शनिवार, 18 सितंबर 2010

महात्मा गांधी की राजनैतिक सार्थकता, भाग 1

समस्त संसार में ये पूर्वानुमानों के दौर हैं। अनेक क्षेत्रों में हम आर्थिक और वित्तीय गिरावट देख रहे हैं जिसकी बहुत कुछ जिम्मेदारी साम्राज्यवाद के ऐतिहासिक विकास में निहित है। साथ ही साथ मानवीय इतिहास में वह महायुद्ध भी हैं, जिनका उद्देश्य था सभी महाद्वीपों के स्वतंत्र राष्ट्रों को नव उपनिवेश बनाना और बरबाद करना, देशों के बजट, उनके आर्थिक क्षेत्रों व बाजारों को छीनना, प्रत्यक्ष रूप से उस नागरिक आबादी के खात्मे को लक्ष्य बनाना जिसे वे उपभोग और प्राकृतिक संसाधनों के प्रयोग में अपना प्रतिद्वंदी मानते हैं।
अनेक देशों पर सैनिक आक्रमण हुए तथा कब्जे भी हुए जैसे फिलिस्तीन, कांगो, पूर्व योगोस्लाविया, अफगानिस्तान, इराक, सोमालिया, यमन, हैती और वे देश भी जिनको धमकियाँ दी जा रही हैं या आगे जिन पर कार्यवाही होना है जैसे ईरान, रूस, चीन। इन बातों के बावजूद आज तक विस्तारवाद, साम्राज्यवाद, फासिस्टवाद की समस्या के हल के लिए कोई गंभीर राजनैतिक प्रयास नहीं हुए, हालाँकि राजनैतिक आंदोलनों तथा जमीनी मुठभेड़ों के साहस जोर पकड़ते रहे हैं। बहरहाल नतीजा यह निकला कि एक के बाद एक देश सैनिक हमलों से या तो बर्बाद कर दिए गए या फिर आन्तरिक फासिस्टों के आगे नत-मस्तक हुए। इस प्रकार से सैनिक आक्रमण के साथ-साथ घातक प्रोपोगण्डा जो इस समय विश्व स्तर पर हो रहा है उसके खिलाफ नागरिकों को शिक्षित करने में हमारी वैचारिक विफलता जिम्मेदार है और नागरिकों तथा समाज के दीर्घ कालिक राजनैतिक स्वतंत्रता के लिए यह बात घातक भी है। यही बात उन सरकारों के लिए भी है जो ऐतिहासिक क्रांतियों के बाद स्थापित हुईं और जिनके सामथ्र्य को कमजोर कर दिया गया।
अन्य समाजों या संघों के साथ-साथ भारत एवं इसमें रहने वाले एक बार फिर वैश्विक तथा भारतीय बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए आर्थिक एवं वित्तीय वरदान बन गए हैं। भारत सरकार की तीन कमेटियों ने भी यह रिपोर्ट दी है कि भारत की तिहाई आबादी से अधिक लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करते हैं और असंगठित कार्य क्षेत्र के लगभग 700 मिलियन श्रमिक प्रतिदिन एक डालर से कम पर और अनेक ऐसे भी हैं जो लगभग बीस रूपये रोज पर जो आधे डालर से कम हैं, जिन्दगी गुजारते हैं। इन हालात के तहत एक चैथी कमेटी ‘‘कृषि सुधार और भूमि सुधार के अधूरे कार्य‘‘ ने भूमि अधिग्रहण की राज्य की नीतियों की आलोचना की है और कहा है यह सब विदेशी तथा भारतीय बहुराष्ट्रीय निगमों को लाभ पहुँचाने के लिए है। यह भी कहा कि वैधानिक अनुशासनहीनता, गरीबी और हिंसा की जो साइकिल है उसका कारण है राज्य का नव उदारवाद का आर्थिक एजेन्डा और उन कानूनों का संशोधन जिनके द्वारा देशी जनजातियों तथा कृषकों के लिए बहुत समय से उन जमीनों को सुरक्षित कर दिया गया था। जिनमें वे खेती करते थे और जिन्हें उनसे छीना नहीं जाता था। व्यापारिक वस्तुओं की अनुमान आधारित फारवर्ड टेªडिंग जो स्वतंत्रता के बाद दशकों तक निषिद्ध थी अब सरकारों ने महज राजनैतिक रंगों के दिखावे के लिए उनकी इजाजत दे दी ताकि फ्री-मार्केट एवं अंधाधुंध विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया जाए। यहाँ तक कि कृषि-व्यापार कम्पनियों के फायदे के लिए खाद्य-पदार्थों के दामों में बेतहाशा वृद्धि भारत को बरबाद करने के लिए की गई। जबकि यह देश हजारों वर्षों से एक कृषि क्षेत्र के रूप में जाना जाता था अनेक प्रकार से खाद्यान्न पैदा किए जाते थे। जहाँ ‘सरप्लस’ की स्थिति होती थी। अब ‘इस्लामी आतंक’ को भी इन्हीं बातों से जोड़ा गया। अनेक क्रूरताओं का जिक्र करें तो देखते हैं कि तमाम बेकुसूर मार डाले जाते हैं बाद में पता चलता हैं कि इनके लिए झूठी कहानियाँ गढ़ी गई थीं तमाम लोगों को बेवजह फाँसा जाता है, इन बातों को अक्सर बचाव पक्ष के वकीलों ने खोला।
मानव जाति को इन तमाम क्रूरताओं से मुक्ति दिलाने हेतु जब हम रणनीति तलाश करते हैं तो 20वीं सदी के तमाम आन्दोलनों में से, इस समय हम को महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले राजनैतिक संघर्ष को याद करना चाहिए। उन्होंने भारतीय आर्थिक क्षेत्र में विदेशी कम्पनियों के दखल का सख्ती से विरोध किया था। विश्व स्तर पर उनकी चिंताएँ इस बात से जाहिर होती हंै कि जब ब्रिटिश सरकार ने यूरोपीय यहूदीवाद से साठ-गाँठ के तहत ‘बालफोर डिक्लेरेशन’ फिलिस्तीन को उपनिवेश बनाने हेतु लागू करना चाहा तो गांधी जी ने उसका विरोध किया। मानव जाति की बरबादी के खिलाफ उनकी आलोचनाएँ जो उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद के कारण र्हुइं तथा अन्यायी राजनैतिक व्यवस्था को उखाड़ फेकने के लिए राजनैतिक प्रशिक्षण हेतु उनकी रणनीति, बहुलवादी संघर्ष, सविनय अवज्ञा एवं असहयोग आदि सभी बातें उन लोगों के लिए अब भी उपयुक्त हैं जो इस, 21वीं सदी में मानव समाज की नई संरचना के उपायों की तलाश में लगे हैं।
1857 के भारतीय स्वतंत्रता के महान युद्ध की विफलता के बाद जिसमें 10 मिलियन भारतीयों की हत्या ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेना ने की थी, उपनिवेश वाद की विरोधी ताकतें भी कुछ न कर सकी थीं, महात्मा गांधी ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि छिटकी हुई उग्र घटनाएँ ब्रिटिश शासन को नहीं हरा सकतीं। इसके लिए सतत राजनैतिक जागरूकता की शिक्षा,तथा मुख्य मुद्दों पर बहुजन संघर्ष की जरूरत है और यह भी जरूरी बताया कि प्रशासन के प्रत्येक क्षेत्र में इतना अधिक असहयोग हो कि नाइंसाफी का शासन पंगु हो जाए। इस प्रकार असहयोग आंदोलन ने विदेशी राजनैतिक एवं आर्थिक ढाँचे को
ध्वस्त कर दिया, जिससे हम ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ों आन्दोलन’ तक पहुँच गए।


-नीलोफर भागवत
उपाध्यक्ष-इण्डियन एसोसिएशन आॅफ लायर्स
अनुवादक-डा.एस0एम0 हैदर
फोन-05248-220866
(क्रमश:)

1 टिप्पणी:

निर्मला कपिला ने कहा…

ाच्छा लगा आलेख। धन्यवाद।