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शनिवार, 2 जुलाई 2011

ओबामा, ओसामा और अफ-पाक

अमरीकी सैनिक कार्यवाही में ओसामा बिन लादेन की मौत ने कई प्रश्नों को जन्म दिया है और कई छिपी हुई सच्चाइयाँ उजागर हुईं हैं। यह स्पष्ट है कि अमरीका ने एक सफल सैनिक कार्यवाही में, अल् कायदा के मुखिया और दुनिया के सबसे दुर्दान्त आतंकवादी ओसामा बिन लादेन का खात्मा कर दिया है। इस कार्यवाही को अंजाम देने के लिए, जिस उच्च प्रशिक्षित कमांडो दस्ते का इस्तेमाल किया गया, उसने पाकिस्तान की हवाई सीमा का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन किया।
बराक हुसैन ओबामा सातवें आसमान पर हैं। उनके नेतृत्व में अमरीका ने वह हासिल किया है, जिसे पाने की कोशिश अमरीकी गुप्तचर एजेन्सियाँ दस साल से कर रही थीं। ओबामा का खुश होना स्वाभाविक है। एक ओर वे नोबेल शांति पुरस्कार के विजेता हैं तो दूसरी ओर उनकी छवि एक ऐसे ताकतवर नेता की बन गई है जो अपने दुश्मनों का सफाया कर देता है। अगले चुनाव में उनकी जीत की संभावना काफी बढ़ गई है।
दूसरी ओर, पाकिस्तान सरकार एक अजीबो-गरीब परिस्थिति में फँस गई है। पाकिस्तान लगातार यह कहता रहा है कि ओसामा उसके देश में नहीं है, व यह भी कि पाकिस्तान, आतंकियों की पनाहगाह नहीं है और इसके बाद क्या हुआ? ओसामा, पाकिस्तान की सबसे प्रसिद्ध सैन्य प्रशिक्षण अकादमी से पैदल तय की जा सकने वाली दूरी पर पाया गया।
अमरीका ने पाकिस्तान को जमकर अपमानित किया है। अमरीका ने पाकिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन किया। उसने पाकिस्तान की धरती पर सैनिक कार्यवाही करने से पहले पाकिस्तान की अनुमति लेना तो दूर, उसे सूचित करना तक जरूरी नहीं समझा। पाकिस्तान के घावों पर नमक छिड़कते हुए, अमरीका ने अपने सैन्य बलों का दूसरे देश में इस्तेमाल करने के लिए माफी माँगने से भी इंकार कर दिया है। ऐसी आशंका जताई जा रही है कि इसी प्रकार की सैनिक कार्यवाही के जरिए अमरीका, पाकिस्तान के परमाणु हथियारों के जखीरे को नष्ट कर सकता है। पाकिस्तान के ओसामा के बारे में लगातार झूठ बोलने के कारण यह माँग भी उठ रही है कि पाकिस्तान को “आतंकी राष्ट्र“ घोषित किया जाए। और तो और, भारतीय सेना प्रमुख तक ने भी ताल ठोककर यह कहा है कि भारतीय सैन्य बल भी पाकिस्तान के भीतर ऐसी ही सैनिक कार्यवाही करने में सक्षम हैं।
ओसामा की मौत के शोर-शराबे में कई सच्चाइयाँ दब सी गई हैं, ओसामा की मौत को एक आतंकी का अंत मात्र समझना गलत होगा। इस मामले में सच की कई परते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अमरीका ही अल् कायदा का जनक है। इस तथ्य को आखिर क्यों छुपाया जा रहा है कि अमरीका ने ही ओसामा बिन लादेन को अफगानिस्तान में सोवियत सेनाओं से लड़ने के लिए धन और हथियार दिए थे? अमरीका आज भले ही पाकिस्तान को ओसामा को शरण देने का दोषी बता रहा हो परंतु क्या यह सच नहीं है कि पाकिस्तानी सेना और आई.एस.आई., मध्यपूर्व के तेल संसाधनों पर कब्जा जमाने की अमरीकी रणनीति के महत्वपूर्ण मोहरे रहे हैं?
कुछ दशक पहले तक, शीत युद्ध का दौर था। उस समय आतंकवाद नहीं बल्कि साम्यवाद, अमरीका का दुश्मन नंबर वन हुआ करता था। अमरीका का लक्ष्य था पूरी दुनिया पर आर्थिक, राजनैतिक व सैनिक दबदबा जमाना और उसकी राह में सबसे बड़ा रोड़ा था समाजवादी देशों का गुट। इसी दौरान, अफगानिस्तान की कम्यूनिस्ट सरकार ने देश में भू-सुधार करने का कार्यक्रम हाथ में लिया और उसकी मदद के लिए सोवियत सेनाएँ अफगानिस्तान में काबिज हो गईं।
सोवियत संघ की इस कार्यवाही का विरोध करने के लिए, अमरीका ने क्षेत्र में कट्टरपंथी इस्लाम को प्रोत्साहन देना शुरू कर दिया। यह वह समय था जब वियतनाम में मुँह की खाने के बाद, अमरीकी सेना का मनोबल टूट चुका था और अमरीका, अपनी सेनाएँ अफगानिस्तान में भेजने की स्थिति में नहीं था।
सोवियत सेना से मुकाबला करने के लिए अमरीका ने एक चतुर रणनीति अपनाई। उसने इस्लाम के कट्टरपंथी संस्करण को प्रोत्साहन व समर्थन देना शुरू कर दिया। अमरीका के सी.आई.ए. ने आई.एस.आई. की मदद से पाकिस्तान में मदरसों की स्थापना करवाई। इन मदरसों में जिहाद और काफिर जैसी इस्लामिक अवधारणाओं को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाने लगा। इन मदरसों का पाठ्यक्रम वाशिंगटन में तैयार किया गया। इसका उद्देश्य था एशियाई मुस्लिम युवकों को आतंकवाद के रास्ते पर ढकेलना। सऊदी अरब के एक सिविल इंजीनियर ओसामा को, मदरसों से खूँखार आतंकी बनकर निकल रहे युवकों के संगठन अल् कायदा का नेतृत्व सँभालने के लिए चुना गया। इसके बाद क्या हुआ, यह सर्वज्ञात है।
अल् कायदा के भारत व पाकिस्तान पर आतंकी हमलों के इतिहास से हम सब वाकिफ हैं परंतु हम सभी इस तथ्य को अपेक्षित महत्व नहीं देते कि अमरीका और आई.एस.आई. व पाकिस्तानी सेना के गठजोड़ ने ही अल् कायदा की विषबेल को बोया और सींचा था।
अमरीका से हथियारों से लदे जहाज, पाकिस्तानी बंदरगाहों पर पहुँचते थे, जहाँ उनकी कोई जाँच नहीं की जाती थी और हथियारों को सीधे अल् कायदा को सौंप दिया जाता था। अमरीका के एक पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन का एक दिलचस्प वक्तव्य इस सिलसिले में प्रासंगिक है। बात सन् 1985 की है। अल् कायदा के नेताओं का एक दल व्हाइट हाउस आया हुआ था। अजीब से कपड़े पहने हुए इन लोगों को हैरानी से देख रहे पत्रकारों को संबोधित करते हुए रीगन ने कहा- “जेंटिलमेन, ये अजीब से दिख रहे लोग, दरअसल, अमरीका के संस्थापकों के समकक्ष हैं“ (व्हाइट हाउस के लाॅन में मुजाहिदीन नेताओं का मीडिया से परिचय करवाते हुए रोनाल्ड रीगन- (1985)। उस समय ये मुजाहिदीन, अफगानिस्तान में अमरीका की लड़ाई लड़ रहे थे। वे अमरीका के एजेंट के बतौर यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे थे कि इस इलाके में शक्ति संतुलन कायम रहे और कच्चे तेल से भरपूर इस क्षेत्र में अमरीका का दबदबा बना रहे।
सन् 1991 के खाड़ी युद्ध में अमरीका ने इराक को परास्त किया। कई अन्य मुस्लिम देशों को भी अमरीका ने भारी नुकसान पहॅँुचाया। इस सब से अल् कायदा अपने ही जन्मदाता का दुश्मन बन बैठा। अल् कायदा और उससे जुडे़ संगठनों ने अमरीका को “सबसे बड़ा शैतान“ कहना शुरू कर दिया। वे अमरीका के खिलाफ जहर उगलने लगे।
इस दौर में पाकिस्तान का शासन कई अलग-अलग जनरलों के हाथों में रहा। ये जनरल, मौलानाओं के सहयोग से देश पर अपनी पकड़ बनाए रखते थे। वे अमरीका के वफादार सेवक थे। पाकिस्तानी सेना व आई.एस.आई., धन के बदले इस इलाके में अमरीकी नीतियों को लागू करने का काम करती रहीं। 9/11 के बाद स्थितियों में परिवर्तन आया। वल्र्ड टेªड सेंटर पर हमले में विभिन्न धर्मों व देशों के 3000 से अधिक लोग मारे गए।
इस हमले के बाद, अमरीकी मीडिया ने एक नया शब्द गढ़ा - “इस्लामिक आतंकवाद“। इस्लाम को आतंकवाद से जोड़ने वाले इस शब्द को पूरी दुनिया के मीडिया ने हाथो-हाथ लिया। इसी के साथ आया “सभ्यताओं के टकराव“ का सिद्धांत। यह सिद्धांत, अमरीकी विदेश नीति का मार्गदर्शक बन गया।
इस सिद्धांत का लुब्बेलुबाब यह है कि “पिछड़ी इस्लामिक सभ्यता“ का उन्नत पश्चिमी सभ्यता से टकराव होना अवश्यंभावी है। जार्ज डब्लू बुश ने अफगानिस्तान पर अमरीकी हमले को क्रूसेड्स (धर्मयुद्ध) की संज्ञा दी थी। सभ्यताओं के टकराव के सिद्धांत को सरल शब्दों में प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा था, “अमरीकन पूछ रहे हैं- वे हमसे घृणा क्यों करते हैं? वे हमारी स्वतंत्रताओं से घृणा करते हैं- हमारी
धार्मिक स्वतंत्रता से, हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से, हमारी वोट देने की स्वतंत्रता से और हमारे एकत्रित होने व एक दूसरे से असहमत होने की स्वतंत्रता से“(जार्ज डब्लू बुश, 11/9/2001 के बाद अमरीकी कांग्रेस को संबोधित करते हुए)।
इस सिद्धांत ने दुनिया के मुसलमानों का दानवीकरण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हाल में ट्यूनीशिया, मिस्र और अन्य अरब देशों की जनता द्वारा शांतिपूर्ण तरीके से प्रजातंत्र के लिए संघर्ष करने से इस्लाम और मुसलमानों के बारे में कई मिथक व पूर्वाग्रह टूटे हैं। अमरीका भी अब अपना नारा बदलना चाहता है। दुनिया में अपनी दादागीरी चलाते रहने के लिए, “प्रजातंत्र का निर्यात“ अमरीका का अगला नारा हो सकता है। इस नारे से अमरीका को दूसरे देशों में अपने सैन्य हस्तक्षेप को उचित ठहराने में मदद मिलेगी। पाकिस्तान की सैनिक सरकारों, जिन्होंने अमरीकी हितों की पूरी वफादारी से रक्षा की, का स्थान नागरिक सरकार ने ले लिया है। यह सरकार पाकिस्तान में प्रजातंत्र लाने की कोशिश कर रही है और वहाँ के समाज को मिलेट्री-मुल्ला गठजोड़ के चंगुल से निकालने की इच्छुक है। यह संयोग की बात है कि लगभग इसी समय अमरीकी नीतियों में भी परिवर्तन हो रहा है। शायद अमरीका को अब पाकिस्तान की सेना और आई0एस0आई0 की सेवाओं की जरूरत नहीं है और इसलिए कई दशकों में पहली बार, अमरीका ने पाकिस्तान की खुलकर कटु आलोचना की है। पाकिस्तान के नेतृत्व को अपने देश के भविष्य के बारे में चिंतन और आत्मावलोकन करना चाहिए। उसे अमरीका के चंगुल सेे मुक्त होने की कोशिश करनी चाहिए और यह विचार करना चाहिए कि अन्य पश्चिम एशियाई देशों के सहयोग से पाकिस्तान किस तरह एक प्रगतिशील-प्रजातांत्रिक देश बन सकता है। अमरीका और पाकिस्तान के आपसी रिश्तों से दूसरे देशों को भी सबक सीखना चाहिए। पाकिस्तान के साथ अमरीका के संबंधों का इतिहास बताता है कि अमरीका की दोस्ती किस तरह रातो रात दुश्मनी में बदल जाती है और किस तरह अमरीका अपने सहयोगियों के आत्मसम्मान की तनिक भी परवाह नहीं करता। जो अन्य देश व्हाइट हाउस की शरण में जाने की महत्वाकांक्षा पाले हुए हैं उन्हें इससे सबक लेना चाहिए।

-राम पुनियानी
मो0:- 09322254043


बुधवार, 29 जून 2011

ओबामा की ‘जीत’ के लिए लादेन का मरना जरूरी था

अमरीका ने एलान कर दिया है किदुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादीऔर अलकायदा का नेता ओसामा बिन लादेन मारा गया। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की मानें तो अमरीकी फौजियों की एक इलीट टुकड़ी ने ओसामा बिन लादेन को एक आपरेशन में इस्लामाबाद के पास एबटाबाद में मार गिराया है। ओबामा के मुताबिक, यह एक अमरीकी आपरेशन था जो सीधे उनके निर्देशन में चला।
अमरीकी टी.वी. चैनलों और समाचार माध्यमों के मुताबिक, इस खबर के बाद से अमरीका में जश्न का माहौल है। यही नहीं, ब्रिटेन से लेकर आस्ट्रेलिया तक के प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपतियों की ओर से खुशी और बधाई के सन्देश चैनलों पर गूँज रहे हैं।
भारतीय न्यूज चैनल भी अमरीकी प्रतिष्ठान के हवाले से आ रही खबरों को पूरे उत्साह के साथ दोहराने में लगे हैं। हमेशा की तरह विजेता के बतौर अमरीकी वीरता और पराक्रम की कहानियाँ मिर्च मसाला लगाकर सुनाई जा रही हैं। इस सबके बीच सिर्फ अब यही बाकी बच गया है कि मारे गए ओसामा की छाती पर पैर रखे और हाथों में बंदूक लिए ओबामा की तस्वीरें नहीं दिखाई गई हैं।
लेकिन सच बात यह है कि कहानी बहुत सरल और सीधी है। न्यूज चैनलों पर मत जाइए, उनका तो काम है कि कहानी में सनसनी, सस्पेंस और ड्रामा डालने के लिए एक से एक पेंच और ट्विस्ट घुसाएँ।
यह ठीक है कि ओसामा बिन लादेन मारा गया, लेकिन उसका यह अंत पहले दिन से ही तय था। सच तो यह है कि अगर वह अब तक जिन्दा था तो इसकी वजह भी यह थी कि उसे और उससे भी ज्यादा उसके नाम के आतंक को खुद अमरीका ने जिन्दा रखा था। आखिर यह “जिहादी आतंकवाद” के खिलाफ “वैश्विक युद्ध” का सवाल था।
अमरीका को ओसामा के नाम और आतंक की जरूरत कई कारणों से थी। ओसामा को पकड़ने और अल कायदा को खत्म करने के नाम पर अफगानिस्तान पर हमला किया गया। इसके लिए उसे बहुत बहाना नहीं बनाना पड़ा। साथ ही, पाकिस्तान में घुसपैठ बढ़ाने का मौका मिला। इसके साथ ही मध्य एशिया में पैर जमाने को जगह मिली। इराक पर हमले के लिए जमीन तैयार करने में बहुत कसरत नहीं करनी पड़ी।
साफ है कि इस सबके लिए ओसामा का जिन्दा रहना बहुत जरूरी था। वैसे भी अमरीका बिना एक वैश्विक दुश्मन के नहीं रह सकता है। इस दुश्मन के नाम पर ही अमरीकी सैन्य औद्योगिक गठजोड़ का खरबों डालर का कारोबार चलता है। आश्चर्य नहीं कि अमरीका ने शीत युद्ध के बाद ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ की फर्जी सैद्धांतिकी के आधार पर ओसामा बिन लादेन के रूप में एक वैश्विक दुश्मन खड़ा किया।
अन्यथा यह सच किससे छुपा है कि ओसामा और उसके साथियों को जेहाद के नारे के साथ खड़ा करने में अमरीका की सबसे बड़ी भूमिका थी? लेकिन अब अमरीका को ओसामा की जरूरत नहीं रह गई थी। न सशरीर और न ही आतंक के एक प्रतीक के रूप में, कारण यह कि अब अमरीका अफगानिस्तान से सम्मानजनक तरीके से निकलना चाहता है। वह यह लड़ाई नैतिक रूप से ही नहीं बल्कि सैन्य तौर पर भी हार रहा था।
ओबामा ने बहुत पहले ही घोषित कर दिया था कि उनकी प्राथमिकता अफगानिस्तान की लड़ाई को जल्दी से जल्दी जीतकर वहाँ से बाहर निकलना है। लेकिन पिछले तीन सालों में यह साफ हो चुका था कि अमरीका अफगानिस्तान में जीतने नहीं जा रहा है। उल्टे उसे और खासकर नाटो के सैनिकों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा था। सबसे बड़ी बात अमरीका को यह भी लगने लगा था कि अफगानिस्तान से कुछ खास मिलने वाला भी नहीं है। मतलब न वहाँ तेल है और न ही कोई और बेशकीमती खनिज, फिर वहाँ रुकने से क्या फायदा? लेकिन अमरीका को वहाँ से निकलने के लिए ‘जीत’ जरूरी थी। यह ‘जीत’ इसलिए भी जरूरी थी क्योंकि अगले साल अमरीका में राष्ट्रपति के चुनाव हैं। यह भी किसी से छुपा नहीं है कि पिछले कुछ महीनों से ओबामा की लोकप्रियता लगातार ढलान पर थी। उनके दोबारा जीत के लिए कुछ ड्रामैटिक होना जरूरी था। इसके लिए ओसामा बिन लादेन से उम्दा प्रत्याशी और कोई नहीं था।
जाहिर है कि ओबामा की ‘जीत’ के लिए लादेन का मरना जरूरी था, और लादेन मारा गया। कहानी खत्म, बच्चों बजाओ ताली!

-आनन्द प्रधान
मो0:- 09818305418

सोमवार, 27 जून 2011

यह ‘न्याय’ नहीं न्याय का ढकोसला है श्रीमान ओबामा!

इसे इतिहास की एक भारी विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे कि जो अमरीकी ओसामा बिन लादेन की हत्या के बाद न्यूयार्क के ‘ग्राउंड जीरो’ पर एकत्रित होकर ‘थैंक यू ओबामा’ का उन्मादपूर्ण नारा लगा रहे थे उन्हीं अमरीकियों को यह भरोसा दिलाने के लिए कि वह भी शुद्ध ‘अमरीकी’ हैं, राष्ट्रपति ओबामा को कुछ ही समय पूर्व अपना जन्म प्रमाणपत्र पेश करना पड़ा था। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी ओबामा की ख्याति ओसामा की हत्या के पूर्व तक कितनी गिरी हुई थी इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत सहित कुछ ही देशों में खेले जाने वाले क्रिकेट के हमारे धुरंधर धोनी के बराबर भी वह खड़े दिखाई नहीं देते थे। लेकिन अब स्थिति यह है कि ओसामा की हत्या की उनकी अपनी योजना की कामयाबी के बाद अमरीका के दो पूर्व राष्ट्रपतियों क्लिंटन तथा बुश सहित दुनिया के ढेर सारे राष्ट्राध्यक्षों/राजनेताओं की ओर से राष्ट्रपति ओबामा की प्रशंसा में कसीदे पढ़े जा रहे हैं।
आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जिस सर्वशक्तिमान अमरीकी राष्ट्रपति को अपनी अमरीकी नागरिकता तक को साबित करने के लिए मशक्कत करनी पड़ रही थी और जो लोकप्रियता के मामले में धोनी से भी नीचे के पायदान पर खड़ा था, वह कितने बुरे दिनों और शर्मनाक स्थिति का सामना कर रहा था और अपनी इन्हीं गिरी हुई स्थितियों में राष्ट्रपति ओबामा को तकरीबन आठ माह बाद होने वाले अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के लिए भी अपने को तैयार रखना था। सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन भारी दुष्वारियों की कीचड़ में गहरे धँसे राष्ट्रपति ओबामा को इससे उबरने के लिए किसी ‘जादू की छड़ी’ की कितनी सख्त आवश्यकता थी? और, देखा जाए तो अपने नेवी सील्स कमांडो द्वारा निहत्थे ओसामा की हत्या का लाइव दृश्य देखे जाने के तुरंत बाद राष्ट्रपति ओबामा ने दंभपूर्वक जो वाक्य कहे-‘‘न्याय हो गया’’- वह ठीक उसी जादू की छड़ी की प्राप्ति की एक तरह से अभिव्यक्ति थी। अन्यथा, अमरीकी राष्ट्रपति की नजर में ‘न्याय’ की अवधारणा कैसी है, इसका क्रूरतम् और निर्लज्जतम मिसाल तो उसने उसी पाकिस्तान की धरती पर ओसामा की हत्या किए जाने के कुछ माह पूर्व ही दे दिए थे। गुप्तचर सेवा के दो दुस्साहसिक अमरीकियों द्वारा दो पाकिस्तानी नागरिकों को सरेआम गोली मार कर हत्या किए जाने की जघन्य घटना से पूरा पाकिस्तानी जनमानस स्तब्ध था। यह किसी भी देश की संप्रभु सरकार की नैसर्गिक न्याय प्रक्रिया का स्वाभाविक तकाजा है कि वह अपने नागरिकों के हत्यारे चाहे वे विश्व के सबसे ताकतवर देश के नागरिक ही क्यों न हों, को कानून के कटघरे में लाकर न्यायोचित सजा दिलाने के अपने अधिकार का दृढ़तापूर्वक पालन करे। दुनिया ने देखा कि पाकिस्तान की सरकार उन दो हत्यारे अमरीकी नागरिकों के साथ ठीक यही तो कर रही थी। लेकिन न्याय का दंभ भरने और दुनिया को सभ्यता का पाठ पढ़ाने वाले ओबामा प्रशासन को यह कतई मंजूर न हुआ। उसने पाकिस्तान सरकार के हाथों को इस नंगई और निर्ममता के साथ मरोड़ना शुरू कर दिया कि उसे दोनों हत्यारों को अपनी न्याय प्रक्रिया से गुजारे बिना छोड़ देना पड़ा।
यह ठीक है कि अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी ओसामा बिन लादेन एक नहीं, दो नहीं, सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों अमरीकियों तथा विश्व व अन्य कई देशों के नागरिकों की जघन्य हत्या का कसूरवार था- वह मौत की सजा पाने से कम का हकदार नहीं था। लेकिन पूरे विश्व ने जब यह जाना, स्वयं अमरीकी प्रशासन की स्वीकारोक्ति द्वारा, कि धावा बोलने वाले अमरीकी सैनिक यदि चाहते तो बिल्कुल निहत्था और नितांत प्रतिरोधविहीन ओसामा को बड़ी आसानी से बंदी बनाया जा सकता था, बजाय इसके उन्होंने उसे वहीं ढेर कर दिया तो यह समस्त न्यायप्रिय लोगों के मन में एक तरह से जुगुप्सा जगा देने वाली बात थी। यह तो आधुनिक इतिहास में मानवता के सबसे बड़े अपराधी हिटलर के लापता हत्यारे सहयोगियों को पकड़े जाने पर भी न हुआ था। उन्हें उनके पनाहगाहों में धावा बोलकर ढेर नहीं किया गया था बल्कि अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के कटघरे में उन्हें घसीट लाया गया और न्याय प्रक्रिया की लंबी अवधि से गुजरते हुए अंततः उन्हें फाँसी के तख्ते तक पहुँचाया गया।
लेकिन अपने समय के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा को ओसामा बिन लादेन के साथ ऐसा करना था भी क्या? पहली बात तो यह कि आतंकवादी ओसामा हिटलर की तरह किसी देश का कोई स्वायत्त शासक नहीं था। वह अफगानिस्तान में सोवियत फौजों के खिलाफ अमरीकी लड़ाई में स्वयं अमरीका द्वारा खड़े किए गए भाड़े के सैनिकों के एक गिरोह का तथाकथित धार्मिक उन्मादी सरदार था। दूसरी बात यह कि अमरीकी धन और हथियारों से सींच कर ही वह तैयार किया गया और अंततः अमरीकियों के ही खून का प्यासा बन बैठा। जिस लापता भस्मासुर अर्थात् ओसामा बिन लादेन को वर्षों से अमरीकी प्रशासन तलाश रहा था वह दरअसल लापता था ही नहीं। जैसा कि लादेन के खिलाफ 4 ‘हेलिकाप्टरों, 40 मिनट और 25 सैन्य कमांडो की इस दुर्दांत अमरीकी कार्रवाई- जिसका कूटनाम दिया गया जेरोनिमो ई0के0आई0ए0, की पूरी अन्र्तवस्तु को बारीकी से देखने से साफ जाहिर है। कहा जाता है कि पाकिस्तान के अत्यंत सामरिक महत्व के शहर एबटाबाद में जिस आलीशान हवेली में धावा बोल कर ओसामा की हत्या की गई थी, धावा बोलने वाले अमरीकी कंमाडों वैसी ही हवेली का निर्माण कर काफी दिनों तक ‘आपरेशन ओसामा’ का रिहर्सल करते रहे थे। यह बात स्वयं अमरीकी पक्ष की तरफ से जाहिर की गई है। लेकिन जो बात छिपा ली गई है क्या लगता नहीं है कि वह ठीक वही बात है जो इस पूरी कार्रवाई से अपने आप साफ झलकती नजर आती है।
2001 में वल्र्ड ट्रेड सेंटर को जमींदोज किए जाने के बाद अमरीका को अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन की तकरीबन 10 वर्षों से तलाश थी। इस तलाश में उसके साथ पाकिस्तान भी साझीदार था। इसके एवज में अमरीका को अपनी अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी लड़ाई में इस तथाकथित विश्वस्त सहयोगी को प्रतिवर्ष अकूत धन देने पड़ते थे। कहते हैं कि इस वर्ष ही पाकिस्तान अपनी इस सहयोगी भूमिका के लिए 3 अरब डालर अमरीका से वसूलने वाला था। पूरे दो दशक बीतने के बाद ओसामा रविवार की आधी रात को जब मार गिराया गया तो अफगानिस्तान के राष्ट्रपति करजई के ये शब्द खासे मायने रखते हैं, ‘‘अमरीकियों ने लादेन को लोगान में नहीं पाया और न ही वह उन्हें कंधार में मिला या काबुल में, उन्हें वह पाकिस्तान के एबटाबाद में मिला।’’ और बेहद तड़प के साथ उन्होंने आगे यह भी कहा, ‘‘पिछले दस वर्षों से हम जो कह रहे थे, नाटो व दुनिया ने उसे कभी नहीं माना। हम झुलसते रहे और अब ओसामा एबटाबाद में मारा गया।’’
करजई के इस तड़प भरे वक्तव्य के गहरे निहितार्थ हैं। यानी अमरीका को चाहिए था एक ऐसा सबल बहाना जिसका वास्ता देकर वह अफगानिस्तान में अपनी फौजी उपस्थिति और आए दिन तथाकथित आतंकवादी अड्डों के सफाया के नाम पर ड्रोन हमलों में निरीह नागरिकों की हत्या के अपने घिनौने कृत्य को जायज ठहरा सके। पाकिस्तान को भी चाहिए था एक ऐसा हथियार जिसका आतंक दिखाकर अपने दिवालिया अर्थतंत्र के लिए अकूत अमरीकी धन के निरंतर आमद की व्यवस्था को बनाए रख सके। जाहिर है, अमरीका और पाकिस्तान दोनों के अत्यंत पाप भरे इन स्वार्थों की पूर्ति के लिए सबसे अचूक उपाय था ओसामा बिन लादेन के अस्तित्व को लंबे समय तक बनाए रखना। अपनी-अपनी सरकारों के निर्देश पर सी0आई0ए0 तथा आई0एस0आई0 के चतुर नक्शानवीसों ने मिलकर ही ओसामा के लिए वह नक्शा बनाए होंगे जिसके घेरे में अपने मारे जाने के दिन तक सुरक्षित पनाह पाता रहा था। करजई का इशारा भी कि ‘‘पिछले दस वर्षों से हम जो कह रहे थे, नाटो व दुनिया ने उसे कभी नहीं माना, और अब ओसामा एबटाबाद में मारा गया है’’, इसी नापाक नक्शे को बेपर्दा करता जान पड़ता है। ओसामा तो लगता है सर्वशक्तिमान अमरीका को हिला देने वाले 9/11 कांड के बाद से ही सी0आई0ए0 तथा आई0एस0आई0 के इस संयुक्त नक्शे के घेरे में आ चुका था और जिसकी अफगानिस्तान के राष्ट्रपति करजई को अच्छी तरह से भनक मिल चुकी थी।
यह तो कहिए कि विश्व में आई आर्थिक सुनामी में अमरीकी अर्थतंत्र के ढहने के साथ-साथ राष्ट्रपति ओबामा की लोकप्रियता भी तेजी से लुढ़कने लगी थी और इस खास कारण ने ओबामा को भारी बेचैनी मंे डाल दिया। जैसा कि बताया जा चुका है, संसार का यह सबसे ताकतवर राष्ट्रपति धोनी जैसे शख्स से भी लोकप्रियता के मामलों में पिट गया था तो फिर ऐसी अपमानजनक स्थिति में बने रहकर ओबामा पुनः अगला राष्ट्रपति चुने जाने का ख़्वाब क्या खाक देखते! यहीं पर चाहिए थी ओबामा को अभी और इसी वक्त एक ऐसी ‘जादू की छड़ी’ जो उनकी लुढ़कती लोकप्रियता पर चमत्कारिक रूप से रोक तो लगा ही दे आगामी राष्ट्रपति चुनाव में उनकी जीत की गारंटी भी दिला सके। फिर क्या था, यहीं से उस रंगमंच और उस पर खेले जाने वाले नाटक के निर्माण की कथा शुरू हो जाती है जिसके घोर घिनौने प्रदर्शन के स्तब्धकारी रोमांच से दुनिया अभी भी उबर नहीं पाई है।
कथा यह गढ़ी गई कि नाटक के अंतिम प्रदर्शन अर्थात् ‘आॅपरेशन ओसामा’ के मामले में बेचारे पाकिस्तान को बिल्कुल नामालूम सी स्थिति में रखा गया था। यह इसलिए भी जरूरी था कि यदि यह जरा भी उजागर हो जाय कि इस नाटक के कथानक की तैयारी में सी0आई0ए0 तथा आई0एस0आई0 दोनों की बराबर की भागीदारी थी तो पाकिस्तानी सत्ता केन्द्र को तो अपने ही नागरिकों के प्रचंड क्रोध की ज्वाला में भस्म हो जाना तय था। अगर यह सच नहीं होता तो अमरीकी नेवी सील्स कमांडो के वीर बाँकुरों की उस अत्यंत सुरक्षित और आई0एस0आई0 द्वारा संरक्षित एबटाबाद की हवेली में सीधे उतरते नानी मर गई होतीं। और, अमरीकी प्रशासन भला इस भारी जोखिम में अपने सैनिकों को डालता ही क्यों जिसके लिए अफगानिस्तान की धरती पर बेपनाह ड्रोन हमलों में अनगिनत बेगुनाह लोगों की हत्या एक सामान्य घटना से अधिक शायद ही और कुछ रह गया हो! यहाँ तो मामला ओसामा जैसे दुनिया के सबसे घिनौने आतंकवादी का था जिसके पनाहगाह पर सीधे ड्रोन हमला करके उसे मारने की कार्रवाई पर शायद ही कोई भारी हंगामा खड़ा होता और यदि इस ड्रोन हमले में ओसामा के साथ-साथ उसके आसपास के मकानों में रहने वाले भी मारे गए होते तो भी अमरीका के लिए यह कोई भारी शर्मिंदगी की बात नहीं होती।
लेकिन यहाँ तो पर्दा उठने के पहले रंगमंच के एक-एक कोने को मानो प्रशिक्षित कुत्तों की तरह अमरीकी कमांडो को सुंघा दिया गया था और आॅपरेशन ओसामा के कई-कई रिहर्सल भी करा दिए गए थे। ऐन वक्त पर पाकिस्तान की तरफ से ‘मैदान साफ है’ की हरी झंडी दिखा दी गई थी। पाकिस्तानी पक्ष का अरज तो बस इतना ही था कि ‘माई बाप’! इस पूरे कांड में पाकिस्तान के गायब रहने के ढोंग को फैलाने में कोई चूक न होने पाए।’ अमरीकी प्रशासन ने सचमुच इस ढोंग को प्रचारित/प्रसारित करने में कोई कोताही नहीं बरती।
अंततः राष्ट्रपति बराक ओबामा के शब्दों में ‘न्याय हो गया।’ इसी के साथ दुनिया ने यह भी देख लिया कि जो अमरीकी ओबामा नाम से आजिज आने लगे थे आज वे ही न्यूयार्क की सड़कों पर ‘थैंक यू ओबामा’ का उन्मादपूर्ण नारा लगा रहे थे। अर्थात् कहना यह पड़ेगा कि ओबामा का ‘आॅपरेशन जादू की छड़ी’ पूरी तरह कामयाब रहा। मगर दुनिया के समस्त न्यायप्रिय लोगों के मन-मस्तिष्क को बुरी तरह से मथ रहे इस प्रचंड प्रश्न का ओबामा क्या जवाब देंगे कि निहत्थे ओसामा को न्याय के कटघरे में खड़ा करके उससे उसके गुनाहों की स्वीकृति सुनने और अंततः उसे सभ्य तरीके से फाँसी तक ले जाने के बजाय उसे वहीं ढेर कर देने की कायरतापूर्ण कार्रवाई क्यों की गई? किस ‘न्याय’ के तहत, पाकिस्तानी सत्ता केन्द्र, साथ ही उसकी पूरी न्याय प्रणाली की बाँह निर्ममतापूर्वक मरोड़ते हुए अपने दो हत्यारे अमरीकी नागरिकों को उड़ा ले जाया गया, राष्ट्रपति ओबामा से दुनिया भर के न्यायप्रिय लोगों का एक सवाल यह भी है और जब तक इन बातों का ठोस जवाब नहीं मिल जाता तब तक कहना यह पड़ेगा कि ‘‘श्रीमान ओबामा यह न्याय नहीं न्याय का ढकोसला है!’’

-सुमन्त
मो0:- 09835055021

मंगलवार, 14 जून 2011

जिरोनिमो और अमेरिकी उपनिवेशवाद

जिरोनिमो

अमेरिकी सेना ने ओसामा को पकड़ने \ मारने के अभियान को विशिष्ट नाम दिया हुआ था |अमेरिकी कमांडो सैनिको ने लादेन के अंत पर व्हाइट हाउस को "जिरोनिमो -इ0 के0 आई0 ० " को संदेश भेजा था |जिसका मतलब था -जिरोनिमो यानी ओसामा बिन लादेन "-एनिमी किल्ड इन एक्शन "अर्थात कार्यवाही में दुश्मन मारा गया |अमेरिकी समाचार -पत्र "वाशिगटन पोस्ट "की सूचनाओं को हिंदी के दैनिक समाचार पत्र हिन्दुस्तान (५ मई )में प्रकाशित किया गया है |इसके अनुसार -ओसामा और उसको पकड़ने \ मारने के अभियान को जिरोनिमो का नाम दिये जाने पर अमेरिकी रेड इन्डियन समूह ने अपना विरोध व्यक्त किया है |उन्होंने बराक ओबामा से इसके लिए सार्वजनिक रूप से माफ़ी भी मागने के लिए कहा है |लेकिन क्यों ? क्यों कि जिरोनिमो 150 वर्ष पूर्व अमेरिका को अपना उपनिवेश और फिर स्थाई देश बना लेने वाले गोरो से युद्धरत मूल निवासियों का अग्रणी योद्धा था |वह अमेरिका और मैक्सिको के सीमा क्षेत्र के प्रदेशो में रहने वाली "अपाचे इन्डियन "जनजाति का नायक था |अपाचे इन्डियन ने 19 वी सदी में अमेरिकी और मैकिस्कियो कि सेनाओं से लोहा लिया था |अमेरिकी सेना ने जिरोनिमो को पकड़ने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया था |इसके वावजूद वह पकड़ा नही जा सका |1886 में जिरोनिमो ने समर्पण कर दिया |जिरोनिमो को युद्धबंदी बनाया गया और यातनाये दी गयी |1909 में कैद में ही उसकी मृत्यु हो गयी |इसी के साथ यह दूसरी सच्चाई भी जगजाहिर है कि अमेरिका गोरो का देश नही है |पहले स्पेनी ,फिर बाद में ब्रिटेनवासी गोरो ने इस भू -भाग को अपना उपनिवेश बनाया |वंहा कि मूल आबादी को काट डाला और गुलाम बना लिया |अमेरिका को अपना देश और ब्रिटेन से स्वतंत्र देश घोषित कर दिया |येही स्थिति आस्ट्रेलिया ,न्यूजीलैंड , साउथ अफ्रिका , कनाडा व यूरोपीय लोगो कि भूल आबादी वाले कई दक्षिणी अमेरिकी देशो की भी है |
अभी चंद साल पहले आस्ट्रेलियाई प्रधानमन्त्री ने आस्ट्रेलिया के मूल निवासियों पर गोरो के पूर्वजो द्वारा किये गये अत्याचार पर खेद जताने की औपचारिकता निभाई थी |लेकिन अमेरिका हुकूमत आज भी वंहा के मूल निवासियों के बहादुर योद्धाओ को कलंकित कर रही है |यह अमेरिकी हुकूमत की और वंहा सदियों से कब्जा जमाए यूरोपीय लोगो की औपनिवेशिक मानसिकता का ही घोतक है |वंहा के मूल निवासियों के यूनाइटेड नेटिव अमेरिका के नाम से बने संगठन ने राष्ट्रपति ओबामा और सीनेट एवं प्रतिनिधि सभा पर जिरोनिमो का अपमान करने का आरोप लगाते हुए कहा कि-इंडियंस की धरती पर कब्ज़ा करने वाले गोरे यूरोपीय आज भी मूल निवासियों पर आघात करने से बाज़ नही आते |वंहा के मूल निवासियों का यह विरोध एकदम उचित है |कयोंकि यह अमेरिका को अपना राष्ट्र मान चुके गोरो के उस उपनिवेशवादी मानसिकता की घोतक है ,जो वंहा के मूल निवासियों और उनके योद्धाओको आज भी अपने दुश्मन जैसा मानता है |उनके प्रति घृणा व्यक्त करता है |ओसामा को पकड़ने \मारने के लिए प्रयोग किया गया शब्द आपरेशन केवल ओसामा के प्रति अमेरिकी घृणा का सूचक नही है ,बल्कि वे जिरोनिमो के प्रति भी अमेरिकी घृणा का सूचक है |

-सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

सोमवार, 23 मई 2011

मियाँ की जूती, मियाँ के सर- दे तक धिना धिन धिन ......

पाकिस्तानी नौसैनिक बेस जल रहा है

अमेरिका व पाकिस्तान द्वारा अलकायदा तथा तालिबान को तैयार किया गया था और अब तालिबान, अलकायदा दोनों देशों के दुश्मन नंबर 1 हैं। 9/11 को अमेरिका में हुए आतंकी हमलों का आरोप इन्ही संगठनो का नाम आया था। पाकिस्तान व उसकी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई के सबसे नजदीक यही संगठन रहे हैं। ओसामा की हत्या के बाद तालिबान, अलकायदा ने पाकिस्तान को सबक सिखाने की ठान ली। रविवार की रात 10:30 बजे पाकिस्तान नौसेना बेस में तालिबान हथियारधारी घुसकर कहर बरसना शुरू कर दिया जिस पर अमेरिका द्वारा प्रदत्त पी3-सी जासूसी जहाजों को नष्ट कर दिया जिससे पाकिस्तान की नवसेना की निगरानी करने की क्षमता काफी कम हो गयी है। 16 घंटे के कराची ऑपरेशन के बाद नवसेना बेस को मुक्त कराया जा सका है जिसमें लगभग 10 सैनिक मारे गए हैं।
5 तालिबानी मारे गए और सात गिरफ्तार किये गए। पकिस्तान की नौसेना के प्रमुख बेस को तालिबानियों ने लगभग तहसनहस कर दिया है लेकिन पाकिस्तानी सरकार किस मुंह से अपने द्वारा संरक्षित तालिबानियों की करतूतों को कह सके कि पकिस्तान व अमेरिका के लिये इस तरह की घटनाएं उन्ही द्वारा पोषित समूहों द्वारा की जा रही हैं। पुरानी कहावत याद आती है मियाँ की जूती मियाँ के सर दे तक धिना धिन धिन .....

सुमन
लो क सं घ र्ष !
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