सोमवार, 15 मार्च 2010

जन प्रतिनिधियों की शैक्षिक आर्हता व चरित्र का सत्यापन जरूरी हो

उ0 प्र0 पंचायत चुनावों में इस बार प्रधान बनने के लिए शैक्षिक योग्यता अनिवार्य कर दी गई है। अब हाईस्कूल फेल व्यक्ति प्रधानी की कुर्सी पर नहीं पहुंच सकेंगे। देर से सही परन्तु सही दिशा में बढ़ाया गया यह एक अच्छा कदम कहा जायेगा यही काम अगर विधान सभा, विधान परिषद, लोक सभा, राज्य सभा, में भी कर दिया जाए तो कम से कम इन पदों पर जाहिल दिमाग न बैठ सकेंगे और कुछ तो गरिमा इन पदों की वापस लौटेंगी।
उ0प्र0 में पंचायत के चुनावों में प्रधान के पद पर अब वही व्यक्ति अपनी उम्मीदवारी का दावा कर सकेंगे जो कम से कम हाईस्कूल पास हो। इस फैसले से भले ही अंगूठा टेक प्रधानों को अघात लगा हो कि अब वह प्रधान न बन सकेंगे परन्तु इसके परिणाम अच्छे आयेंगे। लोकतंत्र की सबसे निचली इकाई ग्राम पंचायत होती है और पंचायती राज अधिनियम के द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने ग्रामीण स्तर पर स्थित ग्राम पंचायतों को विकास के लिए केन्द्र से भेजे जाने वाले धन का उपयोग करने का जिम्मेदार बताया था। उसके बाद से प्रधानी के चुनाव की अहमियत काफी बढ़ गई है और जो चुनाव बगैर धन खर्चा किए पहले हो जाया करता था वह अब लाखों रूपये में होने लगा है। अब ग्राम प्रधानी के पद पर प्रत्याशियों की होड़ सी मच गई है कारण वही पैसा, परन्तु इस पैसे को खर्च करने के लिए प्रधान का अशिक्षित होना काफी दिक्कते पैदा करता था और इसका लाभ सरकारी प्रशासनिक मशीनरी उठाती थी और प्रधानों को भ्रष्टाचार के जाल में फंसाकर जेल तक यही सरकारी तंत्र के बाबू, पंचायत सेक्रेटरी व अधिकारी पहुंचा देते थे।
इन्ही सब पर विचार करके शायद प्रधान की शिक्षित अनिवार्यता को रखा गया है। इससे जहाँ ग्राम पंचायतों की कार्यक्षमता व गुणवत्ता में सुधार आयेगा वहीं शिक्षा की ओर भी रूचि में इजाफा होगा।
अब यही कदम देश के सबसे बड़े लोकतंत्र के मंदिर लोकसभा व राज्य सभा तथा प्रदेश की विधान सभा व विधान परिषद के सदस्यों के लिए भी उठाना चाहिए और कम से कम स्नातक की शैक्षिक योग्तया अवश्य इनके लिए रखी जानी चाहिए। साथ ही यदि एम0एल0सी0 एम0पी0 के पदों के लिए उम्मीदवारी का दावा करने वालों के चरित्र का सत्यापन भी पुलिस व खुफिया विभाग से करा लिया जाये तो फिर काफी गुणात्मक सुधार हमारे लोकतंत्र के ढांचे में देखने को मिलेगा वरना अपराधियों व देश की धार्मिक सौहार्दता अखण्डता व उसकी अस्मिता के लिए खतरा उत्पन्न करने वाले सांसद व विधायक देश के उच्च पदों पर बैठकर ऐसे कारनामों करते रहेंगे जिसे अक्सर मीडिया कर्मी अपने स्टिंग आप्रेशन से बेनकाब करती रहती है। जब हज यात्रा पर जाने वाले, पत्रकारिता जगत में मान्यता प्राप्त सनद हासिल करने वाले और अपनी सुरक्षा के लिए शस्त्र लाइसेंस या विकास का कार्य करने वाले ठेकेदारों के चरित्र का सत्यापन देश में होता है तो देश के सबसे जिम्मेदार पदों पर बैठने वाले व्यक्तियों की शैक्षिक योग्यता की अनिवार्यता और उनके चरित्र के अच्छे होने का प्रमाण पत्र की आवश्यकता अनिवार्य क्यों नहीं।

मोहम्मद तारिक खान

3 टिप्‍पणियां:

AMIT TIWARI 'Sangharsh' ने कहा…

बहुत बढ़िया श्रीमान,
जनप्रतिनिधियों की अर्हता और योग्यता का आपका उठाया हुआ विषय बहुत ही प्रासंगिक है. लेकिन मैं थोडा सा और जोड़ना चाहूँगा .. कि जब आप या हम में से कोई भी चारित्रिक सत्यापन की बात करता है.. तो ना चाहते हुए भी हमारी सोच का आयाम काफी सिमट कर रह जाता है. हम चरित्र का अर्थ हमेशा स्त्री-देह के सापेक्ष में ही लेकर चलते हैं.. यह एक परंपरा सी बन गई है... इस परिभाषा को बदलने की जरूरत है... आर्थिक अपराध को चरित्रहीनता के दायरे में लाना होगा... ऐसा मेरा मानना है...
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शरद कोकास ने कहा…

सही फरमा रहे हैं आप ।

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

...बिल्कुल सही कहा, प्रसंशनीय अभिव्यक्ति !!