मंगलवार, 5 मार्च 2013

निरंकुश सरकारें हैं प्रजातंत्र के लिए खतरा





अफजल गुरू को फांसी

यह तथ्य विवादित नहीं है कि अफजल गुरू, जम्मू-कश्मीर लिब्रेशन फं्रट का आत्मसमर्पित सदस्य था। वह पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के हालात से असंतुष्ट था और उसने सीमा सुरक्षा बल के समक्ष आत्मसर्मपण किया था। जब कोई अतिवादी आत्मसमर्पण करता है तो वह स्वयं को गंभीर खतरे में डालता है। उसके पूर्व साथी अक्सर उसके खून के प्यासे हो जाते हैं क्योंकि उन्हें यह डर रहता है कि आत्मसमर्पण करने वाला उनका साथी उनके व उनके संगठन के बारे में सुरक्षा बलों को जानकारी दे देगा। वे अपने आत्मसमर्पित साथी को इसलिए भी खत्म करना चाहते हैं ताकि उनके संगठन के अन्य सदस्य आत्मसमर्पण करने के पहले दस बार सोचे। अफजल गुरू ने जब आत्मसमर्पण किया तब उसने ये सभी खतरे मोल लिए थे। इस तरह के संगठनों का कोई सदस्य तभी आत्मसमर्पण करता है जब उसे यह लगने लगता है कि उसके संगठन के लक्ष्य को पाना असंभव है या फिर तब, जब उसे अपने संगठन के मिशन में आस्था नहीं रह जाती। यह तथ्य भी अविवादित है कि अफजल गुरू ने अपने आत्मसमर्पण के बाद स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की और वह छोटे-मोटे काम करके अपना जीवनयापन करने लगा।
इसके बाद से अफजल गुरू और पुलिस की कहानी एकदम अलग-अलग हो जाती है। पुलिस का कहना है कि गुरू की मुलाकात तारिक नाम के व्यक्ति से हुई जिसने उसे गाज़ी बाबा से मिलवाया। पुलिस का यह भी कहना है कि गाज़ी बाबा ने अफजल गुरू को भारतीय संसद पर हमला करने वालों के लिए दिल्ली में छिपने का स्थान मुहैय्या कराने के लिए राजी कर लिया। अफजल गुरू को इलेक्ट्रानिक मीडिया के समक्ष प्रस्तुत किया गया और उसके ‘‘इकबालिया‘‘ बयान को जमकर प्रचारित किया गया। उच्चतम न्यायालय ने पुलिस को इसके लिए फटकार भी लगाई और पुलिस अधिकारियों के समक्ष दिए गए गुरू के तथाकथित इकबालिया बयान को कोई महत्व देने से इंकार कर दिया।
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के अन्तर्गत विचारण न्यायालय के समक्ष दिए गए अपने बयान और केन्द्रीय गृह मंत्री को लिखे गए अपने पत्र में अफजल गुरू ने स्वीकार किया कि उसका परिचय उन लोगों से करवाया गया था, जिन्होंने बाद में संसद पर हमला किया। परंतु उसे उन लोगों से मिलवाने वाला व्यक्ति कोई अतिवादी नहीं वरन् दिल्ली पुलिस का डीएसपी दलविंदर सिंह था। दलविंदर सिंह ने उस पर इस बात के लिए भी दबाव डाला कि वह दिल्ली में उन लोगों के रहने का इंतजाम करे और उससे दलविंदर सिंह ने कई बार फोन पर बातचीत भी की। अफजल गुरू के फोन काल रिकार्ड की कोई जांच नहीं की गई। गुरू ने गृहमंत्री को लिखा कि वह अदालत में अपना पक्ष इसलिए प्रस्तुत नहीं कर सका और पुलिस द्वारा पेश किए गए सुबूतों के सच को इसलिए उजागर नहीं कर सका क्योंकि उसके परिवार को जान का खतरा था।
उच्चतम न्यायालय ने भी यह स्वीकार किया है कि अफजल गुरू को उसके बचाव के लिए कोई वकील नहीं मिला। उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अफजल गुरू के खिलाफ कोई सीधे सुबूत नहीं हैं और उसे केवल परिस्थितिजन्य सुबूतों के आधार पर दोषी ठहराया जा रहा है। देश के सामूहिक अंतःकरण को संतुष्ट करने के लिए उसे मौत की सजा दी गई। जिन लोगों ने संसद पर हमला किया था वे मौके पर ही मारे गए और गाज़ी बाबा को गिरफ्तार नहीं किया जा सका।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कहा है कि अफजल गुरू को फांसी दिए जाने के पूर्व उसे उसके परिवारजनों से न मिलने दिया जाना, उसके मानवाधिकारों का उल्लंघन है। किसी व्यक्ति के परिवार को सूचित किए बिना उसे मौत की नींद सुला देना बर्बरता है और उसके परिवार को धार्मिक रीतिरिवाजों के अनुसार उसकी मृत देह का अंतिम संस्कार नहीं करने दिया जाना, उसके धार्मिक स्वतंत्रता के मूल अधिकार का उल्लंघन है।
अफजल गुरू को जिस दिन फांसी दी गई उसी दिन तड़के से कश्मीर मंे अभिव्यक्ति की आजादी को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया। किसी भी व्यक्ति को यह मौका नहीं दिया गया कि वह फांसी की निंदा-या प्रशंसा-कर सके। कश्मीर में बच्चों को दूध तक नसीब नहीं हुआ। समाचारपत्रों और टेलीविजन चैनलों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इंटरनेट और एसएमएस सेवाएं बंद कर दी गईं। क्या कश्मीरियों के लिए प्रजातंत्र और स्वतंत्रता नहीं है? क्या हमें उन पर तनिक भी विश्वास नहीं है? केवल कश्मीर के मुख्यमंत्री को मीडिया से बातचीत करने का अवसर मिला। और यह सब मात्र इसलिए क्येांकि एक कश्मीरी पर भारत सरकार के विरूद्ध युद्ध करने या उसमें सहायक बनने का आरोप था और उसे केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर, हिन्दुत्व संगठनों के जरिए व्यक्त की गई राष्ट्रीय अंतःकरण की मांग को संतुष्ट करने के लिए, बिना उसके परिवार को सूचना दिए, फांसी पर लटका दिया गया। देश की स्वतंत्रता के बाद से लेकर आज तक ऐसा व्यवहार सिर्फ एक अन्य व्यक्ति के साथ किया गया था और वह था पाकिस्तानी नागरिक अजमल कसाब। ब्रिटिश सरकार तक ने भगत सिंह को फांसी देने के पहले उनके परिवार को उनसे अंतिम बार मिलने का अवसर दिया था। यह तब जबकि ब्रिटिश सरकार की निगाह में भगत सिंह एक आतंकवादी थे जो राज्य के विरूद्ध युद्ध करने के दोषी थे।
भारत सरकार या भारत के संविधान के लिए आतंकवादी बहुत बड़ा खतरा नहीं हैं। उनसे मुकाबला करने में हमारे सुरक्षा बल सक्षम हैं। सुरक्षा बलों की ताकत लगभग असीमित है और भारत का जनमत उनके साथ है। प्रजातंत्र, भारतीय संविधान और कानून के राज को आतंकवादियों से कहीं अधिक खतरा ऐसी सरकार से है जो कानून का तनिक भी सम्मान नहीं करती और जो केवल उन तत्वों को संतुष्ट करना चाहती है जो बहुसंख्यकवादी राष्ट्रीयता के झंडाबरदार हैं और जिन्हें न्याय से कोई लेनादेना नहीं है।

न्याय का प्रश्न
प्रतिशोध की भावना और खून की प्यास, मध्यकालीन न्याय व्यवस्था का हिस्सा थे। आंख के बदले आंख और खून के बदले खून को अब न्याय नहीं माना जाता। सत्ताधीशों का खौफ दुनिया में कहीं भी अपराधों को रोकने में सफल नहीं हुआ है। जो लोग वंचित हैं या जिन्हें ऐसा लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है या जिनकी धरती पर दूसरों ने कब्जा कर लिया है, वे हमेशा से, बिना नतीजों की परवाह किए, लड़ते आए हैं। उनके पास जो भी संसाधन होते हैं, वे उन्हीं से अपनी लड़ाई जारी रखते हैं। ब्रिटिश साम्राज्य में सूरज कभी नहीं डूबता था परंतु क्या इस कारण भारतीय स्वतंत्रता सेनानी डर कर चुप बैठ गए? वे अपनी लड़ाई की कोई भी कीमत चुकाने को तैयार थे-अपनी जान देने के लिए भी। दरअसल, समाज में अपराध तभी रूक सकते हैं जब हमारा ढांचा ऐसा हो और हम ऐसी संस्थाओं का निर्माण करें, जो सबके साथ न्याय करें और पूर्णतः निष्पक्ष हों। अपराध तब रूकते हैं जब सरकारें जनता के प्रति जवाबदेह हों।
प्रतिशोध न्याय नहीं है। अगर किसी व्यक्ति ने हमें कोई कष्ट पहुुंचाया है तो उसे उतना ही या उससे भी अधिक कष्ट पहुंचाने से संतोष प्राप्त करना न्याय नहीं है। यह अमानवीयता है। न्याय तो तब होगा जब हम अपराध करनेवाले को यह अहसास करा सकें कि उसने जो कुछ किया वह बहुत गलत था, यह सुनिश्चित कर सकें कि वह अपना आगे का जीवन कानून का सम्मान करने वाले एक नागरिक के बतौर निभाए और अपनी गलती फिर ना दोहराए। पांच पुलिसकर्मी, एक माली व संसद के सुरक्षा दस्ते का एक सदस्य, संसद पर हुए निंदनीय और कुत्सित हमले में मारे गए थे। इन मृतकों के परिवारों के सदस्य, हमलावरों के मारे जाने से प्रसन्नता का अनुभव कर सकते हैं। संसद पर हमला करने वालों ने हमला इसलिए किया क्योंकि वे किसी और का बदला ले रहे थे। और इस प्रकार यह चक्र चलता रहता है। गुरू की फांसी के बाद कश्मीरियों मंे इस बात को लेकर गुस्सा हो सकता है कि गुरू पर निष्पक्षता से मुकदमा नहीं चलाया गया। उनमें उसे फांसी दिए जाने के तरीके को लेकर भी रोष हो सकता है। उनमें इस बात पर भी गुस्सा हो सकता है कि फांसी के बाद उन्हें उनके घरों में कैद कर दिया गया। प्रतिशोध, दरअसल, एक कभी खत्म न होने वाला दुष्चक्र है। इसमें किसी पक्ष को कभी शांति और संतुष्टि का अनुभव नहीं होता। एक व्यक्ति द्वारा लिया गया बदला, दूसरे व्यक्ति में बदला लेने की इच्छा पैदा करता है।
जो लोग संसद पर हमले में मारे गए, उनके परिजनों के लिए इस दुःखद घटनाक्रम का भावनात्मक समापन तब होता जब पूरा देश उनके आर्थिक पुनर्वास में मदद करता और उन्हें ‘‘मेरे प्रियजन ही क्यों‘‘? ‘‘किसकी गलती है‘‘, ‘‘क्या गलत हुआ‘‘, ‘‘हमला क्यों किया गया?‘‘ ‘‘हमलावरों ने मेरे परिवारजन को ही क्यों निशाना बनाया‘‘ और इसी तरह के मन को उद्वेलित करने वाले अन्य प्रश्नों के उत्तर खोजने में सहायता करता। प्रियंका गांधी के लिए उनके पिता की नृशंस हत्या की घटना का समापन नलिनी को फांसी पर चढ़ाकर नहीं होता। वह तब हुआ जब वे नलिनी से मिलीं, उससे कुछ प्रश्न पूछे और उसे माफ कर दिया। नलिनी को फांसी नहीं हुई। न्याय की सफलता तभी है जब अपराधी एक सामान्य नागरिक बन जाए। जब तक वह सच्चा पश्चाताप नहीं करता और उसका ह्दय परिवर्तन नहीं होता, तब तक उसपर उचित प्रतिबंध लगाए जाने चाहिए और अगर ऐसा कभी नहीं होता तो उसे समाज से अलग-थलग रखा जाना आवश्यक है, ताकि समाज उससे सुरक्षित रह सके।

मृत्युदंड में पक्षपात   
भारत में ऐसे कई अन्य व्यक्ति हैं जिन्होंने संवैधानिक संस्थाओं पर हमले किए। इनमें शामिल हैं नलिनी और पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री का हत्यारा राजौना। जो लोग चीख-चीखकर गुरू को फांसी पर चढ़ाने की मांग कर रहे थे वे इन दोनों के बारे में चुप क्यों हैं? क्या कारण है कि यह मांग नहीं उठ रही कि बाबू बजरंगी और माया कोडनानी, जिन्हें कई महिलाओें के साथ क्रूर सामूहिक बलात्कार, अनेकों हत्याओं और यहां तक कि अजन्मे बच्चों की जान लेने तक का दोषी ठहराया गया है, को फांसी दी जाए? मृत्युदंड दरअसल न्याय की मांग नहीं है वरन् यह एक राजनैतिक मांग है, जिसका उद्धेश्य किसी समुदाय या उसके एक हिस्से के वोट पाना और राज्यसत्ता की शक्ति और मर्दानगी का प्रदर्शन करना है। मर्दानगी, सैनिक शक्ति और सत्ता पर गर्व, जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली सोच की उपज है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने 9/11 के हमले, जिसमें विभिन्न देशों के तीन हजार से अधिक नागरिक मारे गए थे, का बदला लेने के लिए अफगानिस्तान और ईराक पर हमला किया। उन्होंने इस हमले की तुलना क्रूसेडस से की और इन हमलों में छःह लाख से अधिक लोग मारे गए और लाखों घायल हुए। यह युद्ध अभी भी जारी है और अमेरिका इसे तब तक नहीं जीत सकेगा जब तक न्याय नहीं होता।
इतिहास गवाह है कि मानव समाज , क्रूरता से मानवीयता की ओर और तानाशाही से प्रजातंत्र की ओर बढ़ता आया है। अपराधियों को सजा देने का उद्धेश्य है दूसरों को वैसा ही अपराध करने से रोकना और अपराधी को पश्चाताप करने और स्वयं को बदलने का मौका देना। प्रजातंत्र जैसे-जैसे सुदृढ़ हो रहा है, मतभेदों और असहमतियों को स्वीकार करने की संस्कृति मजबूत हो रही है। यह अवधारणा भी जड़ें जमा रही है कि समाज को किसी की भी जान लेने का हक नहीं है। पूरे विश्व का अनुभव यह बताता है कि मृत्युदंड अक्सर गरीबों, नस्लीय व धार्मिक अल्पसंख्यकों और समाज के अन्य वंचित वर्गों के सदस्यों के हिस्से मंे आता है। उदाहरणार्थ, अमेरिका में जिन लोगों को मृत्युदंड से दंडित किया गया है उनमें से 41 प्रतिशत और जिन्हें मृत्युदंड दे दिया गया है, उनमें से 34 प्रतिशत अफ्रीकी-अमरीकी हैं, जिनका अमेरिका की आबादी में प्रतिशत मात्र 12 है। इस समस्या का एकमात्र हल है मृत्युदंड को हमेशा-हमेशा के लिए दफना दिया जाना। 

-इरफान इंजीनियर

6 टिप्‍पणियां:

Blogvarta ने कहा…

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राजन ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
राजन ने कहा…

प्रजातंत्र को असली खतरा नकली सेकुलर बुद्धिजीवियों से है जो ऊपर से भले बने रहते है पर अंदर ही अंदर केवल खुद को चमकाने के लिए अलगाववाद को हवा देते रहते हैं।खैर इस लेख पर बात करते हैं।केवल झूठ का पुलिंदा और कुछ नहीं।पहली बात अफजल के समर्थन में ऐसे जितने भी लेख आए है उनमें यह झूठ बढ़ चढ़कर कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने सुबूतों के आधार पर नहीं बल्कि सामूहिक अंतःकरण की संतुष्टि के लिए सजा दी है जबकि अदालत ने कहा था कि अफजल के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य है।हमले की पूरी योजना उसने बनाई ।उन जज महोदय का इंटरव्यू भी आ चुका है।हाँ इसके साथी शौकत या गिलानी के खिलाफ सुबूत नहीं पाए गए तो उन्हें आरोपमुक्त किया गया ।जाहिर है अदालत ने कोई हवा में ही फैसला नहीं दे दिया।केस कई स्तरों से गुजरा था और सुबुतों की पैनी समीक्षा की गई थी।हाँ अरुँधति की तरह आप जैसों को कुछ पेंच नजर आ रहे थे तो पुनर्विचार याचिका दायर कर सकते थे अदालत के समक्ष जा सकते थे लेकिन आपमें से कोई ऐसा नहीं करेगा क्योंकि आपको पता है कि आपके पास तर्क नहीं बस तुक्के हैं।

राजन ने कहा…

आपके लेख का लब्बोलुआब ये ही है कि मुसलमान था इसलिए बहुसंख्यक राष्ट्रवादियों को खुश करने के लिए लटका दिया गया और सुबूत तो थे ही नहीं।यदि ऐसा है तो प्रज्ञा ठाकुर ओर असीमानंद पर कारर्वाई किसे संतुष्ट करने के लिए की गई? लेकिन नहीं तब देश की अदालतें सिर पर बिठाने लायक हो गई और साक्ष्यों पर जोर नहीं दिया गया तो फिर शौकत गुरु अफसान गुरू और गिलानी को रिहा क्यों किया गया और ये कोई पहली बार नहीं है।एक लिस्ट देखिए-8 जनवरी 2010 : इंडियन मिलिट्री अकैडमी पर
हमला करने के चार आरोपी बरी
20 दिसंबर 2009 : देशद्रोह के आरोप से
सलाउद्दीन बरी
20 दिसंबर 2008 : मेहराजुद्दीन को देशद्रोह के
आरोप से बरी किया गया
28 फरवरी 2007 : गुलजार और मोइउद्दीन को
देशद्रोह के आरोप से बरी किया गया
2006 : आफताब और अल्ताफ हुसैन को
देशद्रोह के आरोप से बरी किया।

राजन ने कहा…

सभी मुस्लिम ही है न?और एक आरोपी यही कहता है कि मुझे फँसाया गया प्रज्ञा टाकुर कहती है कि मेरे खिलाफ कोई सबूत नहीं केवल एक मोटरसाईकिल जो मैंने साल भर पहले ही बेच दी थी उसका धमाके में इस्तेमाल के आधार पर ही मुझे गिरफ्तार किया।असीमानंद कहता है कि पुलिस ने मुझसे जबरदस्ती इकबालिया बयान लिया ये कहकर कि तुम्हारी माँ को नंगा कर देंगे।क्या अब इनके कहने से तय होगा कि क्या सही है और क्या नहीं ?आप कहते हैं उनकी फाँसी क्यों नहीं लेकिन ध्यान रहे देश में जयपुर हो या दिल्ली और भी धमाकों के आरोपी पकड़े गए हैं जिनमें लेकिन उनकी भी फाँसी के लिए कोई आवाज नहीं उठा रहा है चाहे वो कथित अल्पसंख्यक वर्ग से ही आते हों ।लेकिन संसद व मुंबई पर हमला अपने आपमें अभूतपूर्व थे जिन्होंने देश को पड़ोसी देश के साथ युद्ध के कगार पर ला खडा किया था।यही कारण है कि उन्हें दुर्लभतम माना गया और आरोपियों को फाँसी दी गई।इनकी तुलना आप दूसरे धमाकों से कर ही नहीं सकते।हाँ ये मैं मानता हूँ कि अफजल की पत्नी को उसकी कब्र पर नमाज पढने की छूट देनी चाहिए थी लेकिन सरकार ने ढुलमुल नीति अपनाई।

राजन ने कहा…

यदि अफजल की फाँसी को लेकर गोपनीयता बरती गई तो कोई खास बात नहीं यह एक संवेदनशील मामला था खासकर कश्मीर में कानून व्यवस्था बिगड़ने का डर था अच्छा हुआ कि वहाँ के हालात बिगडने नहीं दिए गए।और कश्मीरियों को परेशानी हुई ऐसा आप कह रहे हैं ऐसा कह रहे हैं और मैं मानता हूँ की हुई लेकिन जरा सोचिए जब कर्फ्यू के बावजूद छुटपुट हिंसा भडक या भडकाई जा सकती है तो क्या हाल होता यदि यहाँ सशस्त्र बल तैनात नहीं किए जाते ?सौ पचास लाशें गिर जाती न?तब क्या बहुत अच्छा होता कश्मीरियों के साथ?आप तो जाते नहीं वहाँ हालातों पर काबू पाने।
आप जैसे तो तब भी ये ही कह रहे होते कि देखो ये जानें सरकार और आर्मी की वजह से गई है।