मंगलवार, 18 अक्तूबर 2011

भूमण्डलीकरण एवं उसके अनैतिक विकास से उत्पन्न अन्याय की भारतीय उच्चतम न्यायालय द्वारा भत्र्सना भाग 2

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सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भी पहले, भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय की एक कमेटी- ‘‘कमेटी आन स्टेट अग्रेरियन रिलेशन्स एण्ड द अनफिनिश्ड टास्क आॅफ लैण्ड रिफाम्र्स’’ ने अपनी जो रिपोर्ट मार्च 2009 मंे दाखिल की, उसमें यह कहा कि आदिवासियों की जमीनें छीनना ‘‘औपनिवेशिक कृत्य है, जिसमें कम्पनियाँ जन सतर्कता सेना- ‘सलवा जुडूम’ की आर्थिक सहायता केवल इस अभिप्राय से कर रही हैं ताकि गाँव के गाँव खाली करा लिए जाएँ, रिपोर्ट के अनुसार- ‘‘जो कि अधिकारिक रिपोर्ट है, 640 गाँव तो समतल ही कर दिए गए, यह सब बन्दूक के निशाने पर सरकार की मेहरबानी से हुआ, दंतेवाड़ा की आधी से अधिक जनसंख्या के बराबर- 3,50,000 आदिवासी बेघर हो गए, औरतों के साथ व्यभिचार हुआ, युवा अपाहिज बनाए गए, लड़कियों का कत्लेआम हुआ। जो भाग नहीं सके उनको ‘‘सलवा-जुडूम’’ के शरणार्थी शिविरों मंे हँका दिया गया। हाल यह है कि वह 640 ग्राम जो ‘लौह-अयस्क’ पर स्थित थे, अब निर्जन हैं तथा बड़ी बोली लगाने वालों के लिए उपलब्ध हैं।
कोर्ट के फैसले पर हमारे सम्पादकीयों तथा विश्लेषणों का जोर इस बात पर है कि उच्चतम न्यायालय वाक्-पटुता की रौ में विधिक क्षेत्र से आगे निकल गया है, और इसके ब्याख्यात्मक भाग गैर जरूरी हंै। विश्लेषकों के इस रुख ने इस बात को नजर अन्दाज कर दिया कि केन्द्र और राज्य सरकार ने अपने हित
साधने हेतु वहाँ की जमीनी वास्तविकताओं का कोर्ट में खुद ही बखान किया था ताकि उनके द्वारा आदिवासी युवाओं को सिविल मिलीशिया में भर्ती के मामले को न्याय संगत मान लिया जाय, हालाँकि यह भर्ती
संविधान एवं पुलिस एक्ट 1861 का खुला उल्लंघन है। विकास का जो विकृत एजेन्डा पेश हुआ, जो झूठे आश्वासन दिए गए, जो अवैधानिक कार्य किए गए, संवैधानिक
निषेध के बावजूद जिस तरह आदिवासियों की जमीनों को हड़पा गया, जिस तरह से राज्य सरकार के गलत निर्णयों से विद्रोह ने सर उठाया और जिसके दबाने हेतु अन्याय किया गया, उन्हीं संदर्भों में सुप्रीम कोर्ट को आवश्यक रूप से इन बातों पर फोकस करना पड़ा, कोर्ट ने कहा-
‘‘इस समस्या का मूल कारण एवं निस्तारण कहीं और है। आधुनिक नव-उदारवादी आर्थिक विचार ने अनियत्रिंत लालच एवं स्वार्थ को जन्म दिया है। गलत सपने दिखाए गए, यह झूठ कहा गया कि उपभोेग से आर्थिक विकास होगा, जिससे हर एक ऊँचा उठेगा, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से ही विकास सम्भव है, इसी से हम भूमण्डलीय प्रतिस्पर्धा का मुकाबला कर सकेंगे। धन एकत्र करने से ही हम भूख, अस्वस्थता, अशिक्षा एवं गरीबी की समस्या को हल कर पाएँगे। सच तो यह है कि नीति निर्माता या उच्च वर्ग के लोगों के पास गरीबों की समस्या एवं कष्ट के हल का कोई जवाब नहीं है, वे आँखें बन्द किए हुए हैं। इससे बुरी स्थिति यह है कि उन्होंने इस ऐतिहासिक साक्ष्य को भुला दिया है कि जो विकास प्राकृतिक संसाधनों के लूट खसोट पर टिका होता है वह देश को पतन की ओर ले जाता है-’’
विश्व के अनेक भागों में, जिनमें पाश्चात्य उदारवादी प्रजातंत्र भी शामिल हैं, विधि के शासन की बात मात्र प्रतिध्वनि है। वहाँ ‘प्रजातंत्र’, ‘स्वतंत्रता’ तथा ‘संवैधानिक अधिकार’ का शोर मचाना केवल दिखावा है। कोर्ट का यह भी विचार है कि- ‘‘लाभ और मूल्य के समान बँटवारे के बिना निजी क्षेत्र द्वारा संसाधनों के शोषण की जो भी नीतियाँ हैं वह उन सिद्धान्तों के विपरीत हैं जो शासन के लिए आवश्यक मानी गई हैं। जब इस प्रकार के उल्लंघन बड़े पैमाने पर घटित होते हैं तब कानून द्वारा प्रदत्त समानता को, जो आर्टीकिल 14 और सम्मान जनक जीवन जीने के अधिकार को जो आर्टीकिल 21 के अन्तर्गत दिए गए हैं, कमजोर करते हैं। इसके अतिरिक्त जब खनन-माफिया और सरकारी एजेन्टों का शोषण हेतु गठजोड़ बन जाता है तब फिर यही बातें आर्टीकिल 14 तथा 21 को निष्क्रिय करती हैं तथा राज्य के नैतिक अधिकार को भी प्रभावित करती हैं।
भारत के गृह विभाग की रिपोर्ट के अनुसार कुल 607 जिलों में से 120 से 160 तक जिले माओवाद या नक्सलवाद से प्रभावित हैं और यह कि इस आन्दोलन ने लगभग एक चैथाई भारतीय भूभाग को अपनी चपेट में ले लिया है। जहाँ भी कुछ राजनैतिक आन्दोलनों को कड़ाई से कुचलने की जरूरत हुई, माओवादी, नक्सलवादी का लेबिल लगाने हेतु, इस नाम को अपनी सुविधानुसार परिभाषित किया गया। इस सन्दर्भ मंे कोर्ट ने कहा कि प्रजातंत्रिक राज्य में यह न्याय संगत नहीं है कि आन्दोलनों से निपटने के लिए ऐसे गैर कानूनी तरीके अपनाए जाएँ जिससे
संविधान या विधि के शासन का उल्लंघन हो क्योंकि इससे, जैसा कि सरकारी कमेटियों का भी कथन है, हिंसा और असंतोष बढ़ता ही जाएगा।
आदिवासियों, अनुसूचित जातियों, कृषक वर्ग, मजदूर वर्ग, अल्पसंख्यक तथा अन्य शोषित वर्ग की दयनीय दशा को कोर्ट ने ‘भयानक’ बताया है, परन्तु कोर्ट के फैसले से पूर्व इन्हीं वर्गों की सुरक्षा के नाम पर पास किए गए अनेक कानूनों के अंतर्गत माओवादियों या माओवादियों से सहानुभूति रखने वालों या जेहादी कहकर उनको जेलों में बन्द कर दिया गया, कोर्ट ने यह कहकर ऐसे मामलों की भत्र्सना की है-
‘मुझे यह देखकर बहुत आश्चर्य है कि छत्तीसगढ़ राज्य तथा इसके चाटुकार संवैधानिक वर्जनाओं के ज्ञान के प्रति अपनी आँखें मूँदे हुए हैं। यदि कोई वहाँ की अमानवीय स्थिति पर आपŸिा करता है तो उसे तुरन्त माओवादी या उनका हमदर्द मान लिया जाता है’।
जहाँ तक सरकारी मशीनरी एवं पुलिस का कारपोरेट को लाभ पहुँचाने हेतु दोनों में समन्वय की बात है, यह तथ्य याद रखना चाहिए कि जिन वर्गों- मुस्लिम, ईसाई, अनुसूचित जातियों, महिलाओं और अन्य सामाजिक व आर्थिक रूप से वंचित वर्गों पर फासिस्ट आन्दोलनों तथा राजनैतिक दलों द्वारा बराबर प्रहार किया जाता है वे सभी अभी कुछ दिनों पूर्व तक अछूत की श्रेणी में रहे हैं, इन्हीं को बम विस्फोटों एवं सामूहिक हत्याओं में फाँसा जाता है। बाद मंे जन-आक्रोश को दबाने हेतु जाँच कमीशन बैठाए जाते हैं तथा उनके द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों पर सरकार कोई कार्यवाही नहीं करती है। अभी हाल में ‘‘होम लैण्ड सेक्योरिटी’’ का मामला ‘‘चैम्बर्स आॅफ कामर्स एण्ड इन्डस्ट्री’’ द्वारा इस लिए उठाया गया ताकि अधिक मुनाफा कमाया जाए और आन्दोलनों को कुचला जाए। इन मामलों पर आयोजित बैठकों को अधिकतर सेवानिवृत फौजी तथा पुलिस अधिकारी सम्बोधित करते हैं।


-नीलोफर भागवत
अनुवादक-डा.एस0एम0 हैदर

1 टिप्पणी:

कुमार राधारमण ने कहा…

ये गंभीर मुद्दे हैं,यद्यपि इन समस्याओं का समाधान भूमंडलीकरण के दायरे में भी ढूंढा जा सकता है।