गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

उमर खालिद से पूछताछ करने के लिए दिल्ली पुलिस को फिर पढना पड़ेगा

सबाल्टर्न अध्ययन और दक्षिण एशिया में विकास यात्रा के सिद्धांत को दिल्ली पुलिस द्वारा की जा रही उमर खालिद से पूछ ताछ में यह सिद्धांत के तहत उन्होंने कार्यक्रम कराने की मंशा जाहिर की. दिल्ली पुलिस और उमर खालिद का विरोध करने वाली मीडिया व नागपुरी मुख्यालय के प्रबंध कर्तागण इस सब्जेक्ट के बारे में कोई जानकारी नहीं रखते हैं. जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय दुनिया का समाजशास्त्र का एक अद्भुद लोकतान्त्रिक धर्म निरपेक्ष विश्वविद्यालय है. 
दिल्ली पुलिस के विवेचना अधिकारी उमर खालिद से पूछताछ कर रहे हैं जिनका मेंटल स्टेटस उमर खालिद से बहुत ही कम है. उसके उत्तरों को सुनकर वह कुछ समझ ही नहीं पा रहे हैं. उसी स्तर की हमारे देश की मानव संसाधन विकास मंत्री हैं वह नाटकीय भाषा तो दे सकती है. श्रोता या दर्शक मंत्रमुग्ध तो हो सकता है लेकिन समाजशास्त्र के गहराईयों तक उनकी सोच नहीं जा सकती है. 
हमारे देश के गृह मंत्री का भी मानसिक स्तर उसी तरह का है और उनकी स्तिथि यह हो गयी है कि रजिया फंस गयी गुंडों के बीच. गुंडों का अर्थ यहाँ यह है कि असली गुंडे तो सरकार में हो गए और उन गुंडों ने पढ़े-लिखे लोगों को गुंडा साबित कर दिया है. यही काम हमारे गृह मंत्री राजनाथ सिंह कर रहे हैं कि पढ़े लिखे देशभक्तों को देशद्रोही साबित करने में लगे हुए हैं और देशद्रोहियों को देशभक्त की उपाधि देकर भारत रत्न दे चुके हैं.
                               विकिपीडिया के अनुसार सबाल्टर्न इतिहासकारों ने यह धारणा प्रस्तुत की कि औपनिवेशिक दासता से ग्रस्त या उबर चुके राष्ट्र में राष्ट्रवादी इतिहास का लिखा जाना जातीय गौरव का प्रतीक बन जाता है। राष्ट्रवादी इतिहासकारों द्वारा उपनिवेश विरोधी चेतना के निर्माण हेतु समृद्ध विरासत को पुनर्जीवित करने का ही प्रयास किया जाता है। इस विचारधारा ने जातीयता और राष्ट्र की मूलभूत अवधारणा पर प्रश्नचिह्न लगा दिया। इन्होंने समस्त राष्ट्रवादी इतिहास लेखन को अभिजनवादी कहकर अपर्याप्त घोषित कर दिया, साथ ही स्वातंत्र्योत्तर भारत के इतिहासकारों के समक्ष चुनौती रखी कि वे औपनिवेशिक भारत और स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास को सबाल्टर्न इतिहास के रूप में अर्थात् उस साधारण जनता के दृष्टिकोण से प्रस्तुत करें जिनकी राष्ट्रीय चेतना और प्रतिरोध का नेतृत्व हमेशा अभिजात प्रभावशाली राष्ट्रीय नेताओं द्वारा किया गया।
सत्ता में काबिज लोग नागपुर से हिटलर की विचारधारा से ट्रेनिंग लेकर आये हुए लोग हैं. समाज कैसे विकसित होता है और बनता है. देश की एकता और अखंडता कैसे बनाई रखी जाती है उससे अनभिज्ञ हैं, यही संकट है जवाहर लाल नेहरु विश्व विद्यालय के संकट का. आँख के अंधे, ज्ञान के बहरे लोगों को वहां अपराध दिखाई देता है. जबकि वास्तविकता यह है कि वहां अपराध है ही नहीं अपितु एक तार्किक बहस है. तार्किक बहस को रोकने का मतलंब है की समाज की धारा को रोक देना, उसके निर्माण को रोक देना और कुंए का मेढक बन जाना. यह लोग भारत को कुंए का मेढक बना देना चाहते हैं. इसी के लिए यह प्रयत्नशील हैं. अगर दुनिया में कहीं ई
श्वर है तो इनको बुद्धि दे.

सुमन 

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (27-02-2016) को "नमस्कार का चमत्कार" (चर्चा अंक-2265) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'