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रविवार, 11 अक्टूबर 2015

नेपाल में फेकू हारा -भारत नहीं

 भारत की विदेश नीति का यह प्रमुख हिस्सा रहा है कि पडोसी देशो की अंदरूनी राजनीति में हस्तक्षेप न  किया जाय और इसी कारण उसके सम्बन्ध पाकिस्तान को छोडकर सभी से अच्छे सम्बन्ध रहे है भारत में नयी सरकार आने के बाद उसकी विदेश नीति अस्पष्ट हो गयी है जिसका नतीजा नेपाल में दिखाई दे रहा है वहां पर इस चुनाव में भारतीय हस्तक्षेप की बात खुल कर सामने आयी कि सांसदों को खरीदने के लिए रुपया तक भेजा गया हमारे प्रधानमंत्री की पहली नेपाल यात्रा पर उनका भब्य स्वागत हुआ था लेकिन दूसरी यात्रा में उनकी अनाप सनाप बातो ने नेपाली जनता को रुष्ट  कर दिया था. नेपाली संविधान को बनाये जाने की प्रक्रिया में उनकी पार्टी के हस्तक्षेप ने नेपाली जनमानस में देश के प्रति आक्रोश पैदा  कर दिया. अंदरूनी सूत्रों के अनुसार नागपुरी दिशा निर्देशों के अनुरूप संविधान में वह हिन्दू राष्ट्र घोषित कराना चाहते थे जिसको वहा के संविधान निर्माताओ ने अस्वीकार कर दिया .जिसके फलस्वरूप हस्तक्षेप कर्ताओं को मुहं की खानी पडी वहीँ आज नए संविधान के बाद नेपाल ने अपना  प्रधानमंत्री भी चुन लिया है। 558 मेंबर वाली संसद ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल-यूनीफाइड मार्कसिस्ट लेनेनिस्ट  के नेता खडग प्रसाद शर्मा ओली को पीएम को तौर पर चुना। केपी शर्मा ने नेपाली कांग्रेस पार्टी के नेता व पूर्व प्रधानमंत्री सुशील कोइराला को हराया है .
संसद में आज हुए मतदान में सीपीएन-यूएमएल के प्रमुख ओली को 338 मत मिले, जबकि नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष कोइराला ने सिर्फ 249 मत हासिल किए. प्रधानमंत्री चुने जाने के लिए 299 मतों की जरुरत थी.कुल 587 सदस्यों ने मतदान किया.हस्तक्षेप न किया होता तो शायद परिणाम दुसरे होते . इसी तरह हमारे प्रधानमंत्री लगातार विदेश यात्राएं करते रहते है और अप्रवासी भारतीयों से जय जयकारा करते रहते है विरोध वहां भी शुरू हो गया है.विरोध में अप्रवासी भारतीयों द्वारा अपशब्दों का प्रयोग भी किया जा रहा है. प्रधानमंत्री विदेश में भी चुनाव सभा संबोधित करते है और विपक्षी दलों  के ऊपर आरोप- प्रत्यारोप करके  देश की गरिमा  को ठेस पहुचाते है .पहले यह नीति थी कि जो भारतीय किसी भी देश का नागरिक हो गया है वह उसी मुल्क की बेहतरी के सम्बन्ध में सोचे तथा उसी मुल्क के प्रति निष्ठावान रहे. अब यह नीति बदल गयी है अप्रवासी भारतीयों को बार -बार  संबोधित करने से अगर उनकी निष्ठां संदेह के घेरे में आयी तो निश्चित रूप से जिस मुल्क में रह रहे है दिक्कते पैदा हो जायंगी . इस सम्वन्ध में नागपुरी सोचने में असमर्थ है.अमरीकियों ने सुनियोजित तरीको से मुसलमानों में यह नारा दिया कि पहले वह मुसलमान है फिर जिस देश में रहते है वहां के नागरिक है.जिसका असर यह हुआ कि दुनिया में उनके ऊपर सवाल भी अमरीकियों ने ही खड़ा करा दिया. उनकी दिक्कते बढ़ी.नेपाल की जनता और भारतीय जनता में घनिष्ट सम्वन्ध है फेकू की उल्टी सीधी हरकतों से सम्वन्ध खत्म नही होने जा रहे है लेकिन एक विवाद बढ़ रहा है . समय रहते जिस दिशा में कदम उठाने की जरुरत है. भारत -नेपाल की जनता की एकता जिंदाबाद ! -रणधीर सिंह सुमन
लो क सं घ र्ष !

सोमवार, 28 सितंबर 2015

नेपाल में लगे 'मोदी मुर्दाबाद'

प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर मोदी की अनावश्यक विदेश यात्राओं ने भारत की छवि और विदेश नीति को जबरदस्त हानि पहुंचाई है. जिसका नतीजा है कि नेपाल की राजधानी काठमांडू में सोमवार को भारत विरोधी प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों ने  'मोदी मुर्दाबाद' और 'भारतीय विस्तारवाद मुर्दाबाद' जैसे नारे लगाए। फेसबुक से लेकर गूगल तक की यात्राएं भारत के प्रधानमंत्री पद की गरिमा तथा गंभीरता को कम कर रही हैं. देहात में कहा जाता है कि यदि बार-बार ससुराल भी जाओगे तो आखिर में खुरपा व खारा लेकर सास कह देगी कि दामाद जी जरा भैंस के लिए घास छोल लाओ. यही स्तिथि भारतीय प्रधानमंत्री ला रहे हैं. 
नेपाल ने बीते हफ्ते ही नया संविधान अपनाया है जिस पर भारत ने कथित तौर पर आपत्ति जताई है। भारत ने नेपाल के नए संविधान में सात बदलावों की मांग की थी, जो नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप है भारत की विदेश नीति किसी भी मुल्क के अन्दर आंतरिक हस्तक्षेप करने की नहीं रही है किन्तु नयी विदेश नीति में विस्तारवादी रवैये को भी शायद अपनाया है इसीलिए नेपाल में हो रहे विरोध प्रदर्शन वर्तमान सरकार की विदेश नीति की हंसी उड़ा रहे हैं. हद तो यहाँ तक हो गयी है कि नेपाल जाने वाले इंडियन आयल के टैंकरों को रोक दिया गया है जिसके बाद नेपाल में लोगों को वाहन कम इस्तेमाल करने और तेल बचाने की सलाह दी गई है। अगर यही विदेश नीति जारी रही तो नेपाल की जनता का भारत के साथ मधुर सम्बन्ध रख पाना संभव नहीं होगा और वह चीन की तरफ झुकाव होगा जिससे भारत को आर्थिक व राजनीतिक नुकसान होगा. जिसकी भरपाई संभव नहीं होगी. नेपाल के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता के मुताबिक चीन से सीमा पर दो रास्ते फिर से खोलने का अनुरोध किया गया है। इस तरह से नेपाल चीन की तरफ बढ़ रहा है और प्रधानमंत्री गूगल और फेसबुक के मुख्यालय के चक्कर लगा रहे हैं. जहाँ से भारत को कोई लाभ नहीं होना है और अगर गरिमा और गंभीरता प्रधानमंत्री पद की कम हुई तो वहां के कर्मचारी भी नरेन्द्र मोदी मुर्दाबाद के नारे लगाने लगेंगे लेकिन प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी को अपने पद की गंभीरता याद नहीं है. विदेशों में भी वह देश की राजनीति में कटाक्ष करने से बाज नहीं आ रहे हैं. 

सुमन 

मंगलवार, 26 मई 2015

मोदी सरकार की पहली वर्षगांठ

नरेन्द्र मोदी ने 25 मई 2015 को प्रधानमंत्री के रूप में एक साल पूरा कर लिया। उन्होंने 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। इस एक साल में मोदी की क्या उपलब्धियां रहीं,यह उतना ही विवादास्पद है जितना कि मोदी का व्यक्तित्व। जहां प्रधानमंत्री के समर्थक और अनुयायी यह अतिश्योक्तिपूर्ण दावा कर रहे हैं कि मोदी ने अभूतपूर्व सफलताएं हासिल की हैं वहीं उनके विरोधी, उन वायदों की सूची गिनवा रहे हैं जो पूरे नहीं हुए। उनके कार्यकाल का निष्पक्ष और ईमानदार विश्लेषण करना असंभव नहीं तो बहुत कठिन अवश्य है। हम यहां उन कुछ प्रवृत्तियों की चर्चा करेंगे जो मोदी के कार्यकाल में उभरीं और उस दिशा पर विचार करेंगे, जिस ओर उनके नेतृत्व वाली केंद्र सरकार देश को ले जा रही है।
आम चुनाव के समय नारा दिया गया था 'अब की बार, मोदी सरकार' और यह सचमुच मोदी की ही सरकार है। यह न तो एनडीए की सरकार है और ना ही भाजपा की। अखबारों के अनुसार, एनडीए के गठबंधन साथियों ने मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना की है। महाराष्ट्र के स्वाभिमानी शेतकारी संगठन और अकाली दल, भूमि अधिग्रहण अधिनियम में प्रस्तावित संशोधनों के विरोधी हैं। शिवसेना ने भाजपा की तुलना अफजल खान की सेना के महाराष्ट्र पर आक्रमण से की। पिछली यूपीए सरकार के विपरीत, प्रधानमंत्री शायद यह संदेश देना चाहते हैं कि वे एक कड़े प्रशासक हैं और सभी निर्णय वे स्वयं लेते हैं। प्रजातंत्र में सबको साथ लेकर चलना होता है,सभी के हितों का ख्याल रखना होता है। कुछ महीनों पहले, अखबारों में एक फोटो छपी थी जिसमें प्रधानमंत्री मोदी एक ऊँची कुर्सी पर बैठे हुए थे और बाकी सभी कैबिनेट मंत्रियों की कुर्सियां नीचे थीं। संदेश स्पष्ट था। प्रधानमंत्री ने किस हद तक अपने मंत्रियों पर शिकंजा कस रखा है यह इस बात से जाहिर है कि मंत्रियों को अपने निजी सचिवों की नियुक्तियों के लिए भी प्रधानमंत्री कार्यालय से अनुमति लेनी पड़ती है। कारण यह बताया गया है कि प्रधानमंत्री नहीं चाहते कि मंत्रिगण अपने रिश्तेदारों या परिचितों को अपना निजी सचिव बनाएं। परंतु क्या इसके लिए एक सामान्य निर्देश जारी करना पर्याप्त नहीं होता ?क्या प्रधानमंत्री को अपने मंत्रियों पर इतना भरोसा भी नहीं है कि वे उनके निर्देशों का पालन करेंगे? यह भी साफ नहीं है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने मंत्रियों के प्रस्तावित निजी सचिवों के संबंध में क्या जांच.पड़ताल की।
केंद्रीयकरण
मोदी सरकार में सभी शक्तियां, प्रधानमंत्री कार्यालय में केंद्रीकृत कर दी गई हैं। सभी मंत्रालयों के सचिवों की पीएमओ तक सीधी पहुंच है और पीएमओ किसी भी मंत्रालय से कोई भी फाईल बुलवा सकता है। इससे निश्चित तौर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में तेजी आई है परंतु हर तेज निर्णय हमेशा सबसे अच्छा निर्णय नहीं होता। प्रधानमंत्री ने फ्रांस की राफेल कंपनी से लड़ाकू हवाई जहाज खरीदने का सौदा, बिना रक्षामंत्री की मौजूदगी या सहमति के किया। प्रधानमंत्री इस एक वर्ष में दुनिया के बहुत से देशों में गए। इनमें भूटान, श्रीलंका, नेपाल, इंग्लैण्ड,जर्मनी, अमरीका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, चीन और मंगोलिया शामिल हैं। विदेश मंत्री, ईराक में फंसे 39 भारतीयों को निकालने और अन्य इसी तरह के कामों में व्यस्त रहीं। यहां तक कि नेपाल में भूकंप के बाद भारत सरकार ने जो राहत पहुंचाई उसका श्रेय भी केवल मोदी को दिया गया। जिन भी देशों में मोदी गए, वहां उन्होंने अप्रवासी भारतीयों की सभाओं को संबोधित किया और स्वदेश की राजनीति के संबंध में टिप्पणियां कीं।
किसी एक व्यक्ति में सारी शक्तियां केंद्रित कर देने से उन लोगों को लाभ होता है जो उस व्यक्ति के करीबी हैं या जिनकी उस तक पहुंच है। वह व्यक्ति जितना अधिक शक्तिशाली होता है उसे उतने ही ज्यादा विवेकाधिकार प्राप्त होते हैं और वह जो नीतियां बनाता हैए उनसे उन लोगों को लाभ होता है जो उसके नजदीक हैं। प्रधानमंत्री की छवि कुबेरपतियों के मित्र की है। उनके 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' 'मेक इन इंडिया' अभियानों से भी यही ध्वनित होता है। इन अभियानों के अंतर्गत उद्योगों की नियमन प्रणाली को लचीला बनाया जा रहा है, उन्हें विभिन्न अनुमतियां प्रदान करने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है, कारपोरेट टैक्सों की दरें घटाई गई हैं, पर्यावरण संबंधी बंधन ढीले किए गए हैं और उद्योगपतियों को कर्मचारियों को जब चाहे रखने और जब चाहे हटाने की स्वतंत्रता दे दी गई है। इस सब से श्रमिकों की ट्रेड यूनियनें कमजोर हुई हैं व श्रमिक वर्ग की आमदनी घटी है। राज्य, भूमि अधिग्रहण करने में उद्योगपतियों की मदद कर रहा है और उद्योगों के लिए बेहतर आधारभूत संरचना उपलब्ध करवाने के लिए भारी मात्रा में धन खर्च कर रहा है। मुंबई.दिल्ली औद्योगिक गलियारा और मुंबई से अहमदाबाद बुलेट ट्रेन चलाना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल हैं। इनकी तुलना पूर्व यूपीए सरकार की प्राथमिकताओं से कीजिए.यद्यपि वह भी उद्योगपतियों की मित्र थी.जिसने मनरेगा, खाद्य सुरक्षा व सूचना के अधिकार जैसी योजनाओं व कार्यक्रमों पर कम से कम कुछ धन तो खर्च किया।
एससी, एसटी व नीति आयोग
अनुसूचित जातियों के लिए विशेष घटक योजना व आदिवासी उपयोजना के लिए केंद्रीय बजट 2015.16 में पिछले बजट की तुलना में प्रावधान क्रमश: रूपये 43,208 करोड़ से घटाकर रूपये 30,851 करोड़ और रूपये 26,715 करोड़ से घटाकर रूपये 19,980 करोड़ कर दिए गए। इन समुदायों के आबादी में अनुपात की दृष्टि से जितना धन इन योजनाओं के लिए उपलब्ध करवाया जाना चाहिए, बजट प्रावधान उससे काफी कम हैं।
अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री नज़मा हेपतुल्लाह को सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े अल्पसंख्यकों में शिक्षा और रोजगार के अवसरों की कमी से ज्यादा चिंता इस बात की है कि पारसी समुदाय की प्रजनन दर कैसे बढ़ाई जाए।
मोदी सरकार ने योजना आयोग को भंग कर उसके स्थान पर नीति आयोग की स्थापना कर दी। मोदी सरकार का तर्क था कि योजना आयोग की अब कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई है क्योंकि उसका गठन उस दौर में किया गया था जब सरकार का अर्थव्यवस्था पर पूर्ण नियंत्रण था। परंतु इस संदर्भ में यह याद रखे जाने की जरूरत है कि शनैः शनैः योजना आयोग अधिक समावेशी नीतियां अपना रहा था और उसी ने अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए उनकी आबादी के अनुपात में बजट प्रावधान करने की अवधारणा प्रस्तुत की थी। आठवीं पंचवर्षीय योजना में पहली बार 'अल्पसंख्यक' शब्द का इस्तेमाल किया गया और इस बात पर जोर दिया गया कि समाज के हाशिये पर पड़े तबकों को मुख्यधारा के समकक्ष लाए जाने की जरूरत है। नौवीं पंचवर्षीय योजना में सामाजिक न्याय व सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण के जरिए सभी के विकास की बात कही गई थी। अल्पसंख्यकों के लिए विशेष प्रावधान लागू किए जाने का सिलसिला दसवीं पंचवर्षीय योजना से शुरू हुआ। इस योजना का फोकस महिलाओं व अल्पसंख्यकों सहित सभी वंचित व कमजोर वर्गों के सामाजिक.आर्थिक विकास पर था। ग्याहरवीं पंचवर्षीय योजना में अधिक समावेशी विकास की बात कही गई थी और सभी के लिए समान अवसर उपलब्ध करवाने पर जोर दिया गया था। बारहवीं पंचवर्षीय योजना में समाज के हाशिये पर पड़े वर्गों के लिए और अधिक आर्थिक प्रावधान किए गए थे।
योजना आयोग की जगह नीति आयोग स्थापित करने के निर्णय को इन तथ्यों के प्रकाश में देखा जाना चाहिए। नीति आयोग का वंचित समूहों के विकास से कोई लेनादेना नहीं है। वह तो एक प्रकार का 'थिंक टैंक'है, जिसका जोर बाजार और औद्योगिक गलियारों के विकास और उद्योगों के लिए बेहतर आधारभूत संरचना उपलब्ध करवाने पर है।
शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्ता
प्रधानमंत्री मोदी के बाद उनके मंत्रिमंडल के जिस मंत्री की मीडिया में सबसे अधिक चर्चा रही वे थीं मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी। और वे लगभग हमेशा गलत कारणों से चर्चा में रहीं। मानव संसाधन विकास मंत्री का कई शैक्षणिक संस्थानों से कई मौकों पर टकराव हुआ और उन्होंने अनेक विवादास्पद निर्णय लिए। इनमें शामिल हैं दिल्ली विश्वविद्यालय के चार.वर्षीय स्नातक कार्यक्रम को समाप्त करनाए अमर्त्य सेन द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय का दूसरी बार कुलाधिपति बनने से इंकारए परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व निदेशक अनिल काकोडकर व आरण्केण् शैवगांवकर का आईआईटी मुंबई के शासी निकाय से इस्तीफा,केंद्रीय विद्यालयों में शैक्षणिक सत्र के अधबीचए जर्मन की जगह संस्कृत को अनिवार्य विषय बनाना आदि। शैक्षणिक संस्थाओं की स्वायत्ता को समाप्त करने के भरपूर प्रयास किए गए। हरियाणा में स्कूलों में गीता पढ़ाई जा रही है और राजस्थान के स्कूलों में सूर्यनमस्कार अनिवार्य बना दिया गया है।
आरएसएस नेता सुरेश सोनी व कृष्णगोपाल दत्तात्रेय और भाजपा के जेपी नड्डा व रामलाल ने मानव संसाधन विकास मंत्री से मिलकर यह मांग की कि स्कूलों के इतिहास के पाठ्यक्रमों में 'सुधार' किए जाएं। इस मुद्दे पर कई बैठकें हुईं। 30 अक्टूबर 2014 को इस मुद्दे पर छठवीं बैठक आयोजित की गई। दीनानाथ बत्रा की लिखी पुस्तकों को गुजरात  सरकार ने स्कूली विद्यार्थियों के अतिरिक्त अध्ययन के लिए निर्धारित किया है। ये किताबें इतिहास को हिंदू राष्ट्रवादी चश्मे से देखती हैं और इनमें अप्रमाणित तथ्यों के आधार पर प्राचीन भारत का महिमामंडन किया गया है ताकि लोगों में श्रेष्ठता और गर्व का झूठा भाव जगाया जा सके। इतिहास को पौराणिक रंग दे दिया गया है और पौराणिक कथाओं को इतिहास बताया गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं कहा कि प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी की तकनीक उपलब्ध थी और इसका प्रमाण यह है कि भगवान गणेश का सिर हाथी का और शरीर मनुष्य का है। हम सब यह सोचकर चकित थे कि हाथी का कई क्विंटल वजनी सिर यदि किसी तरह मानव शरीर पर लगा भी दिया जाए तो वह मनुश्य उसका वजन कैसे सहन कर सकेगा। इसी तरह के वक्तव्य कई अन्य भाजपा नेताओं ने भी दिए जिनमें से कुछ ने कहा कि भारत में हजारों साल पहले परमाणु मिसाइलें थीं। विद्यार्थियों के सामने फंतासी और पौराणिक कथाओं को इतिहास के रूप में परोसनाए उनके दिमाग को कुंद करना है। एक अच्छे विद्यार्थी का सबसे बड़ा गुण यही होता है कि वह किसी भी बात को आंख मूंचकर नहीं मानता और हर विश्वास व तथ्य को सत्य की कसौटी पर कसता है।  
हिन्दू राष्ट्रवादी सांस्कृतिक चेतना
देश में हिन्दू राष्ट्रवादी सांस्कृतिक चेतना का तेजी से प्रसार हो रहा है। यह, हिन्दू धार्मिक चेतना से एकदम अलग है। हिन्दू धार्मिक चेतना का प्रकटीकरण कई स्वरूपों में हो सकता है जिनमें पवित्रता.अपवित्रता की अवधारणाए जो यह निर्धारित करती है कि कौन किसके साथ रोटी.बेटी का संबंध रख सकता है और कौन ऊँचा है और कौन नीचा से लेकर मीरा, कबीर, गुरूनानक, तुकाराम, रविदास आदि के प्रेमए सद्भाव, समानता, सत्य व अहिंसा पर आधारित समावेशी शिक्षाओं तक शामिल हैं। परंतु हिन्दू राष्ट्रवादी चेतना एक प्रकार की राजनैतिक चेतना है जो जाति.आधारित ऊँचनीच को कायम रखते हुए हिन्दुओं को राजनैतिक रूप से एक करना चाहती है और जो 'दूसरे'को न केवल परिभाषित करती है वरन् यह भी सिखाती है कि उस 'दूसरे' से हिन्दुओं को अनवरत युद्धरत रहना है। हिन्दू राष्ट्रवादी चेतना,एकाधिकारवादी राज्य को आसानी से स्वीकार कर लेगी बशर्ते वह उच्च जातियों के श्रेष्ठि वर्ग के विशेषाधिकारों को कायम रखे और 'दूसरे' समुदाय का हिंसा से दमन करे और यहां तक कि उसे देश से भगा दे।
ध्रुवीकरण करने के उद्धेश्य से शुरू किया गया साम्प्रदायिक विमर्श दिन.प्रतिदिन और दुस्साहसी होता जा रहा है। कुछ राज्यों में गोड़से के मंदिर बन गए हैं और उसे हिन्दुओं का नायक बताया जा रहा है। दिसम्बर 2014 से लेकर अब तक दिल्ली,पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, हरियाणा, कर्नाटक और मध्यप्रदेश में चर्चों पर हमले की कम से कम 11 घटनाएं हुई हैं।  शासक दल के सांसद और यहां तक कि मंत्री ऐसे वक्तव्य दे रहे हैं जिनके लिए उनपर दूसरे समुदाय के विरूद्ध घृणा फैलाने के लिए भारतीय दण्ड संहिता की धारा 153ए के तहत कार्यवाही की जा सकती है। गिरिराज सिंह,साक्षी महाराज, योगी आदित्यनाथ, साध्वी प्राची व अन्यों ने अलग.अलग समय पर कहा कि जो लोग राम में विश्वास नहीं करते वे हरामजादे हैंए मदरसे आतंकवाद के अड्डे हैं,मुसलमानों की आबादी बहुत तेजी से बढ़ रही है, हिन्दू महिलाओं को कम से कम चार बच्चे पैदा करने चाहिए और जो लोग मोदी को वोट नहीं देते उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए। परंतु न तो इन भड़काऊ वक्तव्य देने वालों और ना ही चर्चों पर हमले करने वालों पर कोई कार्यवाही की गई।
घर वापसी अभियान जोरशोर से जारी है और आरएसएस मुखिया मोहन भागवत ने आगरा में गैर.हिन्दुओं को जबरदस्ती हिन्दू बनाए जाने को औचित्यपूर्ण बताते हुए अत्यंत गिरी हुई भाषा का उपयोग किया। उन्होंने यह मांग की कि 'हमारा माल वापिस कर दो' मानो मुसलमान कोई संपत्ति हों। भागवत के खिलाफ कार्यवाही करने की बजाए गृह मंत्री ने धर्मांतरण विरोधी कानून बनाए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया। इसी तरह, कई संगठनों ने यह बीड़ा उठा लिया है कि वे हिन्दू लड़कियों की शादी गैर.हिन्दुओं से नहीं होने देंगे भले ही लड़के और लड़की को इसमें कोई आपत्ति न हो।
हिन्दू राष्ट्रवादी संगठन केवल मुसलमानों के खिलाफ घृणा फैलाने से संतुष्ट नहीं हैं। वे राज्य की शक्ति का प्रयोग उनके खिलाफ करना चाहते हैं। गुजरात विधानसभा ने हाल में एक अत्यंत भयावह तथाकथित आतंकवाद.निरोधक विधेयक पारित किया है और सरकार के कहने पर राष्ट्रपति ने महाराष्ट्र सरकार के बीस साल पुराने गौवध निषेध अधिनियम को अपनी स्वीकृति दे दी है। इन सभी कानूनों का उद्धेश्य अल्पसंख्यकों का दमन है।
-इरफान इंजीनियर

सोमवार, 3 मार्च 2014

संघी विचारधारा और पीएम की कुर्सी के बीच झूलते मोदी

सन् 1999 से 2004 तक स्वघोषित रूप से प्रतिबद्ध स्वयंसेवकों के नेतृत्ववाली वाली एनडीए सरकार का दुस्साहस एक समय इतना बढ़ गया था कि उसने भारतीय संविधान की समीक्षा के लिए एक आयोग का ही गठन कर दिया था ताकि, उसमें से स्वतंत्रता, समानता और न्याय (जो वस्तुतः फ्रांसीसी क्रांति की देन हैं), जैसे विदेशी मूल्यों को निकाला जा सके। उस समय संघ परिवार की ही एक शाखा विश्व हिंदू परिषद के नेता आर्चाय धर्मेद्र और गिरिराज किशोर ने तो एक कदम आगे बढ़कर संविधान में किये जाने वाले परिवर्तनों को भी सुझा दिया था परन्तु आयोग के सदस्यों को लगा कि अगला चुनाव जीतने के बाद ही संविधान बदला जाए। लेकिन भाजपा नेतृत्व का संविधान बदलने का मुंगेरीलाल का यह सपना पूरा नहीं हो सका क्योंकि वह आम चुनाव के बाद सत्ता से बेदखल हो गयी थी।
                                                     कहा जाता है कि इतिहास के पास पुराने सवालों का जवाब देने का एक तरीका यह भी होता है कि वह नित नए सवाल उठाता रहे। जिस तरह आज देश की मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों की जमातें नमो-नमो का दिन रात जाप कर रही हैं, इन पुराने सवालों के जवाब में नए सवालों का उठाया जाना बहुत ही जरूरी हैं। आज जब प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए मोदी की छटपटाहट लगातार बढ़ रही है,
मोदी को इन सवालों से दो चार होना ही पड़ेगा कि वह स्वाधीनता, समानता, धर्मनिरपेक्षता और न्याय जैसे आधारभूत सामाजिक मूल्यों में कोई विश्वास करते हैं अथवा नहीं? वस्तुतः उनके वैचारिक राजनैतिक पूर्वज, संघ परिवार के दार्शनिक और मार्गदर्शक बी.डी सावरकर ने मनुस्मृति को ही नियमों और कानूनों का आधार माना था। जैसा कि खुद सावरकर ने अपनी एक पुस्तक के अध्याय ‘मनुस्मृति और महिलाएं’ में लिखा है ‘मनुस्मृति वह ग्रंथ है जो वेदों के पश्चात हमारे हिंदू राष्ट्र के लिए अत्यंत पूजनीय है तथा प्राचीनकाल से हमारी संस्कृति, आचार, विचार और व्यवहार की आधारशिला बन गयी है। यह ग्रंथ सदियों से हमारे राष्ट्र के एहिक एंव पारलौकिक यात्रा का नियमन करता आया है। आज भी करोड़ों हिंदू जिन नियमों के अनुसार जीवन
यापन तथा व्यवहार-आचरण कर रहे हैं वे नियम तत्वतः मनुस्मृति पर ही आधारितहै। आज भी मनुस्मृति हिंदू नियम है’ (सावरकार समग्र, खंड 4 पृष्ठ संख्या 415)
                                                            बहरहाल, हम सभी इससे वाकिफ हैं कि मनुस्मृति में शुद्रों और महिलाओं के लिए क्या प्रावधान हैं। मनुस्मृति में कहा गया है कि यदि शुद्र किसी ब्राह्मण को धर्मोपदेश देने का दुस्साहस करे तो राजा को उसके कान और मुंह में गरम तेल डाल देना चाहिए (आठ/272 मनुस्मृति)। यह तो मात्र एक नमूना मात्र है जिसे मोदी के वैचारिक प्रतिनिधि और संघ के स्वयंसेवक कानून का आधार मानते हैं। आज मोदी अपनी सभाओं में खुद को चाय वाला या पिछड़ा कह कर वोट मांग रहे हैं, और पिछले कुछ दिनों से जिस तरह से वे खुद को राजनीतिक अछूत बता कर वोटरों से वोट मांग रहे हैं, क्या मोदी को पता भी है कि
मनुस्मृति के अनुसार शुद्रों के साथ क्या व्यवहार किया जाता है?
                                                                        एक बात और, मोदी लगातार राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रवाद की बातें करते हैं। अपनी सभाओं में तिरंगे के खातिर जान देने की बातें तक करते हैं। परंतु, जिस राजनीतिक धारा से मोदी आते हैं उसका इतिहास इन सारी धारणाओं के एकदम ही विपरीत रहा है। संघ परिवार के बहुत सारे लोगों का मानना था कि आजाद के बाद भारत का विलय नेपाल में हो जाना चाहिए, क्योंकि नेपाल दुनिया का एक मात्र हिंदू राष्ट्र है। खुद सावरकर ने नेपाल नरेश को स्वतंत्र भारत का ‘भावी सम्राट’ घोषित किया था। (ए.एस भिंडे-बिनायक दामोदर सावरकर, व्हीर्लस विंड प्रोपोगेंडा 1940, पृष्ठ संख्या 24)। मोदी जिस तिरंगे को
भारत की शान कहते हैं उस तिरंगे को संघ परिवार ने कभी स्वीकार ही नहीं किया। आजादी के पहले तो संघ के स्वयंसेवकों ने तिरंगे को कई बार फाड़ा और जलाया भी था। जाने माने समाजवादी नेता एन.जी गोरे 1938 में घटित ऐसी ही शर्मनाक घटना के गवाह रहे हैं जब हिंदुत्ववादियों ने तिरंगे को फाड़ा और जलाया था। क्या मोदी जैसे कथित राष्ट्रवादी को ऐसी घटनाओं पर दुख नहीं पहंुचता है? क्या संघ के इस शर्मनाक कृत्य के लिए मोदी को माफी नहीं मांगनी चाहिए?

                                             गुजरात में मोदी के ही शासन में इतना बड़ा जनसंहार हुआ जिसमें मुसलमानों
को जानवरों की तरह मारा और काटा गया। परंतु चुनाव आते ही मोदी धर्मनिरपेक्ष हो गए। अभी हाल ही में अहमदाबाद में साबरमती के पास ‘बिजनेस विद हारमोनी’ नाम के एक मुस्लिम बिजनेस कांक्लेव का उद्घाटन करते हुए मोदी ने कहा कि समाज के विकास के लिए एकता जरूरी है और हिंदू तथा मुस्लिम
विकास की गाड़ी के पहिए हैं। खुद मोदी और संघ परिवार का कृत्य और विचार इस बयान के हमेशा विपरीत रहा है। हिंदु राष्ट्र में मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक ही माना गया। जिस तरह से मुस्लिम शासकों ने शासित हिंदुओं की रक्षा के लिए जजिया कर का प्रावधान किया ठीक उसी तर्ज पर संघी विचारधारा में, मुस्लिम आबादी को हिंदु राष्ट्र में उसके द्वारा दिए गए कर पर ही सुविधा मुहैया करवाने का प्रावधान है। आज भी मोदी के साथी और पूर्वी उत्तर प्रदेश में हिंदू युवा वाहिनी के नेता योगी आदित्यनाथ खुले मंच से ऐसी ही बातें करते है
                                                वस्तुतः मोदी आज दो राहे पर खड़े हैं जहां एक रास्ता सावरकर के दर्शन पर आधारित राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ का है तो दूसरा पीएम की कुर्सी का। खैर मोदी ने इतिहास की जानकारी के लिए विष्णु पांड्या और रिजवान कादरी को अपना सिपहसालार बनाया है। मोदी को चाहिए कि वे संघ के इन काले कारनामों को जानें और संघ से अपना नाता तोड़ लें। तभी पीएम की कुर्सी वाला रास्ता उनके लिए आसान होगा नही ंतो संघ से नाता नहीं तोड़ने वाले आडवाणी की तरह पीएम का उनका टिकट भी कभी कंफर्म नहीं हो पाएगा।
-अनिल यादव
क.न. 55 मुस्लिम बोर्डिग हाउस
इलाहाबाद विश्वविद्यालय इलाहाबाद
मो .न.09454292339

बुधवार, 13 नवंबर 2013

वो दस दिन जब दुनिया हिल उठी




“वो मौसम रूस के लिये सदी का सबसे सर्द मौसम था। जर्मनी से हर मोर्चे पर लगातार मिल रही हार, बिना बिजली, खाने और बग़ैर छत के लोग सिर्फ मरने के लिये जी रहे थे, और अंत में मर रहे थे। लाखों गरीब किसानों की मौत के साथ वो साल बीता।”
1916 इतिहास के पन्नों में कुछ इसी तरह दर्ज़ है. यही हालात ज़मीन बने 1917 के रूसी इंक़लाब की। मौका था अक्टूबर क्रांति की 96वीं वर्षगांठ का और जगह थी इंदौर में एमपीबीओए का दफ्तर।
7 नवम्बर को मनाये जाने वाले रूसी क्रांति दिवस को अक्टूबर क्रांति दिवस कहने पर अनेक लोगों को अचरज लगता है।  दरअसल 1917 में रूस में जूलियन कैलेंडर प्रचलित था जिसके मुताबिक रूसी क्रांति 25 अक्टूबर को हुई थी। सारी दुनिया में प्रचलित मौजूदा ग्रेगोरियन कैलेंडर, जिसे हम लोग भी इस्तेमाल करते हैं, के मुताबिक उस दिन 7 नवम्बर की तारीख़ थी। इस दिन को दुनिया भर में सर्वहारा की ऐतिहासिक जीत के रूप में मनाया जाता है।

पिछले बीस-पच्चीस वर्षों में पूँजीवाद के बढ़ते प्रभाव के कारण नयी पीढ़ी के लोगों को सर्वहारा की इस महान क्रांति के इतिहास से वंचित रखा जा रहा है। यह कोई हज़ारों साल पहले की नहीं बल्कि सिर्फ़ 96 वर्ष पहले की ही घटना है जब आम लोगों ने पहले रूस को और फिर सारी दुनिया को हिलाकर रख दिया था। सन 1917 में हुई वह बोल्शेविक क्रांति दुनिया के अनेक देशों के इंकलाबियों के लिए प्रेरणा बनी। सन्दर्भ केन्द्र ने इंदौर में इस बार 7 नवम्बर 2013 को रूसी क्रांति की सालगिरह पर उस क्रांति के गौरवशाली इतिहास को सही परिप्रेक्ष्य में जानने-समझने को उत्सुक युवाओं के साथ पूरे दिन की एक कार्यशाला की, और रूस में  हुई क्रांति के बारे में, क्रांति के बाद बने सोवियत संघ के बारे में, वहाँ हुए परिवर्तनों के बारे में विस्तार से जानने - समझने की कोशिश की। कार्यशाला में क्रांति को एक विज्ञान के रूप में समझने की कोशिश के साथ ही उन महान मज़दूरों, किसानों और इंकलाबियों को याद किया गया जिन्होंने दुनियाभर  में इस यक़ीन को हमेशा के लिए पुख्ता किया कि यह दुनिया आम लोगों द्वारा बदली जा सकती है और पूंजीवाद कितना भी ताकतवर हो, वह भीतर से न केवल खुद खोखला होता है बल्कि मुनाफ़े की हवस में दुनिया को भी खोखला करता जाता है।

समाजवाद और पूँजीवाद क्या हैं? इस बुनियादी प्रश्न पर कॉमरेड जया मेहता के परिचयात्मक संक्षिप्त वक्तव्य के बाद रूसी क्रांति के पूर्व की परिस्थितियों का विवेचन किया गया जो 1917 की क्रांति का आधार बनीं। उन्होंने बाकुनिन के अराजकतावाद से लेकर पोपुलिस्ट नरोदनिकों के बारे में बताया जो ज़ार के शासन को राजनीतिक हत्याओं द्वारा ख़त्म करना चाहते थे लेकिन उसके बाद के समाज को लेकर स्पष्ट नहीं थे।

सन 1861 में रूस में ग़ुलाम किसानों को कथित आज़ादी देने वाले कानून से लेकर 1870 में पेरिस कम्यून से होते हुए लेनिन के भाई की नरोदनिक गुट के साथ ज़ार को बम से उड़ाने की साज़िश, गिरफ्तारी और हत्या के वाकये से होते हुए उन्नीसवीं सदी के अंत में नए मार्क्सवादी समूह के उभार के बारे में जानकारी दी। उन्होंने  बताया कि 1900  के पहले तक लेनिन भी विभिन्न राजनीतिक विचारों वाले गुटों के हिस्सा थे। सन 1902 में उनके पर्चे "हमें क्या करना चाहिए" से खड़ी हुई बहस ने उनकी पार्टी के भीतर विभाजन कर दिया। लेनिन की पार्टी को ज़यादा वोट मिलने के कारण वह कहलायी बोल्शेविक और जिनके मत कम थे, वे कहलाये मेन्शेविक। सन 1903 से 1905 की असफल क्रांति से होते हुए पहले विश्वयुद्ध और फिर फरवरी 1917 की क्रांति और अक्टूबर में हुई समाजवादी क्रांति तक के इतिहास, उस समय के रूसी समाज और आर्थिक परिवर्तनों के बारे में विस्तार से बात हुई। चर्चा को संचालित करते हुए कॉमरेड विनीत तिवारी ने भागीदारों को उस वक़्त के मतभेदों और ट्राटस्की, प्लेखानोव, वेरा जासुलिश आदि क्रांतिकारियों और उनकी बहसों के मुद्दों को भी बताया।

पृष्ठभूमि स्पष्ट करने के बाद रूसी क्रांति के आंखोंदेखे गवाह रहे अमेरिकी पत्रकार जॉन रीड की किताब पर बनी फ़िल्म "वो दस दिन जब दुनिया हिल उठी" का प्रदर्शन किया गया। यह फ़िल्म विश्व के महान फ़िल्मकार आईजेन्स्टाइन के सहयोगी रहे ग्रिगोरी अलेक्सांद्रोव ने बनायी थी और इसमें  पहले विश्व युद्ध और 1917 के दौर के कुछ ऑरिजिनल फुटेज का इस्तेमाल किया गया है।  हिंदी में यह फ़िल्म सन्दर्भ केन्द्र द्वारा डब की गई है और अब तक इसके देश-विदेश में सैकड़ों प्रदर्शन हो चुके हैं। फ़िल्म में बताया गया कि सन 1861 में रूस से मज़दूर प्रथा खत्म होने के बाद लाखों किसान खेत छोडकर शहरों की ओर पलायन करने लगे, बद से बदतरी की ओर। चौड़ी सडकों और आलीशान इमारतों के चकाचौध भरे शहर के पीछे बसी बस्तियों में मज़दूरों की ज़िन्दगी किसी लिहाज़ से ग़ुलाम किसानों से बेहतर नहीं थी। ज़ार के खिलाफ आवाज़ उठना शुरु हो रही थी। और साथ ही क्रूर सशस्त्र दमन भी। इसी दौरान सन 1887 में एक युवा छात्र नेता को ज़ार के खिलाफ़ षड्यंत्र के आरोप में फांसी दे दी गयी. उसका नाम था अलेक्ज़ेंडर उल्यानोव. वह तब सत्रह के हुए व्लादिमिर उल्यानोविच ‘लेनिन’ का बड़ा भाई था।  लेनिन ने बाद में मार्क्स को पढना शुरु किया और जाना कि ज़र को मरने से ज़यादा ज़रूरी इस व्यवस्था को बदलना है जो ज़र को असीमित शक्तियों का मालिक बनती है। ज़ारशाही के खिलाफ संघर्षरत लेनिन को पहली बार 1895 में गिरफ्तार किया गया. 1904 में जापान से मिली हार और सैंट पीटर्सबर्ग की भयानक सर्दियों के अगले साल पहली बडी हडताल हुई जिसमें 30 लाख से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया. जिसे ज़ार द्वारा कुछ रियायत देने के वादे के साथ दबा दिया गया. बिगडते माहौल के बीच दूसरी हडताल साईबेरिया की सोना खदानों के मज़दूरों ने 1912 में और 1917 तक आते-आते ज़ारशाही के अंत के साथ ही क्रांति की कवायद तेज़ हो गयी. अक्टूबर 1917 में बोल्शेविक पार्टी ने लगभग बिना खून-खराबे के सत्ता हासिल की.

फ़िल्म के उपरांत हुई चर्चा में भागीदारों के सवालों का जवाब देते हुए कॉमरेड जया मेहता, कॉमरेड विनीत तिवारी और कॉमरेड अभय नेमा ने रूसी क्रांति के बाद बनी रूस के भीतर की गृहयुद्ध की परिस्थियों, एक पिछड़े और सामंती देश में समाजवादी क्रांति करने की मुश्किलों, लेनिन द्वारा अपनाई गयी नयी आर्थिक नीति (नेप), कृषि से सरप्लस का उद्योगों के भीतर स्थानांतरण, संपत्ति के सामाजिकीकरण, एक नए मनुष्य के निर्माण की कोशिश, वैश्विक आर्थिक मंदी, फ़ासीवाद के उभार और दूसरे विश्वयुद्ध की परिस्थितियों  से लेकर सोवियत संघ के विघटन के कारणों व् मौजूदा हालात पर भी बात की। सवाल-जवाब के दौरान हिंसा से समाजवाद का सम्बन्ध जोड़ने वाले पूंजीवादी मीडिया की साज़िशों और सर्वहारा की तानाशाही का अर्थ भी स्पष्ट किया गया और रूसी क्रांति का दुनिया के बाकी देशों के लिए महत्त्व भी रेखांकित किया गया।

कॉमरेड जया मेहता ने पूर्व समाजवादी देशों की योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था और उससे सामाजिक सम्बन्धों में होने वाले बदलावों के बारे में विस्तार से बताया।  समाजवादी जर्मनी और बर्लिन की दीवार टूटने के बाद एकीकरण से पूंजीवादी चंगुल में आये जर्मनी - दोनों के फर्क को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि समाजवाद में उपभोक्ता वस्तुएं ज़यादा नहीं थीं लेकिन ज़रूरी चीज़ें सभी के लिए थीं। नब्बे फीसदी से ज़यादा औरतें रोज़गार में थीं। उन्हें सम्मान, सुरक्षा और रोज़गार देना ही नहीं , बल्कि उनके बच्चों को पौष्टिक खाना, अच्छी शिक्षा, खेल के अवसर देना, बुज़ुर्गों की देखभाल करना भी राज्य की ज़िम्मेदारी थी। यह स्थिति पूंजीवाद कभी नहीं कर सकता क्योंकि उसका निज़ाम ही शोषण के आधार पर चलता है। लेकिन जो समर्थ हैं, उन्हें लगता है कि हम पूंजीवादी व्यवस्था में ज़यादा कमाएंगे और ज़यादा सुख से रहेंगे क्योंकि हमारे पास अधिक योग्यता है, तो वे पूंजीवाद के प्रति आकृष्ट होते हैं। इस आकर्षण को ज़बरदस्ती नहीं रोका जा सकता।  इसीलिये लेनिन ने अंतरराष्ट्रीयतावाद की बात की थी ताकि पूरी दुनिया के लोगों में समाजवादी मानसिकता का निर्माण हो सके। 

कॉमरेड अभय नेमा ने अपनी पुस्तक लेनिन का अंश सुनाते हुए सोवियत संघ की उपलब्धियों की चर्चा की और बताया कि वहाँ शोषितों के पक्ष में 1917 की क्रांति के तुरंत बाद इतनी चीज़ें हुई थीं जिनके लिए हम आज भी लड़ रहे हैं और किसी पूंजीवादी देश में ऐसे प्रगतिशील कार्यक्रमों को लागू करने का माद्दा नहीं है।

अंत में क्यूबा, वेनेज़ुएला, निकारागुआ, बोलीविया, इक्वेडोर, नेपाल आदि देशों से होते हुए बात हिंदुस्तान तक आयी। सवाल उठा कि क्या हिंदुस्तान जैसे देश में रूस जैसी क्रांति हो सकती है? वक्ताओं ने जवाब में कहा कि हिंदुस्तान में हिंदुस्तान के किस्म की ही क्रांति होगी, न रूस जैसी और न चीन या क्यूबा जैसी। लेकिन क्रांति ज़रूर हो सकती है। जब रूस कि जनता ने रूस के भीतर क्रांति की तो कौन सोचता था कि रूस जैसे पिछड़े, अनपढ़ और गरीब लोगों के देश में क्रांति हो सकती है।  हो सकती है तो कितने दिन टिक सकती है। लेकिन क्रांति रूस के लोगों ने मुमकिन की और उसे आगे भी बढ़ाया। रूस की क्रांति यही सिखाती है कि जब तक दुनिया के किसी भी हिस्से में पूँजीवाद, शोषण और गैर बराबरी है तब तक वहाँ क्रांति ज़रूर हो सकती है, और उसे मुमकिन करना क्रांतिकारी शक्तियों की ज़िम्मेदारी है।

इस कार्यशाला में भागीदारी की पंखुडी मिश्रा, सारिका श्रीवास्तव, जया मेहता, आस्था तिवारी, समीक्षा दुबे, रुचिता श्रीवास्तव, अभय नेमा, विभोर मिश्रा, हेमंत चौहान, केसरी सिह, तौफीक़ होमी, राज लोगरे, सुरेश डूडवे, सुरेश सोनी और विनीत तिवारी ने। रूसी क्रांति की याद से उपजी ऊर्जा और वैचारिक ऊष्मा से भरे प्रतिभागियों ने चाहा कि वे दुनिया के बाकी देशों में हुई  क्रांतियों के बारे में भी जानने-समझने और सोचने के लिए जल्द फिर मिलेंगे।

 -    विभोर मिश्रा
सम्पर्क- 09755555293

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

टुंडा इलाज कराने आया है

बगैर शरा कभी शेख थूकता भी नही।
मगर अँधेरे उजाले वह चूकता भी नहीं।।
                                                      -अकबर इलाहाबादी 

अकबर इलाहाबादी का यह शेर भारत में वर्तमान दौर में पूरी तरीके से लागू है. कथित खूंखार बम निर्माता आतंकी अब्दुल करीम टुंडा की गिरफ्तारी भारत नेपाल बॉर्डर से दिल्ली स्पेशल पुलिस द्वारा करना बताया जाता है जबकि विभिन्न प्रेस सूत्रों से मिल रही जानकारियों के अनुसार सत्तर वर्षीय अब्दुल करीम टुंडा पाकिस्तान में बीमार चल रहा था और उसका इलाज आई एस आई नहीं कर रही थी और फिर इलाज के नाम पर उसको संयुक्त अरब अमीरात भेजा गया जहाँ से उसको नेपाल के रास्ते गुपचुप तरीके से भारत लाया गया। जितनी जानकारियां प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा उसके सम्बन्ध में दी जा रही हैं वह जानकारियां पहले से ही भारत को प्राप्त थी। अब भारत का काम यह है कि उसका बेहतर से बेहतर इलाज कराये और ऐसे दगे कारतूसों को इकट्टा करके रखे। इस देश में खुफिया सूचना तंत्र अभी कौन-कौन से तमाशे करेगा और आगे-आगे क्या होता है यह सब को भली-भाँती मालूम हो गया है।  टुंडा की हलचल ख़त्म नही हुई कि यासीन भटकल को भी उसी तरीके से नेपाल बॉर्डर पर गिरफ्तार कर लिया गया है अब यह पता चलना बाकी है कि यासीन भटकल भारत से नेपाल बॉर्डर गए थे या नेपाल से भारत के बॉर्डर पर आ रहे थे। आने वाले दिनों में सभी कथित फरार आतंकवादी भारत नेपाल सीमा पर बरामद  और उनसे बहुत सारी जानकारियां और बहुत सारे जासूसी उपन्यास भी लिखे जा सकते हैं. समाचारों में यह भी आया है कि वाराणसी, फैजाबाद, गोरखपुर के बम विस्फोट में भी यासीन भटकल का हाथ था जबकि अभी तक न्यायालय में चल रहे वादों में यासीन भटकल का जिक्र कहीं भी विवेचना में नहीं आया था। जो सूचनाएं प्रसारित की जाती हैं उससे सारे बम विस्फोटों की जानकारी प्रसारित कर दी जाती है। कोई भी मौका चूकना नही चाहिए लेकिन सनसनीखेज सूचनाएं जारी करने से स्तिथि नहीं बदलती है। 

सुमन 
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