सोमवार, 14 नवंबर 2011

आंकड़ो के जरिये घटाई जा रही गरीबी वाह रे सरकार .......

गरीबी की किन्ही सीमा रेखाओं से उसे दूर करने के नाम पर चलाई जा रही योजनाओं का फैलाव बढ़ाव में भले ही गरीबी के कुछ हिस्सों को थोड़ी देर के लिए राहत मिल जाए , पर इससे गरीबो की गरीबी यानी साधनहीनता की स्थितियों में कोई कमी नही आनी है | क्योंकि थोड़े से लोगो में अमीरी व साधन सम्पन्नता को बढावा देने का रास्ता ही यही है की देश व दुनिया के ज्यादातर देशो के जनसाधारण को गरीबी की तरफ ढकेला जाए | उन्हें अधिकाधिक साधनहीन बनाया जाए |
20 सितम्बर 2011 को योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा था की ग्रामीण क्षेत्र में प्रतिदिन 26 रूपये और शहरी क्षेत्र में प्रतिदिन 32 रूपये प्रति व्यक्ति खर्च करने वाले को गरीब नही माना जाएगा | फिर इसी प्रति व्यक्ति खर्च के आंकड़े का हिसाब लगाकर गाँव में 3905 रूपये प्रति माह तथा शहर में 4824 रूपये प्रति माह खर्च करने वाले पांच व्यक्तियों के परिवार को भी गरीब नही मानने की सीमा तय कर दी गयी |इस हलफनामे के बाद योजना आयोग और उसके उपाध्यक्ष मोटेक सिंह अहलुवालिया की तथा केंद्र सरकार की चौतरफा आलोचना शुरू हो गयी | खाद्यान्नो तथा अन्य आवश्यक एवं न्यूनतम उपभोग के सामानों की बढती महगाई को उठाकर योजना आयोग व सरकार से यह सवाल पूछा जाने लगा की आखिर गाँव में प्रति व्यक्ति 26 रुपया और शहर में 32 रुपया खर्च करने वाले को गरीब नही मानने का आधार क्या है ? यह आलोचना भी आती रही है की प्रति माह लाखो रूपये के वेतन , भत्ते खर्च करने वाले सांसदों , विधायको , मत्रियो , अधिकारियों को आखिर यह कहने का क्या अधिकार बनता हैं की 26 रूपये व 32 रूपये प्रतिदिन खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नही हैं | योजना आयोग व केंद्र सरकार की उपरोक्त आलोचनाये गलत नही हैं ठीक हैं |ठीक इसलिए भी हैं की यह हलफनामा गरीब को गरीब मानने से इन्कार कर रहा हैं | हालाकि यह समाज की तथ्यगत सच्चाई हैं की देश की आबादी का एक खासा हिस्सा प्रतिदिन के बहुत कम आय व खर्च पर जी रहा हैं | लेकिन सवाल हैं किऐसी स्थितियों में जीते मरते लोगो को वर्तमान दौर की महगाई में 26 रूपये या 32 रूपये प्रतिदिन खर्च करने वाले लोगो को क्या कहा जाए ? क्या उसे गरीबी रेखा से उपर इसलिए मान लिया जाए की वह अभी जीवित हैं या फि उससे भी कम खर्च करने वाली आबादी उसके नीचे मौजूद हैं ?
यह तो गरीब को गरीबी रेखा से उपर करने का षड्यंत्र हैं | उसके लिए आंकड़ो की घपलेबाजी भी हैं | ऐसे षड्यंत्र व घपलेबाजी पहले भी की जाती रही हैं |समाज में थोड़े से लोगो में बढती अमीरी के साथ बहुसख्यक समाज में बढती गरीबी को आंकड़ो के जरिये भी छिपाया भरमाया जाता रहा हैं | दशको पहले ' गरीबी हटाओ ' के नारे इस तरह से लगाये जाते रहे है , मानो उन नारों व प्रोग्रामो से गरीबी बस मिटने ही जा रही है | अब गरीबी को घटाने - मिटाने का कुछ वैसा ही काम योजना आयोग द्वारा प्रस्तुत उपरोक्त आंकड़ो के जरिये किया गया हैं | प्रति व्यक्ति आय की जगह प्रति व्यक्ति खर्च का आंकड़ा पहली घपलेबाजी हैं | साफ़ बात है की प्रतिदिन इतनी कम खर्च करने वाले के पास बचत की आमतौर पर गुंजाइश नही हो सकती | अत:उसके खर्च की यह सीमा दरअसल उसके आय की सीमा हैं | पहले वह कमाएगा तब खर्च करगा | आंकड़े में दूसरी घपलेबाजी उस खर्च (व आय )को प्रति व्यक्ति प्रतिदिन के रूप में पेश करते हुए उसी से हिसाब लगाकर पांच व्यक्तियों के परिवार के ( खर्च व आय ) प्रतिमाह के रूप में पेश कर देना हैं | सभी जानते है की परिवार में हर आदमी कमाई नही करता | हर एक या दो कमाने वाले पर तीन - चार या इससे अधिक लोग निर्भर होते हैं , जो स्वंय कमाई नही करते | तब प्रति व्यक्ति के आंकड़े को पांच गुना बनाकर उसे परिवार की आय या खर्च बनाकर पेश करना आंकड़ो के जरिये घपलेबाजी नही तो क्या है ?
इस संदर्भ में समाज के सबसे निचले स्तर का एक दिलचस्प आंकडा देखिये | गाँवों में मनेरेगा के तहत 100 दिन काम करने वाले मजदूर की आय 120 x100 =12000 रुपया प्रति वर्ष होगी | इसे प्रतिदिन की आय में बदलने पर यह रकम (12000 /365 रुपया यानी ) 32 रूपये 87 पैसे या मोटे तौर पर 33 रूपये होगी | यह भी मान ले की दूसरे कामो से वह स्वंय या परिवार का कोई दुसरा सदस्य इतना और कमा लेता है | तब भी दोनों की कुल कमाई 66 रुपया प्रतिदिन होगी | इसे आप और ज्यादा बढाकर 100 रूपये प्रतिदिन कर दे तो , भी कम से कम दो बच्चो या एक ही बूढ़े आश्रित को लेकर पांच व्यक्तियों के परिवार की प्रति व्यक्ति कमाई या क्रच ( 100 /5 यानी ) 20 रूपये रोजाना ही आयेगा |
लेकिन अगर परिवार को हटाकर इसे प्रति व्यक्ति या क्रच के रूप में देखा जाए तो वह ( 100 /2 यानी ) 50 रूपये प्रति व्यक्ति के रूप में आ जायेगी | फिर उसी कमाई को पांच गुना ( यानी 250 रुपया रोजाना या 7500 रुपया महीना ) कर देने पर वह और उसका परिवार गरीबी रेखा से उपर उठ जाएगा | गरीब नही कहलायेगा | योजना आयोग ने इसे ध्यान में रखकर ही 26 रुपया व 32 रुपया प्रतिदिन कर खर्च का तथा उसी हिसाब से प्रति परिवार प्रति माह 3900 रुपया और 4800 रुपया खर्च का हलफनामा लगाया भी हैं | इस हलफनामे से मनरेगा में काम करने वाला मजदूर भी 33 रुपया प्रतिदिन के आय या खर्च के साथ गरीबी रेखा से उपर उठ गया है | लेकिन आंकड़ो में इस घपलेबाजी का लाभ ?- इसका पहला लाभ तो यह है कि बिना कुछ किए धरे ही केवल इन आंकड़ो के जरिये गरीबो कि संख्या तुरन्त - तुरन्त कम हो जायेगी देश के बहुप्रचारित आधुनिक विकास के साथ गरीबी कि रेखा से नीचे के लोग भी ऊँचे उठते नजर आ जायेगे , जैसा कि पहले से भी प्रचारित किया जाता रहा हैं | दुसरा काम यह है कि देश में लागू की जाती रही आर्थिक नीतियों के सभी समर्थको को इन प्रचारों व आकंड़ो से भी यह कुतर्क करने का मौक़ा मिल जाएगा कि ये नीतिया सर्वसमावेशी हैं | राष्ट्र के आर्थिक विकास के साथ राष्ट्र के सभी अमीर - गरीब का विकास करने वाली हैं |उन्हें उंचा उठाने वाली है | फिर इसका तीसरा लाभ यह है की गरीबो की घटती संख्या दिखाकर सरकारों के लिए गरीबी रेखा से नीचे के लोगो के लिए चलायी जा रही योजनाओं , प्रोग्रामो और उसके आवंटित धन में कटौती करने का आधार मिल जाएगा | योजना आयोग के इन आकंड़ो से विरोधी पार्टियों सहित प्रचार माध्यमि विद्वानों को भी इसका लाभ इस रूप में मिल गया हैं की उन्हें योजना आयोग और सरकार की आलोचना के साथ खुद को गरीबो का हमदर्द बताने व प्रचारित करने का नया अवसर मिल गया है | लेकिन गरीबी कम करने के लिए ' गरीबी हटाओ ' जैसे नारे लगाना या आकंड़ो के जरिये उसे कम होता दिखाना या फिर ऐसे कामो की आलोचनाओं के जरिये स्वंय को गरीब हिमायती दिखाना एक बात है और गरीबी घटाने - मिटाने के लिए वास्तविक प्रयास करनी एकदम दूसरी बात हैं | गरीब होने का वास्तविक मतलब ही है कि जीवन निर्वाह के आवश्यक साधनों से अंशत:या पूर्णत: वंचित होना |गरीबी दूर करने के नाम पर चलायी गयी बी0 पी0 एल0 योजनाओं से उन्हें राहत तो मिल सकता है पर उन्हें जीविकापार्जन के लिए स्थाई काम या साधन नही मिल सकता | आप भी जानते हैं की बहु प्रचारित मनेरगा के तहत भी महज 100 दिन काम पाने का ही कानून ( न की वास्तविक ) गारंटी मिली हुई हैं | फिर पिछले 20 सालो से लागू होती वैश्वीकरणवादी नीतियों के तहत देश व विदेश की धनाढ्य कम्पनियों के हर क्षेत्र में बढ़ते घुसपैठ और अधिकार के साथ आम किसानो , दस्तकारो तथा छोटे व साधारण उद्यमियों आदि के रोजी - रोटी के स्थाई साधनों को भी काटा जा रहा है | उन्हें साधनहीन व गरीब बनाया जा रहा है | अत: देश की अर्थव्यवस्था की दशा - दिशा गरीबी हटाने की नही बल्कि बढाने की ही रही है | इसे अंधाधुंध यंत्रीकरण के जरिये साधारण मजदूरों तथा साधारण पढ़े - लिखे लोगो के श्रम के अवसरों की कटौती के रूप में , फिर बड़ी कम्पनियों तथा आयातित मालो , सामानों की अधिकाधिक घुसपैठ से छोटे उद्यमियों के टूटन के रूप में देखा जा सकता है |इसके साथ अब इसे खेती किसानी के बढ़ते संकटों के साथ कृषि भूमि के बढ़ते अधिग्रहण के रूप में तथा फुटकर दुकानदारी के क्षेत्र में बड़ी कम्पनियों के बढती घुसपैठ से छोटे दुकानदारों की बर्बादी आदि के रूप में भी देखा जा सकता हैं | साफ़ बात है कि वैश्वीकरणवादी नीतियों के जरिये चली आ रही देश की अर्थव्यवस्था की दशा - दिशा गरीबी हटाने की नही बल्कि बढाने की है | सत्ता सरकारों में भागीदार करती हुई सभी पार्टिया तथा देश के अन्य उच्च स्तरीय हिस्से इन नीतियों के समर्थक एवं वाहक बनकर एक तरफ तो देश दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च हिस्से की अमीरी व साधन सम्पन्नता को बढाते जा रहे है तो दूसरी तरफ जनसाधारण को साधनहीन बनाते जा रहे है | इसलिए गरीबी की किन्ही सीमा रेखाओं से उसे दूर करने के नाम पर चलाई जा रही योजनाओं के फैलाव में भले ही गरीबो के कुछ हिस्सों को थोड़ी देर के लिए राहत मिल जाए | पर इससे गरीबो की गरीबी यानी साधनहीनता की स्थितियों में कोई कमी नही आनी हैं |हां उसमे बढ़ोत्तरी जरुर होनी है |क्योंकि थोड़े से लोगो में अमीरी व साधन सम्पन्नता को बढावा देने का रास्ता ही यही है कि देश व दुनिया के ज्यादातर देशो के जनसाधारण को गरीबी कि तरफ ढकेला जाए | उन्हें साधनहीन बनाया जाए | अत:गरीबी रेखा निर्धारित करने व उसे हटाने - मिटाने कि योजनाये प्रस्तुत करने या उसकी कमियों कि आलोचनाये करके स्वंय को गरीबो का हमदर्द दिखाने - बताने का सारा काम गरीबी को बनाये रखकर अमीरी को बढावा देने का काम हो रहा है |गरीबी हटाने का वास्तविक काम गरीबी हटाने में नही अमीरी का निरंतर विरोध करते हुए उसे हटाने - मिटाने में निहित है |
ऐसे में मुझे जन कवि आलोक धन्वा की कुछ लाइने याद आ रही है ..............
बर्फ़ काटने वाली मशीन से आदमी काटने वाली मशीन तक
कौंधती हुई अमानवीय चमक के विरूद्ध
जलतें हुए गाँवों के बीच से गुज़रती है मेरी कविता;
तेज़ आग और नुकीली चीख़ों के साथ
जली हुई औरत के पास
सबसे पहले पहुँचती है मेरी कविता;
जबकिं ऐसा करते हुए मेरी कविता जगह-जगह से जल जाती है
और वे आज भी कविता का इस्तेमाल मुर्दागाड़ी की तरह कर रहे हैं
शब्दों के फेफड़ों में नये मुहावरों का ऑक्सीजन भर रहे हैं,
लेकिन जो कर्फ़्यू के भीतर पैदा हुआ,
जिसकी साँस लू की तरह गर्म है
उस नौजवान खान मज़दूर के मन में
एक बिल्कुल नयी बंदूक़ की तरह याद आती है मेरी कविता।
जब कविता के वर्जित प्रदेश में
मैं एकबारगी कई करोड़ आदमियों के साथ घुसा
तो उन तमाम कवियों को
मेरा आना एक अश्लील उत्पात-सा लगा
जो केवल अपनी सुविधाके लिए
अफ़ीम के पानी में अगले रविवार को चुरा लेना चाहते थे
अब मेरी कविता एक ली जा रही जान की तरह बुलाती है,
भाषा और लय के बिना, केवल अर्थ में-
उस गर्भवती औरत के साथ
जिसकी नाभि में सिर्फ़ इसलिए गोली मार दी गयी
कि कहीं एक ईमानदार आदमी पैदा न हो जाय।

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

3 टिप्‍पणियां:

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

आपका हर लेख पठनीय होता है सुनील जी,. आप इतनी research करते है , आप सच में ही शाबाशी के हक़दार है ..

मुझे ये लगता है कि इस देश की सरकार को एक आम आदमी या गरीब आदमी से कोई भी सरोकार नहीं रह गया है . जिसके चलते ये गति बनी हुई है ..
और ये बहुत ही अफसोसजनक है .
विजय

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

चर्चा मंच के जरिए यहां पहुंचने का अवसर मिला, वाकई बहुत अच्छे लेख यहां पढने को मिले।

चन्दन..... ने कहा…

आपने बहुत हि शोध किया है आज जब सरकार शिक्षा अभियान चला रही है, गरीबों का स्वास्थ सुधर कार्यक्रम चला रही है तो उसे ये नही पता कि सभी जब ३२ रुपया रोज कमाने में लग जायेंगे तो पढेगा कौन, और कौन पानी बीमारी दूर करवाएगा...सिर्फ ३२ रुपया कमाने में हि और खाने में हि आदमी जिंदगी गुजार देगा तो देश और समाज के भविष्य का क्या होगा.. तरक्की सिर्फ उन्ही कि होगी जो सरकार में हैं और जो शिक्षित हैं... क्या देश के संसाधनों पर इन का कोई हक नही है... हक है भई ये भी क्र देते हैं... सुई से सीमेंट तक और मत भी फिर इनके नौकर इन्हें प्रताडित क्यूँ कर रहे हैं?