गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

अफजल गुरू की फांसी कांग्रेस हित में या देश हित में?-3

शेख अब्दुल्ला की 8 सितम्बर 1982 में मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र फारूक अब्दुल्ला कश्मीर के मुख्यमंत्री बने परन्तु कांग्रेस के साथ उनके रिश्ते अधिक दिनों तक मधुर नहीं रहे और इन्दिरा गांधी ने फारूक अब्दुल्ला की सरकार बर्खास्त कर उन्हीं के बहनोई जी0एम0 शाह को कुर्सी सौंप दी। जिनके कार्यकाल में कश्मीर में राज्यपाल बनकर गए जगमोहन ने कश्मीर की जनता के साथ ऐसा क्रूर व्यवहार किया कि कश्मीरियों की मन्द पड़ चुकी अलगावादी सोच को पुनः जीवित कर दिया। जब हालात बद से बदतर होने लगे तो भारत सरकार को पुनः राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा और 1984 से 1989 तक का जगमोहन का कार्यकाल कश्मीर समस्या के इतिहास में काले अक्षरों में लिखा जाने के योग्य सिद्ध हो गया। जगमोहन के कार्यकाल में ही मोलवी मीर वायज़ फारूक चेयरमैन अवामी एक्शन कमेटी की हत्या अलगाववादी सोच के अन्तर्गत आतंकवादी मो0 अय्यूबदार द्वारा 21 मई 1990 में कर दी गई। मौलवी फारूक कश्मीर के वह उदारवादी नेता थे जो पाकिस्तानियों और उग्रवादियों के राह के कांटा थे। कश्मीरियों पर अत्याचार यहीं पर समाप्त नहीं हुआ मौलवी मीर वायज़ फारूक के अन्तिम संस्कार के लिए उमड़ी हजारों की भीड़ पर सी0आर0पी0एफ0 ने अंधाधुन्ध गोलियाँ यह कहकर चला दी कि भीड़ द्वारा उन पर हमला किया गया था इस गोलीकाण्ड से कई निर्दोष तो मारे ही गए साथ में मौलवी मीर वायज़ फारूक के जनाजे पर भी कई गोलियाँ लगी।
    यह घटना जिस समय घटित हुई उस समय देश के प्रधानमंत्री बी0पी0 सिंह थे और राज्यपाल जगमोहन थे। कश्मीर की जनता अपने प्रिय धार्मिक नेता के ग़म और उनके ऊपर शासक जगमोहन की दमनात्मक  कार्यवाही से इतनी विचलित हो गई कि फिर शांति के पथ पर कश्मीर नहीं लौट पाया।
    इस घटना से पूर्व सन 1984 में कश्मीर के अलगाववादी नेता मकबूल बट को कैद मंे डाल दिया गया और उन पर चलाए गए अभियोग के उपरान्त उन्हें फाँसी की सजा सुना दी गई। मकबूल बट की फाँसी लम्बित ही थी कि इंग्लैण्ड में भारतीय राजनयिक रवीन्द्र महात्रे का अपहरण जे.के.एल.एफ. संस्था द्वारा यह कहते हुए कर लिया गया कि उनके लीडर मकबूल बट को आजाद करो तो राजनयिक को छोड़ा जाएगा। भारत सरकार द्वारा आतंकवादी संगठन की माँग न माने जाने के उपरान्त भारतीय राजनयिक की 6 फरवरी 1984 को हत्या कर दी गई। कश्मीरियों के इस कृत्य से आक्रोशित भारतीय प्रधानमंत्री ने 10 फरवरी 1984 को मकबूल बट की दया याचना तत्कालीन राष्ट्रपति से खारिज कराकर तिहाड़ जेल में उसी स्थान पर फाँसी पर लटका दिया गया जहाँ 9 फरवरी 2013 को अफजल गुरू को फाँसी दी गई।
    1984 में मकबूल बट की फाँसी से उत्तेजित कश्मीरियों की प्रतिक्रियाओं को मजबूत शासकों में गिनी जाने वाली इन्दिरा गांधी ने उस समय भले ही दबाने में सफलता प्राप्त कर ली थी परन्तु 90 दशक के प्रारम्भ में आतंकवाद का जो ज्वार कश्मीर में उमड़ा था वह अब अफजल गुरू की फाँसी के बाद, कितने वर्षों के उपरान्त और किस रूप में उभरकर सामने आएगा इसका अनुमान भलीभाँति लगाया जा सकता है।
    जहाँ तक अफजल गुरू के चरित्र का सम्बन्ध है तो अफजल गुरू की फाँसी से पूर्व कम ही लोगों को यह बात पता थी कि वह एक आत्मसमर्पित आतंकवादी था। वर्ष 1968 में अफजल गुरू का जन्म कश्मीर के झेलम नदी के किनारे बसे जिला बारामूला में हुआ था और उसके पिता हबीब उल्ला एक ट्रांसपोर्ट के साथ-साथ टिम्बर के व्यवसायी थे। मुहम्मद अफजल अपने चार भाइयों में दूसरे नम्बर पर था। अपनी शिक्षा के प्रारम्भ से ही वह एक उदीयमान छात्र था और उसके पिता के मन में उसे डाॅक्टर बनाने की अभिलाषा थी और बचपन से उसे डाॅक्टर कहकर पुकारते थे। परन्तु जब उसकी आयु मात्र 10 वर्ष थी तो पिता का साया उसके सिर से उठ गया। परिवार का खर्च चलाने की जिम्मेदारी अफजल के बड़े भाई एजाज के कन्धों पर आ गई। एजाज ने अफजल की शिक्षा प्रभावित नहीं होने दी और उसने हाईस्कूल व इण्टर की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के पश्चात अपने पिता की मनोकामना पूरी करने के लिए प्री0 मेडिकल टेस्ट में भाग लिया और सफलता प्राप्त की। मेडिकल में उसकी रुचि की प्रेरणा उसके रिश्ते के भाई डाॅ0 अब्दुल अहद गुरू से मिली। जो कश्मीर के जाने माने गैस्ट्रोइन्ट्रो लाजिस्टर थे जिनकी हत्या 1994 में आतंकवादियों ने कर दी थी। अफजल गुरू ने मेडिकल की पढ़ाई का प्रथम वर्ष अच्छे अंको से उत्तीर्ण किया। परन्तु उसी समय कश्मीर प्रान्त में भारतीय सेना के कुछ सैनिकों द्वारा कश्मीरी लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना से वह विचलित हो गया और मेडिकल की पढ़ाई छोड़कर झेलम नदी के पार आजाद कश्मीर में चल रहे आतंकवादी शिविर में उसने दाखिला ले लिया। परन्तु शिविर में  इस्लाम के नाम पर जिस प्रकार हिंसा और भारत के विरुद्ध युद्ध की दीक्षा दी जा रही थी उससे अफजल गुरू सन्तुष्ट न हो सका और उसने अपने पुराने जीवन में वापस लौटने का निर्णय ले लिया, इसके लिए उसने सर्वप्रथम रा के आधिकारियों से सम्पर्क साधा तथा वर्ष 1993 में भारतीय बार्डर पर समर्पण कर दिया।

 -तारिक खान
मो .9455804309

3 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

बहुत अच्‍छे मित्र सही समय पर सही बात की है।

www.kanoonisalah.in

बेनामी ने कहा…

http://www.kanoonisalah.in/

Ratan singh shekhawat ने कहा…

जो भी कर रही है आपकी सेकुलर कांग्रेस ही कर रही है|