शुक्रवार, 23 मार्च 2012

खुदरा व्यापार में विदेशी पूँजी एक अतुलनीय जन विरोधी फैसला-2


यह चिकोर आकृति को गोल करने का करतब दिखाने का आधार क्या है। कहा जा रहा है कि ये बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ अनेक बिचैलियों को हटाकर बीच के मुनाफे को घटा देंगी। पहली बात तो यह है कि क्या ये विशाल खुदरा विदेशी सीधे हमारे सात लाख के करीब गाँवों के इर्द-गिर्द पसरे खेतों से खरीदकर पाएँगे। या तो उनके कर्मचारी यह काम करेंगे या उनके एजेंट, दलाल। एक थोक व्यापारी को अनेक अन्य थोक व्यापारियों को किसान का माल खरीदने में टक्कर देनी होती है। जिसका जितना वाजिब दाम और जल्दी भुगतान होगा और नाप-तौल में पारदर्शी ईमानदारी होगी, वही उतना ज्यादा माल खरीद पाएगा। इस स्थिति के मुकाबले इन बड़ी कम्पनियों के मुख्यालय अपने दलालों या कर्मचारियों को एक निश्चित कीमत पर खरीदने का हुक्म देंगे। किसानों के पास खरीदारांे के विकल्प नहीं रहेंगे। मजबूरन उन्हंे इन बड़े मगरमच्छांे द्वारा तय कीमत ही मिल पाएगी। ये मगरमच्छ इन जिन्सों के वायदा बाजार में भी सौदे करते हैं उनके पास सारे देश और संसार की संभावित फसल के आँकड़े होते हैं। इनके सामने किसान की शक्ति, क्षमता, सूचना, विकल्पों आदि की बेहद कमी। ऐसी स्थिति मंे यह उम्मीद करना कि सैकड़ों करोड़ धनराशि को पैरवी में लगाने वाली ये कम्पनियाँ किसान को वाजिबदाम यानी अभी मिल रहे दामों से ऊँचे दाम किसानों को देकर उपभोक्ताओं को अभी चुकाने पड़ने वाले दामों से कम पर बेचेंगे, किसी सामान्य समझवाले इन्सान के गले के नीचे नहीं उतर सकती है।
ऐसे लुभावने झाँसों की पुरानी, लम्बी परम्परा की यह नई खेप क्यों लाई गई है। इन दिनों भारत के विदेशी लेन-देन का घाटा राष्ट्रीय आय के चार प्रतिशत का आँकड़ा छूने की ओर बढ़ रहा है। बाहर से पूँजी आकर्षित करना अब अधिकाधिक कठिन होता जा रहा है। जिन धनी देशों से यह पूँजी आती थी, वे स्वयं गिरावट, पारस्परिक विश्वास, समाप्ति से ग्रस्त वित्तीय क्षेत्र, बेरोजगारी, सरकारी बजट घाटे और भारी कर्जों के बोझ से पीडि़त हैं। अतः खुलेे आॅयल की छूट देकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को बड़ा बाजार देना दिनांे-दिन विदेशी भुगतान संकट को निकट करता है। अतः अब इन कम्पनियों और उनकी वितरक खुदरा और थोक व्यापार कम्पनियों को चोर दरवाजे से रिटेल बाजार की पूँजी के रूप में भारत में अपना जाल फैलाने के लिए आने की अनुमति दी जा रही है। इस तरह 2500 करोड़ रूपये से ज्यादा विदेशी मुद्रा लाने वाली कम्पनियों को हमारे यहाँ एक-दो लाख रूपयों से लकर 5-10 करोड़ तक की पूँजी से व्यापार करने वालों के खिलाफ व्यापारिक जंग में उतारा जा रहा है। इस तरह विदेशी कम्पनियों तथा पूँजी को भारत मंे आकर मुनाफे कमाने के अवसर देने का एक खास कारण विदेशी मुद्रा संकट से बचना है। इसका सीधा अर्थ है भूमण्डलीकरण की आजादी बढ़ाने के लिए करोड़ों परिवारों की रोजी-रोटी यानी आजीविका को दाँव पर लगा दिया गया है।
वास्तव में थोक बाजार में बाहरी पूँजी को अनुमति दी जा चुकी है। विदेशी माल को बेचने के लिए उनके उत्पादकों को सीधे अपनी दुकाने खोलने की इजाजत दी जा चुकी है। रिटेल में आने की इजाजत के साथ कुछ भ्रामक शर्तें लगाई गई हैं। इन शर्तों के पालन की कोई जाँच नहीं होगी। इनको कितने अरसे में पूरा करना है, यह भी नहीं बताया गया है। गाँवों खेतों से माल खरीदने, भण्डार बनाने और उनके हानिरहित रख-रखाव में निवेश पहले होगा या दुकानें पहले खोली जाएँगी? दुकान आज खोलो और इन व्यापार सहायक कामों में निवेश वर्षो बाद करो, किन्तु घोषणा कर दो हमनेA ये शर्तें पूरी कर ली हैं। तब इन संभावित लोगों का क्या हश्र होगा। फिर 30 प्रतिशत माल देश के अन्दर खरीदने का अर्थ है वे 70 प्रतिशत माल आयात कर सकते हैं। हमारे उद्योगों के लिए यह एक भयावह खतरे की घंटी है। जब रोजगार समाप्त हो जाएगा, लोग उपभोक्ता ही नहीं रह पाएँगे फिर किसके भले के लिए ये कम्पनियाँ आएँगी। केवल धनी शहरी लोगों के लिए। स्पष्ट है इतने बड़े जनविरोधी फैसले की शायद ही कोई दूसरी मिसाल मिले।
-कमल नयन काबरा
मो0:- 09013504389

कोई टिप्पणी नहीं: