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रविवार, 6 नवंबर 2016

पिटाई की सरकार है, बागों में बहार है, मोदी साहब की सरकार है

'बागों में बहार है, मोदी साहब की सरकार है'. वास्तव में बहार है नजीब की माँ तथा छात्रों को अभी-अभी इंडिया गेट पर दिल्ली पुलिस द्वारा पीटा गया है और बसों में भरकर कहीं ले जाया जा रहा है. खबर के मुताबिक नजीब की मां को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। चीन और पकिस्तान के सामने सरकार द्वारा शौर्य प्रदर्शन के बाद अब सरकार की नाक की बाल पुलिस दिल्ली पुलिस जो नजीब को पता लगाने में असमर्थ साबित हो चुकी है. वही पुलिस इंडिया गेट पर नजीब की माँ तथा छात्रों पर शौर्य प्रदर्शन कर रही थी.
              14 अक्टूबर से जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के एमएससी बायोटेक्नोलॉजी के फर्स्ट इयर के छात्र नजीब गायब हैं और मुख्य बात यह है कि गायब होने से पहले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के छात्रों ने उनकी पिटाई कर दी थी. दिल्ली पुलिस मुस्लिम नवजवानों को प्रताड़ित करने का काम काफी दिनों से कर रही है और इसका स्पेशल ऑपरेशन सेल मुस्लिम नवजवानों को आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तार करना और तरह-तरह के कहानी किस्से गढ़ने का आदि रहा तो वहीँ दिल्ली पुलिस जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय छात्र संघ के तत्कालीन अध्यक्ष कन्हैया कुमार को फर्जी राष्ट्रद्रोह के मामले में गिरफ्तार करना और फिर उसी की शाह पर न्यायलय के अन्दर गुंडों द्वारा पिटाई उनका बहुचर्चित कारनामा रहा है. दिल्ली पुलिस नागपुर मुख्यालय पर आश्रित केंद्र सरकार द्वारा संचालित पुलिस है. वर्तमान में यह पुलिस दिल्ली के मुख्यमंत्री को भी हिरासत में रख चुकी है. भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में मुख्यमंत्री की हिरासत का शायद यह पहला मामला था. केंद्र सरकार के राजनीतिक विरोधियों को विभिन्न केसेस में फंसाने व उत्पीडन करने का काम करने में ऐसी गुलाम पुलिस शायद कहीं हो.
          भोपाल एनकाउंटर, बंसल परिवार को सीबीआई द्वारा आत्महत्या करने के लिए मजबूर करना और फिर एनडीटीवी पर एक दिवसीय प्रतिबन्ध लगाने की कार्यवाई अब यह साबित करने लगी है कि लोकतंत्र खतरे में है और भेडिये का मुखौटा धीरे-धीरे उतर रहा है तो वहीँ भारत के मुख्य न्यायधीश अपनी दर्द भरी आवाज़ में सरकार के सामने क्या न्यायालयों में ताला लगा दोगे. न्यायालयों में न्यायधीशों की नीतियां लगभग बंद सी हैं और स्तिथि यह हो रही है कि आप न्याय नहीं पा सकते हैं. 
वहीँ, नागरिक संगठन 'इन्साफ' के नेता अमीक जामेई ने कहा है कि केंद्र सरकार अघोषित रूप से आपातकाल की तरफ बढ़ रही है.

सुमन 

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

उमर खालिद से पूछताछ करने के लिए दिल्ली पुलिस को फिर पढना पड़ेगा

सबाल्टर्न अध्ययन और दक्षिण एशिया में विकास यात्रा के सिद्धांत को दिल्ली पुलिस द्वारा की जा रही उमर खालिद से पूछ ताछ में यह सिद्धांत के तहत उन्होंने कार्यक्रम कराने की मंशा जाहिर की. दिल्ली पुलिस और उमर खालिद का विरोध करने वाली मीडिया व नागपुरी मुख्यालय के प्रबंध कर्तागण इस सब्जेक्ट के बारे में कोई जानकारी नहीं रखते हैं. जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय दुनिया का समाजशास्त्र का एक अद्भुद लोकतान्त्रिक धर्म निरपेक्ष विश्वविद्यालय है. 
दिल्ली पुलिस के विवेचना अधिकारी उमर खालिद से पूछताछ कर रहे हैं जिनका मेंटल स्टेटस उमर खालिद से बहुत ही कम है. उसके उत्तरों को सुनकर वह कुछ समझ ही नहीं पा रहे हैं. उसी स्तर की हमारे देश की मानव संसाधन विकास मंत्री हैं वह नाटकीय भाषा तो दे सकती है. श्रोता या दर्शक मंत्रमुग्ध तो हो सकता है लेकिन समाजशास्त्र के गहराईयों तक उनकी सोच नहीं जा सकती है. 
हमारे देश के गृह मंत्री का भी मानसिक स्तर उसी तरह का है और उनकी स्तिथि यह हो गयी है कि रजिया फंस गयी गुंडों के बीच. गुंडों का अर्थ यहाँ यह है कि असली गुंडे तो सरकार में हो गए और उन गुंडों ने पढ़े-लिखे लोगों को गुंडा साबित कर दिया है. यही काम हमारे गृह मंत्री राजनाथ सिंह कर रहे हैं कि पढ़े लिखे देशभक्तों को देशद्रोही साबित करने में लगे हुए हैं और देशद्रोहियों को देशभक्त की उपाधि देकर भारत रत्न दे चुके हैं.
                               विकिपीडिया के अनुसार सबाल्टर्न इतिहासकारों ने यह धारणा प्रस्तुत की कि औपनिवेशिक दासता से ग्रस्त या उबर चुके राष्ट्र में राष्ट्रवादी इतिहास का लिखा जाना जातीय गौरव का प्रतीक बन जाता है। राष्ट्रवादी इतिहासकारों द्वारा उपनिवेश विरोधी चेतना के निर्माण हेतु समृद्ध विरासत को पुनर्जीवित करने का ही प्रयास किया जाता है। इस विचारधारा ने जातीयता और राष्ट्र की मूलभूत अवधारणा पर प्रश्नचिह्न लगा दिया। इन्होंने समस्त राष्ट्रवादी इतिहास लेखन को अभिजनवादी कहकर अपर्याप्त घोषित कर दिया, साथ ही स्वातंत्र्योत्तर भारत के इतिहासकारों के समक्ष चुनौती रखी कि वे औपनिवेशिक भारत और स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास को सबाल्टर्न इतिहास के रूप में अर्थात् उस साधारण जनता के दृष्टिकोण से प्रस्तुत करें जिनकी राष्ट्रीय चेतना और प्रतिरोध का नेतृत्व हमेशा अभिजात प्रभावशाली राष्ट्रीय नेताओं द्वारा किया गया।
सत्ता में काबिज लोग नागपुर से हिटलर की विचारधारा से ट्रेनिंग लेकर आये हुए लोग हैं. समाज कैसे विकसित होता है और बनता है. देश की एकता और अखंडता कैसे बनाई रखी जाती है उससे अनभिज्ञ हैं, यही संकट है जवाहर लाल नेहरु विश्व विद्यालय के संकट का. आँख के अंधे, ज्ञान के बहरे लोगों को वहां अपराध दिखाई देता है. जबकि वास्तविकता यह है कि वहां अपराध है ही नहीं अपितु एक तार्किक बहस है. तार्किक बहस को रोकने का मतलंब है की समाज की धारा को रोक देना, उसके निर्माण को रोक देना और कुंए का मेढक बन जाना. यह लोग भारत को कुंए का मेढक बना देना चाहते हैं. इसी के लिए यह प्रयत्नशील हैं. अगर दुनिया में कहीं ई
श्वर है तो इनको बुद्धि दे.

सुमन 

सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

मोदी का मुखौटा उखड रहा है

यः स्वभावो हि यस्यास्ति स नित्यं दुरतिक्रमः।
श्वा यदि क्रियते राजा स किं नाश्रातयुपानहम् ?

बनारस व लखनऊ में नरेन्द्र मोदी का जनता के विभिन्न तबकों में काले झंडों व मोदी गो बेक के नारों से स्वागत किया. बनारस में कई बार लाठी चार्ज भी करना पड़ा. वाराणसी में एक ओर पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के 100वें दीक्षांत समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शिरकत कर रहे थें तो वहीं दुसरी ओर बीएचयू गेट के बाहर पुलिस ने बल प्रयोगकर और लाठीचार्ज कर विरोध कर रहे दलित संगठनों और छात्रों पर काबू पाने की कोशिश में जुटी थी. हजरतगंज लखनऊ में छात्रों ने काले झंडे दिखाए. नरेन्द्र मोदी की सरकार बने हुए अभी दो वर्ष भी नहीं पूरे हुए हैं कि जनता के विभिन्न तबकों द्वारा जगह-जगह पर उनके खिलाफ आक्रोश प्रदर्शन तेजी से हो रहा है. अच्छे दिन लाने का वादा करने वाले मोदी की एक मात्र उपलब्धि यह है कि सब्सिडी कटौती और कॉर्पोरेट  सेक्टर को लाखों-लाख करोड़ रुपये का फायदा पहुँचाना. ऊपर लिखा गया श्लोक अब उनके ऊपर ठीक तरह से लागू हो रहा है. हैदराबाद विश्वविद्यालय से लेकर जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय तक छात्रों का आन्दोलन चल रहा है. इन आन्दोलनों को पैदा करने का काम अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् का है. शासन में आने के बाद विभिन्न विचारों के मानने वाले लोगों को देशद्रोही साबित करके अपमानित करने का जो तरीका इस सरकार ने अपनाया है वही उसके संकट का कारण है. 
जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में उद्गम संकट को पैदा करने में गृह मंत्री राजनाथ सिंह, दिल्ली पुलिस कमिश्नर बस्सी तथा अखिल विद्यार्थी परिषद् का मुख्य हाथ है. इतनी दुर्दशा होने के बाद भी दिल्ली पुलिस कमिश्नर बीएस बस्सी कहते हैं कि देशद्रोह का आरोप झेल रहे जेएनयू छात्रों को अगर लगता है कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया तो उन्हें सबूत देने होंगे। जबकि अगर उन्होंने देशद्रोह किया है तो उसको साबित करने का काम पुलिस को करना है. पुलिस के पास सबूत न होने के बावजूद कन्हैया कुमार को कारागार में निरुद्ध कराये हुए हैं.
इसी सन्दर्भ में हितोपदेश के ऊपर लिखे श्लोक का अर्थ यह है कि जिसका जैसा स्वभाव है, वह सर्वदा छूटना कठिन है, जैसे यदि कुत्ते को राजा कर दिया जाए, तो क्या वह जूते को नहीं चबाएगा ?
शासक दल एक गणवेश, एक विचार को लाठी से डरा धमका कर मनवाने के लिए प्रयत्नशील है जिसके विरोध में समाज के विभिन्न तबके विरोध कर रहे हैं.  

सुमन 
लो क सं घ र्ष !  

बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

बस्सी साहब ! खूब बाँट रहे हो कन्हैया की अपील

आज पटियाला हाउस में दिल्ली पुलिस कमिश्नर बी एस बस्सी ने कन्हैया, उसके वकीलों व जेएनयू के टीचर्स की सुरक्षा की गारंटी ली थी लेकिन दिल्ली पुलिस कमिश्नर की गारंटी या जमानत पूरी तरह से असफल हुई. जवाहर लाल नेहरु विश्व विद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार की पिटाई तो हुई ही साथ में पत्रकारों की भी पिटाई हो गयी. माननीय उच्चतम न्यायलय द्वारा पटियाला हाउस भेजी गयी टीम पर भी पानी की बोतल, छोटे पत्थर फेंके गए तथा पाकिस्तानी दलाल कहकर नारेबाजी की गयी और दिल्ली पुलिस मूक दर्शक भूमिका के अतिरिक्त कुछ नहीं बनी. कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी गृह मंत्री व दिल्ली पुलिस कमिश्नर के षड़यंत्र का परिणाम थी. अभी तक लखनऊ, फैजाबाद से लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में आतंकवाद के नाम पर देश द्रोह के मुक़दमे के तहत बेगुनाह मुस्लिम नवजवानों को सोची-समझी रणनीति के तहत संघी वकीलों द्वारा पिटवाना और न्यायलय परिसर में कथित अभियुक्तों व पैरोकारो की पिटाई का कार्य होता था.जिससे अभियुक्त गण अपने ऊपर लगाये गए आरोपों के खिलाफ अपनी पैरवी न कर सकें. अब जब माननीय उच्चतम न्यायलय की नाक के नीचे इस तरह के कार्यक्रम को पुलिस ने दोहराया तो उसकी जवाबदेही न्यायलय में देनी पड़ रही है. 
कन्हैया कुमार को देश द्रोह के मामले में गिरफ्तार किया गया था और दो बार पुलिस कस्टडी रिमांड लिया गया. रिमांड पूछताछ के लिए लिया गया था लेकिन अब कन्हैया कुमार से एक अपील लिखवाकर पुलिस कमिश्नर बस्सी मीडिया में प्रसारित करवा रहे हैं. क्या पुलिस कमिश्नर का यही काम है. जानबूझकर कन्हैया कुमार को देश द्रोह के वाद में गिरफ्तार किया गया गृह मंत्री ने हाफिज सईद तक की हवाई उड़ान की. वहीँ, भाजपा सांसद महेश गिरी जो गंभीर धाराओं का अभियुक्त है उसने कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी. 
दिल्ली पुलिस सीधे-सीधे केंद्र सरकार के अधीन है और उन्ही के दिशा निर्देशों के ऊपर कार्य करती है. कन्हैया कुमार के मामले में केंद्र सरकार व दिल्ली पुलिस कमिश्नर दोनों बेनकाब हुए हैं.  पटियाला हाउस कोर्ट ने सुनवाई के बाद कन्हैया कुमार को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है. अब वह दो मार्च तक जेल में रहेगा. हालांकि, पटियाला हाउस कोर्ट परिसर से कन्हैया को ले जाने वाले रास्ते में करीब 100 वकील खड़े थे और नारेबाजी कर रहे थे. स्थिति के मद्देनजर पुलिस को कन्हैया को पटियाला हाउस कोर्ट के पिछले गेट से कन्हैया को ले जाना पड़ा. बस्सी साहब को इन बातों से जरा सा भी शर्मिंदगी महसूस नहीं हुई होगी.
अगर केंद्र सरकार में जरा सा भी शर्म है तो ऐसे अक्षम पुलिस कमिश्नर को बर्खास्त करें.

सुमन 

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

शर्म तुम्हे तो आती होगी...

पटियाला कोर्ट के सामने बस्सी की कानून व्यवस्था
दिल्ली देश की राजधानी के साथ दुनिया में लोकतांत्रिक देशों में एक प्रमुख शहर है. यहाँ की छोटी बड़ी घटनाओं के ऊपर विश्व की नजर रहती है. दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार द्वारा नियंत्रित कानून व्यवस्था स्थापित करने वाला बल है. कल जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को पटियाला कोर्ट में उपस्थित कराने में दिल्ली पुलिस नाकाम रही. बड़े-बड़े दावे करने वाले पुलिस कमिश्नर बस्सी व उनकी पुलिस ने संसद मार्ग स्तिथ थाने में रिमांड के लिए सम्बंधित मजिस्टेट को बुला कर लेना पड़ा. पटियाला हाउस के अन्दर व बाहर केंद्र में शासित सत्तारूढ़ दल के विधायक से लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् कार्यकर्त्ता व उनसे सम्बंधित अधिवक्ता जेएनयू के प्रोफेसर्स, छात्रों, पत्रकारों की पिटाई अभियान में लगे हुए थे. वहीँ, कन्हैया कुमार के समर्थकों की भी पिटाई की गयी. जिससे वह लोग कन्हैया कुमार की पैरवी न कर सके. पुलिस की सोची समझी रणनीति के तहत इस तरह की कार्यवाईयां होती हैं. कुछ वर्षों पुर्व लखनऊ में भी गिरफ्तार लोगों की पैरवी न करने देने के लिए पुलिस, एटीएस, एसटीऍफ़ व कथित हिन्दुवत्ववादी अधिवक्ताओं व उनके कार्यकर्ताओं ने मुहम्मद शुऐब एडवोकेट की यह कहते हुए पिटाई कोर्ट रूम में कर दी कि यह पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे. 
             देश में दंगा कराने के लिए 5 जनवरी 2012 को कर्नाटक की सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और श्रीराम सेना के आधा दर्जन लोगों को पाकिस्तानी झंडा फहराकर दंगा भड़काने की कोशिश के आरोप में गिरफ्तार किया है. दूसरे दिन झंडा फहराए जाने के खिलाफ बजरंग दल और श्रीराम सेना समेत अनेक संगठनों ने बंद का आव्हान किया था. इधर श्रीराम सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रमोद मुतालिक ने कहा है कि गिरफ्तार किए गए लोग राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सदस्य हैं.
इस तरह की घटनाएं देश के अन्दर कानून व्यवस्था को खराब करने के लिए संघी गिरोह करता रहता है. सर्व विदित है कि यह सारी घटनाएं बराबर समाचारों में आती रहती हैं. क्या दिल्ली पुलिस कमिश्नर बस्सी को यह चीजें नहीं दिखाई देती हैं. जवाहर लाल नेहरु विश्व विद्यालय के प्रकरण से दिल्ली पुलिस की भूमिका नागपुर मुख्यालय द्वारा संचालित एक अनुवांशिक संगठन जैसी हो गयी है. यदि जरा सा भी शर्म दिल्ली पुलिस में बाकी है तो उसे तुरंत पटियाला कोर्ट के अन्दर व बाहर हुई मारपीट के ऊपर कार्यवाई करनी चाहिए लेकिन कहीं नथुनी उतर न जाए इसलिए बड़ी शर्मिंदगी पूर्ण स्तिथि में भी आकर दिल्ली पुलिस कार्यवाई करने की स्तिथि में नहीं है. वहीँ, केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने बयान दिया कि जेएनयू में चल रहे विवाद के पीछे 26/11 के मुख्य आरोपी हाफिज़ सईद का हाथ है कहकर जेएनयू परिसर की घटना को नयी धार देने की कोशिश की. क्या बस्सी साहब में दम है कि इस तरह की आधारहीन बयानों के लिए कोई भी कार्यवाई करने के लिए केंद्र सरकार से अनुमति मांगेंगे. 
महात्मा गाँधी की हत्या से लेकर हाफिज सईद से मिलने जाने वाले लोगों की राष्ट्रभक्ति व देशभक्ति की उनकी परिभाषा क्या है. जम्मू एंड कश्मीर अलगाववादी नेता सज्जाद लोन को अपने कोटे से मिनिस्टर बनाने वाले लोग दिल्ली में ही रहते हैं. जम्मू एंड कश्मीर के भारतीय जनता पार्टी के उमीदवारों की लिस्ट उठाकर अगर बस्सी साहब देखें तो अधिकांश प्रत्याशी अलगाव वादी नेता हैं. क्या उनके आकाओं ने निवास स्थान दिल्ली में नहीं हैं, देखने की जरूरत है. 
भारतीय नौकरशाही पूरी तरह से सत्तारूढ़ दल के एजेंट के रूप में काम करने की आदत डाल ली है और सेवानिवृत्त होने के बाद शेष जीवन मलाई खाने के लिए इस तरह के कार्य करना उनकी मजबूरी है. शर्म और हया इनके चेहरे पर नहीं है. 

सुमन

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

नकली राष्ट्रभक्त चूहे भी खायेंगे देश भक्ति का गीत भी गायेंगे

अफजल गुरु की फांसी का सबसे ज्यादा जबरदस्त विरोध जम्मू एंड कश्मीर की पीडीपी नेता महबूबा मुफ़्ती ने एक राजनैतिक कदम बताया था और जबरदस्त विरोध किया था. वहीँ, जम्मू एंड कश्मीर विधानसभा ने अफजल गुरु का शव सौंपने की मांग करते हुए प्रस्ताव पारित किया गया था लेकिन उसे भी नजरअंदाज कर दिया गया था। उन्हें लगता है कि देश में दो तरह के कानून चल रहे हैं। एक देश के अन्य हिस्सों के लिए है और दूसरा अलग सिर्फ कश्मीर के लिए।
         उसी महबूबा मुफ़्ती की पार्टी के साथ भारतीय जनता पार्टी ने जम्मू एंड कश्मीर गठबंधन सरकार बनायीं है और अब मुफ़्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद महबूबा मुफ़्ती को मुख्यमंत्री बनाने के लिए नागपुर मुख्यालय के प्रतिनिधि राम माधव प्रयासरत हैं मतलब यह इसका सीधा-सीधा है हम नकली राष्ट्रभक्ति का मुखौटा लगा कर सब कुछ करेंगे और जब दूसरा चर्चा भी करेगा तो हम मीडिया से लेकर सोशल मीडिया देशद्रोही का जाप करना शुरू कर देंगे. देखें https://www.youtube.com/watch?v=R8vlDv8FWGM&spfreload=10

जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा जब अफजल गुरु की फांसी के ऊपर चर्चा का कार्यक्रम शुरू हुआ तो महबूबा मुफ़्ती के साथ सरकार चलाने के लिए प्रयासरत भारतीय जनता पार्टी के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् ने छात्रों से हाथापाई की और राष्ट्रविरोधी नारे भी लगाए जिससे उन छात्रों को फंसाया जा सके इससे पूर्व हैदराबाद यूनिवर्सिटी में रोहित वेमुला के मामले में षड्यंत्र कर आत्महत्या के लिए मजबूर कर चुके हैं. कुछ वर्षों पूर्व लखनऊ कचेहरी में इन्ही तत्वों द्वारा सुप्रसिद्ध अधिवक्ता मुहम्मद शुऐब के साथ न्यायलय के अन्दर मारपीट की गयी थी और यह आरोप लगाया गया था कि वह पकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे यह सब बेतुकी बातें नागपुर मुख्यालय के विषाक्त विचारधारा का परिणाम हैं. षड्यंत्रकारी भूमिका में यह हमेशा रहते हैं. 
अफजल गुरु की फांसी की चर्चा अगर राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में आता है तो नाथूराम गोडसे की फांसी की चर्चा करना और उसको महिमा मंडित करना क्या गंगा स्नान है. इस कार्य को बखूबी नागपुर मुख्यालय करता आ रहा है. इसी सम्बन्ध में हमारे फेसबुक के मित्र मनोज कुमार ने एक गंभीर टिप्पणी की है
"अफजल गुरू को इस देश की सर्वोच्य न्यायालय ने संसद पर हमले का अपराधी माना और फाँसी की सजा सुना दी| आप कहते हैं कि अब इस पर कोई चर्चा नहीं हो सकती| इस पर कोई भी चर्चा राष्ट्रद्रोह है| चलिए मैं आपकी बात मान लेता हूँ| नाथूराम गोडसे को इस देश की सर्वोच्य न्यायालय ने बापू की हत्या का दोषी माना और उसे फाँसी की सजा सुनाई| अगर किसी दुकान पर गोडसे की किताब - "मैंने गाँधी को क्यों मारा" या उसके भाई की किताब " गाँधी वध क्यों" बिकती हुई दिखती है तो उस दूकान पर, उसके प्रकाशक पर देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए या नहीं? और हाँ, एक बार अपना बुक-सेल्फ चेक कर लीजिएगा| कहीं आपने इनमें से कोई किताब खरीदकर रखी हुई तो नहीं है"

जवाहर लाल नेहरु विश्व विद्यालय की खुली सोच के कारण नागपुरी मुख्यालय षड्यंत्र पर षड्यंत्र रच रहा है.
 ट्राई द्वारा फ्री बेसिक्स प्लान को खारिज करने के फैसले से सोशल साइट फेसबुक बौखला गई है। फेसबुक के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में शामिल मार्क एंड्रीसन ने ट्राई के फैसले को लेकर भारत विरोधी ट्वीट किया कि भारत की इकोनॉमी ब्रिटिश शासन के अधीन (औपनिवेशिक) ज्यादा बेहतर थी। भारत को तो औपनिवेशिक शासन की आदत हो चुकी है, अब इसका विरोध क्यों? यह बात अगर उनके आका लोग लिख रहे हैं तो उनको राष्ट्र
द्रोहिता नहीं दिखाई देती है क्यूंकि उन्ही के नौकरों के ये वंशज हैं.

सुमन
लो क सं घ र्ष !

गुरुवार, 24 सितंबर 2015

अंग्रेजों का गधा या अब अमेरिका का

नई  कहानी
 मुल्ला नसरुद्दीन की कहानी अद्भुद कहानी है. वह कहानी पुरानी हो गयी है लेकिन भाव वही है इस नयी कहानी के पात्र बदले हैं, मंशा वही है, बातें वही हैं, अर्थ वही है लेकिन सन्दर्भ नया है. 2014 में संसदीय चुनाव हुए मुल्ला नसरुद्दीन की तरह चुनाव प्रचार होता है- पद्रह-पंद्रह लाख प्रति नागरिकों को काला धन लाकर दिया जायेगा. जनता के अच्छे दिन आयेंगे, एक सैनिक के सर के बदले चार सर लाये जायेंगे.
                यह सब बातें कहने वाले पहले ब्रिटिश साम्राज्यवाद के नौकर थे अब अमेरिकी साम्राज्यवाद के नौकर हैं. हमारे समाज की कहावत है कि बाप न मारिन पेडूकी-बेटा तीरंदाज. वही हालात पहले अंग्रेजों के रहे गधे और अब अमेरिकियों के रहे गधे अफवाहबाजी करके, झूठ बोल कर, फेंकने की कला में माहिर नागपुरियों ने देशभक्ति और राष्ट्रभक्ति का जो प्रमाण पत्र जारी करना शुरू किया तो स्तिथि बाद से बदतर होती जा रही है. सारे देश द्रोही रत्न होते जा रहे हैं और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ जेलों में रहने वाले लोग देशद्रोही की भूमिका में किया जा रहा है. अभी जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के संभावित कुलपति ने ट्विटर पर आरोप लगाया कि जेएनयू नक्सलियों, कम्युनिस्टों, और राष्ट्रद्रोहियों को अड्डा रहा है.  शायद आपातकाल के दौरान सी आई ए मुख्यालय में शरण लेने वाले उक्त नेता ने मुल्ला नसरुद्दीन को नहीं पढ़ा है. अगर पढ़ा होता तो यह बात वह नहीं करते जनता सब समझती है गलतियां होती हैं. जनता गलतियाँ सुधारती भी है जनता को गधा मत समझो.  राष्ट्रद्रोही देशभक्त नहीं हो सकता है यही कारण है कि हर बात को तोड़-मरोड़ कर पेश करने से अंग्रेजों की गुलामी को जनता माफ़ नहीं कर देगी और इस समय जो अमेरिकी गुलामी का दौर ला रहे है उन्हें  भी जनता माफ़ नहीं करेगी. पुरानी कहानी नयी कहानी को दोहरा रही है. हम जो भी वादा पूरा करेंगे 2019 के बाद करेंगे.  मुल्ला नसरुद्दीन की पुरानी कहानी को नए सन्दर्भों में देखा जाना चाहिए. मुल्ला नसरुद्दीन जालिमों के खिलाफ लड़ने के लिए गधे को गधा बनाता था लेकिन यह लोग अमेरिकी गुलामी करने के लिए जनता को गधा समझने की भूल कर रहे हैं लेकिन वह यह नहीं समझते हैं की पहले अँगरेज़ उन्हें अपना गधा समझते थे और अब अमेरिकी.
पुरानी  कहानी
नसरुद्दीन समझाने लगा, ‘यह कोई मामूली गधा नहीं है। अमीर का गधा है। एक दिन अमीर ने मुझे बुलाकर कहा, ‘क्या तुम मेरे गधे को धर्म-कर्म सिखा सकते हो, ताकि वह भी उतना ही सीख जाए, जितना मैं जानता हूँ। मैंने गधे को देखकर कहा, ‘महान अमीर, यह गधा उतना ही बुद्धिमान है, जितने आप हैं, या आपके वज़ीर लेकिन इसे दीनियात सिखाने में बीस बरस लगेंगे।  अमीर ने ख़जाने से सोने के पाँच हज़ार तंके मुझे दिलवाकर कहा, ‘गधे को ले जाओ और पढ़ाओ। अगर यह बीस साल के बाद दीनियात न सीख पाया और इसे कुरान जबानी याद न हुई तो मैं तुम्हारा सिर कटवा दूँगा।’
कहवाख़ाने के मालिक ने कहा, ‘तो तुम अपने सिर को अलविदा कह लो। गधे को दीनियात और कुरान पढ़ते क्या किसी ने देखा-सुना है?’
‘बुखारा में ऐसे गधों की कमी नहीं है। मुझे सोने के पाँच हजार तंके चाहिए और ऐसे अच्छे गधे रोज़-रोज़ तो मिलते नहीं। मेरे सिर के कटने की फ़िक्र मत करो दोस्त। क्योंकि बीस सालों में हम में से एक-न-एक ज़रूर मर जाएगा। या तो मैं, या अमीर का यह गधा। और तब यह पता लगाने में बहुत देर हो चुकी होगी कि दीनियात जाननेवाला सबसे बड़ा विद्वान कौन है।’
कहवाख़ाना ज़ोरदार क़हक़हों से गूँज उठा। मालिक नमदे पर गिर गया। हँसते-हँसते उसके पेट में बल पड़ गए। आँसुओं से भीग गया। वह बहुत ही हँसोड़ और खुशमिजाज था। हँसते हुए बोलो, ‘सुना तुमने, हा-हा तब तक यह जानने के लिए बहुत देर हो चुकी होगी कि इससे बड़ा आलिम (विद्वान) कौन है-हा-हा-हा।’ 

सुमन 
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