी एक कदम आगे बढ़कर अल्पसंख्यक समुदायों के धर्मों को विदेशी धर्म बताती है जो देश के बाहर से आये हैं और इसलिए ‘‘राष्ट्रीय’’ हितों के खिलाफ हैं। कुल मिलाकर, भाजपा और हिन्दुत्ववादी ताकतें, अल्पसंख्यकों के अस्तित्व को ही राष्ट्रीय हितों के खिलाफ मानती हैं। भाजपा की अल्पसंख्यकों के प्रति उदारता की सीमा है मुस्लिम समुदाय की धार्मिक संस्थाओं और चर्च का भारतीयकरण करने की शर्त। राज्यों की भाजपा सरकारें इस तरह के कानून बना रही हैं जिनसे उच्च जातियों की खानपान संबंधित आदतों को पूरे समाज पर थोपा जा सके। शैक्षणिक संस्थाओं में एक धर्म विशेष को प्रोत्साहन दिया जा रहा है और सभी धर्मों के विद्यार्थियों को इस धर्म  के कर्मकाण्डों का पालन करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। बहाना यह है कि ये कर्मकाण्ड धार्मिक नहीं वरन् सांस्कृतिक और सार्वभौमिक हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने स्कूलों में भगवत् गीता की पढ़ाई को इस आधार पर अनिवार्य बना दिया है कि गीता कोई धार्मिक ग्रंथ नहीं है।
हिन्दुत्व, जिसका झंडा भाजपा उठाये हुये है, विचारधारा और नीतियों के स्तर पर प्रजातंत्र, विभिन्नता, बहुवाद और बहुसंस्कृतिवाद के विरूद्ध है। ये सभी मूल्य हमारे संविधान का हिस्सा हैं। भाजपा के लिए आस्था, कानून से बड़ी है। अगर हिन्दुत्ववादियों की चले तो वे आस्था को कानून का आधार बना दें। भाजपा ने यह मांग की थी कि भारतीय संसद एक कानून के जरिए हिन्दुओं की इस आस्था कि भगवान राम ठीक उसी स्थान पर जन्में थे जहां बाद में बाबरी मस्जिद बनायी गई, के आधार पर जमीन के उस टुकड़े को राम मंदिर के निर्माण के लिए हिन्दुओं को सौंपे।
यदि हमें भारत में प्रजातंत्र को जीवित रखना है तो हमें सभी प्रकार की सांप्रदायिक व कट्टरपंथी ताकतों को शिकस्त देनी होगी। सांप्रदायिकता और कट्टरवाद को हराने के बाद ही हम प्रजातंत्र को मजबूती देने और ऐसी संस्थाओं का निर्माण करने में सफल हो सकंेगे जो विभिन्नता और बहुवाद का पोषण करें और जनता के प्रति जवाबदेह हों।
 -इरफान इंजीनियर

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

म्यांमार में साम्प्रदायिक हिंसा से प्रजातांत्रिक प्रक्रिया को धक्का


दक्षिण एशिया के लगभग सभी देशों में धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरूद्ध हिंसा एक बड़ी समस्या बनी हुई है। अलग.अलग देशों में इसका स्वरूप भले ही अलग.अलग हो परन्तु इसके नतीजे में धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ अमानवीय व्यवहार हो रहा है और निर्दोष व्यक्ति सताये जा रहे हैं। इस मामले में, सन् 2013 की शुरूआत बहुत बुरी रही है। नए साल के तीन महीने भी नहीं गुजरे हैं परन्तु इस बीच पाकिस्तानए बांग्लादेश, भारत और म्यांमार में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के दौर हो चुके हैं। जब भी मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की बात की जाती है तब कुछ लोग इस्लाम को हिंसा में विश्वास रखने वाला धर्म बताकर यह साबित करने का प्रयास करते हैं कि हिंसा के लिए स्वयं मुसलमान ही जिम्मेदार हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दूसरे धर्मों के मानने वाले भी पलटकर यह कह सकते हैं कि चूंकि गीता में कृष्ण, अर्जुन को हथियार उठाने के लिए प्रेरित करते हैं इसलिए हिन्दू धर्म भी हिंसा को प्रोत्साहित करता है। यह आम धारणा है कि बौद्ध धर्म, शांति का धर्म है। परन्तु सच यह है कि यद्यपि सभी धर्म नैतिकतापूर्ण व्यवहार के हामी हैं तथापि लगभग सभी धर्मों के मानने वालों ने समय.समय पर अपने.अपने राजनैतिक हितों की पूर्ति के लिए धर्म के नाम पर हिंसा की है। निःसंदेहए भगवान गौतम बुद्ध शांति के पुरोधा थे परन्तु यह भी सही है कि श्रीलंका, थाईलैण्ड और अब ;मार्च 2013द्ध म्यांमार में बौद्ध भिक्षु हिंसा करने में किसी से पीछे नहीं हैं।
म्यांमार के मैयिखाटीला में साम्प्रदायिक हिंसा के ज्वार पर नियंत्रण पाने के लिए मार्शल ला लागू कर दिया गया है और सेनाए स्थिति पर नजर रखे हुए है। इस इलाके में बौद्धों और मुसलमानों के बीच हिंसा हो रही है। आधिकारिक तौर पर यह कहा जा रहा है कि इस हिंसा में अब तक 31 लोग मारे जा चुके हैं परन्तु गैर.आधिकारिक सूत्र, मृतकों की संख्या कहीं अधिक बताते हैं। पूरे राज्य में आपातकाल लागू कर दिया गया है। हमेशा की तरह, हिंसा की शुरूआत एक मामूली सी घटना से हुई। एक बौद्ध दंपति और सोने के गहनों की एक दुकान के मुसलमान मालिक के बीच किसी मुद्दे को लेकर कटु बहस हो गई। इसके बाद, दोनों समुदायों के मन में एक दूसरे के प्रति छुपी घृणा और गुस्सा बाहर आ गया और फसाद शुरू हो गये। यद्यपि हिंसा में एक बौद्ध भिक्षु भी मारा गया है तथापि मरने वालों में अधिकांश मुसलमान हैं। इस घटना ने जून.जुलाई 2012 में पश्चिमी म्यांमार के राखिने राज्य में हुई सांप्रदायिक झड़पों की याद ताजा कर दी है। इस हिंसा में 110 लोग मारे गये थे और एक लाख बीस हजार बेघर हो गये थे। मृतकों और बेघर होने वालों में अधिकांश रोहिंग्या मुसलमान थे।
पिछली तानाशाह सरकार ने साम्प्रदायिक हिंसा की खबरों को छुपाकर रखा था। अब जबकि म्यांमार में प्रजातंत्र दस्तक दे रहा हैए इस तरह की हिंसा की खबरें सामने आ रही हैं। म्यांमार का समाज विविधतापूर्ण और बहुवादी है। वहां बौद्धों का बहुमत है परंतु मुस्लिम अल्पसंख्यकों की आबादी भी कम नहीं है। रोहिंग्या मुसलमान शायद दुनिया के सबसे दमित अल्पसंख्यक समुदाय हैं। वे इंडो.आर्य हैं और मुख्यतः ब्रिटिश शासनकाल में म्यांमार में बसे थे। बहुसंख्यक बौद्ध, चीनी व तिब्बती मूल के हैं। मुसलमान देश की पश्चिमी सीमा पर स्थित राखिने राज्य में रहते हैं। सन् 1982 में बने नागरिकता कानूनों में उन्हें नागरिकता से वंचित कर दिया गया। इस अन्यायपूर्ण कानून से उनके मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन हुआ। उनसे जबरदस्ती काम कराया जाता है। सरकारी परियोजनाओं में उन्हें बिना कोई वेतन लिए काम करना पड़ता है। यूएनएचसीआर के अनुसारए सन् 1991 से उनकी देश के अंदर आवाजाही पर कड़ा प्रतिबंध है। उनके साथ दूसरे दर्जे के नागरिक की तरह व्यवहार किया जाता है। इन गंभीर परिस्थितियों के चलते, उनमें से कई थाईलैंडए मलेशिया व अन्य देशों में भाग गए हैं।
सन् 2012 के जून.जुलाई में राखिने में बौद्धों और रोंहिग्या मुसलमानों के बीच हिंसा की शुरूआत एक बौद्ध लड़की के साथ बलात्कार की अफवाहों के बाद हुई थी। असल में हुआ यह था कि एक मुसलमान लड़का व बौद्ध लड़की आपस में प्रेम करते थे और वे शादी करने के उद्देश्य से अपने.अपने घरों से भाग गए थे। लड़के का कत्ल कर दिया गया और उसके दो साथी, जिन्होंने उसे भागने में मदद की थी, को मौत की सजा सुनाई गई है।
कुल मिलाकर, ये सारी स्थितियां क्षेत्र में धर्मनिरपेक्षता व प्रजातंत्र के जड़ें न पकड़ पाने का नतीजा हैं। पूरे दक्षिण एशिया में, आर्थिक कारणों से लोग एक देश से दूसरे देश जा रहे हैं। साम्राज्यवादी देशों से स्वतंत्र होने के बादए दक्षिण एशिया के कई देशों में प्रभुत्वशाली समुदायों ने धर्म को नागरिकता अधिकारों से जोड़ने का प्रयास किया। इससे कुछ समुदाय औपचारिक या अनौपचारिक रूप से नागरिक के बतौर अपने अधिकारों से वंचित कर दिए गए। श्रीलंका में बड़ी संख्या में तमिलों, जो वहां के बागानों में काम करने के लिए गए थे, को समान अधिकारों से वंचित किया गया। उनकी प्रतिक्रिया भी अतिवादी रही और उन्होंने एलटीटीई का गठन कर जबरदस्त खून.खराबा किया।
म्यांमार की पांच प्रतिशत आबादी मुसलमान है। इनमें से कुछ यहां कई सदियों से रह रहे हैं। कोई भी आधुनिक प्रजातांत्रिक राज्य उन्हें उनके संपूर्ण नागरिक अधिकार देने से इंकार नहीं कर सकता। म्यांमार पर कई दशकों तक सैनिक तानाशाहों का राज रहा और उस दौरान एक दुर्भाग्यपूर्ण और अतार्किक निर्णय मेंए नागरिकता को धर्म से जोड़ दिया गया। यह समझने के लिए गहन अध्ययन की आवश्यकता है कि इतनी बड़ी संख्या में बौद्ध भिक्षु, इस्लाम के विरूद्ध क्यों हो गए हैं। श्रीलंका में भी बौद्ध भिक्षुओं ने तमिलों का कटु विरोध किया था। ऐसा लगता है कि कुछ सामाजिक.मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं के चलते सभी धर्मों को बराबरी का दर्जा देने के प्रजातांत्रिक सिद्धांत की लगातार अवहेलना हो रही है। म्यांमार में कई दशकों तक चली लंबी लड़ाई के बाद प्रजातंत्र की वापिसी हो रही है परंतु इस नव प्रजातंत्र में साम्प्रदायिक विभाजन एक बड़ी समस्या बनकर उभरा है। एक अर्थ में यह विभाजन साम्राज्यवादी शासन की विरासत भी है, जिसने समाज को बांटने की हर संभव कोशिश की।
म्यांमार की इस हिंसा के बाद, पूरे दक्षिण एशिया को जाग उठना चाहिए और अपनी औपनिवेशिक विरासत में से एक.दूसरे से घृणा करने की लंबी परंपरा को उखाड़ फेंकना चाहिए। सभी देशों में साम्राज्यवादी शासकों ने अपने आर्थिक और राजनैतिक हितों की खातिर विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच विभाजन के बीज बोए। स्वतंत्रता के बाद भी इन देशों में ऐसी राजनैतिक ताकतें सक्रिय बनी रहीं जो धार्मिक पहचान का इस्तेमाल अपने राजनैतिक हितों की पूर्ति के लिए करती हैं और जिनका नारा है अपने को छोड़कर हरेक से घृणा करो।यह प्रवृत्ति और ये ताकतें दक्षिण एशियाई देशों की प्रगति को बाधित कर रही हैं। दक्षिण एशिया के देश आपस में मिलकर दक्षिण एशिया महासंघ बनाने की बजाए अपने.अपने नागरिकों की आपसी खूनी लड़ाईयों को सुलझाने में व्यस्त हैं। शांति के बिना इस क्षेत्र का विकास नहीं हो सकता। हमें संकीर्ण धार्मिक पहचान से ऊपर उठना होगा। दक्षिण एशिया के सभी देशों में धार्मिक स्वतंत्रता होनी चाहिए और सभी धर्मों को बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए। जब तक इन देशों के सभी धर्मों के नागरिक सम्मान और गरिमा से जीवन नहीं बिताने लगेंगे तब तक इस क्षेत्र में विकास की उम्मीद नहीं की जा सकती। तब तक हम यह आशा नहीं कर सकते कि घोर गरीबी में जी रहे दक्षिण एशिया के करोड़ों नागरिकों को कोई राहत मिलेगी।
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राम पुनियानी

मंगलवार, 5 मार्च 2013

निरंकुश सरकारें हैं प्रजातंत्र के लिए खतरा





अफजल गुरू को फांसी

यह तथ्य विवादित नहीं है कि अफजल गुरू, जम्मू-कश्मीर लिब्रेशन फं्रट का आत्मसमर्पित सदस्य था। वह पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के हालात से असंतुष्ट था और उसने सीमा सुरक्षा बल के समक्ष आत्मसर्मपण किया था। जब कोई अतिवादी आत्मसमर्पण करता है तो वह स्वयं को गंभीर खतरे में डालता है। उसके पूर्व साथी अक्सर उसके खून के प्यासे हो जाते हैं क्योंकि उन्हें यह डर रहता है कि आत्मसमर्पण करने वाला उनका साथी उनके व उनके संगठन के बारे में सुरक्षा बलों को जानकारी दे देगा। वे अपने आत्मसमर्पित साथी को इसलिए भी खत्म करना चाहते हैं ताकि उनके संगठन के अन्य सदस्य आत्मसमर्पण करने के पहले दस बार सोचे। अफजल गुरू ने जब आत्मसमर्पण किया तब उसने ये सभी खतरे मोल लिए थे। इस तरह के संगठनों का कोई सदस्य तभी आत्मसमर्पण करता है जब उसे यह लगने लगता है कि उसके संगठन के लक्ष्य को पाना असंभव है या फिर तब, जब उसे अपने संगठन के मिशन में आस्था नहीं रह जाती। यह तथ्य भी अविवादित है कि अफजल गुरू ने अपने आत्मसमर्पण के बाद स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की और वह छोटे-मोटे काम करके अपना जीवनयापन करने लगा।
इसके बाद से अफजल गुरू और पुलिस की कहानी एकदम अलग-अलग हो जाती है। पुलिस का कहना है कि गुरू की मुलाकात तारिक नाम के व्यक्ति से हुई जिसने उसे गाज़ी बाबा से मिलवाया। पुलिस का यह भी कहना है कि गाज़ी बाबा ने अफजल गुरू को भारतीय संसद पर हमला करने वालों के लिए दिल्ली में छिपने का स्थान मुहैय्या कराने के लिए राजी कर लिया। अफजल गुरू को इलेक्ट्रानिक मीडिया के समक्ष प्रस्तुत किया गया और उसके ‘‘इकबालिया‘‘ बयान को जमकर प्रचारित किया गया। उच्चतम न्यायालय ने पुलिस को इसके लिए फटकार भी लगाई और पुलिस अधिकारियों के समक्ष दिए गए गुरू के तथाकथित इकबालिया बयान को कोई महत्व देने से इंकार कर दिया।
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के अन्तर्गत विचारण न्यायालय के समक्ष दिए गए अपने बयान और केन्द्रीय गृह मंत्री को लिखे गए अपने पत्र में अफजल गुरू ने स्वीकार किया कि उसका परिचय उन लोगों से करवाया गया था, जिन्होंने बाद में संसद पर हमला किया। परंतु उसे उन लोगों से मिलवाने वाला व्यक्ति कोई अतिवादी नहीं वरन् दिल्ली पुलिस का डीएसपी दलविंदर सिंह था। दलविंदर सिंह ने उस पर इस बात के लिए भी दबाव डाला कि वह दिल्ली में उन लोगों के रहने का इंतजाम करे और उससे दलविंदर सिंह ने कई बार फोन पर बातचीत भी की। अफजल गुरू के फोन काल रिकार्ड की कोई जांच नहीं की गई। गुरू ने गृहमंत्री को लिखा कि वह अदालत में अपना पक्ष इसलिए प्रस्तुत नहीं कर सका और पुलिस द्वारा पेश किए गए सुबूतों के सच को इसलिए उजागर नहीं कर सका क्योंकि उसके परिवार को जान का खतरा था।
उच्चतम न्यायालय ने भी यह स्वीकार किया है कि अफजल गुरू को उसके बचाव के लिए कोई वकील नहीं मिला। उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अफजल गुरू के खिलाफ कोई सीधे सुबूत नहीं हैं और उसे केवल परिस्थितिजन्य सुबूतों के आधार पर दोषी ठहराया जा रहा है। देश के सामूहिक अंतःकरण को संतुष्ट करने के लिए उसे मौत की सजा दी गई। जिन लोगों ने संसद पर हमला किया था वे मौके पर ही मारे गए और गाज़ी बाबा को गिरफ्तार नहीं किया जा सका।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कहा है कि अफजल गुरू को फांसी दिए जाने के पूर्व उसे उसके परिवारजनों से न मिलने दिया जाना, उसके मानवाधिकारों का उल्लंघन है। किसी व्यक्ति के परिवार को सूचित किए बिना उसे मौत की नींद सुला देना बर्बरता है और उसके परिवार को धार्मिक रीतिरिवाजों के अनुसार उसकी मृत देह का अंतिम संस्कार नहीं करने दिया जाना, उसके धार्मिक स्वतंत्रता के मूल अधिकार का उल्लंघन है।
अफजल गुरू को जिस दिन फांसी दी गई उसी दिन तड़के से कश्मीर मंे अभिव्यक्ति की आजादी को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया। किसी भी व्यक्ति को यह मौका नहीं दिया गया कि वह फांसी की निंदा-या प्रशंसा-कर सके। कश्मीर में बच्चों को दूध तक नसीब नहीं हुआ। समाचारपत्रों और टेलीविजन चैनलों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इंटरनेट और एसएमएस सेवाएं बंद कर दी गईं। क्या कश्मीरियों के लिए प्रजातंत्र और स्वतंत्रता नहीं है? क्या हमें उन पर तनिक भी विश्वास नहीं है? केवल कश्मीर के मुख्यमंत्री को मीडिया से बातचीत करने का अवसर मिला। और यह सब मात्र इसलिए क्येांकि एक कश्मीरी पर भारत सरकार के विरूद्ध युद्ध करने या उसमें सहायक बनने का आरोप था और उसे केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर, हिन्दुत्व संगठनों के जरिए व्यक्त की गई राष्ट्रीय अंतःकरण की मांग को संतुष्ट करने के लिए, बिना उसके परिवार को सूचना दिए, फांसी पर लटका दिया गया। देश की स्वतंत्रता के बाद से लेकर आज तक ऐसा व्यवहार सिर्फ एक अन्य व्यक्ति के साथ किया गया था और वह था पाकिस्तानी नागरिक अजमल कसाब। ब्रिटिश सरकार तक ने भगत सिंह को फांसी देने के पहले उनके परिवार को उनसे अंतिम बार मिलने का अवसर दिया था। यह तब जबकि ब्रिटिश सरकार की निगाह में भगत सिंह एक आतंकवादी थे जो राज्य के विरूद्ध युद्ध करने के दोषी थे।
भारत सरकार या भारत के संविधान के लिए आतंकवादी बहुत बड़ा खतरा नहीं हैं। उनसे मुकाबला करने में हमारे सुरक्षा बल सक्षम हैं। सुरक्षा बलों की ताकत लगभग असीमित है और भारत का जनमत उनके साथ है। प्रजातंत्र, भारतीय संविधान और कानून के राज को आतंकवादियों से कहीं अधिक खतरा ऐसी सरकार से है जो कानून का तनिक भी सम्मान नहीं करती और जो केवल उन तत्वों को संतुष्ट करना चाहती है जो बहुसंख्यकवादी राष्ट्रीयता के झंडाबरदार हैं और जिन्हें न्याय से कोई लेनादेना नहीं है।

न्याय का प्रश्न
प्रतिशोध की भावना और खून की प्यास, मध्यकालीन न्याय व्यवस्था का हिस्सा थे। आंख के बदले आंख और खून के बदले खून को अब न्याय नहीं माना जाता। सत्ताधीशों का खौफ दुनिया में कहीं भी अपराधों को रोकने में सफल नहीं हुआ है। जो लोग वंचित हैं या जिन्हें ऐसा लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है या जिनकी धरती पर दूसरों ने कब्जा कर लिया है, वे हमेशा से, बिना नतीजों की परवाह किए, लड़ते आए हैं। उनके पास जो भी संसाधन होते हैं, वे उन्हीं से अपनी लड़ाई जारी रखते हैं। ब्रिटिश साम्राज्य में सूरज कभी नहीं डूबता था परंतु क्या इस कारण भारतीय स्वतंत्रता सेनानी डर कर चुप बैठ गए? वे अपनी लड़ाई की कोई भी कीमत चुकाने को तैयार थे-अपनी जान देने के लिए भी। दरअसल, समाज में अपराध तभी रूक सकते हैं जब हमारा ढांचा ऐसा हो और हम ऐसी संस्थाओं का निर्माण करें, जो सबके साथ न्याय करें और पूर्णतः निष्पक्ष हों। अपराध तब रूकते हैं जब सरकारें जनता के प्रति जवाबदेह हों।
प्रतिशोध न्याय नहीं है। अगर किसी व्यक्ति ने हमें कोई कष्ट पहुुंचाया है तो उसे उतना ही या उससे भी अधिक कष्ट पहुंचाने से संतोष प्राप्त करना न्याय नहीं है। यह अमानवीयता है। न्याय तो तब होगा जब हम अपराध करनेवाले को यह अहसास करा सकें कि उसने जो कुछ किया वह बहुत गलत था, यह सुनिश्चित कर सकें कि वह अपना आगे का जीवन कानून का सम्मान करने वाले एक नागरिक के बतौर निभाए और अपनी गलती फिर ना दोहराए। पांच पुलिसकर्मी, एक माली व संसद के सुरक्षा दस्ते का एक सदस्य, संसद पर हुए निंदनीय और कुत्सित हमले में मारे गए थे। इन मृतकों के परिवारों के सदस्य, हमलावरों के मारे जाने से प्रसन्नता का अनुभव कर सकते हैं। संसद पर हमला करने वालों ने हमला इसलिए किया क्योंकि वे किसी और का बदला ले रहे थे। और इस प्रकार यह चक्र चलता रहता है। गुरू की फांसी के बाद कश्मीरियों मंे इस बात को लेकर गुस्सा हो सकता है कि गुरू पर निष्पक्षता से मुकदमा नहीं चलाया गया। उनमें उसे फांसी दिए जाने के तरीके को लेकर भी रोष हो सकता है। उनमें इस बात पर भी गुस्सा हो सकता है कि फांसी के बाद उन्हें उनके घरों में कैद कर दिया गया। प्रतिशोध, दरअसल, एक कभी खत्म न होने वाला दुष्चक्र है। इसमें किसी पक्ष को कभी शांति और संतुष्टि का अनुभव नहीं होता। एक व्यक्ति द्वारा लिया गया बदला, दूसरे व्यक्ति में बदला लेने की इच्छा पैदा करता है।
जो लोग संसद पर हमले में मारे गए, उनके परिजनों के लिए इस दुःखद घटनाक्रम का भावनात्मक समापन तब होता जब पूरा देश उनके आर्थिक पुनर्वास में मदद करता और उन्हें ‘‘मेरे प्रियजन ही क्यों‘‘? ‘‘किसकी गलती है‘‘, ‘‘क्या गलत हुआ‘‘, ‘‘हमला क्यों किया गया?‘‘ ‘‘हमलावरों ने मेरे परिवारजन को ही क्यों निशाना बनाया‘‘ और इसी तरह के मन को उद्वेलित करने वाले अन्य प्रश्नों के उत्तर खोजने में सहायता करता। प्रियंका गांधी के लिए उनके पिता की नृशंस हत्या की घटना का समापन नलिनी को फांसी पर चढ़ाकर नहीं होता। वह तब हुआ जब वे नलिनी से मिलीं, उससे कुछ प्रश्न पूछे और उसे माफ कर दिया। नलिनी को फांसी नहीं हुई। न्याय की सफलता तभी है जब अपराधी एक सामान्य नागरिक बन जाए। जब तक वह सच्चा पश्चाताप नहीं करता और उसका ह्दय परिवर्तन नहीं होता, तब तक उसपर उचित प्रतिबंध लगाए जाने चाहिए और अगर ऐसा कभी नहीं होता तो उसे समाज से अलग-थलग रखा जाना आवश्यक है, ताकि समाज उससे सुरक्षित रह सके।

मृत्युदंड में पक्षपात   
भारत में ऐसे कई अन्य व्यक्ति हैं जिन्होंने संवैधानिक संस्थाओं पर हमले किए। इनमें शामिल हैं नलिनी और पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री का हत्यारा राजौना। जो लोग चीख-चीखकर गुरू को फांसी पर चढ़ाने की मांग कर रहे थे वे इन दोनों के बारे में चुप क्यों हैं? क्या कारण है कि यह मांग नहीं उठ रही कि बाबू बजरंगी और माया कोडनानी, जिन्हें कई महिलाओें के साथ क्रूर सामूहिक बलात्कार, अनेकों हत्याओं और यहां तक कि अजन्मे बच्चों की जान लेने तक का दोषी ठहराया गया है, को फांसी दी जाए? मृत्युदंड दरअसल न्याय की मांग नहीं है वरन् यह एक राजनैतिक मांग है, जिसका उद्धेश्य किसी समुदाय या उसके एक हिस्से के वोट पाना और राज्यसत्ता की शक्ति और मर्दानगी का प्रदर्शन करना है। मर्दानगी, सैनिक शक्ति और सत्ता पर गर्व, जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली सोच की उपज है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने 9/11 के हमले, जिसमें विभिन्न देशों के तीन हजार से अधिक नागरिक मारे गए थे, का बदला लेने के लिए अफगानिस्तान और ईराक पर हमला किया। उन्होंने इस हमले की तुलना क्रूसेडस से की और इन हमलों में छःह लाख से अधिक लोग मारे गए और लाखों घायल हुए। यह युद्ध अभी भी जारी है और अमेरिका इसे तब तक नहीं जीत सकेगा जब तक न्याय नहीं होता।
इतिहास गवाह है कि मानव समाज , क्रूरता से मानवीयता की ओर और तानाशाही से प्रजातंत्र की ओर बढ़ता आया है। अपराधियों को सजा देने का उद्धेश्य है दूसरों को वैसा ही अपराध करने से रोकना और अपराधी को पश्चाताप करने और स्वयं को बदलने का मौका देना। प्रजातंत्र जैसे-जैसे सुदृढ़ हो रहा है, मतभेदों और असहमतियों को स्वीकार करने की संस्कृति मजबूत हो रही है। यह अवधारणा भी जड़ें जमा रही है कि समाज को किसी की भी जान लेने का हक नहीं है। पूरे विश्व का अनुभव यह बताता है कि मृत्युदंड अक्सर गरीबों, नस्लीय व धार्मिक अल्पसंख्यकों और समाज के अन्य वंचित वर्गों के सदस्यों के हिस्से मंे आता है। उदाहरणार्थ, अमेरिका में जिन लोगों को मृत्युदंड से दंडित किया गया है उनमें से 41 प्रतिशत और जिन्हें मृत्युदंड दे दिया गया है, उनमें से 34 प्रतिशत अफ्रीकी-अमरीकी हैं, जिनका अमेरिका की आबादी में प्रतिशत मात्र 12 है। इस समस्या का एकमात्र हल है मृत्युदंड को हमेशा-हमेशा के लिए दफना दिया जाना। 

-इरफान इंजीनियर

सोमवार, 28 जनवरी 2013

ब्रिटिश राज के खिलाफ



भारत की बलात्कार संस्कृति शहरी या ग्रामीण

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आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने फरमाया कि बलात्कार भारत में नहीं वरन् इंडिया में होते हैं। भागवत के लिए भारत पर्याय है ग्रामीण क्षेत्र का और इंडिया से उनका आशय है शहरी इलाके। उनके अनुसार, शहरी क्षेत्रों के लोगों ने पाश्चात्य जीवनशैली अपना ली है जिसके कारण महिलाओं पर अत्याचार की घटनाएं बढ़ी हैं।
आप देश के गांवों और जंगलों में जाईये। वहां सामूहिक बलात्कार और सेक्स अपराध नहीं होते। उनके कहने का अर्थ यह है कि जहां शहरी क्षेत्रों में पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव है वहीं गांव भारतीय संस्कृति में रचे.बसे हैं। प्राचीन भारतीय पंरपरा में महिलाओं को अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था और इन्हीं प्राचीन भारतीय मूल्यों और परंपराओं के कारण गांव, आज भी महिलाओं के विरूद्ध अपराधों से मुक्त हैं।
आंकड़े और तथ्य भागवत के दावे को पूरी तरह गलत साबित करते हैं। नेशनल ला यूनिवर्सिटी, दिल्ली में शिक्षक मृणाल सतीश द्वारा किया गया बलात्कार की घटनाओं का सांख्यिकीय अध्ययन एक अलग ही कथा कहता है। वे अदालतों के आंकड़ों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि भारत में बलात्कार की 75 प्रतिशत घटनाएं ग्रामीण क्षेत्रों में होती हैं। उनके निष्कर्ष 1983 से लेकर 2009 तक की अवधि के क्रिमिनल ला जर्नल में प्रकाशित आंकड़ों पर आधारित हैं।
खैरलांजी जैसे मामले और आदिवासी महिलाओं के साथ आए दिन होने वाले बलात्कारों की जानकारी शायद भागवत तक नहीं पहुंच सकी है। परंतु उनकी यह विभाजक रेखा उन लोगों के गले नहीं उतर सकती जो दलितों, आदिवासियों और महिलाओं के बीच काम करते हैं। भागवत इस समस्या का अति सरलीकरण कर रहे हैं।
प्राचीन भारत में महिलाओं को अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता थाए यह केवल एक मिथक है जिसे सघन प्रयास से गढ़ा गया है। प्राचीन भारत में समय.समय पर महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन आते रहे हैं। घुमन्तु आर्य सभ्यता से लेकर बाद की कृषि आधारित सभ्यता.जब लोग एक स्थान पर रहने लगे थे.तक महिलाओं की स्थिति एक सी रही होगी यह मान्यता गलत है। घुमन्तु आर्य सभ्यता के काल में भी महिलाओं को अपने पति की मृत्यु के बाद सांकेतिक आत्मदाह करना पड़ता था। रामायण में भगवान राम अपनी गर्भवती पत्नी सीता को मात्र इसलिए अपने घर से बाहर निकाल देते हैं क्योंकि अयोध्या में उनके चरित्र को लेकर कुछ अफवाहें फैल गईं थीं। महाभारत में पांडव अपनी सांझी पत्नी द्रोपदी को किसी वस्तु की तरह इस्तेमाल करते हैं और उसे जुएं में इस तरह दांव पर लगा देते हैं मानो वह उनकी संपत्ति हो। पांडवों के भाई.बंधु भी पीछे नहीं रहते और द्रोपदी को भरी सभा में नग्न करने का प्रयास करते हैं। यह था प्राचीन भारत में महिलाओं का उच्च दर्जा!
इसके बाद के काल के मूल्यों को मनुस्मृत्ति प्रतिबिंबित करती हैए जिसमें महिलाओं के शिक्षा प्राप्त करने की स्पष्ट मनाही की गई है और जिसके अनुसार पति की सेवा और घर.गृहस्थी के काम करना ही महिलाओं की शिक्षा और उनकी नियति है। गुप्तकाल ;तीसरी से सातवीं ईसवी जो कि भारतीय इतिहास का स्वर्णिम युग बताया जाता हैए में भी शिक्षा तक महिलाओं की पहुंच बहुत सीमित थी।  मैत्रेयी और गार्गी जैसी कुछ महिलाएं इसका अपवाद थीं और उन्हीं का नाम बार.बार दुहराकर यह साबित करने का प्रयास किया जाता है कि उस काल में महिलाओं को अत्यधिक सम्मान प्राप्त था। तथ्य यह है कि अधिकांश महिलाएं शिक्षा से वंचित थीं और केवल चन्द महिलाएं ही ज्ञानार्जन कर पातीं थीं। यज्ञों में महिलाओं का स्थान दूसरे दर्जे के यजमान ;वह व्यक्ति जो यज्ञ करवाने के लिए पंडित को बुलाता है रहता था। यह दिलचस्प है कि यजमान शब्द का कोई स्त्रीलिंग नहीं है।
भागवत और उनके संघ परिवार के सदस्य वर्तमान भारत की सभी बुराईयों के लिए मुसलमानों के देश में आगमन को दोषी ठहराते हैं। यह दलितों और महिलाओं के आतंरिक दमन के लिए बाहरी कारकों को दोषी ठहराने की कुटिल चाल है। इतिहास के आधुनिक काल मेंए ब्रिटिश शासन के दौरान, धार्मिक मान्यता प्राप्त कई बुराईयों के विरूद्ध समाज सुधारकों को लंबी और कठिन लड़ाई पड़ी। भागवत परिवार आज भी सती जैसी भयावह धार्मिक.सामाजिक प्रथा को दबे स्वर में सही ठहराता है। रूपकंवर के सती हो जाने के बाद विजयाराजे सिंधिया ने सती.निरोधक कानून के विरूद्ध मोर्चा निकाला था। उनका कहना था कि सतीप्रथा न केवल एक गौरवशाली परंपरा है वरन् वह हिन्दू महिलाओं का अधिकार भी है।
राजा राममोहन राय को सती प्रथा के अपने विरोध के चलते क्या.क्या कष्ट झेलने पड़े थे, यह सब जानते हैं। बाल विवाह भी ऐसी ही एक कुप्रथा थी। ब्रिटिश सरकार बाल विवाह को प्रतिबंधित करने के लिए कानून बनाना चाहती थी परंतु  हिन्दू धार्मिक नेता इसके विरोध में खड़े हो गए। यह कहा गया कि हिन्दू धर्म का यह तकाजा है कि लड़कियों का विवाह उनके पहले मासिकधर्म के पूर्व कर दिया जाना चाहिए। विधवा पुनर्विवाह, देवदासी प्रथा का उन्मूलन आदि के लिए समाज सुधारकों को जितना संघर्ष करना पड़ा और जो कष्ट झेलने पड़ेए उनसे ही यह साफ हो जाता है कि प्राचीन भारत मंे महिलाओं की असल में क्या स्थिति थी।
शिक्षा महिला सशक्तिकरण की कुंजी है और महिलाओं को पुरूषों के समकक्ष दर्जा दिलवाने का एक प्रभावी हथियार भी। परंतु महिलाओं को शिक्षा पाने का अधिकार दिलवाने के लिए सावित्रीबाई फुले को फातिमा शेख व उन जैसी अन्य महिलाओं के सहयोग से एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। ये महिलाएं सच्चे अर्थों में क्रांतिकारी थीं और उनके प्रयासांे का विरोध जिन आधारों पर किया गयाए उनमें से एक यह भी था कि महिला शिक्षा धर्म.विरूद्ध है।
दरअसल, भागवत उस आधुनिकीकरण का विरोध कर रहे हैं, प्रजातंत्र जिसका अविष्कार है। महिला अपराधों का कारण आधुनिकता या प्रजातंत्र नहीं है। बल्कि इसके उलट जातिगत और लैंगिक समानता का संघर्ष, आधुनिकीकरण की प्रक्रिया का अविभाज्य हिस्सा है। प्रजातंत्रीकरण समाज के औपचारिक समानता से वास्तविक समानता की ओर बढ़ने की प्रक्रिया है और यह प्रक्रिया हर सामाजिक आंदोलन के एजेन्डे में होनी चाहिए। महिलाओं के दमन की एक महत्वपूर्ण वजह है पितृसत्तात्मक व्यवस्था। यह व्यवस्था उन प्राचीन और मध्यकालीन मूल्यों को संरक्षित रखना चाहती है जो सामंती समाज में विद्यमान थे। यह उन मूल्यों मंे विश्वास करती है जिनके अनुसार महिलाओं को घर की चहारदीवारी के भीतर और पुरूषों के अधीन रहना चाहिए। आज भी देश में विधवाओं की जो हालत है, वह उस महान प्राचीन परंपरा की याद दिलाती है जिसे भागवत पुनर्जीवित करना चाहते हैं। बल्कि शायद वे यह भी चाहते होंगे कि विधवाओं को उनके पतियों की चिता पर जिन्दा जला दिया जाए। भागवत और उनके साथीगण भारत को पीछे ढकेलना चाहते हैं। वे हमसे वह सब छीन लेना चाहते हैं जो हमने अपने लंबे स्वाधीनता संग्राम से हासिल किया है.उस संग्राम से जो ब्रिटिश राज के खिलाफ तो था ही साथ ही, जिसका लक्ष्य लैंगिक और जातिगत समानता स्थापित करना भी था
-राम पुनियानी
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