रविवार, 5 अक्तूबर 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम-16

रामविलास या भोगविलास
    दलित साहित्य का पठन पाठन निरन्तर जारी था, अब मैंने दलित समुदाय के सामाजिक एवं राजनैतिक कार्यकर्ताओं से भी मिलना जुलना प्रारम्भ कर दिया था, उन्हीं दिनों मुझे न्यायचक्र नामक पत्रिका पढ़ने को मिली, जिसे दलित नेता रामविलास पासवान सम्पादित करते थे, उस अंक के कवर पर लिखा उद्धरण मुझे बहुत अच्छा लगा, जिसमें पासवान कहते हैं कि ‘मैं उन घरों में दिया जलाने चला हूँ, जिनमें सदियों से अँधेरा है, मैंने सोचा, मुझे भी तो ऐसी ही आँखों से आँसू पोछने हैं जिनमें बरसों से आँसुओं के अलावा कुछ भी नहीं है, इस तरह तो पासवान जी और मेरी राह एक ही है, मैंने राम विलास पासवान से मिलने की ठान ली, और एक दिन मैं उनके 12 जनपथ, नई दिल्ली स्थित निवास पर जा पहुँचा, काफी प्रयास के बाद उनसे मुलाकात हो पाई। मैं दिखने में तो आज की तरह ही दुबला-पतला बिल्कुल बच्चे जैसा था, मेरी बातों पर वे यकीन ही नहीं कर पा रहे थे कि मैं आर0एस0एस0 जैसे विशाल अर्द्धसैनिक संगठन से अकेले लोहा ले रहा हूँ, जब मैंने उन्हें अपने द्वारा सम्पादित ‘ दहकते अंगारे ‘की खबरें और अपने नाम से विभिन्न अखबारों में छपे आलेख दिखाए तब उन्हें यकीन होने लगा, उनकी आँखों में विश्वास और प्रशंसा के भाव एक साथ ही दिखाई पड़े, इस मुलाकात का फायदा यह हुआ कि मैं मात्र 20 वर्ष की आयु में ही दलित सेना का भीलवाड़ा जिले का अध्यक्ष बना दिया गया, मैंने दलित सेना में रहते हुए जमकर काम किया, कई दलित चेतना शिविर आयोजित किए, रैलियों में जयपुर से लेकर प्रगति मैदान तक भीड़ लेकर गया, मेम्बरशिप में भी हमारा जिला काफी आगे रहा, नतीजतन पासवानजी मेरे काम से काफी खुश हुए और 1996 में जब वे रेल मंत्री बने तो उन्होंने मुझे पश्चिमी रेलवे का सलाहकार बना दिया। मंत्री रहते हुए पासवान और उनके नजदीकी दलित नेताओं की कार्यशैली और व्यवहार काफी बदल गए, जिस क्रांतिकारी दलित नेता रामविलास पासवान से मैं मिला और जिसके विचारों से मैं प्रभावित हुआ था, अब सत्ता की चकाचैंध और उनके आसपास उग आए दलालों ने उन्हें बिल्कुल ही बदल डाला था, पूरा राजनैतिक सामाजिक परिदृश्य ही बदल गया था, हर कोई भारतीय रेलवे को लूट खाने में लग गया, राम नाम की लूट मची हुई थी, दलित सेना के कई नेता जो रेलवे भर्ती बोर्ड के सदस्य बने हुए थे, भर्तियों के नाम पर खुल्लमखुल्ला पैसा बटोर रहे थे, छोटे-मोटे सब नेता अपनी अपनी क्षमता जितना लूटने में लगे थे, जिसे कुछ नहीं मिल सकता था, वे रेलवे में छोटे-मोटे ठेके ही लेने की कोशिश में लगे थे, रेलवे भवन से लेकर प्रत्येक रेलवे स्टेशन तक हर तरफ सिर्फ धन का साम्राज्य फैला हुआ था, अब दलित सेना में जय भीम सिर्फ एक नारा था, जो पैसा बटोर कर ला सके और दलाली कर सके वही कार्यकर्ता सबसे प्यारा था, मैं आया तो यहाँ मिशन के लिए था, पर हमारे मसीहाओं को तो कमीशन खाने से ही फुरसत न थी, मेरा यहाँ भी दम घुटने लगा, मुझे अपने आप पर ही शक होने लगा कि हर जगह मैं इतना जल्दी क्यों ऊबने लगता हूँ, कहीं पर भी फिट क्यों नहीं हो पाता हूँ, अब यहाँ तो सब लोग अपने ही हैं फिर भी सवाल उठने लगे कि मैं यहाँ क्यों हूँ? मैं यहाँ लीडरशिप करने आया था पर यहाँ तो डीलरशिप करने की जरूरत पड़ रही है, क्या मैं लोगों से पैसा बटोर-बटोर कर दिल्ली ले जाने का काम कर पाऊँगा ,मैं उन लोगों से नजरें कैसे मिलाऊँगा, जिनकों मैं बड़ी-बड़ी सैद्धांतिक बातें समझाता रहा हूँ, यह कैसा दीपक है जिसे मैं जलाने चला हूँ, इससे मैं किसी का घर रोशन कर पाऊँगा या उनका घर ही जला बैठूँगा, सैंकड़ों सवाल मेरे मन मस्तिष्क में उमड़ने लगे, एक बार फिर मैं बैचेनी और अवसाद का शिकार होने लगा था, मुझसे रहा नहीं गया, मैंने दलित मसीहा रामविलास पासवान की राजसी जीवनशैली और उनके इर्द गिर्द के चमचानुमा नेताओं द्वारा इकट्टा की जा रही अकूत धन सम्पदा पर एक सम्पादकीय दहकते अंगारे में लिख डाला, जिसका शीर्षक था ‘रामविलास या भोगविलास‘ ?
      बस फिर क्या था, मुझे इस अपराध की तुरंत सजा दी गई, दलित सेना के राजस्थान प्रदेश के तत्कालीन अध्यक्ष ने मुझे अनुशासनहीनता के आरोप में जिलाध्यक्ष के पद से हटा दिया और प्राथमिक सदस्यता से भी निकाल बाहर किया, मैंने भी दलितों की इस दलाल सेना से बाहर हो जाने में ही अपनी भलाई समझी, कभी वापसी के बारे में नहीं सोचा, दलित सेना से निकाले जाने के लगभग 15 साल बाद अन्ना हजारे के आन्दोलन के साम्प्रदायिक चरित्र पर मेरे द्वारा उठाए गए सवालों को पढ़कर लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव खालिक साहब ने मुझे वर्ष 2012 में अपनी पार्टी के कैडर को
संबोधित करने के लिए सोमनाथ आमंत्रित किया, तब मंच पर पासवान और उनकी मंडली से पुनः मुलाकात हुई, बीच के दिनों में वे एन0डी0ए0 सरकार में मंत्री रह लिए थे, फिर गुजरात में किए गए अल्पसंख्यकों के एकतरफा नरसंहार को मुद्दा बनाकर वे राजग का डूबता जहाज छोड़ भागे छूटे, बाद में बिहार में मुस्लिम मुख्यमंत्री का मुद्दा बनाए डोलते फिरे, असफल रहे। अंततः हाल ही में राजनाथ सिंह के पाँव पड़कर वापस राजग का हिस्सा बन बैठे, कभी मोदी को गुजरात नरसंहार के लिए दोषी बताने वाले रामविलास पासवान अब उन्हें पाप मुक्ति का प्रमाण पत्र बाँट रहे थे, अंततः अपना और अपने खानदान और अपनी जेबी पार्टी एल0जे0पी0 का भविष्य सँवारने के लिए तमाम पिछली बातों को भुला कर अपना ही थूँका हुआ चाटकर वे मोदी के शरणागत हो गए, गठबंधन में जीत कर आ गए और अब खाद्य एवं आपूर्ति मामलों के मिनिस्टर बन कर सत्ता का उपभोग करने को तत्पर हैं।
    सत्ता की मछली थे, कुर्सी लिप्सुओं से मिलकर अब बेहद खुश हैं , अम्बेडकर के नाम और मिशन को बेच खाने में इनका कोई सानी नहीं है। जय भीम कहते-कहते जय सियाराम का जाप करने लगे हैं, समानता के प्रतीक नीले दुपट्टे की जगह गले में विषमता पैदा करने वाला भगवा पट्टा डाल कर ये फर्जी दलित मसीहा फिर हमारे आपके बीच आने वाले हंै, इन्हें जवाब देना कबीर, फुले अम्बेडकर के अनुयायियों का काम है, समाज को छोड़कर जो राज की ओर चले जाते हंै और सत्य के स्थान पर सत्ता को प्रमुखता दे देते हैं , वे बड़े से बड़े तिकड़मबाज तो हो सकते हंै, मगर हमारे मसीहा नहीं हो सकते है। हमें भेड़ की खाल ओढ़े भेडियों को पहचानना हंै, अब वक्त है कि हम अपने दोस्तों और दुश्मनों की शिनाख्त कर लें ।
 -भँवर मेघवंशी
 लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित


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