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गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

नकली राष्ट्रभक्त चूहे भी खायेंगे देश भक्ति का गीत भी गायेंगे

अफजल गुरु की फांसी का सबसे ज्यादा जबरदस्त विरोध जम्मू एंड कश्मीर की पीडीपी नेता महबूबा मुफ़्ती ने एक राजनैतिक कदम बताया था और जबरदस्त विरोध किया था. वहीँ, जम्मू एंड कश्मीर विधानसभा ने अफजल गुरु का शव सौंपने की मांग करते हुए प्रस्ताव पारित किया गया था लेकिन उसे भी नजरअंदाज कर दिया गया था। उन्हें लगता है कि देश में दो तरह के कानून चल रहे हैं। एक देश के अन्य हिस्सों के लिए है और दूसरा अलग सिर्फ कश्मीर के लिए।
         उसी महबूबा मुफ़्ती की पार्टी के साथ भारतीय जनता पार्टी ने जम्मू एंड कश्मीर गठबंधन सरकार बनायीं है और अब मुफ़्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद महबूबा मुफ़्ती को मुख्यमंत्री बनाने के लिए नागपुर मुख्यालय के प्रतिनिधि राम माधव प्रयासरत हैं मतलब यह इसका सीधा-सीधा है हम नकली राष्ट्रभक्ति का मुखौटा लगा कर सब कुछ करेंगे और जब दूसरा चर्चा भी करेगा तो हम मीडिया से लेकर सोशल मीडिया देशद्रोही का जाप करना शुरू कर देंगे. देखें https://www.youtube.com/watch?v=R8vlDv8FWGM&spfreload=10

जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा जब अफजल गुरु की फांसी के ऊपर चर्चा का कार्यक्रम शुरू हुआ तो महबूबा मुफ़्ती के साथ सरकार चलाने के लिए प्रयासरत भारतीय जनता पार्टी के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् ने छात्रों से हाथापाई की और राष्ट्रविरोधी नारे भी लगाए जिससे उन छात्रों को फंसाया जा सके इससे पूर्व हैदराबाद यूनिवर्सिटी में रोहित वेमुला के मामले में षड्यंत्र कर आत्महत्या के लिए मजबूर कर चुके हैं. कुछ वर्षों पूर्व लखनऊ कचेहरी में इन्ही तत्वों द्वारा सुप्रसिद्ध अधिवक्ता मुहम्मद शुऐब के साथ न्यायलय के अन्दर मारपीट की गयी थी और यह आरोप लगाया गया था कि वह पकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे यह सब बेतुकी बातें नागपुर मुख्यालय के विषाक्त विचारधारा का परिणाम हैं. षड्यंत्रकारी भूमिका में यह हमेशा रहते हैं. 
अफजल गुरु की फांसी की चर्चा अगर राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में आता है तो नाथूराम गोडसे की फांसी की चर्चा करना और उसको महिमा मंडित करना क्या गंगा स्नान है. इस कार्य को बखूबी नागपुर मुख्यालय करता आ रहा है. इसी सम्बन्ध में हमारे फेसबुक के मित्र मनोज कुमार ने एक गंभीर टिप्पणी की है
"अफजल गुरू को इस देश की सर्वोच्य न्यायालय ने संसद पर हमले का अपराधी माना और फाँसी की सजा सुना दी| आप कहते हैं कि अब इस पर कोई चर्चा नहीं हो सकती| इस पर कोई भी चर्चा राष्ट्रद्रोह है| चलिए मैं आपकी बात मान लेता हूँ| नाथूराम गोडसे को इस देश की सर्वोच्य न्यायालय ने बापू की हत्या का दोषी माना और उसे फाँसी की सजा सुनाई| अगर किसी दुकान पर गोडसे की किताब - "मैंने गाँधी को क्यों मारा" या उसके भाई की किताब " गाँधी वध क्यों" बिकती हुई दिखती है तो उस दूकान पर, उसके प्रकाशक पर देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए या नहीं? और हाँ, एक बार अपना बुक-सेल्फ चेक कर लीजिएगा| कहीं आपने इनमें से कोई किताब खरीदकर रखी हुई तो नहीं है"

जवाहर लाल नेहरु विश्व विद्यालय की खुली सोच के कारण नागपुरी मुख्यालय षड्यंत्र पर षड्यंत्र रच रहा है.
 ट्राई द्वारा फ्री बेसिक्स प्लान को खारिज करने के फैसले से सोशल साइट फेसबुक बौखला गई है। फेसबुक के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में शामिल मार्क एंड्रीसन ने ट्राई के फैसले को लेकर भारत विरोधी ट्वीट किया कि भारत की इकोनॉमी ब्रिटिश शासन के अधीन (औपनिवेशिक) ज्यादा बेहतर थी। भारत को तो औपनिवेशिक शासन की आदत हो चुकी है, अब इसका विरोध क्यों? यह बात अगर उनके आका लोग लिख रहे हैं तो उनको राष्ट्र
द्रोहिता नहीं दिखाई देती है क्यूंकि उन्ही के नौकरों के ये वंशज हैं.

सुमन
लो क सं घ र्ष !

गुरुवार, 6 अगस्त 2015

समाज की पशुवत प्रवृत्तियों का प्रतीक है मृत्युदंड


मानव सभ्यता का इतिहास क्रूरए असमान और हिंसक समाजों के मानवतावादी,समावेशी और कम हिंसक समाजों में परिवर्तन का इतिहास है। मानव समाज, तानाशाही से प्रजातंत्र की ओर अग्रसर हुआ, वह राजशाही से लोकशाही की तरफ बढ़ा।
समाज में हमेशा से अपराधियों को सज़ा देने का प्रावधान रहा है परंतु जहां प्राचीन समाजों में सज़ा का उद्देश्य प्रतिशोध लेना हुआ करता था, वहीं आधुनिक समाज, सज़ा को एक ऐसे उपकरण के रूप में देखता है, जिससे अपराधी को स्वयं को बदलने की प्रेरणा मिले और समाज के अन्य लोग अपराध करने से बचें।
'नेशनल च्वाईस थ्योरी' ;तार्किकता चयन सिद्धांत के अनुसार,सज़ा का प्रावधान इसलिए नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि हम अपराधियों से बदला लेना चाहते हैं बल्कि सज़ा का प्रावधान इसलिए होना चाहिए क्योंकि इससे अन्य लोग अपराध करने के प्रति हतोत्साहित होंगे, अपराध करने से डरेंगे। प्राचीन और मध्यकाल में राजाओं द्वारा जो सज़ाएं दी जाती थीं उनमें शामिल थीं आदमी को उबलते हुए पानी में फेंक देना, भूखे शेरों के सामने डाल देना,  धीरे.धीरे काटकर मारना, कमर के नीचे से शरीर को दो भागों में बांटकर मरने के लिए छोड़ देना,पेट काटकर आंते बाहर निकाल लेना, सूली पर चढ़ाना, हाथी के पैरों तले कुचलवाना, पत्थरों से मारकर जान लेना, तोप के मुंह से बांधकर उड़ा देना, जिंदा जलाना, हाथ.पैर काट लेना,सार्वजनिक रूप से फांसी देना, गिलोटिन से मौत के घाट उतारना और लाईन में खड़ा कर गोली मार देना। यह उन तरीकों की पूरी सूची नहीं है, जिनका इस्तेमाल प्राचीन और मध्यकाल में राज्य, अपराधियों को सज़ा देने के लिए करता था। यह केवल उनमें से कुछ तरीकों की बानगी भर है।
ये सज़ाएं उन लोगों को दी जाती थीं जो राज्य के खिलाफ विद्रोह करते थेए राज्य के धर्म के अलावा किसी और धर्म को मानते थे, शासक वर्ग से मतभेद रखते थे या जिन्हें लीक पर चलना मंजूर न था। गेलिलियो ने जब यह कहा कि पृथ्वी नहीं, बल्कि सूर्य ब्रह्मण्ड का केंद्र है तो चर्च का कहर उन पर टूट पड़ा। अंततः उन्हें यह कहना पड़ा कि उनकी खोज गलत थी और चर्च का यह सिद्धांत ठीक था कि ब्रह्मण्ड, पृथ्वी.केंद्रित है।
सन् 1820 में ब्रिटेन में 160 ऐसे अपराध थे जिनके लिए मौत की सज़ा का प्रावधान था। इनमें शामिल थे दुकानों से सामान चुराना, छोटी.मोटी चोरी, खानाबदोशों के साथ एक महीने से अधिक समय बिताना आदि। ब्रिटेन में एक समय 220 अपराधों की सज़ा मृत्युदंड थी। मौत की सज़ा जिन 'अपराधों' के लिए दी जाती थी उनमें से कई ऐसे थे जो धनी लोगों की संपत्ति की सुरक्षा करने के लिए बनाए गए थे। ऐसा बताया जाता है कि हैनरी अष्टम ने 72,000 लोगों को मौत की सज़ा से दंडित किया था। सन् 1810 में हाउस ऑफ कामन्स में मृत्युदंड के विषय पर भाषण देते हुए सर सैम्युअल रोमिल्ली ने कहा थाए 'इस धरती पर कोई ऐसा देश नहीं है जिसमें इतने सारे अपराध मौत की सज़ा से दंडनीय होंए जितने कि इंग्लैण्ड में'।
19वीं सदी में रोमन गणराज्य, वेनेजुएला, सेनमेरिनो और पुर्तगाल ने मौत की सज़ा का प्रावधान समाप्त कर दिया। रोमन गणराज्य ने 1849 में यह प्रतिबंध लगाया, वेनेजुएला ने 1854 मेंए सेनमेरिनो ने 1865 में और पुर्तगाल ने 1867 में। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद, सारी दुनिया में व्यापक वैचारिक परिवर्तन आया। वर्गीय ऊँचनीच कम हुई और नाज़ी जर्मनी में हुए कत्लेआम ने लोगों को अंदर तक हिला दिया और नस्लीय भेदभाव के विद्रूप चेहरे से दुनिया को परिचित करवाया। सन् 1948 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानवाधिकारों का सार्वभौम घोषणापत्र जारी किया और इसे सन् 1950 में ब्रिटेन द्वारा स्वीकार कर लिया गया। ब्रिटेन में सन् 1964 के बाद से किसी व्यक्ति को मृत्यु दंड नहीं दिया गया। सन् 1965 में प्रधानमंत्री हेरोल्ड विल्सन की लेबर पार्टी की सरकार ने मृत्यु दंड की व्यवस्था को पांच साल के लिए निलंबित कर दिया। सन् 1969 में हाउस ऑफ कामन्स ने मृत्यु दंड के प्रावधान को ही खत्म कर दिया। सन् 1999 के 10 दिसंबर को अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के अवसर पर इंग्लैंड ने 'नागरिक व राजनैतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय समझौते' के द्वितीय ऐच्छिक प्रोटोकाल पर दस्तखत कर दिए। इसके साथ ही, ब्रिटेन में मृत्यु दंड हमेशा के लिए समाप्त हो गया।
इस तरहए हम यह देख सकते हैं कि प्रजातंत्र और प्रजातांत्रिक संस्थाओं के मजबूत होते जाने के साथ ही, असहमति और मतभेदों को स्वीकार करनेए सहने और उनका सम्मान करने की प्रवृत्ति बढ़ी। इस तथ्य को स्वीकार किया जाने लगा कि मानव जीवन अत्यंत मूल्यवान व पवित्र है और किसी समाज या राज्य को यह हक नहीं है कि वह किसी मनुष्य की जान ले। जैसा कि गांधीजी ने कहा था, आंख के बदले आंख का सिद्धांत पूरी दुनिया को अंधा बना देगा। यह माना जाने लगा कि सामूहिक सामाजिक चेतना को खून का प्यासा नहीं होना चाहिए। इस संभावना को भी समुचित महत्व दिया जाने लगा कि कोई भी न्यायालय या सरकार, किसी निर्दोष व्यक्ति को भी सज़ा दे सकती है। अन्य सज़ाओं के मामले में, अगर बाद में संबंधित व्यक्ति निर्दोष साबित हो जाता है, तो उसे जेल से रिहा किया जा सकता है परंतु मृत्यु दंड के मामले में गलती सुधारने की गुंजाईश नहीं है।
20वीं सदी में, आस्ट्रेलिया ने 1973 में मृत्यु दंड का प्रावधान समाप्त कर दिया। केनेडा ने 1976 और फ्रांस ने 1981 में मृत्यु दंड समाप्त कर दिया। सन् 1977 में संयुक्त राष्ट्र संघ की सामान्य सभा ने एक औपचारिक प्रस्ताव पारित किया जिसमें यह कहा गया था कि मृत्यु दंड के उन्मूलन की वांछनीयता के मद्देनजर 'यह बेहतर होगा कि उन अपराधों, जिनके लिए मृत्यु दंड दिया जा सकता है, की सूची उत्तरोत्तर छोटी की जाए।'
संयुक्त राष्ट्र संघ की सामान्य सभा की द्वितीय समिति ने 21 नवंबर 2012 को पारित अपने चौथे प्रस्ताव में कहा कि मृत्यु दंड की व्यवस्था को समाप्त करने के उद्देश्य से, उसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया जाए। इस प्रस्ताव को 91 सदस्य राष्ट्रों ने प्रायोजित किया था और इसके पक्ष में 110 और विरोध में 39 मत पड़े। छत्तीस देशों ने मतदान में भाग नहीं लिया। भारत ने प्रस्ताव के विरोध में मत दिया। दुनिया धीरे.धीरे मृत्यु दंड के उन्मूलन या उसके इस्तेमाल पर रोक की ओर बढ़ रही है। दुनिया के दो तिहाई देशों में या तो मृत्यु दंड खत्म किया जा चुका है या उस पर प्रतिबंध है। अर्जेन्टीना, ब्राजील, कोलम्बिया, कोस्टारिका, इक्वाडोर, मैक्सिको, पनामा, पेरू, उरूग्वे व वेनेजुएला सहित अधिकांश लातिन अमरीकी देशों में मृत्यु दंड समाप्त कर दिया गया है। यूरोप में बेल्जियम, डेनमार्क, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड, नार्वे, स्वीडन, स्विटज़रलैंड और आईसलैंड में मृत्यु दंड नहीं दिया जाता। आस्ट्रेलिया और अमरीका के कई राज्यों में भी इस पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है। मृत्यु दंड को मानवीय गरिमा के खिलाफ माना जाता है।
परंतु दुनिया की 60 प्रतिशत आबादी उन देशों में रहती है, जिनकी कानून की पुस्तकों में अब भी मृत्यु दंड का प्रावधान है। चीन, भारत, अमरीका और इण्डोनिशया.जो कि आबादी की दृष्टि से दुनिया के चार सबसे बड़े देश हैं.में मृत्यु दंड की व्यवस्था कायम है। पूरी दुनिया में 97 देशों में मृत्यु दंड समाप्त कर दिया गया है, 58 देशों में मृत्यु दंड दिया जाता है और बाकी देशों में कम से कम पिछले दस सालों में या तो किसी को मौत की सज़ा दी ही नहीं गई है या केवल अपवादात्मक परिस्थितियों जैसे युद्धकाल में दी गई है। यूरोपियन यूनियन के मानवाधिकार घोषणापत्र का अनुच्छेद दो, मृत्यु दंड को प्रतिबंधित करता है।
इस बात के कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं कि किसी देश में मृत्यु दंड समाप्त कर देने के बाद वहां अपराधों में वृद्धि हुई हो। ग्रीस में डकैती के लिए मौत की सज़ा का प्रावधान समाप्त करने के बाद, डकैती की घटनाओं में कमी आई। कनाडा में यही बलात्कार के मामलों में हुआ। इंग्लैण्ड में 1957 के होमीसाइड अधिनियम के तहत जिन अपराधों के लिए मृत्यु दंड का प्रावधान समाप्त किया गया था, उनमें इस अधिनियम के लागू होने के बाद कोई वृद्धि नहीं हुई।
सन् 2011 में दुनिया के 21 देशों में एक या उससे अधिक व्यक्तियों को मौत की सज़ा दी गई। दस साल पहले यह संख्या 31 थी। चीन में सबसे ज्यादा लोगों को मौत की सज़ा दी गई। चीन ने हाल में कुछ आर्थिक अपराधों के लिए मृत्यु दंड के प्रावधान को समाप्त कर दिया और मृत्यु दंड के सभी मामलों की उच्चतम न्यायालय द्वारा अनिवार्य रूप से समीक्षा किए जाने की व्यवस्था पुनः लागू कर दी। यद्यपि चीन, आधिकारिक रूप से यह नहीं बताता कि वहां कितने लोगों को मौत की सज़ा दी गई परंतु अध्ययनों से यह पता चलता है कि वहां लगभग 4,000 लोगों को मौत की सज़ा से दंडित किया गया। सन् 2011 में ईरान में 360 लोगों को राज्य द्वारा मौत के घाट उतारा गया। सऊदी अरब में 82 को, ईराक में 68, अमरीका में 43, येमेन में 41, उत्तर कोरिया में 30, सोमालिया में 10, सूडान में 7 और बांग्लादेश व वियतनाम में 5.5। भारत में धनंजय चटर्जी को 2004 में फांसी पर चढ़ाया गया,अज़मल कसाब को 21 नवंबर 2012 कोए अफज़ल गुरू को 9 फरवरी 2013 को और याकूब मेमन को 30 जुलाई 2015 को।
कुछ देश आतंकवाद, ड्रग्स और समलैंगिकता से जुड़े अपराधों के लिए मौत की सज़ा का प्रावधान कर रहे हैं। दुनिया के लगभग 32 देशों ने ड्रग्स से जुड़े अपराधों के लिए मौत की सज़ा का प्रावधान किया है और जिन लोगों को मौत की सज़ा दी जाती हैए उनमें से अधिकांश ड्रग्स से संबंधित अपराधों के दोषी होते हैं। लाईबेरिया,युगांडा और कुछ अन्य देशों में समलैंगिकता के लिए मौत की सज़ा का प्रावधान है। सीरिया ने दिसंबर 2011 में आतंकवादियों को हथियार मुहैया कराने को मौत की सज़ा से दंडनीय अपराध घोषित कर दिया। भारत, बांग्लादेश और नाइजीरिया ने नए कानून बनाकर आतंकी हमलों के लिए दोषी पाए जाने वालों के लिए मौत की सज़ा का प्रावधान किया है। भारतीय अदालतें   'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' ;दुर्लभ में दुर्लभतमअपराधों के लिए ही मौत की सज़ा सुनाती हैं।
जो लोग मौत की सज़ा के प्रावधान को बनाए रखना चाहते हैं,उनके पास अपने तर्क हैं और जो इसका उन्मूलन चाहते हैं, उनके पास अपने। परंतु मोटे तौर पर, मौत की सज़ा के पक्षधर, दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी हैं जो विचारधारा के स्तर पर एकाधिकारवादी राज्य की स्थापना के समर्थक हैं और सामाजिक पदानुक्रम को बनाए रखना चाहते हैं। अभियोजकए जांचकर्ता व आपराधिक न्याय व्यवस्था के अन्य पुर्जे़ भी मौत की सज़ा को बनाए रखने के पक्षधर हैं क्योंकि उन्हें ऐसा लगता है कि इससे अन्य लोग अपराध करने के पहले दस बार सोचेंगे। परंतु हम यह कैसे भूल सकते हैं कि अज़मल कसाब की फांसी ने आतंकवादियों को 27 जुलाई 2015 को पंजाब के गुरूदासपुर में पुलिस स्टेशन पर हमला करने से नहीं रोका। इस हमले में एसपी सहित चार पुलिसकर्मी व तीन नागरिक मारे गए। सुरक्षाबलों ने आतंकवादियों को भी मार गिराया।
मृत्यु दंड की व्यवस्था को समाप्त करने के पक्षधर वे हैं जो अधिक मानवीय समाज का निर्माण करना चाहते हैं और जो समानता व सामाजिक न्याय के मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध हैं। उनका तर्क यह है कि समाज में जैसे.जैसे असमानता और अन्याय बढ़ेगा,अपराध भी बढेंगे। और अपराधों में यह वृद्धि कड़ी से कड़ी सज़ा के प्रावधान के बाद भी होती रहेगी। जिस व्यक्ति को समाज का एक तबका क्रूर अपराधी मानता है, वह किसी दूसरे तबके लिए न्याय के लिए लड़ने वाला नायक हो सकता है। उसे जितनी क्रूर सज़ा दी जाएगी,वह उतना ही बड़ा शहीद बन जाएगा और उसके नक्षेकदम पर अन्य लोग चलेंगे। स्पष्टतः, क्रूर सज़ाएं देने से अपराध रूकने वाले नहीं हैं। अपराध तब रूकेंगे जब हम एक न्यायपूर्ण और समतावादी समाज की स्थापना करें, जिसमें अपराध करने वाले के प्रति भी सहानुभूति और करूणा का भाव हो और अपराधी को सुधारना, जिसका लक्ष्य हो। अपराधों को रोकने में क्रूर सज़ाओं की तुलना में एक सुधरा हुआ अपराधी अधिक सक्षम होगा।
यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि जो लोग मौत की सज़ा पाते हैं उनमें से अधिकांश समाज के हाशिए पर पड़े तबकों के सदस्य होते हैं.गरीब, नस्लीय व धार्मिक अल्पसंख्यक और नीची जातियां। उदाहरणार्थ अमरीका में जिन लोगों को मौत की सज़ा सुनाई जा चुकी है उनमें से 41 प्रतिशत और जिन लोगों के मृत्यु दंड पर अमल हो गया है, उनमें से 34 प्रतिशत अफ्रीकी.अमरीकी हैं, यद्यपि वे अमरीका की आबादी का मात्र 12 प्रतिशत हैं। जहां तक अज़मल कसाब का प्रश्न है, उसकी फांसी को लेकर कोई विवाद नहीं था। अफज़ल गुरू के मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मौत की सज़ा 'राष्ट्र की संयुक्त अंर्तात्मा को संतुष्ट करेगी।' नरोदा पाटिया ;गुजरात के मामले में सत्र न्यायालय की न्यायाधीश ज्योत्सना यागनिक ने बाबू बजरंगी को मौत की सज़ा नहीं सुनाई। बाबू बजरंगी ने कौसर बानो के गर्भ को चीरकर उसके अजन्मे बच्चे को त्रिशूल की नोंक पर फंसाया था। कोई भी सामान्य आदमी यही कहेगा कि यह क्रूरता का दुर्लभ में दुर्लभतम उदाहरण है। यागनिक ने अपने निर्णय में कहा कि वे बाबू बजरंगी को मौत की सज़ा इसलिए नहीं दे रही हैं क्योंकि वह मानवीय गरिमा के खिलाफ है।
कुल मिलाकर,मौत की सज़ा या किसी व्यक्ति की कानून के नाम पर जान लेना, बदले की कार्यवाही के अतिरिक्त कुछ नहीं है। यह समाज की हिंसक, पशुवत प्रवृत्तियों का प्रकटीकरण है। कसाब को फांसी दिए जाने के बाद आम लोगों ने टीवी पर जिस तरह की प्रतिक्रियांए दीं थीं, उन्हें देख.सुनकर कोई भी यह समझ सकता था कि ये सभ्य समाज की भाषा नहीं थी। फेडरेशन ऑफ हिंदू आर्गनाईजेशन्स ने भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से यह अनुरोध किया था कि अफज़ल गुरू को दी गई सज़ा में यह संशोधन किया जाए कि 'उसका दाहिना हाथ और बांया पैर काट दिया जाए और उसकी एक आंख निकाल ली जाए और उसके बाद इस हालत में उसे पूरे भारत में घूमने दिया जाए ताकि इस देश में कोई आतंकवादी बनने की हिम्मत न करे।' फेडरेशन चाहती थी कि राष्ट्रपति' अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए अफज़ल गुरू की सज़ा में ये परिवर्तन करें।
इस तरह की क्रूर और पशुवत प्रवृत्तियों से यह दुनिया जितनी जल्दी मुक्त हो उतना बेहतर होगा।
-इरफान इंजीनियर

मंगलवार, 5 मार्च 2013

निरंकुश सरकारें हैं प्रजातंत्र के लिए खतरा





अफजल गुरू को फांसी

यह तथ्य विवादित नहीं है कि अफजल गुरू, जम्मू-कश्मीर लिब्रेशन फं्रट का आत्मसमर्पित सदस्य था। वह पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के हालात से असंतुष्ट था और उसने सीमा सुरक्षा बल के समक्ष आत्मसर्मपण किया था। जब कोई अतिवादी आत्मसमर्पण करता है तो वह स्वयं को गंभीर खतरे में डालता है। उसके पूर्व साथी अक्सर उसके खून के प्यासे हो जाते हैं क्योंकि उन्हें यह डर रहता है कि आत्मसमर्पण करने वाला उनका साथी उनके व उनके संगठन के बारे में सुरक्षा बलों को जानकारी दे देगा। वे अपने आत्मसमर्पित साथी को इसलिए भी खत्म करना चाहते हैं ताकि उनके संगठन के अन्य सदस्य आत्मसमर्पण करने के पहले दस बार सोचे। अफजल गुरू ने जब आत्मसमर्पण किया तब उसने ये सभी खतरे मोल लिए थे। इस तरह के संगठनों का कोई सदस्य तभी आत्मसमर्पण करता है जब उसे यह लगने लगता है कि उसके संगठन के लक्ष्य को पाना असंभव है या फिर तब, जब उसे अपने संगठन के मिशन में आस्था नहीं रह जाती। यह तथ्य भी अविवादित है कि अफजल गुरू ने अपने आत्मसमर्पण के बाद स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की और वह छोटे-मोटे काम करके अपना जीवनयापन करने लगा।
इसके बाद से अफजल गुरू और पुलिस की कहानी एकदम अलग-अलग हो जाती है। पुलिस का कहना है कि गुरू की मुलाकात तारिक नाम के व्यक्ति से हुई जिसने उसे गाज़ी बाबा से मिलवाया। पुलिस का यह भी कहना है कि गाज़ी बाबा ने अफजल गुरू को भारतीय संसद पर हमला करने वालों के लिए दिल्ली में छिपने का स्थान मुहैय्या कराने के लिए राजी कर लिया। अफजल गुरू को इलेक्ट्रानिक मीडिया के समक्ष प्रस्तुत किया गया और उसके ‘‘इकबालिया‘‘ बयान को जमकर प्रचारित किया गया। उच्चतम न्यायालय ने पुलिस को इसके लिए फटकार भी लगाई और पुलिस अधिकारियों के समक्ष दिए गए गुरू के तथाकथित इकबालिया बयान को कोई महत्व देने से इंकार कर दिया।
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के अन्तर्गत विचारण न्यायालय के समक्ष दिए गए अपने बयान और केन्द्रीय गृह मंत्री को लिखे गए अपने पत्र में अफजल गुरू ने स्वीकार किया कि उसका परिचय उन लोगों से करवाया गया था, जिन्होंने बाद में संसद पर हमला किया। परंतु उसे उन लोगों से मिलवाने वाला व्यक्ति कोई अतिवादी नहीं वरन् दिल्ली पुलिस का डीएसपी दलविंदर सिंह था। दलविंदर सिंह ने उस पर इस बात के लिए भी दबाव डाला कि वह दिल्ली में उन लोगों के रहने का इंतजाम करे और उससे दलविंदर सिंह ने कई बार फोन पर बातचीत भी की। अफजल गुरू के फोन काल रिकार्ड की कोई जांच नहीं की गई। गुरू ने गृहमंत्री को लिखा कि वह अदालत में अपना पक्ष इसलिए प्रस्तुत नहीं कर सका और पुलिस द्वारा पेश किए गए सुबूतों के सच को इसलिए उजागर नहीं कर सका क्योंकि उसके परिवार को जान का खतरा था।
उच्चतम न्यायालय ने भी यह स्वीकार किया है कि अफजल गुरू को उसके बचाव के लिए कोई वकील नहीं मिला। उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अफजल गुरू के खिलाफ कोई सीधे सुबूत नहीं हैं और उसे केवल परिस्थितिजन्य सुबूतों के आधार पर दोषी ठहराया जा रहा है। देश के सामूहिक अंतःकरण को संतुष्ट करने के लिए उसे मौत की सजा दी गई। जिन लोगों ने संसद पर हमला किया था वे मौके पर ही मारे गए और गाज़ी बाबा को गिरफ्तार नहीं किया जा सका।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कहा है कि अफजल गुरू को फांसी दिए जाने के पूर्व उसे उसके परिवारजनों से न मिलने दिया जाना, उसके मानवाधिकारों का उल्लंघन है। किसी व्यक्ति के परिवार को सूचित किए बिना उसे मौत की नींद सुला देना बर्बरता है और उसके परिवार को धार्मिक रीतिरिवाजों के अनुसार उसकी मृत देह का अंतिम संस्कार नहीं करने दिया जाना, उसके धार्मिक स्वतंत्रता के मूल अधिकार का उल्लंघन है।
अफजल गुरू को जिस दिन फांसी दी गई उसी दिन तड़के से कश्मीर मंे अभिव्यक्ति की आजादी को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया। किसी भी व्यक्ति को यह मौका नहीं दिया गया कि वह फांसी की निंदा-या प्रशंसा-कर सके। कश्मीर में बच्चों को दूध तक नसीब नहीं हुआ। समाचारपत्रों और टेलीविजन चैनलों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इंटरनेट और एसएमएस सेवाएं बंद कर दी गईं। क्या कश्मीरियों के लिए प्रजातंत्र और स्वतंत्रता नहीं है? क्या हमें उन पर तनिक भी विश्वास नहीं है? केवल कश्मीर के मुख्यमंत्री को मीडिया से बातचीत करने का अवसर मिला। और यह सब मात्र इसलिए क्येांकि एक कश्मीरी पर भारत सरकार के विरूद्ध युद्ध करने या उसमें सहायक बनने का आरोप था और उसे केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर, हिन्दुत्व संगठनों के जरिए व्यक्त की गई राष्ट्रीय अंतःकरण की मांग को संतुष्ट करने के लिए, बिना उसके परिवार को सूचना दिए, फांसी पर लटका दिया गया। देश की स्वतंत्रता के बाद से लेकर आज तक ऐसा व्यवहार सिर्फ एक अन्य व्यक्ति के साथ किया गया था और वह था पाकिस्तानी नागरिक अजमल कसाब। ब्रिटिश सरकार तक ने भगत सिंह को फांसी देने के पहले उनके परिवार को उनसे अंतिम बार मिलने का अवसर दिया था। यह तब जबकि ब्रिटिश सरकार की निगाह में भगत सिंह एक आतंकवादी थे जो राज्य के विरूद्ध युद्ध करने के दोषी थे।
भारत सरकार या भारत के संविधान के लिए आतंकवादी बहुत बड़ा खतरा नहीं हैं। उनसे मुकाबला करने में हमारे सुरक्षा बल सक्षम हैं। सुरक्षा बलों की ताकत लगभग असीमित है और भारत का जनमत उनके साथ है। प्रजातंत्र, भारतीय संविधान और कानून के राज को आतंकवादियों से कहीं अधिक खतरा ऐसी सरकार से है जो कानून का तनिक भी सम्मान नहीं करती और जो केवल उन तत्वों को संतुष्ट करना चाहती है जो बहुसंख्यकवादी राष्ट्रीयता के झंडाबरदार हैं और जिन्हें न्याय से कोई लेनादेना नहीं है।

न्याय का प्रश्न
प्रतिशोध की भावना और खून की प्यास, मध्यकालीन न्याय व्यवस्था का हिस्सा थे। आंख के बदले आंख और खून के बदले खून को अब न्याय नहीं माना जाता। सत्ताधीशों का खौफ दुनिया में कहीं भी अपराधों को रोकने में सफल नहीं हुआ है। जो लोग वंचित हैं या जिन्हें ऐसा लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है या जिनकी धरती पर दूसरों ने कब्जा कर लिया है, वे हमेशा से, बिना नतीजों की परवाह किए, लड़ते आए हैं। उनके पास जो भी संसाधन होते हैं, वे उन्हीं से अपनी लड़ाई जारी रखते हैं। ब्रिटिश साम्राज्य में सूरज कभी नहीं डूबता था परंतु क्या इस कारण भारतीय स्वतंत्रता सेनानी डर कर चुप बैठ गए? वे अपनी लड़ाई की कोई भी कीमत चुकाने को तैयार थे-अपनी जान देने के लिए भी। दरअसल, समाज में अपराध तभी रूक सकते हैं जब हमारा ढांचा ऐसा हो और हम ऐसी संस्थाओं का निर्माण करें, जो सबके साथ न्याय करें और पूर्णतः निष्पक्ष हों। अपराध तब रूकते हैं जब सरकारें जनता के प्रति जवाबदेह हों।
प्रतिशोध न्याय नहीं है। अगर किसी व्यक्ति ने हमें कोई कष्ट पहुुंचाया है तो उसे उतना ही या उससे भी अधिक कष्ट पहुंचाने से संतोष प्राप्त करना न्याय नहीं है। यह अमानवीयता है। न्याय तो तब होगा जब हम अपराध करनेवाले को यह अहसास करा सकें कि उसने जो कुछ किया वह बहुत गलत था, यह सुनिश्चित कर सकें कि वह अपना आगे का जीवन कानून का सम्मान करने वाले एक नागरिक के बतौर निभाए और अपनी गलती फिर ना दोहराए। पांच पुलिसकर्मी, एक माली व संसद के सुरक्षा दस्ते का एक सदस्य, संसद पर हुए निंदनीय और कुत्सित हमले में मारे गए थे। इन मृतकों के परिवारों के सदस्य, हमलावरों के मारे जाने से प्रसन्नता का अनुभव कर सकते हैं। संसद पर हमला करने वालों ने हमला इसलिए किया क्योंकि वे किसी और का बदला ले रहे थे। और इस प्रकार यह चक्र चलता रहता है। गुरू की फांसी के बाद कश्मीरियों मंे इस बात को लेकर गुस्सा हो सकता है कि गुरू पर निष्पक्षता से मुकदमा नहीं चलाया गया। उनमें उसे फांसी दिए जाने के तरीके को लेकर भी रोष हो सकता है। उनमें इस बात पर भी गुस्सा हो सकता है कि फांसी के बाद उन्हें उनके घरों में कैद कर दिया गया। प्रतिशोध, दरअसल, एक कभी खत्म न होने वाला दुष्चक्र है। इसमें किसी पक्ष को कभी शांति और संतुष्टि का अनुभव नहीं होता। एक व्यक्ति द्वारा लिया गया बदला, दूसरे व्यक्ति में बदला लेने की इच्छा पैदा करता है।
जो लोग संसद पर हमले में मारे गए, उनके परिजनों के लिए इस दुःखद घटनाक्रम का भावनात्मक समापन तब होता जब पूरा देश उनके आर्थिक पुनर्वास में मदद करता और उन्हें ‘‘मेरे प्रियजन ही क्यों‘‘? ‘‘किसकी गलती है‘‘, ‘‘क्या गलत हुआ‘‘, ‘‘हमला क्यों किया गया?‘‘ ‘‘हमलावरों ने मेरे परिवारजन को ही क्यों निशाना बनाया‘‘ और इसी तरह के मन को उद्वेलित करने वाले अन्य प्रश्नों के उत्तर खोजने में सहायता करता। प्रियंका गांधी के लिए उनके पिता की नृशंस हत्या की घटना का समापन नलिनी को फांसी पर चढ़ाकर नहीं होता। वह तब हुआ जब वे नलिनी से मिलीं, उससे कुछ प्रश्न पूछे और उसे माफ कर दिया। नलिनी को फांसी नहीं हुई। न्याय की सफलता तभी है जब अपराधी एक सामान्य नागरिक बन जाए। जब तक वह सच्चा पश्चाताप नहीं करता और उसका ह्दय परिवर्तन नहीं होता, तब तक उसपर उचित प्रतिबंध लगाए जाने चाहिए और अगर ऐसा कभी नहीं होता तो उसे समाज से अलग-थलग रखा जाना आवश्यक है, ताकि समाज उससे सुरक्षित रह सके।

मृत्युदंड में पक्षपात   
भारत में ऐसे कई अन्य व्यक्ति हैं जिन्होंने संवैधानिक संस्थाओं पर हमले किए। इनमें शामिल हैं नलिनी और पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री का हत्यारा राजौना। जो लोग चीख-चीखकर गुरू को फांसी पर चढ़ाने की मांग कर रहे थे वे इन दोनों के बारे में चुप क्यों हैं? क्या कारण है कि यह मांग नहीं उठ रही कि बाबू बजरंगी और माया कोडनानी, जिन्हें कई महिलाओें के साथ क्रूर सामूहिक बलात्कार, अनेकों हत्याओं और यहां तक कि अजन्मे बच्चों की जान लेने तक का दोषी ठहराया गया है, को फांसी दी जाए? मृत्युदंड दरअसल न्याय की मांग नहीं है वरन् यह एक राजनैतिक मांग है, जिसका उद्धेश्य किसी समुदाय या उसके एक हिस्से के वोट पाना और राज्यसत्ता की शक्ति और मर्दानगी का प्रदर्शन करना है। मर्दानगी, सैनिक शक्ति और सत्ता पर गर्व, जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली सोच की उपज है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने 9/11 के हमले, जिसमें विभिन्न देशों के तीन हजार से अधिक नागरिक मारे गए थे, का बदला लेने के लिए अफगानिस्तान और ईराक पर हमला किया। उन्होंने इस हमले की तुलना क्रूसेडस से की और इन हमलों में छःह लाख से अधिक लोग मारे गए और लाखों घायल हुए। यह युद्ध अभी भी जारी है और अमेरिका इसे तब तक नहीं जीत सकेगा जब तक न्याय नहीं होता।
इतिहास गवाह है कि मानव समाज , क्रूरता से मानवीयता की ओर और तानाशाही से प्रजातंत्र की ओर बढ़ता आया है। अपराधियों को सजा देने का उद्धेश्य है दूसरों को वैसा ही अपराध करने से रोकना और अपराधी को पश्चाताप करने और स्वयं को बदलने का मौका देना। प्रजातंत्र जैसे-जैसे सुदृढ़ हो रहा है, मतभेदों और असहमतियों को स्वीकार करने की संस्कृति मजबूत हो रही है। यह अवधारणा भी जड़ें जमा रही है कि समाज को किसी की भी जान लेने का हक नहीं है। पूरे विश्व का अनुभव यह बताता है कि मृत्युदंड अक्सर गरीबों, नस्लीय व धार्मिक अल्पसंख्यकों और समाज के अन्य वंचित वर्गों के सदस्यों के हिस्से मंे आता है। उदाहरणार्थ, अमेरिका में जिन लोगों को मृत्युदंड से दंडित किया गया है उनमें से 41 प्रतिशत और जिन्हें मृत्युदंड दे दिया गया है, उनमें से 34 प्रतिशत अफ्रीकी-अमरीकी हैं, जिनका अमेरिका की आबादी में प्रतिशत मात्र 12 है। इस समस्या का एकमात्र हल है मृत्युदंड को हमेशा-हमेशा के लिए दफना दिया जाना। 

-इरफान इंजीनियर

बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

अफजल गुरू: अंतःकरण की मौत


अफजल गुरू की अर्ध.गुप्त फांसी ;फरवरी 2013 से कुछ लोगों को धक्का लगा है तो कुछ में जश्न का माहौल है। अफजल गुरू को सुबह.सवेरे फांसी पर लटका दिया गया और उसके शव को जेल के प्रांगण में दफन कर दिया गया। अफजल गुरू के परिवार को उसकी दया याचिका खारिज किए जाने के खिलाफ अपील करने का अवसर नहीं मिला। मौत की सजा की उपादेयता संबंधी प्रश्न कई लोगों के अंतःकरण को झकझोर रहे हैं परंतु शायद वे उस सामूहिक अंतःकरण का हिस्सा नहीं हैं, जो सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और बाद में राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका को खारिज किए जाने का आधार बनी। समाज के जिस तबके की सोच यह थी कि अफजल गुरू को फांसी की सजा देना ही गलत था, वह तबका भी शायद देश के सामूहिक अंतःकरण का हिस्सा नहीं था!
गुरू की फांसी के बाद, कश्मीर घाटी में बाहरी दुनिया की खबरों का पूरी तरह टोटा हो गया। अखबार नहीं निकले और टी. वी. चैनलों के प्रसारण पर रोक लगा दी गई। व्यथित लोगों के विरोध प्रदर्शनों के दौरान कुछ मौतें भी हुईं। सही सूचनाओं के अभाव में अफवाहों का बाजार गर्म रहा। हमारे देश के सत्ताधीशों को इस आशंका पर विचार करने की जरूरत है कि खबरों का स्थान अफवाहों द्वारा ले लिए जाने के भयावह परिणाम हो सकते हैं।
इस फांसी ने कई प्रश्नों को जन्म दिया है। फांसी क्यों दी गई और उसके लिए यही समय क्यों चुना गया। गुरू संसद भवन पर 13 दिसंबर 2001 को हुए हमले के आरोपियों में से एक था। इस हमले में 8 सुरक्षाकर्मी और 1 माली मारे गए थे। जांच एजेन्सियां और अदालतें भी इस निष्कर्ष पर पहुंची थीं कि गुरू किसी आतंकवादी संगठन का सदस्य नहीं था और ना ही उसकी हमले में कोई सीधी भूमिका थी। उच्चतम न्यायालय ने भी यह कहा कि गुरू की संलिप्तता का कोई सीधा सुबूत नहीं है। सारे सुबूत, परिस्थितिजन्य थे। उच्चतम न्यायालय सहित तीनों न्यायालयों ने उसे पोटा के अंतर्गत लगे आरोपों  से दोषमुक्त करार दिया था। अदालत ने यह भी कहा था कि गुरू के किसी आतंकी संगठन या समूह का सदस्य होने संबंधी सुबूत मनगंढ़त हैं।
ज्यादा से ज्यादा गुरू पर यह आरोप लगाया जा सकता है कि वह इस अपराध में मददगार था। उसने सीधे कोई अपराध नहीं किया था, उसके विरूद्ध सुबूत, परिस्थितिजन्य थे और पुलिस ने उसकी गिरफ्तारी के समय और स्थान के संबंध में झूठ बोला था। गिरफ्तारी संबंधी कागजात गढ़े गए थे और उससे झूठा इकबालिया बयान उगलवाया गया था। अदालत ने कहा पोटा की धारा 3;2 के अंतर्गत दोषसिद्धी को रद्द किया जाता है। पोटा की धारा 3;5 के अंतर्गत दोषसिद्धी को  भी रद्द किया जाता है क्योंकि अगर इकबालिया बयान को परे रख दिया जाए तो इस बाबत कोई सुबूत नहीं है कि वह किसी भी प्रतिबंधित संगठन का सदस्य था। यहां हम यह भी कहना चाहेंगे कि अगर इकबालिया बयान को सही भी मान लिया जाए, तब भी यह संदेहास्पद है कि उसकी किसी आतंकी समूह या संगठन से संबद्धता सिद्ध होती है। आगे अदालत ने कहा कि चूंकि इस घटना में बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे और इसने पूरे राष्ट्र को झकझोर दिया था इसलिए समाज का सामूहिक अंतःकरण तभी संतुष्ट होगा जब अपराधी को मौत की सजा दी जाए। क्या इसका अर्थ यह है कि सजा सिर्फ इसलिए दी गई ताकि सामूहिक राष्ट्रीय अंतःकरण को संतुष्ट किया जा सके यहां यह कहना  भी समीचीन होगा कि जिसे सामूहिक राष्ट्रीय अंतःकरण बताया जा रहा हैए वहए दरअसल, केवल मध्यम वर्ग के एक हिस्से और कुछ चुनिंदा सामाजिक.राजनैतिक संगठनों का अंतःकरण है। विहिप, बजरंग दल और उनके साथियों द्वारा उत्पादित अंतःकरण पर राष्ट्र के सामूहिक अंतःकरण का लेबल चस्पा करए उसे देश की सामूहिक मांग के रूप में स्वीकार कर लिया गया। यही समूह अब मौत का जश्न मना रहे हैं और फांसी को अपनी जीत बता रहे हैं।
हाल में भारत के राष्ट्रपति को संबोधित अपनी याचिका में सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों ने कहा था कि यह तथ्य कि अदालत ने एक ऐसे वकील को एमीकस क्यूरे ;न्यायमित्र नियुक्त कियाए जिस पर अफजल ने कभी  अपना भरोसा नहीं जताया, यह तथ्य कि उसकी गिरफ्तारी से लेकर उसके तथाकथित इकबालिया बयान तक उसे किसी वकील की सहायता उपलब्ध नहीं थी व यह तथ्य कि अदालत ने उससे कहा था कि या तो वह अदालत द्वारा नियुक्त वकील को स्वीकार करे या गवाहों का प्रतिपरीक्षण स्वयं करे.इन सभी तथ्यों का उसकी दया याचिका पर विचार करते समय ध्यान रखा जाना चाहिए।
वह एक आत्मसमर्पित अतिवादी था, उसे एसटीएफ द्वारा घोर शारीरिक यंत्रणा दी गई थी और उसने खुली अदालत में कहा था कि उसने संसद के हमलावरों में से एक . मोहम्मद . को एसटीएफ के अधिकारियों के कहने पर मकान और कार दिलवाई थी। इन सभी तथ्यों के आधार पर उस पर लगे आरोपों की संपूर्ण व सूक्ष्म जांच की जानी चाहिए थी। इस देश के नागरिक तो यह भी नहीं जानते कि ऐसी किसी जांच का आदेश भी जारी किया गया था या नहीं।उच्चतम न्यायालय ने जिन सुबूतों के आधार पर अपना निर्णय सुनाया वे सुबूत पुलिस ने संदेहास्पद तरीकों से तैयार किए थे, जिसके लिए पुलिस को अदालत ने फटकारा भी था। दूसरे पक्ष का तर्क यह था कि अगर गुरू को फांसी नहीं दी गई तो यह उन लोगों का अपमान होगा जिन्होंने संसद भवन की रक्षा करते हुए अपनी जानें गवांई।
 उच्चतम न्यायालय पूरे सम्मान का हकदार है परंतु हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि अदालत के निर्णय का आधार वह पुलिस जांच थीए जिसमें ढ़ेर सारी कमियां और छेद थे। क्या ऐसी जांच के निष्कर्षों को जस का तस स्वीकार कर लिया जाना चाहिए थाजब मुख्य आरोपी या तो मर चुके हैं या फरार हैं, तब क्या पूर्ण सत्य सामने आ सकता है या फिर किसी न किसी को सजा देना इसलिए जरूरी है ताकि बदले की आग को शांत किया जा सके और इससे बेहतर क्या होगा कि वह व्यक्ति मुसलमान हो और कश्मीर का रहनेवाला भी। दरअसलए अफजल के पूरे मुकदमे के पुनरावलोकन की आवश्यकता थी। जांच में कमियां और पुलिस अधिकारियों द्वारा नियमों के उल्लंघन को ध्यान में रखा जाना चाहिए था।
एक प्रश्न यह भी है कि राजीव गांधी और पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारों के साथ अलग व्यवहार क्यों किया जा रहा है पंजाब और तमिलनाडु की विधानसभाओं ने इन लोगों को फांसी दिए जाने के खिलाफ औपचारिक प्रस्ताव पारित किए हैं जबकि ये व्यक्ति हत्याओं में सीधे तौर पर शामिल थे। कुल मिलाकर, बात सिमट जाती है कश्मीर मामले में भारत सरकार के रूख पर और इस तथ्य पर कि मुसलमानों और आतंकवाद को एक दूसरे से जोड़ दिया गया है। इस धारणा को देश की साम्प्रदायिक ताकतों ने जानते.बूझते प्रोत्साहन दिया है। मीडिया के एक हिस्से ने भी समाज को बांटने वाली इस सोच को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कभी.कभी तो ऐसा लगता था कि मीडिया का एक हिस्सा पुलिस का प्रवक्ता है। साम्प्रदायिक शक्तियां समाज  सामूहिक अंतःकरण की ठेकेदार बन बैठी हैं। यह हमारे देश के प्रजातंत्र पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है। क्या एक प्रजातांत्रिक देश, अल्पसंख्यकों को खलनायक बनने दे सकता है क्या उसे कमजोर अल्पसंख्यकों के नागरिक अधिकारों की रक्षा नहीं करनी चाहिए क्या उसे यह सुनिश्चित नहीं करना चाहिए कि अल्पसंख्यकों को भी न्याय मिले
पिछले कुछ वर्षों से कश्मीर में धीरे.धीरे हालात सामान्य हो रहे थे। यद्यपि कश्मीरियों के एक बड़े तबके के मन में अब भी अलगाव का भाव गहरे तक पैठा हुआ है तथापि ऐसा लग रहा था कि यदि प्रजातांत्रीकरण की प्रक्रिया अबाध रूप से चलती रही तो लोग हालात से समझौता कर लेंगे और कश्मीर में शांति स्थापित हो जाएगी। अफजल गुरू की फांसी ने सन् 1984 में मकबूल बट्ट की फांसी की याद को ताजा कर दिया है, जिसके बाद कश्मीर में कई वर्षों तक आतंकवाद का बोलबाला रहा। हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि इस बार ऐसा नहीं होगा। हमें कश्मीर में हो रहे विरोध प्रदर्शनों पर एक संतुलित रवैया अपनाना होगा। कांग्रेस को भाजपा और उसके साथियों की आक्रामक अंधराष्ट्रीयता में सहभागी नहीं बनना चाहिए। भाजपा और उसके साथियों के धार्मिक राष्ट्रवाद के समक्ष घुटने टेकने से कश्मीर के सामान्यीकरण की प्रक्रिया को गहरा धक्का लगेगा। कांग्रेस और भारत सरकार को साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा लादी जा रही विघटनकारी विचारधारा से दूरी बनाकर रखनी चाहिए।.
-राम पुनियानी

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