रविवार, 15 जून 2014

कार्पोरेट की कोख से जन्मा दक्षिणपंथ का दानव

           दुनिया भर ने धड़कते दिलों के साथ 16 मई को संपन्न हुए पृथ्वी के सबसे विशाल जनतंत्र के चुनावी नतीजों को देखा। संसद में भारत की हिंदुत्ववादी भारतीय जनता पार्टी ने बहुमत प्राप्त किया। निवर्तमान शासक दल कांग्रेस को मात्र 44 सीटों पर संतोष करना पड़ा, कांग्रेस की हुई दुर्गति का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अन्य क्षेत्रीय दलों द्वारा जीती गई सीटों की संख्या कांग्रेस की 44 सीटों से कहीं अधिक है। जाहिर है कांग्रेस हुकूमत के दौरान पिछले दस सालों, विशेषकर पिछले पाँच वर्षों में इसके कुशासन, जनविरोधी आर्थिक नीतियों, आसन्न भ्रष्टाचार, भयावह बेरोजगारी और गैर जवाबदेही वाले तंत्र से जनता में भारी रोष था जिसका परिणाम उसे अपने संसदीय इतिहास में सबसे करारी हार के रूप में भुगतना पड़ा। 2014 के भारतीय आम चुनावों का मूल्यांकन भारतीय राज्य के अपने अन्तर्निहित द्वंद्वों की सही मायने में व्याख्या करने से ही किया जा सकता है। चुनाव परिणामों के बाद स्वाभाविक रूप से भारत की राजनीति में दक्षिणपंथी उभार अपनी तार्किक परिणति यानी पूर्ण वृत की दशा में पहुँच गया है जिसकी जुस्तजू में वह पिछले तीन दशकों से प्रयासरत था। कांग्रेस हुकूमत के दौरान पैदा हुए जनरोष और किसी कारगर विकल्प की गैर मौजूदगी ने संघ परिवार की राह गुजरात के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री पद के चुनाव पूर्व घोषित उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के लिए आसान कर दी। क्या भारत में दक्षिणपंथी राजनीति को दुनियाभर में चल रही राजनैतिक सक्रियता से अलग रख कर उसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए?
    भारत के चुनाव पर टीका करने से पूर्व एक बार दुनियाभर में चल रहे राजनैतिक घटनाक्रम पर एक सरसरी नजर दौड़ाना प्रासंगिक होगा। दक्षिणी अमरीका में क्यूबा के बाद समाजवादी नीतियों को लागू करने वाले दूसरे सबसे बड़े देश वेनेजुएला में इन दिनों  ह्यूगो शावेज सरकार को भारी संकट का सामना है। देश की दक्षिणपंथी ताकतें सड़कांे पर उतर कर प्रदर्शन कर रही हैं। सरकार का मानना है कि इस तथाकथित जन आन्दोलन को अमरीकी मीडिया सम्राट सीएनएन के भ्रामक प्रचार और शावेज सरकार द्वारा भगाए गए कार्पोरेट्स का भारी समर्थन है। सरकार विरोधी भारी प्रचार के चलते जनता को उकसाने का काम अमरीकी प्रचार तंत्र बखूबी कर रहा है। भारत के चुनाव के दौरान ही हंगरी में 6 अप्रैल को पुनः बहुमत (133/199) की एक दक्षिणपंथी सरकार चुनी गई। उक्रेन में चल रहे राजनैतिक उथल पुथल और सैन्य जमघटों (रूस-नाटो/ अमरीका) पर दुनिया की नज़र गत मार्च से लगी हुई है। इस उथल-पुथल में अमरीकी और नाटो देशों द्वारा जनतंत्र की आड़ में नव फासीवादी शक्तियों का समर्थन अब किसी से छिपा प्रश्न नहीं है। 30 मार्च को तुर्की में हुए स्थानीय निकायों के चुनाव में सत्तारूढ़ इस्लामी दक्षिणपंथी दल को लगभग 43 प्रतिशत वोट मिले। सीरिया में चल रहे गृह युद्ध में विपक्षी इस्लामी दक्षिणपंथी ताकतों को जनतंत्र बहाली के नाम पर अमरीकी, सऊदी और यूरोपीय देशों द्वारा आर्थिक एवं सैन्य सहायता दिया जाना एक खुली किताब है। अफ्रीकी उपमहाद्वीप में नाइजीरिया में बोकोहरम और माली में इस्लामी गुटों को अमरीकी पिट्ठू सऊदी का समर्थन जगजाहिर है। 2011 के अरब स्प्रिंग का गुलाब मुस्लिम ब्रदरहुड के जरिए मिस्र की धरती पर खिलते सभी ने देखा है और आज वहाँ चल रहे फौजी शासन पर किन विदेशी शक्तियों का प्रभाव है यह भी किसी से छिपा नहीं है। बहरीन में सुन्नी राजा के खिलाफ शिया जन असंतोष और उसमंे ईरानी धार्मिक, राजनैतिक और आर्थिक सहयोग सभी जानते हैं। हमने हाल ही में देखा कि पड़ोसी पाकिस्तान में पीपुल्स पार्टी की हुकूमत को जनता ने सेंटर राइट मुस्लिम लीग के जरिये सत्ता से बरतरफ किया, हमने हाल ही में नेपाल के चुनावों में सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी को सेंटर राइट दल कांग्रेस के हाथों सत्ताच्युत होते देखा है, ठीक भारत के नीचे हिंद महासागर में स्थित टापू देश मालद्वीप में भी यही सब कुछ हुआ। उपरोक्त घटनाक्रमांे पर यह सरसरी नजर इस तथ्य को प्रमाणित करती है कि आज जिस युग में हम जी रहे हंै, लगभग पूरे विश्व में दक्षिणपंथी ताकतें अपने उभार पर हंै। निश्चय ही जनता के मौलिक मुद्दों और उनकी बुनियादी समस्याओं को धर्म, क्षेत्र, राष्ट्र, भाषा, जाति आदि के प्रश्नों को उछाल कर उन्हें आसानी से भ्रमित किया जा सकता है और शासक वर्ग इन्हीं उथली संवेदनाओं के घोड़े पर सवार होकर अपनी लूट को जनता पर थोपने में सफल हो जाता है। सत्ता के इस अनूठे अनुष्ठान को व्यावहारिक रूप प्रदान करने में पूरी दुनिया पर एकछत्र राज करने वाला अमरीकी कार्पोरेट मीडिया अपनी निर्णायक भूमिका अदा करता है, यह सच अमरीका, कनाडा, यूरोप, मध्य पूर्व, वेनेजुऐला, अफ्रीका से लेकर भारत तक साफ तौर पर देखा जा सकता है। आज पूरे विश्व में ऐसा देश (कुछ एक खित्तों को छोड़ कर) खोजना मुश्किल है जहाँ कार्पोरेट मीडिया किसी भी चुनाव में खुद एक स्टेक होल्डर न हो। यह कौन नहीं जनता कि ‘विश्व पूँजी’ और ‘कार्पोरेट मीडिया’ एक ही  सिक्के के दो पहलू हंै और एक दूसरे के हितों के संरक्षक भी। यह तथ्य रखना यहाँ आवश्यक है कि दुनिया के 1500 प्रमुख अखबार, 1100 पत्रिकाएँ, 9000 रेडियो स्टेशन, 1500 टेलीविजन संस्थान, 2400 प्रकाशन समूहों का नियंत्रण मात्र 6 कार्पोरेट्स के हाथों में है। पूरी दुनिया के  इस नेटवर्क में देशी पूँजी को समाहित करना अथवा उसके हितों को सुरक्षा देना, उसे पल्लवित करना, इनका सहधर्म है। विभिन्न देशों के स्थानीय पूँजीपति की टाँगों के बिना यह पूरी दुनिया में अपने विस्तार और प्रभुत्व को स्थापित नहीं कर सकते।
    इस विश्व परिदृश्य के मद्देनजर भारतीय चुनावों और उसके परिणामों की स्वतःस्फूर्त मीमांसा करने में अब पाठकांे को सुविधा होगी। 1991 में नव उदारवाद के नाम पर नई आर्थिक नीतियों की शुरुआत नरसिम्हा राव सरकार के जमाने से हुई जिसके कर्ता
धर्ता तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह थे, उन्हीं नीतियों को अटल सरकार ने जारी रखा फिर उसके बाद मनमोहन सिंह की कांग्रेसी सरकार ने पिछले दस सालो में उसे विस्तार दिया। इन नीतियों के चलते भ्रष्टाचार अपने चरम पर पहुँचा और कमर तोड़ महँगाई से आम जनता की कमर टूट गई। अटल सरकार मात्र प्याज के मँहगे होने पर रुखसत हुई हो ऐसा कहना जल्दबाजी होगी, तब भी आसमान छूती सब्जियों, सेवाओं और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में भारी उछाल था, खुले बाजार की नीतियों के चलते मुनाफाखोरी अपनी चरम पर थी, ठीक वही परिदृश्य निवर्तमान मनमोहन सरकार के सामने मौजूद था जिसके ऊपर भ्रष्टाचार के भारी कलंकों ने शासक दल की इतनी कमर तोड़ दी कि कुछ बड़े मंत्रियों ने भारी जनाक्रोश देखते हुए चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया। इसी व्याप्त जन निराशा के माहौल में पिछले साल के अंत में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तीसरी बार चुनाव जीतने पर भारत के शासक वर्ग को एक ऐसा चेहरा मिल गया जिसकी सवारी करके वह अपने मंसूबों को राष्ट्रीय स्तर पर निर्बाध गति से जारी रख सकें। इन्हीं उदारवादी आर्थिक नीतियों के चलते भारत में गत 20 वर्षों के दरम्यान संपत्ति की एकाधिकार वादी प्रवृति जितनी तेजी से बढ़ी ऐसा आजाद भारत के इतिहास में पहली बार हुआ। एक अखबारी रपट के अनुसार 127 करोड़ लोगों के भारत के कुल घरेलू उत्पाद का दो तिहाई हिस्सा मात्र 8700 लोगों के हाथों में सीमित है, 65 करोड़ लोगों के पास जहाँ शौच करने की जगह नहीं है, उसी भारत में मुकेश अम्बानी 27 मंजिला मकान (अन्टिलिया) में रहता है जिसकी कीमत एक अरब डालर से अधिक है। टाटा द्वारा नैनो कार की फैक्ट्री पश्चिम बंगाल से उखाड़कर गुजरात में लगाने के बाद टाटा, अम्बानी और अडानी जैसे धन पशुओं को नरेंद्र मोदी के रूप में विकास का ऐसा विश्वसनीय मिथक मिल गया जो इनकी इजारेदारी में दिन दूनी रात चैगुनी तरक्की करने में मददगार साबित होगा। तीसरी बार मुख्यमंत्री की शपथ लेते ही उन तमाम विज्ञापन कम्पनियों और इमेज बिल्डिंग संस्थानांे को अब राष्ट्रीय स्तर पर प्रचार और मोदी के ब्रांड को स्थापित करने का ठेका मिल गया जिनकी कृपा से मोदी को गुजरात में चुनाव जीतने में सफलता मिली थी। क्या यह वही अहमदाबाद की सड़कांे पर स्कूटर चलाता साधारण संघ प्रचारक नरेंद्र मोदी है जिसे संघ ने स्कूटर से उठाकर गुजरात का मुख्यमंत्री 13 साल पहले बनाया था? उसके डिजाइनर खादी के कपडे, पगडि़याँ, स्टेज पर स्टार की भाँति अवतरण, भाषण कला, अभिनेताओं की भाँति भाव भंगिमाएँ, लच्छेदार भाषा, 13 वर्ष पुरानी नहीं बल्कि मात्र साल दो साल पुरानी है जिसकी पटकथा, कला संयोजन और डायरेक्शन सभी कुछ संयोजित और प्रायोजित है। भारत की राजनीति में नेताओं को किसी माॅडल के रूप में पेश करने का यह पहला प्रयोग है जिसके पीछे भारत का कार्पोरेट जगत बैठा है। भारत की कार्पोरेट ताकत ने अपने इस सफल प्रयोग के माध्यम से पूरी दुनिया को बता दिया है कि वह अपने धन, बल और छल की ताकत से जनमत को कैसे हाइजैक कर सकते हंै। उन्हीं के द्वारा संचालित मीडिया ने कुछ माह पूर्व एक नौटंकी को ‘अगस्त क्रांति’ का नाम देकर पूरे देश की जन भावनाओं को झकझोरा था और उसी मीडिया के पलटे रुख से नौटंकी के इन तथाकथित महानायकों की आम चुनाव में ऐसी  दुर्दशा बना दी कि उन्हें मात्र 4 सीटों पर संतोष करके औंधे मुँह गिरना पड़ा।
     भारत के आम चुनावों के इतिहास में 2014 का चुनाव सबसे महँगा चुनाव है। किसी राष्ट्रीय चैनल में तीन सेकेण्ड के एक स्लाट की कीमत 1 लाख रुपया है। पीक आवर्स में यह कीमत और बढ़ जाती है। भारत में करीब 800 टीवी चैनल्स है जिनमें 300 चैनल्स समाचार-विचार प्रसारित करते हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं के हवाले से नरेंद्र मोदी की ब्रांड बिल्डिंग अथवा चुनाव प्रचार में पाँच से दस हजार करोड़ रुपया खर्च किया गया है। संघ परिवार इस खर्च पर आपराधिक खामोशी रखते हुए उसे छिपाता है लेकिन यह बताने से नहीं चूकता कि पिछले छः माह में मोदी मात्र 5 घंटे सोये हंै, 15 सितम्बर 2013 से 3 लाख किलोमीटर सफर तय करके रिकार्ड 437 रैलियाँ की हंै, इसके अतिरिक्त नवरचनात्मक 1350 थ्री डी रैलियाँ भी की है। भारत में 2011 तक 82000 पत्र-पत्रिकाएँ और टेलिविजन चैनल्स पर (इन प्रचार-प्रसार संस्थाओं पर 100 से भी कम पूँजीपति घरानों का नियंत्रण है) जिस तरह विज्ञापनों और पेड न्यूज के माध्यम से पिछले तीन महीनों से लगातार प्रचार किया गया वह अपने आप में अभूतपूर्व है। भारत का चुनाव दुनिया में अमरीका के चुनाव के बाद दूसरा सबसे बड़ा खर्चीला चुनाव बन गया है। अमरीका के चुनाव पर 7 अरब डालर खर्च हुआ जबकि भारत में यह खर्च अखबारी अनुमानों के अनुसार पाँच अरब डालर पहुँच गया है, कैसी विडम्बना है कि  दोनों मुल्को की प्रति व्यक्ति आमदनी में करीब दस गुना फर्क है लेकिन चुनाव खर्च लगभग एक जैसा। चुनावों के दौरान ही लगभग 250 करोड़ रुपया भारत की भ्रष्ट पुलिस ने पकड़ा है जिसकी अखबारों में खबर छपी है, इससे चुनावों में काले धन के प्रयोग का सिर्फ एक अनुमान लगाया जा सकता है। इस खर्च पर कांग्रेस एंव अन्य दलों की चुप्पी भारत के लोकतंात्रिक भविष्य के प्रति एक आपराधिक मनोवृति है। ऐसी स्थिति में क्या गरीब मजलूमों की आवाज उठाने वाले दल भविष्य में कोई चुनाव लड़ सकेंगे? इतने भयावह चुनावी खर्च के बाद भी 34 प्रतिशत मतदाताओं ने वोट ही नहीं डाला जो एक चिंतनीय विषय है। 2014 के आम चुनावों में भारतीय मीडिया की कलई भी साफ तौर पर खुल चुकी है। पूरे चुनाव अभियान के दौरान यह पहला मौका था कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने गिने चुने मात्र तीन प्रायोजित साक्षात्कार दिए हों। मोदी के पीछे खड़ी इतनी बड़ी धन संपदा को देखकर मीडिया ने इस बहती गंगा में खूब हाथ धोए। बीबीसी की एक खबर के मुताबिक चुनाव अभियान के दौरान ही भारत में लगभग एक दर्जन नए न्यूज चैनल्स खुले। जाहिर है सभी को पैसा बनाना था और बनाया भी लेकिन प्रचार युद्ध के इस महासमर में खुद को एक योद्धा के रूप में प्रस्तुत भी करना था जो बखूबी किया भी गया। प्रचार के इन पारंपरिक अस्त्रों के अतिरिक्त टीम मोदी ने सोशल मीडिया का भी जबरदस्त प्रयोग किया। संघ-भाजपा ने बाकायदा आई टी सेल बनाकर एसएमएस, ट्वीटर और फेसबुक पर अपने प्रतिबद्ध और पेड कार्यकर्ताओं को दिन रात भारत और विदेश स्थित अपने तमाम स्र्रोतों के माध्यम से प्रचार किया जो अपने आप में एक अनुपम प्रयोग था। जाहिर है इन माध्यमों के जरिये उन्हें भारत के तकनीक संपन्न नौजवानों में अपना प्रभाव और प्रभुत्व स्थापित करने में बड़ी मदद मिली। चुनाव के दिन संघ के संगठन ने तैयार हुए वातावरण को वोटों में तब्दील करके अपना ऐतिहासिक दायित्व पूरा किया।
    नेता को किसी माॅडल अथवा प्रोडक्ट की भाँति पेशकर उसके लिए वोट करने को मजबूर करने के तमाम हथकंडे अपनाए गए। उन पर से विकास की बात, रोजगार की बात करते हुए मोदी ने चुनाव प्रचार के बीचो बीच अपने स्वर बदले। विकास पुरुष को जनता की सांप्रदायिक भावनाएँ भड़काने में, बंगलादेशियों प्रवासियों को बाहर निकालने, पाकिस्तानी नेताओं को कांग्रेस सरकार द्वारा बिरयानी खिलाने और यहाँ तक कि अपनी पिछड़ी जाति का उलाहना देकर दलितों को आकर्षित करने जैसे तमाम अस्त्र चलाते हुए भारत की जनता ने देखा सुना, गंगा पूजन आरती जैसे टोटके करते हुए कथित लौह पुरुष को पूरे देश ने प्रचार माध्यमों के जरिए देखा जबकि निचले स्तर के संघी-भाजपाई नेताओं ने मुजफ्फरनगर में दंगा कराने में शरीक भाजपा विधायकों का खुले मंच पर स्वागत सत्कार कर अपने फासीवादी इरादों को जाहिर किया। अमित शाह द्वारा आजमगढ़ को आतंकवाद का अड्डा बताना, गिरिराज सिंह द्वारा बिहार में मोदी विरोधियों को पाकिस्तान भेजे जाने जैसे सांप्रदायिक बयानों ने पूरे देश में चुनाव सांप्रदायिक आधार पर धु्रवीकृत करने में मदद की। समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान की बेलगाम जुबान ने निश्चय ही संघ और उसके इरादों को पूरा करने में मदद की। जिसके चलते चुनाव के दौरान ही असम में सांप्रदायिक दंगे हुए और दुनिया भर ने लाशों के व्यापारियों को धर्म के नाम पर लहूलुहान करते जनतंत्र के भारतीय नमूने को जी भर कर देखा।
    जाहिर है विज्ञापनों के जरिए माल बेचना विकसित देशों के समाज में एक स्थापित परंपरा है, दो डालर मूल्य के किसी उत्पाद को खरीदने से पूर्व उपभोक्ता विज्ञापित उत्पाद के ‘यूसर्स रिव्यू’ पढ़कर उत्पाद के बारे में उपभोक्ताओं/ उपयोगकर्ताओं के विचारों को जाँच परख कर ही उक्त उत्पाद को खरीदता है। भारतीय समाज में अभी यह परंपरा विकसित नहीं हुई है, लेकिन मोदी के प्रचार में उपभोक्ता बनाए गए मतदाताओं को इतना समय, समझ और संसाधनों को दिए बिना ही उन्हें मोदी ब्रांड का झुनझुना बेच दिया गया और विकल्पहीनता के अभाव में मोदी का ब्रांड भी गुजरात के एक कुख्यात वाशिंग पाउडर की तरह बिक गया जिसमें कास्टिक सोडा की मात्रा इतनी अधिक है कि बहुत से लोगों के हाथों में एलर्जी हो जाती है, कपड़ों की उम्र जो कम होती है वह नुकसान अलग।
    चुनाव परिणामों ने भारतीय लोकतंत्र के एक दूसरे महत्वपूर्ण छेद को भी उजागर किया है। पहली बार भाजपा को उसी मूलमंत्र का फायदा हुआ जिसके जरिए कांग्रेस ने देश में लगभग पाँच दशकों तक राज किया। कुल 31 प्रतिशत मत पाकर (17 करोड़) भाजपा की मोदी के नेतृत्व में बनने वाली सबसे कम मतों की बहुमत सरकार बन गई है। 11 करोड़ मत पाकर कांग्रेस को मात्र 44 सीटें मिली और 2 करोड़    मत पाकर बहुजन समाज पार्टी सोलहवीं संसद में अपना खाता भी नहीं खोल सकी। यह लोकतंत्र की विडंबना है या भारतीय लोकतंत्र का चमत्कार कि विपक्षी मतों के बँटवारे का फायदा उठाकर तथाकथित अल्पमत वाले दल सवा सौ करोड़ के मुल्क पर छाती ठोककर हुकूमत करते हैं। निश्चय ही भारतीय राज्य व्यवस्था में मतों के अनुपात के अनुसार (जैसा कि कई यूरोपीय देशों में होता है) संसदीय सीटों के वितरण के विकल्प को चुनने का समय आ गया है ताकि मतदान में पड़े हर एक वोट की कीमत संसद में उसकी आवाज के रूप में पहुँचे। मिशन 272 प्रचारित करने वाली भाजपा को उनकी आशा से अधिक मिली सीटों ने उनके सीने फुला दिए हैं। विजय जुलूस को खिताब करते हुए मोदी ने धन बल के आधार पर अपने पहले भाषण में ही दस साल का समय माँगा है। घृणित पूँजी को अपने दोहन के लिए भारत में फासीवादी चेहरे को स्थापित करने के मंसूबे अब बेनकाब हो चुके हैं। गुजरात में मोदी ने अपने शासनकाल में अपनी ही मजदूर इकाई भारतीय मजदूर संघ का गला घोटकर रखा है, मोदी ने अपनी ही पार्टी के स्वदेशी आन्दोलन को गुजरात में आक्सीजन पर रखा है। चुनाव प्रचार के दौरान ही वालमार्ट ने अपने भारतीय विस्तार की खबरों से सभी आर्थिक विश्लेषकों को चैंकाया है। ये सभी ऐसे संकेत हैं जिनके आधार पर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि पूरे भारत पर गुजराती माॅडल का आवरण चढ़ाने की नारकीय पूँजीवादी नीतियों को थोपने के कारण ही मोदी के चुनाव पर  धनपशुओं ने अपने खाते खोले हैं। भारत की सबसे प्रबुद्ध आर्थिक और सामाजिक मामलों की ख्याति प्राप्त पत्रिका ‘इकोनाॅमिक एंड पोलिटिकल वीकली’ ने अपने हालिया सम्पादकीय में बहुत सारगर्भित टिप्पणी करते हुए 2014 के चुनावों को भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी कार्पोरेट डकैती लिखा है। इस डकैती के महानायक नरेद्र मोदी हंै और वे
धनपशु ताकतें जिनकी योजनाओं को क्रमबद्ध तरीके से लागू करने में संघ और उसकी भाजपा दंडवत है। निश्चय ही अब कोई पोस्को अथवा वेदांता भारत से बाहर नहीं भगाया जाएगा, भूमि अधिग्रहण का गुजरात फार्मूला अब पूरे देश पर लागू होगा। भारत के संसाधनों पर विदेशी पूँजी अपना कब्जा पहले से बेहतर बनाएगी और जनता को देशभक्ति के सबसे बड़े पाठ यानी पड़ोसियों के साथ युद्ध जल्दी पढ़ने को मिलेंगे, पूँजीवाद ने फासीवाद का आवरण जब जब दुनिया में कहीं भी ओढ़ा है उन देशांे में भारी जन धन की बर्बादी हुई है, क्या भारत इतिहास के उसी मुहाने पर खड़ा है जहाँ से लौट कर जाने की क्षतिपूर्ति  मानव जाति को अकल्पनीय कुर्बानियाँ देकर चुकानी पड़ी हैं?      
-शमशाद इलाही ‘‘शम्स’’



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