शुक्रवार, 1 मार्च 2013

अफजल गुरू की फांसी कांग्रेस हित में या देश हित में?-4

अफजल गुरू ने वतन वापसी पर अपना कैरियर फिर से बनाने के लिए सोचा और इस क्रम में उसे सहायता उसके रिश्ते के भाई शौकत गुरू व देहली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सैय्यद अब्दुल रहमान जीलानी से मिली। अफजल ने पहले दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और अब उसका लक्ष्य आई0ए0एस0 प्रतियोगिता में सफलता प्राप्त करने का था। जिसको पाने के लिए उसने कठोर परिश्रम दिल्ली में रहकर प्रारम्भ कर दिया इसी बीच उसका विवाह हो गया और वर्ष 1999 में वह एक बच्चे का बाप भी बन गया। परिवार का आर्थिक बोझ उठाने के लिए उसने दिल्ली व कश्मीर में शल्य चिकित्सा सामग्री की सप्लाई का व्यवसाय प्रारम्भ किया। चूँकि मेडिकल लाइन से वह काफी परिचित था और कई सहपाठी चिकित्सक बन चुके थे, उसका कारोबार चल निकला था। परन्तु दुर्भाग्य ने उसका पीछा नहीं छोड़ा और पहले भारतीय सेना की ओर से तथा बाद में एस0टी0एफ0 की ओर से उस पर इस बात दबाव डाला जाने लगा कि वह उनका मुखबिर बन कर उनके लिए काम करे और यदि वह ऐसा नहीं करता है तो फिर उसका एनकाउन्टर कर देंगे। एस0टी0एफ0 द्वारा उससे कई बार पूछताछ के नाम पर उठाया गया और एक-एक लाख रूपये की वसूली करके छोड़ा गया। विवश होकर एस0टी0एफ0 के एक अन्य मुखबिर तारिक की सलाह पर वह मुखबिरी को राजी हो गया। बताते हैं कि उसकी मुखबरी पर कई आतंकवादी गिरफ्तार किए गए और कई मुठभेड़ में मारे गए। एस0टी0एफ0 के लोगों को अफजल गुरू की हर गतिविधि का पता रहता था। इस बीच 13 दिसम्बर 2001 को संसद भवन पर हमला हेा गया। एक महिला सुरक्षा कर्मी सहित सात सुरक्षा कर्मी व पाँच आतंकवादी पुलिस की क्रास फायरिंग में ढेर हो गए। देश के इतिहास में सबसे बड़ी आतंकवादी घटनाओं में एक इस घटना ने सभी का दिल झकझोर दिया। दिल्ली में हर व्यक्ति भयभीत था अफजल गुरू इसलिए भी अधिक भयभीत था कि वह आतंकवादियों और एस0टी0एफ0 के बीच मुखबिर के रूप में एक कड़ी था। अतः उसने कश्मीर वापस हो जाने का निर्णय लिया।  परन्तु अफजल गुरू का भय सही निकला और उसे कश्मीर से गिरफ्तार कर लिया गया, साथ ही उसके रिश्ते के भाई शौकत गुरू व उसकी पत्नी अफसा नवजोत जो कि सिख धर्म से इस्लाम धर्म स्वीकार करने के उपरान्त शौकत की पत्नी बनी थी को श्री नगर से गिरफ्तार कर लिया गया।
    उधर दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एस0आर0 गिलानी भी गिरफ्तार हो गए। चारो अभियुक्तों को गिरफ्तार करके दिल्ली सरकार ने अपनी सफलता की कहानी नेशनल चैनलों व समाचार पत्रों के माध्यम से पूरे राष्ट्र को सुनाई और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एस0ए0आर0 गिलानी को दिल्ली में चल रही गतिविधियों का मास्टर माइन्ड घोषित कर दिया। राष्ट्र के विरुद्ध युद्ध तथा पोटा के तहत चार्जशीट लगाते हुए निचली अदालत (एफ0टी0सी0) त्वरित न्यायालय में अभियोग चला परन्तु इसी दौरान प्रोफेसर गिलानी के उज्ज्वल चरित्र की दुहाई देकर शिक्षा शास्त्रियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं एवं समाजसेवियों ने मैदान में उतरकर जोरदार प्रदर्शन प्रारम्भ कर दिया। इसका प्रभाव अदालत पर भी पड़ना स्वाभाविक था और एस0टी0एफ0 व दिल्ली स्पेशल ब्राँच पुलिस ने अपने मीडिया के साथियों द्वारा जो दबाव अदालत पर बनाया था वह दबाव कम होना प्रारम्भ हो गया। इसी बीच जी0टी0वी0 ने 13 दिसम्बर के नाम से डाक्यूमेन्टरी भी बना डाली जिसकी प्रशंसा खुलकर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी व गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने की। फिल्म पर प्रतिबन्ध लगाने के उद्देश्य से कुछ समाज सेवियांे ने याचिका ाल दिया जिसे न्यायालय ने यह कहकर खारिज कर दी कि किसी पब्लिसिटी से न्याय प्रभावित नहीं होता।
    त्वरित न्यायालय ने प्रोफेसर गिलानी, शौकत गुरू व अफजल गुरू को फाँसी की तथा अफसा को पाँच साल की सजा सुना दी। बाद में उच्च न्यायालय दिल्ली ने प्रोफेसर गिलानी व अफसा को दोषमुक्त करार देते हुए बरी कर दिया। परन्तु अफजल गुरू को फाँसी की सजा बरकरार रखने के साथ-साथ उसके भाई शौकत गुरू को उम्रकैद की सजा सुना दी। इसके विरुद्ध अभियुक्तों ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जहाँ 4 अगस्त 2005 को दिए गए निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने शौकत गुरू की सजा को घटाकर दस साल कर दी परन्तु अफजल गुरू की सजा को बढ़ाते हुए तीन-तीन अभियोग में उम्र कैद व दो अभियोग में फाँसी की सजा सुना दी।
 -तारिक खान
मो .9455804309

2 टिप्‍पणियां:

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

फाँसी का निर्णय उचित था,इससे फायदा देश का हो या कोंग्रेस का मेरे ख्याल से या बात बहुत महत्व पूर्ण नही है,,,,

RECENT POST: पिता.

Rajendra Kumar ने कहा…

धीरेन्द्र जी से मैं पूर्णरूप से सहमत हूँ,जैसे को तैसा.