गुरुवार, 24 सितंबर 2015

अंग्रेजों का गधा या अब अमेरिका का

नई  कहानी
 मुल्ला नसरुद्दीन की कहानी अद्भुद कहानी है. वह कहानी पुरानी हो गयी है लेकिन भाव वही है इस नयी कहानी के पात्र बदले हैं, मंशा वही है, बातें वही हैं, अर्थ वही है लेकिन सन्दर्भ नया है. 2014 में संसदीय चुनाव हुए मुल्ला नसरुद्दीन की तरह चुनाव प्रचार होता है- पद्रह-पंद्रह लाख प्रति नागरिकों को काला धन लाकर दिया जायेगा. जनता के अच्छे दिन आयेंगे, एक सैनिक के सर के बदले चार सर लाये जायेंगे.
                यह सब बातें कहने वाले पहले ब्रिटिश साम्राज्यवाद के नौकर थे अब अमेरिकी साम्राज्यवाद के नौकर हैं. हमारे समाज की कहावत है कि बाप न मारिन पेडूकी-बेटा तीरंदाज. वही हालात पहले अंग्रेजों के रहे गधे और अब अमेरिकियों के रहे गधे अफवाहबाजी करके, झूठ बोल कर, फेंकने की कला में माहिर नागपुरियों ने देशभक्ति और राष्ट्रभक्ति का जो प्रमाण पत्र जारी करना शुरू किया तो स्तिथि बाद से बदतर होती जा रही है. सारे देश द्रोही रत्न होते जा रहे हैं और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ जेलों में रहने वाले लोग देशद्रोही की भूमिका में किया जा रहा है. अभी जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के संभावित कुलपति ने ट्विटर पर आरोप लगाया कि जेएनयू नक्सलियों, कम्युनिस्टों, और राष्ट्रद्रोहियों को अड्डा रहा है.  शायद आपातकाल के दौरान सी आई ए मुख्यालय में शरण लेने वाले उक्त नेता ने मुल्ला नसरुद्दीन को नहीं पढ़ा है. अगर पढ़ा होता तो यह बात वह नहीं करते जनता सब समझती है गलतियां होती हैं. जनता गलतियाँ सुधारती भी है जनता को गधा मत समझो.  राष्ट्रद्रोही देशभक्त नहीं हो सकता है यही कारण है कि हर बात को तोड़-मरोड़ कर पेश करने से अंग्रेजों की गुलामी को जनता माफ़ नहीं कर देगी और इस समय जो अमेरिकी गुलामी का दौर ला रहे है उन्हें  भी जनता माफ़ नहीं करेगी. पुरानी कहानी नयी कहानी को दोहरा रही है. हम जो भी वादा पूरा करेंगे 2019 के बाद करेंगे.  मुल्ला नसरुद्दीन की पुरानी कहानी को नए सन्दर्भों में देखा जाना चाहिए. मुल्ला नसरुद्दीन जालिमों के खिलाफ लड़ने के लिए गधे को गधा बनाता था लेकिन यह लोग अमेरिकी गुलामी करने के लिए जनता को गधा समझने की भूल कर रहे हैं लेकिन वह यह नहीं समझते हैं की पहले अँगरेज़ उन्हें अपना गधा समझते थे और अब अमेरिकी.
पुरानी  कहानी
नसरुद्दीन समझाने लगा, ‘यह कोई मामूली गधा नहीं है। अमीर का गधा है। एक दिन अमीर ने मुझे बुलाकर कहा, ‘क्या तुम मेरे गधे को धर्म-कर्म सिखा सकते हो, ताकि वह भी उतना ही सीख जाए, जितना मैं जानता हूँ। मैंने गधे को देखकर कहा, ‘महान अमीर, यह गधा उतना ही बुद्धिमान है, जितने आप हैं, या आपके वज़ीर लेकिन इसे दीनियात सिखाने में बीस बरस लगेंगे।  अमीर ने ख़जाने से सोने के पाँच हज़ार तंके मुझे दिलवाकर कहा, ‘गधे को ले जाओ और पढ़ाओ। अगर यह बीस साल के बाद दीनियात न सीख पाया और इसे कुरान जबानी याद न हुई तो मैं तुम्हारा सिर कटवा दूँगा।’
कहवाख़ाने के मालिक ने कहा, ‘तो तुम अपने सिर को अलविदा कह लो। गधे को दीनियात और कुरान पढ़ते क्या किसी ने देखा-सुना है?’
‘बुखारा में ऐसे गधों की कमी नहीं है। मुझे सोने के पाँच हजार तंके चाहिए और ऐसे अच्छे गधे रोज़-रोज़ तो मिलते नहीं। मेरे सिर के कटने की फ़िक्र मत करो दोस्त। क्योंकि बीस सालों में हम में से एक-न-एक ज़रूर मर जाएगा। या तो मैं, या अमीर का यह गधा। और तब यह पता लगाने में बहुत देर हो चुकी होगी कि दीनियात जाननेवाला सबसे बड़ा विद्वान कौन है।’
कहवाख़ाना ज़ोरदार क़हक़हों से गूँज उठा। मालिक नमदे पर गिर गया। हँसते-हँसते उसके पेट में बल पड़ गए। आँसुओं से भीग गया। वह बहुत ही हँसोड़ और खुशमिजाज था। हँसते हुए बोलो, ‘सुना तुमने, हा-हा तब तक यह जानने के लिए बहुत देर हो चुकी होगी कि इससे बड़ा आलिम (विद्वान) कौन है-हा-हा-हा।’ 

सुमन 

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