मंगलवार, 5 नवंबर 2013

संघ परिवार और सांप्रदायिक दंगे -भाग2


हमने यह तर्क दिया था कि भले ही कांग्रेसशासित प्रदेशों में अधिक संख्या में दंगे हुए हों परन्तु उनके लिए हिन्दुत्ववादी शक्तियां अधिक जिम्मेदार थीं। हमने रघुवर दयाल व मादोन न्यायिक जांच आयोगों की रपटों पर भी नजर डाली थी। इन रपटों में महाराष्ट्र के भिवण्डी और शोलापुर और बिहार के मुजफ्फरपुर में हुए दंगों में संघ परिवार की भूमिका पर तीखी टिप्पणियां की गई थीं। हम यहां कुछ और दंगा जांच आयोगों की रपटों की संक्षिप्त चर्चा कर रहे हैं।
केरल के तेल्लीचेरी में 28 दिसम्बर, 1971 को हुए दंगों की जांच के लिए नियुक्त जोसेफ विथ्याहिल आयोग ने अपनी रपट में कहा कि दंगों की जड़ में, जनसंघ द्वारा मुस्लिम लीग के सरकार में शामिल हो जाने के बाद लीग के विरूद्ध किया गया दुष्प्रचार था। इससे हिन्दुओं के मन में यह आशंका घर कर गई कि जिन मामलों में मुसलमान आरोपी होंगे, उनमें पुलिस हिन्दुओं के साथ न्याय नहीं करेगी। जनसंघ और आरएसएस अनवरत मुस्लिम लीग पर कटु हमले करते रहे। वे लगातार यह कहते रहे कि लीग, प्रशासनिक मामलों में दखलअंदाजी कर रही है।
जमशोदपुर में 11 अप्रैल 1979 को भड़के दंगों की जांच जितेन्द्र नारायण आयोग ने की। आयोग ने कहा कि दंगे की जड़ में हिन्दू साम्प्रदायिक तत्वों द्वारा दिम्माबस्ती अखाड़े के जुलूस के रास्ते को लेकर की गई दादागिरी व जिद थी। जमशोदपुर में रामनवमी के त्यौहार के दिन हिंसा हुई। अतिवादी साम्प्रदायिक हिन्दू यह मांग कर रहे थे कि अखाड़े का जुलूस, विवादित रोड नंबर 14 से ही निकलेगा। यह एक संकीर्ण सड़क थी, जिसके दोनों ओर मुसलमानों के घर थे और एक मस्जिद भी थी। आयोग का कहना था कि आरएसएस ने इस मामले में कोई भी समझौता करने से इसलिए इंकार कर दिया क्योंकि उसे उम्मीद थी कि इससे उसकी राजनैतिक शाखा भाजपा को बल मिलेगा। श्रीरामनवमी अखाड़ा समिति की ओर से एक पर्चा बांटा गया जिसमें हिन्दुओं से उनके मजहब के नाम पर यह आह्वान किया गया कि चाहे जो हो, हिन्दुओं को प्रतिबंधित रास्ते से ही जुलूस निकालना चाहिए। प्रशासन कुछ भी कहे या करे, हिन्दुओं को झुकना नहीं चाहिए।
आरएसएस ने संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को चुनौती दी। आयोग ने कहा कि तत्कालीन सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस ने रीगल मैदान पर 1 अपै्रल 1979 को अपने भाषण में कहा कि अरब देशों में हिन्दुओं को अपने मंदिर बनाने की इजाजत नहीं है, जबकि भारत में, जहां कि हिन्दू बहुसंख्यक हैं, न केवल मुसलमानों और ईसाईयों को मस्जिदों और चर्चों का निर्माण करने की पूरी स्वतंत्रता है बल्कि उन्हें अपने धर्म का प्रचार करने की इजाजत भी है...। आयोग ने दंगों के लिए आरएसएस को सीधे दोषी ठहराते हुए कहा कि उसने धार्मिक मुद्दों को लेकर लोगों की भावनाओं को भड़काया और साम्प्रदायिक जुनून उत्पन्न किया। आयोग ने अपनी रपट में यह सिफारिश भी की कि आरएसएस व जमायतए-इस्लामी जैसे साम्प्रदायिक संगठनों को आमसभाएं आयोजित करने की अनुमति कतई नहीं दी जानी चाहिए।
महाराष्ट्र के बीड जिले के उमापुर में साम्प्रदायिक हिंसा की जांच के लिए नियुक्त न्यायमूति मावलंकर आयोग ने दंगा शुरू होने की कारण की विवेचना करते हुए कहा कि 10 मई 1986 को कुछ शिवसैनिक, शाम लगभग सा़े छःह बजे अब्दुल हमीद चौक पर पहुंचे और वहां स्थापित गणेश प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। उसके बाद वे श्री गुलाम गौस के पास पहुंचे जो दूध कट्टा में अपनी दुकान में दूध बेच रहे थे। उन्होंने श्री गौस से गणेश उत्सव का चंदा मांगा। श्री गौस ने उन्हें 20 रूपए दिए। इसके कुछ देर बाद, राजेन्द्र बागुल, श्याम कनकरिया और कुछ अन्य लोग फिर से श्री गौस के पास पहुंचे और उनसे चंदे के नाम पर और पैसे देने को कहा। श्री गौस ने और पैसे देने से इंकार कर दिया। इसके बाद चंदा, मांगने वालों ने उनके साथ मारपीट की जिससे वे बेहोश होकर गिर गए। इससे गुस्साए शकील व जावेद की शिवसैनिकों से हाथापाई हुई। शकील और जावेद के साथ शिवसैनिकों ने जमकर मारपीट की। इसके तुरंत बाद हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच पत्थरबाजी शुरू हो गई और हिंसा भड़क उठी।
लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा अपने पीछे साम्प्रदायिक दंगों की एक लंबी श्रृंखला छोड़ गई। रथयात्रा के दौरान आडवाणी ने निहायत भड़काऊ भाषण दिए। श्री आर एच हीरा मानसिंह आयोग ने पाया कि बिहार में श्री एल के आडवाणी की 23 अक्टूबर 1990 को गिरफ्तारी के बाद, आन्ध्रप्रदेश के रंगारेड्डी जिले और हैदराबाद व सिकंदराबाद में साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाएं हुईं। हिंसा अक्टूबर से लेकर दिसम्बर 1990 तक जारी रही।
सन 199293 में मुंबई में हुए दंगों के दौरान, कांग्रेस सरकार दंगों को रोकने में असफल और असहाय साबित हुई। मुख्यमंत्री सुधाकरराव नाईक, बाबरी मस्जिद के हाए जाने के बाद की स्थिति के लिए जरा भी तैयार नहीं थे। दंगों की जांच के लिए नियुक्त न्यायमूर्ति बीएन श्रीकृष्ण आयोग ने कहा कि ॔॔यद्यपि 15 दिसम्बर 1992 और 05 जनवरी 1993 के बीच हिंसा की कई घटनाएं हुईं परंतु बड़े पैमाने पर दंगों और हिंसा की शुरूआत 6 जनवरी 1993 से हुई, जब हिंदू साम्प्रदायिक संगठनों और सामना व नवाकाल जैसे अखबारों द्वारा किए गए साम्प्रदायिक दुष्प्रचार ने जुनून भड़काया। हिंसा की कमान शिवसेना और उसके नेताओं ने संभाल ली और वे अपने वक्तव्यों और हरकतों के जरिए, साम्प्रदायिक उन्माद को हवा देते रहे। उन्होंने शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के निर्देशों पर ऐसा किया। शिवसेना का क्या दृष्टिकोण था, यह बाल ठाकरे द्वारा टाईम पत्रिका को दिए गए उनके साक्षात्कार से जाहिर है। बाल ठाकरे ने बारबार ॔प्रतिशोध’ की बात कही और श्री सरपोत्तदार एवं श्री मनोहर जोशी ने जोर देकर कहा कि शिवसैनिकों का आतंक ही हिन्दुओं की सुरक्षा की गारंटी है। शहर के किसी एक इलाके में आपराधिक चरित्र के मुसलमानों द्वारा निर्दोष हिन्दुओं की हत्या का बदला, शहर के दूसरे इलाकों में निर्दोष मुसलमानों को मारकर लिया जाने लगा।’’
जस्टिस श्रीकृष्ण आयोग ने बिल्कुल ठीक कहा कि एल.के.आडवाणी की रथयात्रा, जो सोमनाथ मंदिर से शुरू हुई थी और जिसे अयोध्या पहुंचना था, ने साम्प्रदायिक भावनाओं को भड़काने में मुख्य भूमिका अदा की। छःह दिसम्बर 1992 आजाद भारत का सबसे बुरा दिन था। इस दिन बाबरी मस्जिद को जमींदोज कर दिया गया और मुंबई में इतना खूनखराबा हुआ, जितना उससे पहले कभी नहीं हुआ था। शिवसैनिकों ने विजय जुलूस निकाले।
निष्कर्ष
बिहार के भागलपुर में 24 अक्टूबर 1989 को हुए दंगों की जांच के लिए नियुक्त पांचसदस्यीय आयोग के सदस्यों न्यायमूर्ति रामानद प्रसाद, न्यायमूर्ति रामचंद्र प्रसाद सिन्हा व न्यायमूर्ति एस. शम्सुल हसन ने अपनी रपट में कहा, ॔॔हमने उन सभी कारकों की विस्तृत चर्चा की है, जिनके अंतिम नतीजे बतौर साम्प्रादायिक हिंसा हुई। दंगों के एक साल पहले से ही माहौल में साम्प्रदायिकता घुलने लगी थी। दोनों समुदायों के बीच संदेह और घृणा की दीवार खड़ी हो गई थी। इसके पीछे थीं गलतफहमियां, धार्मिक कट्टरता और राजनैतिक अवसरवाद। जिला प्रशासन ने हालात को बिगड़ने दिया और गुंडा तत्वों को हिरासत में नहीं लिया। जिला प्रशासन निष्पक्ष नहीं था और इस तथ्य ने भी हिंसा को ब़ावा दिया’’।
यह टिप्पणी साम्प्रदायिक तत्वों और प्रशासनदोनों की भूमिकाओं को रेखांकित करती है। साम्प्रदायिक तत्व, छोटेमोटे झगड़ों और घटनाओं को साम्प्रदायिक रंग देकर तनाव पैदा करते हैं। किसी धार्मिक समुदाय के एक या दो व्यक्तियों द्वारा की गई बेजा हरकत के लिए पूरे समुदाय को दोषी ठहराया जाता है। यह सिलसिला कई दिनों तक और कबजब महीनों तक चलता रहता है। इस के बिना कभी दंगे शुरू नहीं हो सकते। और यह काम मुख्यतः संघ परिवार करता है। पॉल ब्रास कहते हैं कि देश के कुछ क्षेत्रों, विशोषकर उत्तरी व पिश्चमी राज्यों में, दंगों का ॔संस्थागत तंत्र’ विकसित हो गया है, जिसे राजनैतिक आवश्यकता पड़ने पर या चुनावों के दौरान, सक्रिय किया जा सकता है। साम्प्रदायिक हिंसा शायद ही कभी अपने आप भड़कती है। ब्रास का तर्क है कि दंगों के ॔उत्पादन’ के लिए पहले से तैयारी की जाती है। इसमें शामिल होता है दंगाईयों की भर्ती, भड़काऊ गतिविधियां, अफवाहों का प्रचार व संदेशों का आदानप्रदान। पूर्वाभ्यास किए जाते हैं और उपयुक्त समय पर हिंसा शुरू हो जाती है। कांग्रेस का दोष यह है कि उसने हमेशा इस ॔संस्थागत दंगा तंत्र’ की अनदेखी की। रामानद प्रसाद आयोग ने कांग्रेस की इस असफलता पर जोर दिया है। दंगे, और उनके बाद दोषियों को सजा दिलवाने में असफलता से यह तंत्र मजबूत होता जाता है और साथ ही वे संगठन भी, जो दंगों को भड़काते और प्रायोजित करते हैं। जहां विभिन्न समुदायों के बीच भेद नहीं होता, वहां साम्प्रदायिक गड़बड़ियां इसे जन्म देती हैं और जहां यह भेद होता है, वहां उसे गहरा करती हैं। साम्प्रदायिक हिंसा के बाद, आरएसएस व संघ परिवार घावों को भरने नहीं देते। वे उन्हें कुरेदते रहते हैं, जब तक की घाव, मवाद से भरा फोड़ा नहीं बन जाता। पिछले कुछ वर्षों में संस्थागत दंगा तंत्र को काफी मजबूत व कार्यकुशल बना दिया गया है। दंगे पहले से ज्यादा जानलेवा व विनाशकारी हो गए हैं। पहले दंगे शहरों के सीमित इलाकों में हुआ करते थे। अब वे चक्रीय नियमितता से होते हैं और 72 घंटे या उससे भी लंबे समय तक चलते रहते हैं। इनमें बड़े पैमाने पर नरसंहार होता है। सन 1983 में असम के नेल्ली में हुए दंगों में 3000 से अधिक निर्दोष नागरिक मारे गए थे। गुजरात में सन 2002 में दंगे एक माह से भी अधिक समय तक चलते रहे और इनमें लगभग 2500 लोगों ने अपनी जानें गंवाईं। कन्धमाल में ठेठ ग्रामीण इलाके में एक महीने तक हिंसा चली जिसमें 70 लोग मारे गए।
इसमें कोई संदेह नहीं कि कांग्रेस शासनकाल में, भाजपा शासनकाल की तुलना में अधिक दंगे हुए हैं परन्तु इससे यह साबित नहीं होता कि कांग्रेस साम्प्रदायिक है और भाजपा नहीं। भाजपा के दोहरे मानदण्ड का एक सुबूत यह है कि वह अपने शासनकाल में हुए दंगों के लिए अपनी जिम्मेदारी कभी स्वीकार नहीं करती। श्री नरेन्द्र मोदी ने कभी यह नहीं माना कि 2002 के गुजरात दंगों के लिए वे या उनकी सरकार या उनकी पार्टी जिम्मेदार थी। अगर भाजपा शासनकाल में हुए दंगों के लिए भाजपा स्वयं को जिम्मेदार नहीं मानती तब फिर कांग्रेस के शासनकाल में हुए दंगों के लिए उसे दोषी कैसे ठहराया जा सकता है? दंगों की जिम्मेदारी स्वीकार करना तो दूर, मोदी तो उनके लिए खेद व्यक्त करने के लिए भी तैयार नहीं है। उल्टै वे 2002 के कत्लओम के पीड़ितों को ॔कुत्ते के पिल्ले’ बताते हैं। इस सबका यह अर्थ नहीं है कि कांग्रेस पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष है।
न्याय और शांति के लिए अनवरत, सघन प्रयास से ही हम साम्प्रदायिकता के दानव पर विजय प्राप्त कर सकते हैं और एक ऐसे शांतिपूर्ण भारत का निर्माण कर सकते हैं, जिसमें सभी को आगे ब़ने और गरिमापूर्ण जीवन बिताने का मौका मिले। इसके लिए हमें साम्प्रदायिक पूर्वाग्रहों और सोच के खिलाफ जबरदस्त अभियान चलाना होगा। यह काम मुश्किल जरूर है परंतु असंभव नहीं। हम सब को शुरूआत स्वयं से करनी होगी। हम एक दूसरे को हिंदू या मुसलमान के रूप में देखना बंद करें और हर व्यक्ति को उसके गुणअवगुण के आधार पर परखें, उसके मजहब के आधार पर नहीं।
-इरफान इंजीनियर

3 टिप्‍पणियां:

dr.mahendrag ने कहा…

पूर्वाग्रह से लिखे गए लेख पर कोई भी टिपण्णी करना व्यर्थ ही है,जब एक दल विशेष के प्रति एक लेखक का झुकाव हो तो उसे अपनी बात कहना कोई मायने नहीं रखता.

रविकर ने कहा…

खीरा-ककड़ी सा चखें, हम गोली बारूद |
पचा नहीं पटना सका, पर अपने अमरूद |

पर अपने अमरूद, जतन से पेड़ लगाये |
लिया पाक से बीज, खाद ढाका से लाये |

बिछा पड़ा बारूद, उसी पर बैठ कबीरा |
बने नीति का ईश, जमा कर रखे जखीरा ||

रविकर ने कहा…

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥