शुक्रवार, 7 जून 2013

नफरत से प्यार करने वालों को करें नजरअंदाज



घृणा फैलाने वाली वक्तव्य और साम्प्रदायिक राजनीति

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महात्मा गांधी जिन्होंने साम्प्रदायिक सद्भाव की खातिर अपनी जिंदगी कुर्बान कर दी . जिन्हें इसलिए मौत के घाट उतार दिया गया क्योंकि वे विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच प्रेम की बात करते थे . उन महात्मा के पास तीन बंदरों की एक छोटी सी मूर्ति थी। इनमें से एक बंदर अपने मुंह पर हाथ रखे हुए था। इसका अर्थ यह था कि हमें बुरा नहीं बोलना चाहिए। जो लोग शांति और अमन की राह पर चल रहे हैं, वे विभिन्न धार्मिक समुदायों को एक करने की बात करते हैं जिनके लिए राजनीति एक व्यापार है, जिसे वे धर्म के नाम पर खेलते हैं, वे लगातार दूसरे समुदायों के विरूद्ध जहर उगलते रहते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस तरह की घृणा फैलाने वाली बातों से हिंसा भड़कती है और विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच की खाई और चौड़ी होती है। हमारी यह स्पष्ट मान्यता है कि राजनैतिक दलों और समूहों की उनकी नीतियों को लेकर आलोचना की जा सकती है और की जानी चाहिए . यह बुरा बोलना नहीं है और न ही यह किसी धार्मिक समुदाय विशेष पर हमला है। घृणा फैलाने वाली बातें साम्प्रदायिक राजनीति के पैरोकारों का प्रमुख हथियार हैं। उन्हें यह अच्छी तरह से मालूम है कि "दूसरे से घृणा करो"की राजनीति चुनाव में उन्हें बहुत लाभ पहुंचा सकती है।
इस संदर्भ में, सबसे ताजा मामला वरूण गांधी का है। उनका महात्मा गांधी से कोई लेना देना नहीं है परन्तु वे साम्प्रदायिक सद्भाव के एक बहुत बड़े मसीहा पंडित जवाहरलाल नेहरू के परिवार से हैं। वरूण गांधी ने सन् 2009 में एक आमसभा में घृणा फैलाने वाली बातें कहीं थीं। पीलीभीत में भाषण देते हुए उन्होंने दूसरों के हाथ काट डालने और ऐसी ही कई बेहूदा और निम्नस्तरीय बातें कहीं थीं। उनके भाषण को कैमरे पर रिकार्ड कर लिया गया और उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज कर लिए गए। सारे सबूतों के होते हुए भी उन्हें अदालत ने बरी कर दिया क्योंकि सभी गवाह पलट गए। यह घटनाक्रम हमें गुजरात के बेस्ट बेकरी मामले की याद दिलाता है, जहां भी धन के लालच में या डर के चलते अधिकांश गवाह पक्षद्रोही हो गये थे। तहलका द्वारा किये गये स्टिंग आपरेशन से यह साफ हुआ कि भाजपा कार्यकर्ताओं ने किस प्रकार या तो गवाहों को खरीद लिया था या फिर उन्हें डरा.धमका कर अदालत में अपने ही पहले के बयानों से मुकरने पर मजबूर कर दिया था। भारत में गवाहों की सुरक्षा के लिए कोई कानून नहीं है। सामाजिक कार्यकर्ता लम्बे समय से यह मांग कर रहे हैं कि सुनियोजित हिंसा के पीड़ितों को न्याय दिलवाने के लिए यह आवश्यक है कि गवाहों को उनके जानोमाल की हिफाजत की गारंटी दी जाए। जहीरा शेख मामले में भी निचली अदालत ने गवाहों के पक्षद्रोही हो जाने के कारण  आरोपियों को बरी कर दिया था।
वरूण गांधी के मामले ने एक बार फिर देश का ध्यान गवाहों के पलटने की समस्या पर केन्द्रित किया है। तहलका ने एक बार फिर यह साबित किया है कि गवाहों को "मैनेज" किया गया था।  इसमें कोई संदेह नहीं कि घृणा फैलाने वाले लोगों को यदि इसी प्रकार दोषमुक्त किया जाता रहा तो उनके हौसले बढ़ते ही जायेंगे। इस मुद्दे से एक और पहलू जुड़ गया है। हाल में "आल इंडिया मजलिस ए इत्तहादुल मुसलमीन" के अकबरद्दीन ओवेसी को गिरफ्तार किया गया और वे अपने "हिन्दू विरोधी भाषण" के लिए मुकदमें का सामना कर रहे हैं। यह बिलकुल ठीक हो रहा है। दोषियों को सजा मिलनी इसलिए जरूरी है ताकि इस तरह की घटनाएं दोहराई ना जाएं। ओवेसी के भाषण के जवाब में प्रवीण तोगड़िया ने भी उतना ही भडकाऊ भाषण दिया। उनके विरूद्ध एफआईआर तो दर्ज कर ली गई परन्तु इससे आगे कोई अब तक कोई कार्यवाही नहीं हुई। उन्हें गिरफ्तार तक नहीं किया गया। तोगड़िया इस खेल के पुराने खिलाड़ी हैं परन्तु उन्हें केवल एक बार जेल की सलाखों के पीछे डाला गया है। जाहिर है कि उनकी हिम्मत बढ़ती जा रही है।
घृणा फैलाने वाले भाषणों के मामले में भारतीय संविधान और कानूनों में बहुत स्पष्ट प्रावधान हैं। भारतीय दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता और कई अन्य कानून, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा को परिभाषित करते हैं और घृणा फैलाने वाली बातें कहने या लिखने को प्रतिबंधित करते हैं। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 95ए राज्य सरकार को किसी भी प्रकाशन को प्रतिबंधित करने का हक देती है अगर राज्य सरकार की दृष्टि में प्रकाशन में ऐसी कोई बात कही गई है जो भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए या 153 ए या 153 बी या 292 या 293 या 295 ए के तहत् दण्डनीय अपराध है। भारत नागरिक और राजनैतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय समझौता;आईसीसीपीआर का हस्ताक्षरकर्ता है, जो यह कहता है किराष्ट्रीय, नस्लीय या धार्मिक आधार पर घृणा फैलाने की ऐसी कोशिश, जिसका उद्देश्य हिंसा भड़काना, शत्रुता का भाव उत्पन्न करना या भेदभाव करने के लिए प्रेरित करना हो, कानून के अन्तर्गत प्रतिबंधित होगी। हमें यह याद रखना चाहिए कि हर समुदाय में विभिन्न प्रकार के लोग होते हैं। जब कोई व्यक्ति किसी समुदाय विशेष के बारे में घृणा फैलाने वाली बातें कहता है तो वह उस समुदाय के सभी सदस्यों को एकसार बताता है। यह तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। एक सेवानिवृत्त अधिकारी जे.बी. डिसूजा ने बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद मुंबई में हुई हिंसा के दौरान और उसके पश्चात, घृणा फैलाने वाली बातें कहने के आरोप में बाल ठाकरे के विरूद्ध मामला दायर किया था। परन्तु उन्हें उनके इस प्रयास में कोई खास सफलता नहीं मिल सकी, क्योंकि हमारे कानून में ढेर सारे छेद हैं।
यद्यपि मूलतः भारत की सांस्कृति शांति और सद्भाव की संस्कृति है तथापि विशिष्ट धार्मिक समुदायों को घृणा का पात्र बनाने के प्रयास ब्रिटिश शासन काल में ही शुरू हो गये थे। अपनी फूट डालो राज करो की नीति के तहत ब्रिटिश शासकों ने इतिहास का साम्प्रदायिकीकरण किया और साम्प्रदायिक तत्वों को एक दूसरे के समुदायों के विरूद्ध लोगों को भड़काने के लिए प्रोत्साहित किया।  अंग्रेजों ने अपनी विभाजनकारी राजनीति खेलने के लिए हिन्दू और मुस्लिम समुदायों को चुना। दोनों धर्मों के लोगों की जीवन शैली के कुछ चुनिंदा पक्षों को घृणा फैलाने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा। सूअर का मांस खाना, गाय का मांस खाना, मस्जिद के सामने बाजे बजाना, मंदिरों का विध्वंस, तलवार की नौंक पर इस्लाम का प्रसार आदि कुछ ऐसी चुनिंदा थीम थीं, जिनका इस्तेमाल दशकों तक घृणा फैलाने और हिंसा भड़काने के लिए किया जाता रहा। आडवाणी की रथयात्रा में भी इन्हीं मुद्दों को प्रमुखता से उठाया गया था। मुस्लिम राजाओं द्वारा मंदिरों का विध्वंस करने के मुद्दे को पागलपन की हद तक हवा दी गई। एक जुनून.सा पैदा कर दिया गया। इस घृणा से उपजी हिंसा और रथयात्रा जहां जहां से भी गुजरी, वहां खून बहा।
आज भी कई लोग बांटने वाले दुष्प्रचार का बड़ी कुटिलता से इस्तेमाल कर रहे हैं। कई वेबसाईटें इस काम में जुटी हुई हैं और भड़काऊ ई.मेलों को एक व्यक्ति से दूसरे, दूसरे से तीसरे को भेजा जा रहा है। सुब्रमण्यम स्वामी एक अन्य ऐसे राजनेता हैं जो नियमित तौर पर घृणा फैलाने वाली बातें कहते रहें हैं परन्तु उनके खिलाफ कुछ नहीं हुआ। मुसलमानों के प्रति घृणा से लबरेज उनके एक लेख के प्रकाशन के बाद यद्यपि भारत में उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गई तथापि अमरिका के एक विश्वविद्यालय से उनकी प्रोफेसरी समाप्त कर दी गई। आज भी उनकी घृणा फैलाने वाले भाषण के वीडियो इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। ऐसी चीजों को हमारा समाज नजरअंदाज करता आ रहा है परन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस तरह के वीडियो, ई.मेल और भाषण हमारी राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुंचाते हैं। वरूण गांधी के मामले से यह साफ है कि हमारी न्याय व्यवस्था में दोषियों के लिए बच निकलना बहुत आसान है। वे घृणा फैलाने वाली बातें कहकर राजनैतिक लाभ भी अर्जित कर लेते हैं और बाद में उन्हें अपने किए की कोई सजा भी भुगतनी नहीं पड़ती है।
वैश्विक स्तर पर 9/11 के डब्ल्यूटीसी हमले के बाद से अमरीकी मीडिया में इस्लाम और मुसलमानों को खलनायक सिद्ध करने का अभियान चल रहा है। इसी अभियान का यह नतीजा यह है की वहां पर आम मुसलमानों पर हमले हो रहे हैं। हाल में इंग्लैण्ड में भी इस तरह के हमले बढ़े हैं। इनमें शामिल हैं ड्रम वादक लीराईट बी की वुलेच में हत्या। हम एक डरावने दौर से गुजर रहे हैं जब प्रेम और सद्भाव के मूल्यों को हर ओर से चोट पहुंचाई जा रही है।
अपनी एक कविता में जावेद अख्तर लिखते हैं भूल के नफरतए प्यार की कोई बात करें। काश हम सब इसे गंभीरता से लेते। वरूण गांधी, ओवेसी, तोगड़िया जैसे लोग जहां नफरत की तिजारत कर रहे हैं वहीं ऐसे लोग भी हैं जो शांति मार्च निकाल रहे हैंए अमन के गीत गा रहे हैं और सद्भाव की खुशबू फैला रहे हैं। हमारे ये ही मित्र राष्ट्रीय एकीकरण की नींव रखेंगे और घृणा फैलाने वाली बातों पर विजय प्राप्त करेंगे। अब समय आ गया है कि हम उन सब लोगों को एक सिरे से खारिज करें जो किसी धर्म विशेष या उसके मानने वालों को घृणा का पात्र सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं।
.-राम पुनियानी

1 टिप्पणी:

raj ने कहा…

shayad ap ko it I has kind jankari hi hair tab hi apko such hi dikhta.kya ap ko bhagalpur Sikh virodhi dange 2002 see pahle k dange nhi.ap logon k isi sautiya daah Ne modi ko itna popular kiya hai.rote rahiye