शनिवार, 14 अप्रैल 2012

अरब देशों में उमड़ते असंतोष का बड़ा कारण है नव-साम्राज्यवाद



    अरब देश इस समय जिस व्यापक  असंतोष के दौर से गुज़र रहे हैं, उसका एक बड़ा कारण नव साम्राज्यवाद है। इन देशों के आर्थिक व सामाजिक महत्व को देखते हुए पश्चिमी देशों व विशेषकर अमरीका ने यहाँ की सरकारों को अपने हितों के अनुकूल रखने का विशेष प्रयास किया। इसके परिणाम स्वरूप ऐसे अभिजात सत्ताधारियों को भरपूर पश्चिमी सहायता से देर तक सत्ता में टिके रहने का अवसर मिला जिन्हें वहाँ की जनता पसंद नहीं करती थी। इन शासकों के विरुद्ध असंतोष एकत्र होता रहा और अब इतने दिनों तक एकत्र हुआ असंतोष बहुत उभर कर सामने आ रहा है।
    विश्व में प्रत्यक्ष औपनिवेशिक शासन के अंत के साथ ही नई व पुरानी साम्राज्यवादी ताकतों ने यह प्रयास आरम्भ किए कि वे तरह-तरह के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष उपायों से महत्वपूर्ण देशों में अपने आर्थिक व सामरिक हितों की रक्षा करें। यह प्रयास मध्य पूर्व व अरब देशों में सबसे अधिक सक्रिय रहे क्योंकि यहाँ तेल व गैस की सबसे अधिक सम्पदा है व क्षेत्र का सामरिक महत्व भी बहुत है। यहाँ अमरीका व उसके मित्र देशों ने इस्राइल के साथ अपने हितों को सबसे नजदीकी तौर पर जोड़ा। इस गठबंधन के प्रति अरब लोगों का विरोध स्वाभाविक था क्योंकि फिलिस्तीनियों को खदेड़ कर व उनके साथ तरह-तरह का अन्याय कर इस्राइल की स्थापना की गई थी। पर अमरीका ने आर्थिक व सैनिक सहायता के बल पर महत्वपूर्ण अरब देशों में ऐसे शासकों को आगे लाने का प्रयास किया जो अमरीकी-इस्राइल गठबंधन से या तो मित्रता रखें या कम से कम उसे सहन करें। अमरीका की नीति इस संकीर्ण संदर्भ में काफी वर्षों तक सफल रही कि मिस्र व सऊदी अरब जैसे सबसे महत्वपूर्ण या धनी अरब देशों ने अमरीका-इस्राईली गठबंधन की क्षेत्र की मुख्य ताकत को कोई चुनौती नहीं दी। बदले में मिस्र के राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक को अमरीका ने भरपूर सहायता दी व सबसे बड़े हथियारों के सौदे सऊदी अरब के शासकों के साथ किए। इराक में सद्दाम हुसैन ने अमरीकी वर्चस्व को चुनौती दी तो उन्हें सत्ता से हटाने के लिए बहुत विध्वंसक युद्ध करने में भी अमरीका ने देर नहीं की।
    मध्य-पूर्व क्षेत्र में अरब देशों से अलग जो सबसे महत्वपूर्ण देश है वह ईरान है। पहले अरब देशों पर नियंत्रण रखने के लिए अमरीका ने ईरान को ही चुना था। वहाँ की लोकतांत्रिक सरकार को हटाकर ईरान के शाह की तानाशाही स्थापित करने में अमरीका की महत्वपूर्ण भूमिका थी। ईरान के शाह की तानाशाही के लम्बे दौर में लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन हुआ पर शाह से अमरीका की दोस्ती बनी रही। इस तरह ईरान का समर्थन उपलब्ध होने के कारण क्षेत्र में अमरीका व इस्राइल       ka  गठबंधन मजबूत स्थिति में रहा।
    ईरान के शाह की जन विरोधी नीतियों के विरुद्ध यहाँ के लोगों का असंतोष बहुत वर्षों तक एकत्र होता रहा व जब वह एक ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ा तो वहाँ एक कट्टरपंथी मुस्लिम सरकार की स्थापना हुई जो अमरीका की घोर विरोधी थी। इस तरह से अमरीका का मध्य-पूर्व क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण साथ छूट गया तो उसने महत्वपूर्ण अरब देशों में मित्र सरकारें बनाने के अपने प्रयास और तेज कर दिए।
    अमरीका के लिए सबसे महत्वपूर्ण देश मिस्र था। पहले यहाँ के राष्ट्रपति नासिर के नेतृत्व में ही अरब राष्ट्रवाद में जबरदस्त उभार आया था। पर अनवर सादात के राष्ट्रपति बनने के बाद यहाँ अमरीकी असर बढ़ने लगा व हुस्नी मुबारक के समय में तो मिस्र अमरीका का सबसे बड़ा मित्र बन गया। पर यह दोस्ती सत्ताधारियों के स्तर पर ही थी व मिस्र के आम लोगों ने इस मित्रता को कभी स्वीकार नहीं किया। हुस्नी मुबारक ने अपने लोकतांत्रिक विरोधियों का उत्पीड़न किया व चुनावों का आयोजन इस तरह किया गया कि विरोधियों को उचित अवसर न मिल सके। मुबारक की इस जोर जबरदस्ती के बावजूद उनकी सत्ता को मजबूत करने के लिए अमरीका का समर्थन मिलता रहा।
    जब लोकतांत्रिक विरोध को उभारने के अवसर नहीं मिले तो मिस्र में वही हुआ जो ईरान में हुआ था यानी कट्टरपंथी मुस्लिम ताकतों में विरोध केन्द्रित होने लगा। जब और कोई जगह नहीं मिलती है तो विरोधी धार्मिक मंच की ओर हो जाते हैं क्योंकि वहाँ कुछ सुरक्षा मिल जाती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि मिस्र में अन्य विरोधी स्वर नहीं हैं पर सबसे संगठित विरोध की ताकत तो कट्टरपंथी तत्वों के पास है।
    पर अमरीका ने भी कच्ची गोलियाँ नहीं खेली हैं। ईरान के अनुभव से सीखते हुए उसने ऐसे प्रयास पहले ही आरंभ कर दिए हैं कि मुबारक के बाद जो सत्ताधारी आएँ वे उसके हितों के अनुकूल हों। आगे सवाल यह है कि मुबारक के जाने के बाद अस्थाई सरकार में सत्ता किसके पास आएगी व फिर चुनावों में कौन जीत पाएगा।
    सऊदी अरब के शासकों ने कट्टरपंथी धार्मिक नेताओं से समझौता किया हुआ है जिससे वे एक दूसरे की सहायता से पनप सकें। इस तरह यहाँ के कट्टरवादी तत्व बहुत शक्तिशाली हैं तथा उन्होंने अनेक देशों में हिंसक कट्टरवादी व सांप्रदायिक विचारों को फैलाया है। इसके बावजूद अमरीका यहाँ के शासकों के साथ अरबों रूपये के हथियार के सौदे करता रहा है।
    आगे सवाल यह है कि तेल की दौलत के बल पर सऊदी अरब के शासक कब तक अपनी लोकतांत्रिक मूल्यों की अवहेलना करने वाली सत्ता को कायम रख पाएँगे। अरब देशों की जनता में जो उभार आया है वह आज नहीं तो कल सऊदी अरब को भी ज़रूर प्रभावित करेगा।
    इराक में भयानक हिंसा व बर्बादी करने के बाद भी अमरीका यहाँ अपने उद्देश्य प्राप्त करने में सफल हुआ हो, ऐसा नहीं लगता है। वहाँ के आम लोगों में अमरीका व उसके पिछलग्गू राजनेताओं के प्रति आज भी बहुत विरोध की भावना है। अतः अमरीका व उसके मित्र पश्चिमी देशों को अब गंभीरता से सोचना चाहिए कि जिस तरह की नीतियाँ उन्होंने अरब देशों मे जन विरोधी सरकारों को बनाए रखने के लिए अपनाई हैं उन्हें त्यागने का वक्त अब आ गया है। यदि अमरीका व उसके सहयोगी पश्चिमी देश इस समय भी अरब स्ट्रीट से उठती आवाज़ को सुन कर अपनी नीतियाँ बदल लें तो अरब देशों में वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना की राह से एक बड़ी बाधा दूर हो जाएगी।
-भारत डोगरा

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