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मंगलवार, 8 जनवरी 2013

संघ की दकियानूसी, पुरूषवादी मानसिकता का प्रतीक

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डा. मोहन भागवत ने महिलाओं को जो परामर्श दिया है और बलात्कार के जो कारण बताये हैं, वे उनकी पुरूषवादी व पितृसत्तात्मक सोच के प्रतीक हैं। डाॅ. भागवत ने कहा कि ‘‘बलात्कार इंडिया में होते हैं भारत में नहीं‘‘।
यह कहना कठिन है कि डा. भागवत का ‘इंडिया‘ और  ‘भारत‘ से क्या आशय है। डा. भागवत के ‘भारत‘ के दो अर्थ हो  सकते हैं। एक अर्थ हो सकता है प्राचीन भारत। यदि डा. भागवत का इशारा प्राचीन भारत की ओर है, तो क्या हम भूल सकते हैं कि प्राचीन भारत में पुरूषों ने द्रौपदी के साथ जो व्यवहार किया था, वह बलात्कार से कम नहीं था। पहले तो पांडवों ने द्रोपदी को जुएं में दांव पर लगा दिया। उसके बाद कौरवों ने द्रोपदी को भरी सभा में नंगा करने का प्रयास किया। द्रोपदी को नंगा किए जाने के शर्मनाक कृत्य को महान आत्माएं, जिनमें भीष्म पितामह शामिल थे, मौन होकर देख रहीं थीं। महिलाओं के अपमान के अनेक ऐसे दृष्टांत प्राचीन भारत और हिन्दू धर्मग्रंथों में भरे पड़े हैं। राम ने गर्भवती सीता को जिस ढंग से अपने महल से निकाला था, वह भी नारी जाति का अपमान अपमान था।
यदि भागवत के अनुसार, इंडिया का अर्थ शहरी क्षेत्र और भारत का अर्थ ग्रामीण क्षेत्र है तो हमें डा. भागवत से यह पूछने का अधिकार है कि क्या गांवों में बलात्कार नहीं होते हैं? सच पूछा जाए तो गांवों में महिलाओं के विरूद्ध शहरों से कहीं ज्यादा हिंसा होती है और सबसे दुर्भाग्य की बात यह है कि वे उसके विरूद्ध शिकायत भी नहीं कर पातीं। गांवों में महिलाओं के विरूद्ध होने वाले अत्याचार, सामंतवादी व्यवस्था की देन हैं।
हमारे देश में आज भी गांवों में सामंती व्यवस्था कायम है। इस सामंती व्यवस्था के कर्ताधर्ता उच्च जातियों के लोग होते हैं। ये लोग गांव में निवास कर रहे दलितों को इंसान नहीं मानते। दलितों की बहू बेटियों को भोग्या मानते हैं। आज भी हमारे देश में कुछ ऐसे गांव हैं जहां दलितों के घर आने वाली वधू पर पहला अधिकार इन दबंगों का समझा जाता है।
हरियाणा की खाप पंचायतें ग्रामीण भारत की महिलाओं के संबंध में सोच को इंगित करती हैं। इन पंचायतों ने महिलाओं के साथ घोर आपत्तिजनक व्यवहार किया है। झारखंड सहित कई राज्यों में महिलाओं को डायन घोषित कर उन्हें नंगा घुमाने और उनकी हत्या तक कर देने की घटनाएं आम हैं। 
आये दिन समाचारपत्रों में पढ़ने को मिलता है कि कोई महिला जिस समय रात के अंधेरे में शौच को गयी उसके साथ बलात्कार किया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गांवों में होने वाली इन घटनाओं की पुलिस में रिपोर्ट भी नहीं लिखी जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में पुलिस पर इन सामंती तत्वों का दबदबा रहता है। डाक्टर भी इनके दबदबे के कारण बलात्कार की घटना की पुष्टि नहीं कर पाते हैं।
इस तरह भागवत का यह कहना कि गांवों में बलात्कार नहीं होते बेबुनियाद है और देश को इंडिया और भारत में बांटने का दुष्प्रयास है। सच पूछा जाये तो बलात्कार चाहे शहर में हों या गांव में, इनके लिये वह दृष्टिकोण उŸारदायी है जो मनुस्मृति से हमें धरोहर के रूप में मिला है। जहां तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सवाल है, वह तो केवल पुरूषों की  संस्था है। संघ के संस्थापकों ने आरएसएस से महिलाओं को दूर रखा है। इस मामले में संघ और इस्लामिक व्यवस्था में समानता है। इस्लाम के धार्मिक ठेकेदार, महिलाओं को पुरूषों के साथ मस्जिद में नमाज अदा करने की इजाजत नहीं देते हैं। उसी तरह, संघ अपनी शाखाओं में महिलाओं को प्रवेश नहीं देता है। कुल मिलाकर, भागवत अपनी पुरूषवादी सोच को ही प्रगट कर रहे हैं।
भागवत के बलात्कार संबंधी बयान से उत्पन्न विवाद ठंडा भी नहीं हुआ था कि उन्होंने एक और बयान दे डाला, जिसमें उन्होंने  महिलाओं को घर की चहारदीवारी में वैसे ही बंद रहने की सलाह दी जैसे तालिबानी, मुस्लिम महिलाओं को देते हैं। उनके इस बयान पर स्पष्टीकरण देते हुए संघ के प्रवक्ता राम माधव ने कहा कि भागवत ने यह बयान पश्चिम के परिवारों के बारे में दिया है। यदि उन्होंने ऐसा किया है तो यह पश्चिम की महिलाओं का अपमान है।
भागवत के अलावा, मध्यप्रदेश के उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने भी बलात्कार की घटनाओं पर आपŸिाजनक बयान दिया है। विजयवर्गीय ने युवतियों और महिलाओं को यह सलाह दी है कि वे लक्ष्मण रेखा को न लांघंे। यह सच है कि शायद सीता का अपहरण नहीं होता यदि वे लक्ष्मण रेखा नहीं लांघतीं। परन्तु आज के रावण तो स्वयं लक्ष्मण रेखा के भीतर प्रवेश कर जाते हैं। क्या कैलाश विजयवर्गीय यह नहीं जानते कि आज के दानव, घरों में घुसकर महिलाओं के साथ जबरदस्ती करते हैं। अभी कुछ दिन पहले असम में कांग्रेस से जुड़े एक व्यक्ति ने रात्रि को एक महिला के घर में घुस कर उसके साथ बलात्कार किया। बाद में लोगों ने उसकी जमकर पिटाई की।
फिर, बलात्कार तो अबोध बच्चियों के साथ भी होते हैं। विजयवर्गीय बतायें कि ये बच्चियां कौन सी लक्ष्मण रेखा लांघती हैं। भागवत और विजयवर्गीय द्वारा दिये गये इन बयानों से अपराधियों के हौसले बुलन्द होते हैं। ऐसा लगता है कि भागवत और उनकी विचारधारा, महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों के लिए महिलाओं को ही दोषी मानती हैं।  
भागवत और विजयवर्गीय ऐसे संगठन और पार्टी से जुड़े हैं जिनके हाथों में अनेक राज्यों की सŸाा है और जिनकी महत्वाकांक्षा पुनः केन्द्र की सŸाा हथियाना है। यदि इतने जिम्मेदार लोग इतने गैर जिम्मेदाराना बयान देंगे तो ऐसे जघन्य अपराधों पर कैसे नियंत्रण पाया जा सकेगा?
न सिर्फ राजनैतिक नेता ऐसे गैर-जिम्मेदाराना बयान दे रहे हैं वरन् वे जो आध्यात्मिक क्षेत्र की हस्ती होने का दावा करते हैं, भी इस मामले में गैर जिम्मेदाराना बातें कर रहे हैं। आसाराम बापू ने कहा कि दिल्ली की सामूहिक बलात्कार की पीडि़त लड़की यदि हाथ-पैर जोड़ती, बलात्कारियों के पैर पड़ती, गिड़गिड़ाती और उनमें से एक को अपना भाई बना लेती तो वह स्वयं को बचा सकती थी।
क्या आज तक किसी हत्यारे ने अपने दुश्मन को इसलिये छोड़ दिया है क्योंकि उसने उसके पैर छू लिये और उसके सामने समर्पण कर दिया? क्या कोई डाकू इसलिये लूट का इरादा छोड़ देता है क्योंकि जिसे वह लूट रहा है उसने उससे दया की भीख मांगी हो?
- एल. एस. हरदेनिया

शनिवार, 19 मई 2012

खानपान की आदतों पर राजनीति“गौमांस उत्सव“


पिछले माह (अप्रैल 2012) के मध्य में हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में गौमांस भक्षण के मुद्दे पर अनापेक्षित हिंसा हुई। विश्वविद्यालय के दलित छात्रों का एक तबका लंबे समय से मांग कर रहा था कि होस्टलों के मेन्यू में गौमांस शामिल होना चाहिए। उन्होंने एक “गौमांस उत्सव“ का आयोजन भी किया जिसमें बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने गौमांस बिरयानी का सेवन किया। यह उत्सव ज्यादा देर न चल सका। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र शाखा) के कार्यकर्ताओं ने तूफान मचा दिया। एक छात्र पर चाकू से हमला किया गया, एक बस में आग लगा दी गई और विश्वविद्यालय में अफरातफरी और हिंसा का माहौल बना दिया गया। गौभक्तों के आक्रामक तेवरों के आगे उस्मानिया विश्वविद्यालय के कुलपति ने घुटने टेक दिए। उन्होंने घोषणा की कि होस्टलें के मेन्यू में गौमांस को शामिल नहीं किया जाएगा।
इसके लगभग एक माह पूर्व, हैदराबाद के करमागुड़ा इलाके में एक हिन्दू साम्प्रदायिक संगठन से जुड़े युवाओं ने एक हनुमान मंदिर में गौमांस के लोथड़े फेंक दिए। इसके बाद यह अफवाह उड़ा दी गई कि यह मुसलमानों की कारगुजारी है। असहाय मुसलमानों को हिंसा का जमकर निशाना बनाया गया। कुछ बसों को आग के हवाले कर दिया गया। बाद में असली दोषियों का पता लगा और वे गिरफ्तार भी हुए। कुछ महीनों पहल,े मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार ने एक नया कानून बनाकर राज्य में गौमांस भक्षण पर प्रतिबंध लगा दिया। कई अन्य भाजपा-शासित प्रदेशों में गौहत्या पर पहले से ही प्रतिबंध है और कुछ राज्यों में ऐसा प्रतिबंध लगाने की तैयारी चल रही है।
गुजरात, जहां नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हजारों मुसलमानों को बेरहमी से कत्ल कर दिया गया था, में एक कदम और बढ़कर गौमाताओं के मोतियाबिन्द और दांतों की सर्जरी की व्यवस्था की गई है। गुजरात के हिन्दू राष्ट्र की सरकार का इरादा राज्य में जगह-जगह मोतियाबिन्द और दांत संबंधी समस्याओं से ग्रस्त गौमाताओं के इलाज के लिए केन्द्र स्थापित करने का है। सरकार ने घोषणा की है कि गौमाता को इन चिकित्सकीय सेवाओं का लाभ लेने के लिए तीन किलोमीटर से अधिक पैदल न चलना पड़े, यह सुनिश्चित किया जाएगा। यह वही गुजरात सरकार है जो दंगों के आत्ंाक के साये से अब तक न उबर सके अल्पसंख्यकों के इलाज और उनकी अन्य मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कुछ नहीं कर रही है।
जो कानून बनाए जा रहे हैं और उनका जिस ढंग से प्रचार-प्रसार किया जा रहा है उसका एकमात्र उद्धेश्य मुसलमानों का दानवीकरण करना है-यह दर्शाना है कि मुसलमान उस गाय को काटते और खाते हैं जो हिन्दुओं के लिए माता के समान पूजनीय है। उस्मानिया विश्वविद्यालय का घटनाक्रम गाय की राजनीति के सिक्के का दूसरा पहलू है। हममंे से कुछ को यह अवश्य याद होगा कि हरियाणा के झज्जर में दलितों की इसलिए हत्या कर दी गई थी क्योंकि उन्होंने एक मृत गाय की खाल उतारने से इंकार कर दिया था। उस समय विहिप ने कहा था कि हिन्दुओं के लिए गाय की सुरक्षा और संरक्षण, दलितों की जान से ज्यादा महत्वपूर्ण है। विहिप को दलितों की हत्या पर कोई रंज नहीं था। यद्यपि दलित भी गाय की राजनीति के शिकार हैं तथापि इसका मुख्य निशाना मुसलमान ही हैं। संघ परिवार के विभिन्न सदस्य इस मुद्दे को लेकर समय-समय पर अल्पसंख्यक समुदाय पर निशाना साधते रहे हैं।
दलितों और मुसलमानों को खलनायक सिद्ध करने की कोशिश केवल हिन्दू “अस्मिता“ का मुद्धा नहीं है। इसका संबंध दलितों-आदिवासियों की खानपान की आदतों और उनकी जीवनशैली से भी है। संघ परिवार, ब्रिटिश शासनकाल से ही गाय पर राजनीति करता रहा है। गाय सैकड़ों साल से उच्च जाति के हिन्दुओं का नीची जातियों का दमन करने का हथियार रही है। बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए ब्राहम्णवादी हिन्दुओं ने गाय के प्रतीक का इस्तेमाल किया था। कुछ दलित विद्वानों का कहना है कि बौद्ध धर्म से मुकाबला करने के लिए गाय के प्रतीक का चयन अत्यंत धूर्ततापूर्ण था। भैंस भी मानवमात्र के लिए गाय के बराबर उपयोगी थी परंतु उसे इसलिए नहीं चुना गया क्योंकि उसका रंग काला होता है। यह मात्र संयोग नहीं है कि काली चमड़ी वाले लोग भारत ही नहीं पूरे विश्व में प्रभुत्वशाली वर्ग के दमन के शिकार रहे हैं। वैदिक भारतीय इतिहास के उद्भट विद्वान प्रोफेसर डी. एन. झा व डॉ. पाडुंरंग वामन काने एवं सामाजिक न्याय के पुरोधा डॉ. भीमराव अम्बेडकर का स्पष्ट मत है कि वैदिक काल में हिन्दू गौमांस भक्षण करते थे। कृषि-आधारित समाज के उदय के साथ पशुधन का संरक्षण करने की आवश्यकता उत्पन्न हुई। नतीजे में जैन और बौद्ध धर्मों व अन्य कई पंथों ने अहिंसा को अपना ध्येयवाक्य घोषित कर दिया और यज्ञों में गाय की बलि चढ़ाने को अधार्मिक व पाप बताया जाने लगा।
वर्तमान साम्प्रदायिक राजनीति के एजेन्डे में दो मुख्य मुद्दे हैं। पहला है अल्पसंख्यकों का दमन। इसके लिए भगवान राम और गाय जैसे भावनात्मक मुद्दों को उछालकर अल्पसंख्यकों के विरूद्ध माहौल बनाया जाता रहा है। संघ परिवार के सदस्य तो गौसेवा के लिए केवल चंदा देते हैं। गौमाता की असली देखभाल, उसे चराने आदि का काम तो दलित ही करते हैं। पिछले कुछ समय से राजनैतिक और सांस्कृतिक मंचों से यह दबाव बनाया जा रहा है कि समाज के वे वर्ग जो गौमांस भक्षण करते हैं, ऐसा करना छोड़ दें।
इस प्रचार अभियान के चलते आमजनों की खानपान की आदतों में कुछ परिवर्तन तो आया है परंतु आज भी देश में गौमांस की खपत, मुर्गे और बकरे के मांस की कुल खपत से भी ज्यादा है। गौमांस का बड़े पैमाने पर निर्यात भी किया जाता है। संघ परिवार जहां अल्पसंख्यकों को स्थायी रूप से आतंकित रखना चाहता है वहीं वह लैंगिक और जातिगत रिश्तों में यथास्थितिवाद का पोषक भी है। यथास्थिति को बनाए रखने के लिए कई अलग-अलग मंचों व तरीकों से धूर्ततापूर्ण उपाय किए जा रहे हैं। राजनीति, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे संघ से प्रेरित संगठन इस उद्धेश्य की पूर्ति में लगे हुए हैं। संघ परिवार की दलितों के प्रति नीति काफी जटिल है। सन् 1980 में आरक्षण के मुद्दे पर दलित-विरोधी हिंसा, सन् 1986 में अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए पदोन्नति में आरक्षण के मुद्दे पर पिछड़े वर्गों के खिलाफ हिंसा और मंडल के खिलाफ कमंडल का इस्तेमाल, इस नीति के कुछ पहलू हैं।
इसके समानांतर, दलितों को हिन्दुत्व के झंडे तले लाने का षड़यंत्र भी जारी है। सन् 1980 के दशक के मध्य से संघ ने “सामाजिक समरसता मंचों“ की स्थापना शुरू की। इन मंचों का उद्धेश्य दलितों का हिन्दुकरण है। श्री श्री रविशंकर और अन्य कई बाबा ऊंची और नीची जातियों के हिन्दुओं के बीच सौहार्दपूर्ण संबंधों पर जोर देते रहे हैं परंतु दलितों के साथ हो रहे अन्याय के मुद्दे पर वे खामोशी ओढ़े हुए हैं। यह, साम्प्रदायिक राजनीति के लैंगिक और जातिगत ढांचे को जस का तस बनाए रखने के लक्ष्य के अनुरूप है।
सामाजिक समरसता मंचों द्वारा सामाजिक न्याय और जातिवादी अत्याचार के मुद्दों को हाषिए पर खिसकाने की कोशिश की जा रही है। इसके साथ ही, श्रेष्ठि वर्ग के सांस्कृतिक मूल्यों को पूरे समाज पर लादने की साजिश भी चल रही है। खान-पान की आदतें किसी भी समुदाय की संास्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग होती हैं। गौमांस, आदिवासियों और दलितों के भोजन का अविभाज्य हिस्सा है। यह भी दिलचस्प है कि शाकाहार को मांसाहार से श्रेष्ठ सिद्ध करने के अभियान भी चल रहे हैं। ऐसा बताया जा रहा है मानो मांसाहारी एक तरह के अपराधी हैं व स्वभाव से ही क्रूर है।
जहां एक ओर दलितों का एक बड़ा तबका सामाजिक और आर्थिक न्याय के लिए कठिन संघर्ष कर रहा है वहीं उनके हिन्दुकरण के प्रयास भी जारी हैं। उनकी खानपान की आदतों और जीने के तरीके पर किए जा रहे हमले इसी प्रयास का हिस्सा हैं। राज्यतंत्र दलितों के सामाजिक और प्रजातांत्रिक अधिकारों पर साम्प्रदायिक ताकतों के हमले को रोकने में असफल रहा है। न तो राज्य उन्हें जानोमाल की सुरक्षा दे सका है और न अवसर की समानता। और अब तो यह भी दूसरे तय करना चाहते हैं कि दलित और आदिवासी क्या खाएं और क्या नहीं। ऐसा लगता है कि आने वाले समय में गौमाता साम्प्रदायिक राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक बनने जा रही है। इस खेल से इस राजनीति के दो प्रमुख लक्ष्यों का आभास मिलता है। सतही तौर पर ऐसा लगता है कि इन ताकतों का एकमात्र उद्धेय अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखना है। असल में उनका एजेन्डा अधिक व्यापक है। वे अल्पसंख्यकों के साथ-साथ दलितों और आदिवासियों को भी सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में दमित बनाए रखना चाहते हैं।
-राम पुनियानी
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