सोमवार, 1 अप्रैल 2013

हिंदू धर्म को पुनर्परिभाषित करने का प्रयास




यद्यपि धर्म को परिभाषित करना, मूलतः, धर्मशास्त्रियों का काम है, तथापि समय.समय पर विभिन्न न्यायिक अधिकरण और न्यायाधीश, अपनी.अपनी बुद्धि व सोच के आधार परए हिंदू धर्म की प्रकृति के सम्बन्ध में अपने.अपने विचार व्यक्त करते रहे हैं. इनमें से अधिकांश की सोच वर्तमान राजनीति से प्रेरित रही है .. उस राजनीति से जो हिंदू धर्म को अपने लक्ष्यों के अनुरूप परिभाषित करना चाहती है यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि हाल में आयकर अपीलीय अधिकरण ने यह घोषणा कर दी कि हिंदू धर्म, दरअसल, कोई धर्म ही नहीं है और यह कि शिव, हनुमान और देवी दुर्गा किसी धर्म.विशेष का प्रतिनिधित्व नहीं करते वरन वे तो बरह्मंड की महाशक्तियां हैं! इसी माह पारित अपने एक आदेश  में, आयकर अपीलीय अधिकरण, नागपुर ने कहा कि हिंदू देवी.देवताओं की पूजा.अर्चना और मंदिर के रखरखाव को धार्मिक गतिविधियां नहीं कहा जा सकता.
न्यायाधिकरण ने कहा कि तकनीकी दृष्टि से हिंदू  धर्म, कोई धर्म नहीं है और ना ही हिंदुओं को धार्मिक समुदाय कहा जा सकता है, शिव मंदिर देवस्थान पञ्च समिति सनातनीश् ने यह तर्क प्रस्तुत किया था कि  चूँकि उसके द्वारा संचालित मंदिर के द्वार सभी धर्मों और पंथों के लोगों के लिए खुले हुए हैं इसलिए मंदिर किसी धर्म.विशेष का नहीं है और मूर्तियों की स्थापना, धर्मिक गतिविधि नहीं है.
यह तर्क नितांत हास्यास्पद है क्योंकि मूर्तिपूजा, हिंदू धर्म का महत्वपूर्ण भाग है और इस्लाम व ईसाई धर्म के मानने वालेए मूर्तिपूजा नहीं करते. मूर्तिपूजा, निःसंदेह, हिंदू धार्मिक गतिविधि है यही कारण है कि राममंदिर आन्दोलन खड़ा किया गया और बाबरी मस्जिद को जमींदोज किया गया ताकि उसके स्थान पर राम मंदिर का निर्माण कर, उसमें रामलला की मूर्ति स्थापित करने का धार्मिक कर्त्तव्य पूरा किया जा सके. शिव, हनुमान और देवी दुर्गा को श्महाशक्ति बताने का क्या उद्देश्य है? वर्तमान विश्व राजनीति मेंए अमरीका को विश्व की महाशक्ति कहा जाता है. अधिकरण ने दुर्गा, हनुमान व शिव को बरह्मंड की महाशक्तियां बताया है.अधिकरण के विद्वान सदस्यों को यह पता होना चाहिए कि हिंदू धर्म में अलौकिक शक्ति की अवधारणा बहुस्तरीय है.इसकी शुरुआत होती है, बहुदेववाद से, जिसमें अलग.अलग देवी.देवताओं के अलग.अलग कार्यक्षेत्र है.वर्षा के देवता इन्द्र हैं तो मारूत, हवा के देवता है. शक्ति की प्रतीक दुर्गा हैं तो सरस्वती, ज्ञान की देवी हैं.यहाँ तक कि सेक्स.सम्बन्धी मामलों का प्रभारी एक अलग देवता ;कामदेव है. इसके ऊपर का स्तर त्रिदेववाद का है, जहाँ ब्रह्मा, सृष्टि निर्माता हैंए विष्णुए पालनकर्ता हैं और शिव, विनाशक हैं. तीसरे स्तर पर एकेश्वरवाद है,जिसमें केवल एक ईश्वर की परिकल्पना है हनुमान तो एक पौराणिक चरित्र हैं, राम के सेवक है और उन्हें भगवान भी कहा जाता है.
ये सारी अवधारणाएँ हिंदू धर्म का भाग हैं और यह कहना कि इनमें सभी धर्मों के लोग विश्वास करते हैंए सच को झुठलाना है हिंदू धर्म के अलग अलग पंथ, अलग.अलग देवताओं की आराधना करते हैं इनमें से कुछ विष्णु के अवतार हैं जैसे राम और कृष्ण. यूनानी धर्मशास्त्र में भी कुछ.कुछ इसी तरह का बहुदेववाद है. ईसाई धर्मं में पिताए पुत्र और पवित्र आत्मा का त्रिदेववाद प्रचलित है,ये सभी मान्यताएं धर्म.विशेष से जुड़ी हुईं हैं और इतर धर्मों पर लागू नहीं होतीं.अधिकरण के आदेश के विपरीत, हम जानते हैं कि बौद्ध व जैन जैसे कुछ धर्म अलोकिक शक्तियों में विश्वास नहीं करते. भारत में विकसित कुछ और धार्मिक परम्पराओं जैसे चार्वाक की भी अलौकिक शक्तियों में आस्था नहीं थी.
जहाँ तक न्यायाधिकरण के इस निष्कर्ष का प्रश्न है कि हिंदू, कोई धर्म नहीं हैं क्योंकि उसमें कई अलग.अलग धारायें हैं, उसे तुरंत खारिज किया जा सकता है. इसमें कोई संदेह नहीं कि हिंदू धर्म में विभिन्न धाराएं हैं परन्तु इसका कारण यह है कि इस धर्म का कोई एक पैगंबर नहीं है. यह धर्म किस्तों में, एक लंबे अंतराल में,  अस्तित्व में आया है. इसलिए इस धर्मं में विभिन्नताएं तो हैं परन्तु ये विभिन्नताएं, हमें यह इज़ाज़त नहीं देतीं कि हम इस इसे एक धर्म ही न मानें.
इसमें कोई संदेह नहीं कि हिंदू धर्म की कोई सर्वमान्य परिभाषा देना कठिन है. इसके कई कारण हैं. पहला यह कि इस धर्म का कोई एक जन्मदाता नहीं है. दूसरा यह कि दुनिया के इस भूभाग में उभरे दो विभिन्न धर्मों को हिंदू धर्म का हिस्सा मान लिया गया है और तीसरे, हिंदू धर्म में इतनी विभिन्नताएं हैं कि उसे एक झंडे.तले रखना मुश्किल प्रतीत होता है.   विशेष बात यह है  कि अलग.अलग समय में स्थापित परंपराएं और कर्मकांड, आज भी इस धर्म का हिस्सा बने हुए हैं. भगवान सत्यनारायण से लेकर संतोषी माता और  देवी दुर्गा से लेकर निराकार, निर्गुण ईश्वर की परिकल्पनाएं इस धर्म में एक साथ जीवित हैं.
हिंदू धर्म जिस मामले में अन्य धर्मों से भिन्न है वह है उसकी जाति व्यवस्था. यह धर्म सामाजिक ऊंचनीच को धार्मिक स्वीकार्यता प्रदान करता है. जाति व्यस्वथा को हिंदू धर्म के ग्रंथों और उसकी परंपराओं व रीति.रिवाजों में स्वीकृति प्राप्त है. जिन   परिस्थितियों में यह व्यवस्था अस्तित्व में आयी, उनसे भी हमें इसे समझने में मदद मिलती है. आर्य, जो कई दौरों में भारत आये, पशुपालक और बहुदेववादी थे. शुरुआती दौर में वेद रचे गए, जो तत्कालीन समाज के मूल्यों की झलक हमें  दिखलाते हैं. वह बहुदेववाद का युग था और अलग.अलग देवताओं के पास अपने.अपने विभाग  थे. मनु के नियम समाज के पथप्रदर्शक थे, वैदिक युग के बाद आया, ब्राह्मणवाद का युग, जिसमें समाज बाहरी प्रभावों से दूर रहा. जाति व्यवस्था के चलते, समाज का अभिजात्य वर्ग को सामान्यजनों से दूरी बनाने में जाति व्यवस्था ने मदद की. इसके बाद, जाति व्यवस्था को बौद्ध धर्म की चुनौती ने ब्राह्मणवाद को  बदलने पर मजबूर किया और उसके नतीजे में वह अस्तित्व में आया, जिसे हम आज हिंदू धर्म कहते हैं. इस दौर में  पंथिक प्रथाओं  के निर्वहन में आमजनों को भी शामिल किया गया और सार्वजनिक कर्मकांडों और अनुष्ठानों का सिलसिला प्रारंभ किया गया ताकि आम लोगों को बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित होने से रोका जा सके.
यह दिलचस्प है कि आठवीं शताब्दी तक, तथाकथित हिंदू ग्रंथों में, हिंदू शब्द का कहीं प्रयोग नहीं किया गया है. यह शब्द तो अरब निवासीयों और मध्य.पूर्व के मुसलमानों के इस भूभाग पर आगमन के बाद अस्तित्व में आया. वे सिंधु नदी के पूर्व में रहनेवालों को हिन्दू कहने लगे. प्रारंभ में, हिंदू शब्द का भौगोलिक अर्थ था.इसके बाद, इस क्षेत्र में विकसित हो रहे धर्मों को हिंदू धर्मों की संज्ञा दी गयी. जाति व्यवस्था के कारण, हिंदू धर्म में धर्मप्रचार के लिए कोई स्थान नहीं था. उलटे, जाति व्यवस्था के पीड़ितों ने बौद्ध, इस्लाम और बाद में ईसाई व सिक्ख धर्मों को अपनाने की हर संभव कोशिश की.
हिंदू धर्म में भी दो धाराएं स्पष्ट नज़र आतीं हैं . ब्राह्मणवादी और श्रमण परंपरा. श्रमण परंपरा ने  जाति व्यस्वथा को ख़ारिज किया और ब्राह्मणों के प्रभुत्व का विरोध. ब्राह्मणवाद का प्रभुत्व बना रहा परन्तु साथ ही अन्य धाराएँ जैसे तंत्र, भक्ति, शैव, सिद्धांत आदि का अस्तित्व भी बना रहा.श्रमण परंपरा ने वैदिक नियमों और मूल्यों को तरजीह नहीं दी.जहाँ ब्राह्मणवाद, समाज को जातियों के खांचों में बांटता था, वहीं श्रमणवादी इस विभाजन के विरोधी थे.ब्राह्मणवाद हिंदू धर्म की प्रधान धारा इसलिए बना रहा क्योंकि उसे राज्याश्रय मिला. कालांतर में, नीची जातियों की धार्मिक परंपराओं को नकार कर, ब्राह्मणवाद को ही हिंदू धर्म के रूप में स्वीकार कर लिया गया. यह प्रक्रिया, मगध.मौर्य साम्राज्य के दौरान बौद्ध व जैन धर्मों के दमन के बाद शुरू हुई. बाद में, अंग्रेजों ने, भारतीय समाज को समझने के अपने प्रयास के चलते, सभी गैर.ईसाई व गैर.मुसलमानों को, ब्राह्मणवादी मानदंडों पर आधारित, हिंदू पहचान दे दी. वेदों व अन्य ब्राह्मणवादी ग्रंथों को हिंदू ग्रन्थ कहा जाने लगाण् इस प्रकार, हिंदू धर्म में निहित विभिन्नताओं को परे रक् कर, केवल ब्राह्मणवाद को हिंदू धर्मं का दर्ज़ा दे दिया गया. जिसे हम आज हिंदू धर्मं कहते हैं, दरअसल वह, ब्राह्मणवादी कर्मकांडों, ग्रंथों व ब्राह्मणों की सत्ता पर आधारित है.
वर्तमान हिंदू धर्म, धर्म के सभी समाजशास्त्रीय मानदंडों पर खरा उतरता है.यह अलग बात है कि उसपर ब्राह्मणवाद का वर्चस्व है. यह कहना कि हिंदू कोई धार्मिक समुदाय नहीं है, पूरी तरह से गलत है.
-राम पुनियानी

2 टिप्‍पणियां:

saralhindi ने कहा…

May be Hinduism is based on Brahmin's marketing ideas by creating various shapes of murti that can dwell in temple so he can have better place to earn lively hood without working hard in the fields. Sanskrit was not taught to masses in the past so they can have better jobs in temples in performing rituals.Would this lower caste people qualify as priest if they learn Sanskrit in holy Devanagari script??Those who promote Hindi know English very well but encourage others not to learn English.Also they make good living by doing Hindi/English translations compared to regional languages translations.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
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इंजीनियर प्रदीप कुमार साहनी अभी कुछ दिनों के लिए व्यस्त है। इसलिए आज मेरी पसंद के लिंकों में आपका लिंक भी चर्चा मंच पर सम्मिलित किया जा रहा है और आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार (03-04-2013) के “शून्य में संसार है” (चर्चा मंच-1203) पर भी होगी!
सूचनार्थ...सादर..!