बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

अफजल गुरू: अंतःकरण की मौत


अफजल गुरू की अर्ध.गुप्त फांसी ;फरवरी 2013 से कुछ लोगों को धक्का लगा है तो कुछ में जश्न का माहौल है। अफजल गुरू को सुबह.सवेरे फांसी पर लटका दिया गया और उसके शव को जेल के प्रांगण में दफन कर दिया गया। अफजल गुरू के परिवार को उसकी दया याचिका खारिज किए जाने के खिलाफ अपील करने का अवसर नहीं मिला। मौत की सजा की उपादेयता संबंधी प्रश्न कई लोगों के अंतःकरण को झकझोर रहे हैं परंतु शायद वे उस सामूहिक अंतःकरण का हिस्सा नहीं हैं, जो सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और बाद में राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका को खारिज किए जाने का आधार बनी। समाज के जिस तबके की सोच यह थी कि अफजल गुरू को फांसी की सजा देना ही गलत था, वह तबका भी शायद देश के सामूहिक अंतःकरण का हिस्सा नहीं था!
गुरू की फांसी के बाद, कश्मीर घाटी में बाहरी दुनिया की खबरों का पूरी तरह टोटा हो गया। अखबार नहीं निकले और टी. वी. चैनलों के प्रसारण पर रोक लगा दी गई। व्यथित लोगों के विरोध प्रदर्शनों के दौरान कुछ मौतें भी हुईं। सही सूचनाओं के अभाव में अफवाहों का बाजार गर्म रहा। हमारे देश के सत्ताधीशों को इस आशंका पर विचार करने की जरूरत है कि खबरों का स्थान अफवाहों द्वारा ले लिए जाने के भयावह परिणाम हो सकते हैं।
इस फांसी ने कई प्रश्नों को जन्म दिया है। फांसी क्यों दी गई और उसके लिए यही समय क्यों चुना गया। गुरू संसद भवन पर 13 दिसंबर 2001 को हुए हमले के आरोपियों में से एक था। इस हमले में 8 सुरक्षाकर्मी और 1 माली मारे गए थे। जांच एजेन्सियां और अदालतें भी इस निष्कर्ष पर पहुंची थीं कि गुरू किसी आतंकवादी संगठन का सदस्य नहीं था और ना ही उसकी हमले में कोई सीधी भूमिका थी। उच्चतम न्यायालय ने भी यह कहा कि गुरू की संलिप्तता का कोई सीधा सुबूत नहीं है। सारे सुबूत, परिस्थितिजन्य थे। उच्चतम न्यायालय सहित तीनों न्यायालयों ने उसे पोटा के अंतर्गत लगे आरोपों  से दोषमुक्त करार दिया था। अदालत ने यह भी कहा था कि गुरू के किसी आतंकी संगठन या समूह का सदस्य होने संबंधी सुबूत मनगंढ़त हैं।
ज्यादा से ज्यादा गुरू पर यह आरोप लगाया जा सकता है कि वह इस अपराध में मददगार था। उसने सीधे कोई अपराध नहीं किया था, उसके विरूद्ध सुबूत, परिस्थितिजन्य थे और पुलिस ने उसकी गिरफ्तारी के समय और स्थान के संबंध में झूठ बोला था। गिरफ्तारी संबंधी कागजात गढ़े गए थे और उससे झूठा इकबालिया बयान उगलवाया गया था। अदालत ने कहा पोटा की धारा 3;2 के अंतर्गत दोषसिद्धी को रद्द किया जाता है। पोटा की धारा 3;5 के अंतर्गत दोषसिद्धी को  भी रद्द किया जाता है क्योंकि अगर इकबालिया बयान को परे रख दिया जाए तो इस बाबत कोई सुबूत नहीं है कि वह किसी भी प्रतिबंधित संगठन का सदस्य था। यहां हम यह भी कहना चाहेंगे कि अगर इकबालिया बयान को सही भी मान लिया जाए, तब भी यह संदेहास्पद है कि उसकी किसी आतंकी समूह या संगठन से संबद्धता सिद्ध होती है। आगे अदालत ने कहा कि चूंकि इस घटना में बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे और इसने पूरे राष्ट्र को झकझोर दिया था इसलिए समाज का सामूहिक अंतःकरण तभी संतुष्ट होगा जब अपराधी को मौत की सजा दी जाए। क्या इसका अर्थ यह है कि सजा सिर्फ इसलिए दी गई ताकि सामूहिक राष्ट्रीय अंतःकरण को संतुष्ट किया जा सके यहां यह कहना  भी समीचीन होगा कि जिसे सामूहिक राष्ट्रीय अंतःकरण बताया जा रहा हैए वहए दरअसल, केवल मध्यम वर्ग के एक हिस्से और कुछ चुनिंदा सामाजिक.राजनैतिक संगठनों का अंतःकरण है। विहिप, बजरंग दल और उनके साथियों द्वारा उत्पादित अंतःकरण पर राष्ट्र के सामूहिक अंतःकरण का लेबल चस्पा करए उसे देश की सामूहिक मांग के रूप में स्वीकार कर लिया गया। यही समूह अब मौत का जश्न मना रहे हैं और फांसी को अपनी जीत बता रहे हैं।
हाल में भारत के राष्ट्रपति को संबोधित अपनी याचिका में सामाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों ने कहा था कि यह तथ्य कि अदालत ने एक ऐसे वकील को एमीकस क्यूरे ;न्यायमित्र नियुक्त कियाए जिस पर अफजल ने कभी  अपना भरोसा नहीं जताया, यह तथ्य कि उसकी गिरफ्तारी से लेकर उसके तथाकथित इकबालिया बयान तक उसे किसी वकील की सहायता उपलब्ध नहीं थी व यह तथ्य कि अदालत ने उससे कहा था कि या तो वह अदालत द्वारा नियुक्त वकील को स्वीकार करे या गवाहों का प्रतिपरीक्षण स्वयं करे.इन सभी तथ्यों का उसकी दया याचिका पर विचार करते समय ध्यान रखा जाना चाहिए।
वह एक आत्मसमर्पित अतिवादी था, उसे एसटीएफ द्वारा घोर शारीरिक यंत्रणा दी गई थी और उसने खुली अदालत में कहा था कि उसने संसद के हमलावरों में से एक . मोहम्मद . को एसटीएफ के अधिकारियों के कहने पर मकान और कार दिलवाई थी। इन सभी तथ्यों के आधार पर उस पर लगे आरोपों की संपूर्ण व सूक्ष्म जांच की जानी चाहिए थी। इस देश के नागरिक तो यह भी नहीं जानते कि ऐसी किसी जांच का आदेश भी जारी किया गया था या नहीं।उच्चतम न्यायालय ने जिन सुबूतों के आधार पर अपना निर्णय सुनाया वे सुबूत पुलिस ने संदेहास्पद तरीकों से तैयार किए थे, जिसके लिए पुलिस को अदालत ने फटकारा भी था। दूसरे पक्ष का तर्क यह था कि अगर गुरू को फांसी नहीं दी गई तो यह उन लोगों का अपमान होगा जिन्होंने संसद भवन की रक्षा करते हुए अपनी जानें गवांई।
 उच्चतम न्यायालय पूरे सम्मान का हकदार है परंतु हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि अदालत के निर्णय का आधार वह पुलिस जांच थीए जिसमें ढ़ेर सारी कमियां और छेद थे। क्या ऐसी जांच के निष्कर्षों को जस का तस स्वीकार कर लिया जाना चाहिए थाजब मुख्य आरोपी या तो मर चुके हैं या फरार हैं, तब क्या पूर्ण सत्य सामने आ सकता है या फिर किसी न किसी को सजा देना इसलिए जरूरी है ताकि बदले की आग को शांत किया जा सके और इससे बेहतर क्या होगा कि वह व्यक्ति मुसलमान हो और कश्मीर का रहनेवाला भी। दरअसलए अफजल के पूरे मुकदमे के पुनरावलोकन की आवश्यकता थी। जांच में कमियां और पुलिस अधिकारियों द्वारा नियमों के उल्लंघन को ध्यान में रखा जाना चाहिए था।
एक प्रश्न यह भी है कि राजीव गांधी और पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारों के साथ अलग व्यवहार क्यों किया जा रहा है पंजाब और तमिलनाडु की विधानसभाओं ने इन लोगों को फांसी दिए जाने के खिलाफ औपचारिक प्रस्ताव पारित किए हैं जबकि ये व्यक्ति हत्याओं में सीधे तौर पर शामिल थे। कुल मिलाकर, बात सिमट जाती है कश्मीर मामले में भारत सरकार के रूख पर और इस तथ्य पर कि मुसलमानों और आतंकवाद को एक दूसरे से जोड़ दिया गया है। इस धारणा को देश की साम्प्रदायिक ताकतों ने जानते.बूझते प्रोत्साहन दिया है। मीडिया के एक हिस्से ने भी समाज को बांटने वाली इस सोच को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कभी.कभी तो ऐसा लगता था कि मीडिया का एक हिस्सा पुलिस का प्रवक्ता है। साम्प्रदायिक शक्तियां समाज  सामूहिक अंतःकरण की ठेकेदार बन बैठी हैं। यह हमारे देश के प्रजातंत्र पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है। क्या एक प्रजातांत्रिक देश, अल्पसंख्यकों को खलनायक बनने दे सकता है क्या उसे कमजोर अल्पसंख्यकों के नागरिक अधिकारों की रक्षा नहीं करनी चाहिए क्या उसे यह सुनिश्चित नहीं करना चाहिए कि अल्पसंख्यकों को भी न्याय मिले
पिछले कुछ वर्षों से कश्मीर में धीरे.धीरे हालात सामान्य हो रहे थे। यद्यपि कश्मीरियों के एक बड़े तबके के मन में अब भी अलगाव का भाव गहरे तक पैठा हुआ है तथापि ऐसा लग रहा था कि यदि प्रजातांत्रीकरण की प्रक्रिया अबाध रूप से चलती रही तो लोग हालात से समझौता कर लेंगे और कश्मीर में शांति स्थापित हो जाएगी। अफजल गुरू की फांसी ने सन् 1984 में मकबूल बट्ट की फांसी की याद को ताजा कर दिया है, जिसके बाद कश्मीर में कई वर्षों तक आतंकवाद का बोलबाला रहा। हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि इस बार ऐसा नहीं होगा। हमें कश्मीर में हो रहे विरोध प्रदर्शनों पर एक संतुलित रवैया अपनाना होगा। कांग्रेस को भाजपा और उसके साथियों की आक्रामक अंधराष्ट्रीयता में सहभागी नहीं बनना चाहिए। भाजपा और उसके साथियों के धार्मिक राष्ट्रवाद के समक्ष घुटने टेकने से कश्मीर के सामान्यीकरण की प्रक्रिया को गहरा धक्का लगेगा। कांग्रेस और भारत सरकार को साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा लादी जा रही विघटनकारी विचारधारा से दूरी बनाकर रखनी चाहिए।.
-राम पुनियानी

कोई टिप्पणी नहीं: