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मंगलवार, 17 मई 2011

नीम के पेड़ की फरियाद मुख्यमंत्री मायावती के नाम



बाराबंकी। हलो हलो ..... बहन जी मैं बाराबंकी से नीम का पेड़ बोल रहा हॅू। आपके सुशासन और कार्यशैली के तमाम किस्से सुन रखा है। आप हर दिल अजीज और बड़ी ही न्याय प्रिय हैं। जिसका कोई नहीं उनकी आप जरूर सुनती है और न्याय भी दिलाती है।
कहने को तो मैं निर्जीव कहा जाता हॅू लेकिन ऐसा नहीं। हमारी सांसों से लोग जीवन पाते है। एक एक पत्ती लोगों को स्वास्थ्य व जीवनदान देती है। धर्मग्रंथ तो दस पुत्रों के बराबर मैं एक हॅू की बात बताते हैं। शायद इसीलिए पेटेंट हुआ। हलो हलो जी कुछ खरखराहट आ रही होगी, आपको शायद इसीलिए साफ नहीं सुनाई नहीं दे रहा होगा। दरअसल मेरे पड़ोस में आरा और कुल्हाड़ी चल रहे हंै। बहन जी मैंने इंसाफ पाने के खातिर आपको फोन लगाया है। किस्मत कुछ अच्छी है कि जहाॅ मैं हॅू बगल में ही एक पी0सी0ओ0 भी है। बहन जी मैं शहर नवाबगंज में जहां नगरपालिका का दफ्तर के पास मो0सत्यप्रेमीनगर स्थित एक पार्क, खेल ग्राउन्ड में पला और बढ़ा हूॅ। खसरा 154 व 204 भूभाग वाले इस पार्क का ले आउट जब पास हुआ था तो यहां जमीन इतनी कीमती नहीं थी। राष्ट्रीय कोआपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी लि0 जिसकी स्थापना स्वतंत्रता श्री सत्यप्रेमी जी ने की थी। उदार हृदय पंडित जी का सानिध्य कहिए कि मैं और मेेरे अन्य साथी जिसमें कई लोग तो यूकेलिप्टस वर्ग थे, कुछ गूलर आदि के बड़े प्रसन्न थे कि जब यहां पार्क बनेगा तो बच्चों की किकारियां भी गूंजेगी। बच्चे बूढ़े सभी यहां आकर शुद्ध वातावरण से लाभांवित होंगे तो हम तो हम लोगों का जीवन कृतार्थ एवं सुफल हो जावेगा। हमारे कई साथी यूकेलिप्टस तो बड़े मोटे हो गए कुछ तो खुशी में इतना बढ़ गए थे कि यहां की सबसे बड़ी बिल्डिंग पायनियर स्कूल 20फिट छोटी पड़ गयी थी। यहां कुछ हमारे साथी तो ऐसे भी विराजमान थे जिनका कोई साथी ही नहीं बचा। पत्रकार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चन्द्र भूषण शुक्ला और उनके परिवार के बच्चे उनकी पीढ़ी के बाद के लोग भी नहीं रहे। अगर पुराने लोग होते तो शायद हमारा आशियाना न उजाड़ा जाता। हमारी स्थापना करने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित चन्द्र भूषण शुक्ल भी नही रहे। आप तो डाॅ0 अम्बेडकर की परम अनुयायी हो हम कमजोर लोगों की व्यथा आपसे अधिक भला कौन जान सकता है। मेरे सभी साथियांे की हत्या की जा चुकी है। सबसे करीबी गूलर भी शनिवार को मेरा साथ छोड़कर जा चुका है। पता नहीं उसकी क्या गति की गयी होगी। वन विभाग द्वारा कोई रास्ता सुझाया गया होता तो मंजिल का पता रहता। आप चाहो तो अपने अधीन वाले वन विभाग के अधिकारियांे से जानकारी ले लो कि उसने हमारे अन्य साथियांे जिन पर भूमाफिया, कथित जनप्रतिनिधि गणबंधन ने आरे व कुल्हाड़ी चलवाए तो उन्होने शमशान तक हमारे साथियांे को ले जाने खातिर परमिट यानि ट्रंाजिट पास तक लेना उचित नहीं समझा। जी बहन जी बात कुछ लम्बी हो जा रही है, तो आपको और भी बहुत कुछ सुनना देखना रहता है। संक्षेप में बताता हॅू इस पार्क की कहानी जहां हमारा जन्म हुआ। हमारी जन्म भूमि है सत्यप्रेमी नगर स्थित वह पार्क जो रेलवे स्टेशन घंटाघर रोड किनारे स्थित है। बीती शताब्दी के मध्य काल में ले आउट पास हुआ था। मेरी देखरेख का जिम्मा सत्यपे्रमी जी वाली सोसाइटी राष्ट्रीय कोआपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी पर था। बाद में इस कालोनी के दोनो पार्को के रखरखाव का जिम्मा नगर पालिका के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया गया था। पुराने लोग जब तक रहे तब तक सब ठीक ठाक रहा।

एक भूमाफिया ने अपना हक जमाने का बार बार प्रयास किया तो सरकारी कागजातों में पार्क खेलकूद मैदान लिखा होने के नाते वह मेरी मातृ भूमि का बाल बांका नहीं कर सका था। नियम के विपरीत एक सोसायटी को सदस्य बनाकर भूमि दी गयी थी सोसायटी मुकदमा पर तुली तो भी कुछ नहीं बिगड़ा। बाराबंकी से मामला लखनऊ वाली कोर्ट में गया था वहां तक सब ठीक रहा। अचानक दोनो सोसाइटी जो आपस के दुश्मन थी। पड़ोसी देश पाकिस्तान की क्रिकेट टीम के खिलाड़ी बन गए। एक धन्नासेठ की तिजोरी खुलते ही दोनों टीमों में फिक्सिंग हो गयी और मेरी मातृभूमि पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। जिस भूमि को बेचा नही जा सकता, कानून जहां गरीबों के घर बनने चाहिए उस इलाके में बाजार बनने जा रही है। हमारा क्या हम लोग तो बाले नहीं सकते लेकिन जो बोल सकते हैं वे दौलत की चमक में अंधे हुए जा रहे है। सच्चाई जानने वाले निगरानीकर्ता आपके मातहत आला अफसर भी हमारी तरह ही गंूगे हो गए हंै न जाने क्यांे। हां हलो हलो, बहन जी मेरी बात पूरी भी नही हुई कि सामने से आरा कुल्हाड़ी समेत दो लोग आते दिखाई दे रहे हैं हो सकता है अगला नम्बर हमारा ही हो। जल्दी बात पूरी कर लेता हॅू। बहन जी सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय का आपका नारा बेमतलब हो गया है। दबंग सुखाय का नारा आपके ही सरकार में एक मंत्री ने यहां लागू किया है। अवैध काम गैर कानूनी क्रियाकलाप पर कोई उंगली न उठाए पार्क पर बाजार बनाने का एग्रीमेंट मंत्री श्री संग्राम सिंह ने खुद ही किया है। एक बात और कहनी है कि एक बाहुबली माफिया सरगना भी इस काम मंे लगा है। जानकर आपको ताजुब होगा कि यह वहीं माफिया है जिसने पिछले स्थानीय चुनाव बेला में आपको बदनाम किया था। कहा था कि चंदा लेकर भी टिकट नहीं दिया इसलिए धन वापसी की बात कही थी। अखबार वालों ने चुटकी लेकर माफिया सरगना की खबरें छापी थी।
मैं इसलिए भी गवाह हूं क्योंकि तब जिला सूचना का दफ्तर मेरे बाजू में ही था।

-महन्त बी0पी0दास

रविवार, 15 मई 2011

आखिर बाराबंकी में यह क्या हो रहा है?

बाराबंकी। पहले लखनऊ बाराबंकी मुख्य मार्ग पर बसपा के बाहुबली सांसद द्वारा औद्योगिक क्षेत्र के एक बडे भूखण्ड की आवासीय प्लाटिंग, फिर आजादी के समय की पुलिस चैकी का सौदा, फिर हरे भरे आम के बाग पर आरे चला कर बगैर लेआउट के प्लाटिंग और अब शहर के बीचोबीच हाऊसिंग सोसायटी की एक सार्वजनिक भूमि का राज्य मंत्री द्वारा कामर्शियल काम्पलेक्स बनाने के लिए सौदा।
माया सरकार को सपा के इस गढ में सात में से पाॅच सीटे जिताकर आम जनमानस ने यह उम्मीद उससे लगायी थी कि अब कानून का राज जिले में होगा और दबंग दुबक जाएंगे। सत्ता सम्भालने के एक पखवारे के उपरान्त ही अपने ही एक सांसद को उनकी अपराधिक गतिविधियों के चलते मैडम मायावती ने अपने बंगले से गिरफतार करवाके यह संदेश अपराधिक तत्वो को दे दिया था कि अब उनकी खैर नही। इसके बाद मुख्तार अंसारी फिर अतीक मियां राजा भैया, मुन्ना बजरंगी, अभय सिंह,शेखर तिवारी इत्यादि वह नाम है जो अपने कर्मो के कारण किसी परिचय का मोहताज नही।इन सभी की मैडम ने नकेल कसके राहेरास्त पर ला खड़ा किया यह फिर जेल के हवाले कर दिया।
परन्तु विगत एक वर्ष से बाराबंकी में दबंगो ने अपने पैर पसारना प्रारम्भ कर दिए और मैडम की सरकार की छवि पर बडे़ पैमाने पर बटटा लगाना अपने कुकर्मो से शुरु कर दिया। बताते है कि दबंग राजनेता,पत्रकार, व प्रशासन यानि समाज के चार खम्भो में से तीन मिलकर इस खेल को संचालित कर रहे है और सभी लाभान्वित भी हो रहे है। घाटे में हमेशा की तरह बेचारे आम जन मानस है जो अन्य सरकारो के समय की तरह इस बार भी ठगी का शिकार बन रहे है।

-मोहम्मद तारिक खान

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

इंसाफ की देवी को शर्मिन्दा करते इंसाफ के देवता

देश के कानून मंत्री वीरप्पा मोयली ने न्यायालयों की जवाबदेही बनाए जाने का कानून बनाने का जिक्र करके एक लाईलाज और अति घातक बीमारी का दर्द उठाया है।
सभ्य समाज को पाप व दुराचार से पाक रखने के लिए ही न्यायिक व्यवस्था का गठन किया गया था पहले जब देश आजाद नहीं था तो अंग्रेजों के दो सौ वर्षों से ऊपर के शासनकाल और उससे पूर्व मुस्लिम शासकों के साढे़ पांच सौ साल व उससे पूर्व के हिन्दू राजा-महाराजाओं के शासनकाल में दरबार, शरई अदालते व कोर्ट में लार्डशिप जनता को न्याय देने का कार्य किया करते थे। इंसाफे जहांगीरी की चर्चा की खूब प्रशंसा इतिहासकारों ने की।
परन्तु प्रशंसा का आधार सदैव निष्पक्ष न्याय पर आधारित होता था जो बादशाह सलामत या राजाराम ने अपने दौरे हुकूमत या रामराज्य में किया। उस समय फरियादी व अपराधी के बीच वकील की भूमिका नहीं हुआ करती थी। फरियादी की फरियाद तथ्यों साझों के आधार पर न्याय की कुर्सी पर बैठकर हाकिमे वक्त सुनते थे और खून के रिश्तों, ऊँच नीच से ऊपर उठकर न्याय किया करते थे। जहांगीर ने तो अपने महल के बाहर एक घण्टा लटका कर चैबीसों घण्टे फरियादी को अपनी फरियाद दर्ज कराने की व्यवस्था की थी।
फिर मुस्लिम काल में शरई अदालतों का भी जाल पूरे देश में बिछा हुआ था और शहर काजी न्याय की कुर्सी पर बैठकर पवित्र कुरआन में दिए गये कानूनी प्राविधानों को ध्यान में रखकर इंसाफ किया करते थे।
न्यायिक प्रक्रिया में परिवर्तन अंग्रेजों के दौरे हुकूमत में शुरू हुए और आई0पी0सी0, सी.आर0पी0सी0 व सी0पी0सी0 जैसे अनेक कानून बनाकर सम्पूर्ण न्यायिक ढांचा तैयार किया गया जिसका केन्द्र प्रिवी कौंसिल के रूप में इंग्लैण्ड में होता था और देश के हर प्रान्त में उच्च न्यायालय व हर जिले में न्यायालयों के माध्यम से न्यायिक प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। अंग्रेजों के ही दौर में वकील की भूमिका प्रारम्भ न्यायालयों में हुआ लोग बार एट लॉ
की सर्वोच्च पदवी लेने इंलैण्ड जाते और उच्च न्यायालयों में वकालत करते।
फिर देश आजाद हुआ। देश का संविधान बना और वर्तमान न्याययिक व्यवस्था स्थापित हुई। न्यायालयों में न्यायिक अधिकारियों व जजों की प्रतिष्ठा पर कोई प्रश्न चिन्ह काफी लम्बे समय तक नहीं रहा परन्तु चूंकि सर्वोच्च न्यायालयों में जजों व चीफ जस्टिस आफ इण्डिया की नियुक्ति पर जैसे-जैसे राजनीतिक दलों की स्वार्थ से ओत प्रोत बदनीयती का काला साया पड़ना प्रारम्भ हुआ इंसाफ के मंदिरों के इन देवताओं के चरित्र पर सवालिया निशान लगने प्रारम्भ हुए। राष्ट्रीय एवं संवैधानिक मुद्दों पर सर्वोच्च न्यायालयों की भूमिका पर प्रश्न उठे। न्यायालयों की धर्मनिरपेक्ष छवि पर सवाल खड़े हुए परन्तु बात देश वासियों के दिलों के भीतर ही कैद रही क्योंकि अवमानना का खौफ प्रश्न उठाने वालों को बेबस किये रहा।
न्यायालयों में भ्रष्टाचार का कीटाणु नीचे की अदालत से दाखिल हुआ। जिला स्तर पर जिलाधिकारी, उपजिलाधिकारी व अन्य मजिस्ट्रेटों के न्यायालयों में न्याय की खरीद फरोख्त का कार्य प्रारम्भ हुआ। फिर यह बीमारी जिला जजी व मुंसिफ मजिस्ट्रेटों, मुंसिफ व जज की आंखों के सामने उनकी बगल में बैठा कोर्ट का अहलकार वकील के माध्यम से मुटठी गर्म करने लगा फिर कोर्ट साहबान पेनेल लायर्स के माध्यम से इंसाफ का सौदा होना शुरू हुआ। हालत अब यहां तक आ पहुंचे है कि ईमानदार जजों व मजिस्ट्रेटों पर अदालतों में वकील साहबान की ओर से हमले इस बात पर किये जाने लगे कि वह उनसे सेट नहीं हो रहे उनके साथ चैम्बरिंग नहीं कर रहे।
अदालतों में निर्दोषों को सजाएं और दोषियों को आजादी मिलने लगी। विशेष अदालतों में तो न्याय की जगह केवल सजा ही मिलने लगी। इन सब के बीच फिल्मों में जज साहबान की कुर्सी के पीछे आंखों पर पट्टी बांधे इंसाफ का तराजू लिए खड़ी इंसाफ की देवी शर्मिंदा व रूसवा होती नजर आ रही है और लोग यह कहने को मजबूर हैं कि कानून अंधा होता है।

-मोहम्मद तारिक खान

बुधवार, 31 मार्च 2010

सत्ता की डोली का कहार, बुखारी साहब आप जैसे लोग हैं

दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम अहमद उल्ला बुखारी ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता का ढोंग रचने वाली सियासी पार्टियों ने आजादी के बाद से मुसलमानों को अपनी सत्ता की डोली का कहार बना दिया है।
बुखारी जी आपका बयान बिल्कुल ठीक है परन्तु क्या आप इस बात से इत्तेफाक़ करेंगे कि सियासी पार्टियों को यह मौका फराहम कौन करता है? आप और आपके बुज़रगवार वालिद मोहतरम जो हर चुनाव के पूर्व अपने फतवे जारी करके इन्हीं राजनीतिक पार्टियों, जिनका आप जिक्र कर रहे हैं, को लाभ पहुँचाते थे। लगभग हर चुनाव से पूर्व जामा मस्जिद में आपकी डयोढ़ी पर राजनेता माथा टेक कर आप लोगों से फतवा जारी करने की भीख मांगा करते थें। वह तो कहिए मुस्लिम जनता ने आपके फतवों को नजरअंदाज करके इस सिलसिले का अन्त कर दिया।
सही मायनों में राजनीतिक पार्टियों की डोली के कहार की भूमिका तो मुस्लिम लीडरों व धर्मगुरूओं ने ही सदैव निभाई जो कभी भाजपा के नेतृत्व वाली जनता पार्टी या एन0डी0ए0 के लिए जुटते दिखायी दिये तो कभी गुजरात में नरेन्द्र मोदी का प्रचार करने वाली मायावती की डोली के कहार।
मुसलमानो की बदहाल जिन्दगी पर अफसोस करने के बजाए उसकी बदहाली की विरासत पर आप जैसे लोग आजादी के बाद से ही अपनी रोटियाँ सेकते आए हैं। शायद यही कारण है कि हर राजनीतिक पार्टी अब अपने पास एक मुस्लिम मुखौटे के तौर पर मुसलमान दिखने वाली एक दाढ़ी दार सूरत सजा कर स्टेज पर रखता है और मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं का शोषण राजनीतिक दल इन्हीं लोगों के माध्यम से कराते आए हैं। लगभग हर चुनाव के अवसर पर आप जैसे मुस्लिम लीडरों की बयानबाजी ही मुसलमानों की धर्मनिरपेक्ष व देश प्रेम की छवि को सशंकित कर डालती है और अपने विवेक से वोट डालने के बावजूद उसके वोटों की गिनती जीतने वाला उम्मीदवार अपने पाले में नहीं करता।


-मोहम्मद तारिक खान

शुक्रवार, 26 मार्च 2010

उ0प्र0 सरकार का गुप्त हिन्दुत्व एजेन्डा


मुजफ्फरनगर जिले की खतोली तहसील में स्थित थाना मंसूरपुर के ग्राम पोर बालियान में एक मस्जिद को गिरा कर उस पर पुलिस चौकी स्थापित करने का मामला चर्चा में आया है। समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचार को संज्ञान में लेते हुए उ0प्र0 अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष एस0एम0ए0 काजमी ने मुजफ्फरनगर के जिलाधिकारी से रिपोर्ट भी तलब कर ली है। पुलिस का कहना है कि उसने ग्राम पंचायत की भूमि पर नाजायज तौर पर बनी इमारत से उसे रिक्त कराया है। जबकि मुस्लिम पक्ष के अनुसार ग्राम पंचायत की भूमि का पट्टा एक मुसलमान शरीफ को हुआ था जिसके मरणोपरांत उसके लड़के ने इस पर मस्जिद दारूल उलूम देवबन्द से फतवा लेने के बाद बनवाई थी।
यह बात बिल्कुल दुरूस्त है कि किसी विवादित भूमि पर मस्जिद नहीं बनवाई जा सकती है मस्जिद के लिए शरई हुक्म है कि वह भूमि हर विवाद से पाक-साफ हो और उसे ईश्वर के नाम पर वक्फ किया गया हो। मुजफ्फर नगर की मस्जिद यदि ग्राम समाज की भूमि पर धोखाधड़ी से बनवाई गई थी तो वह मस्जिद की ईमारत तो हो सकती है अल्लाह का इबादतगाह नहीं।
मुजफ्फरनगर की तहसील खतोली के ग्राम पोर बालियान की यह मस्जिद जो उस क्षेत्र के एक पुलिस अधिकारी राजू मल्होत्रा ने बुलडोजर चलवा कर उस पर पुलिस चैकी का बोर्ड लगवाने का कार्य बगैर जिला प्रशासन के किया जैसा कि जिलाधिकारी संतोष कुमार यादव के बयान से जाहिर है जो समाचार पत्रों में आया। विवादित भूमि का पट्टा ग्राम प्रधान द्वारा वर्ष 1967 में गांव के एक भूमिहीन शरीफ अहमद के नाम हुआ था जिनके मरने के पश्चात उनके वारिस पुत्र द्वारा इस पर मस्जिद का निर्माण बाकायदा दारूल उलूम देवबंद से फतवा हासिल कर करवाया था। गांव के लोग उस पर वर्षों से नमाज अदा करते चले आ रहे थें।
यह सही है कि सार्वजनिक भूमि पर बगैर अनुमति के केाई धार्मिक स्थल नहीं निर्मित किया जाना चाहिए और जिसको गंभीरता से लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने देश के सभी प्रांतों से सितम्बर 2009 के पूर्व में सार्वजनिक भूमि पर निर्मित धार्मिक स्थलों को चिंहांकित करने के निर्देश भी दिए हैं।
परन्तु पुलिस प्रदेश के हर थाने व पुलिस लाइन में अवैध रूप से बनाए गये मंदिरों के बारे में क्या कहेगी? क्या यह नेक काम अपने स्वयं के घर से नही प्रारम्भ कर सकती थी? अकेले मस्जिद पर कार्यवाई करना क्या न्यायोचित है?
आज प्रदेश में मस्जिद बनाने के लिए मुसलमान डरता है वक्फ बोर्ड जिसका अपर सर्वे आयुक्त स्वयं जिले का हाकिम यानि जिलाधिकारी होता है वह मस्जिद के नाम पर अनुमति यह कहकर नहीं देता कि इससे शांति भंग होने की संभावना उत्पन्न हो सकती है। मुसलमानों को साफ तौर पर संविधान में दी गई उनकी धार्मिक आजादी का उल्लंघन है परन्तु मंदिर बनाने के लिए कोई रोक नहीं चाहे वह थाना हो या कोतवाली या तहसील परिसर।
कहने को तो भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है परन्तु धर्म निरपेक्षता का अनुसरण करने के क्या यही तौर तरीके हैं कि देश के दूसरे नम्बर के बहुसंख्यक जिन्हें अल्पसंख्यक कहकर उन्हें विशेष अधिकार का दर्जा भी दिया गया है उनकी धार्मिक स्वतंत्रता पर इस प्रकार से आघात किया जाये। उनकी सामाजिक व शैक्षिक उन्नति पर सम्प्रदायिक भावना से ओत प्रोत होकर अंकुश लगाया जाए यह कहाँ का इंसाफ है क्या खुफिया तौर पर प्रदेश में यह हिन्दुवत्व वाली विचारधारा के एजेण्डे का हिस्सा तो नहीं।

मो0 तारिक खान

बुधवार, 24 मार्च 2010

दीन पर भारी पड़ता मुसलमान का दुनियावी प्रेम

नवाबों के शहर लखनऊ में अमरीकी राजदूत रिमोथी जे0 रोमर ने गत सप्ताह मुस्लिम शैक्षिक संस्थानों व सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक इमारत इमाम बाड़े का दौरा कर कहा कि वह राष्ट्रपति बराक ओबामा के मुहब्बत व अमन के पैगाम को लेकर यहां आए हैं। यह दौरा ठीक उस समय क्यों हुआ जब आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का राष्ट्रीय अधिवेशन यहां आयोजित हो रहा था, यह एक विचारणीय प्रश्न है?
मुसलमानों के शरई अधिकारों को सुरक्षित रखने, उनके शैक्षिक, सामाजिक एवं आर्थिक उत्थान की तदबीरे ढूढ़ने तथा मुस्लिम एकता को कायम रखने के दृष्टिकोण से आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के 21वें राष्ट्रीय अधिवेशन का आयोजन अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नदवा यूनीवर्सिटी में हुआ तदोपरान्त एक जलसे आम ऐशबाग ईदगाह में हुआ जहां एक लाख से ऊपर मुसलमानों के ढारे मारते समुद्र ने उलमाए ए दीन के उपदेश व वसीहते सुनी।
इससे तीन दिन पूर्व अमरीकी राजदूत रिमोथी जे0 रोमर ने लखनऊ में अपने दौरे के दौरान मुस्लिम शैक्षिक संस्थान शिया कालेज, करामत हुसैन गल्र्स डिग्री कालेज व ऐतिहासिक इमामबाड़ों का भ्रमण किया और शहर लखनऊ की गंगा जमुनी तहजीब की जमकर तारीफ की।
यह दोनों उल्लेखनीय घटनाएं परस्पर विरोधाभासी लगती है क्योंकि एक ओर अमरीका की विश्व स्तरीय मुस्लिम विरोधी नीतियों , जिसके चलते ईराक, अफगानिस्तान की ईंट से ईंट बज गई लाखों व्यक्ति शान्ति के नाम पर अमरीका के सैन्य अभियान में मारे गये जिनमें काफी संख्या में औरते व मासूम बच्चे थे और अब पाकिस्तान का नम्बर चल रहा है। ईरान व यमन दूसरा निशाना है जहाँ अमरीका किसी भी समय सैनिक कार्यवाई कर सकता है। दूसरी ओर मुस्लिम उलेमा का अधिवेशन जिसमें अमरीका व इजराइल के विरूद्ध प्रस्ताव पारित कर मुसलमानों के ऊपर जुल्म व अत्याचार ढाने का विरोध किया गया तथा इजरायल के साथ बढ़ती हिन्दुस्तानी दोस्ती पर चिंता व्यक्त की गई।
परन्तु इसके विपरीत अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान का दर्जा व आर्थिक अनुदान प्राप्त करामत मुस्लिम गर्ल्स डिग्री कालेज व शिया पी0जी0 कालेज में अमरीकी राजदूत का आदर सत्कार करना और छात्राओं के द्वारा उनके गले में मालाएं डालना एक विरोधाभासी बात लगती है। और सबसे अधिक तो इमामबाड़े में उनका खैर मकदम आश्चर्यजनक है जहाँ अनेक बार अमरीका के विरूद्ध उलेमा ने भाषण देकर अमरीका और उसके पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश के पुतले जलाएं गये।
मुस्लिम समुदाय द्वारा ऐसे समय पर अमरीकी राजदूत का महिमामण्डप किया जाना जब अमरीका का संरक्षण प्राप्त इजरायल द्वारा मुसलमानों की अति पवित्र माने जाने वाली मस्जिद अक्सा से नमाजियों को मार भगाया गया और विरोध करने पर कई लोगों को जान भी गवानी पड़ी। परिणाम स्वरूप पूरे विश्व में इसके विरूद्ध जोरदार आवाज उठी। परन्तु अमरीका खामोश है और इजरायल के विरूद्ध उठती हर आवाज को दबाने में लगा हुआ है।
दर हकीकत मुलसमानों की पूरे विश्व में थुकका फजीहत का मुख्य कारण यही है कि उनका चरित्र खोखला हो चुका है उसे दूसरी कौमों की भांति दुनिया के सुख-संसाधनों की चाह अधिक और दीन धर्म केवल सामाजिक आवश्यकता तक ही उनके अन्दर सीमित रह गया है। उस पर स्वार्थहित इतना हावी हो गया है कि किसी से भी उसे दो टके मिलने की उम्मीद हो तो वह अपनी लार टपकाने लगता है।


-मोहम्मद तारिक खान

सोमवार, 15 मार्च 2010

जन प्रतिनिधियों की शैक्षिक आर्हता व चरित्र का सत्यापन जरूरी हो

उ0 प्र0 पंचायत चुनावों में इस बार प्रधान बनने के लिए शैक्षिक योग्यता अनिवार्य कर दी गई है। अब हाईस्कूल फेल व्यक्ति प्रधानी की कुर्सी पर नहीं पहुंच सकेंगे। देर से सही परन्तु सही दिशा में बढ़ाया गया यह एक अच्छा कदम कहा जायेगा यही काम अगर विधान सभा, विधान परिषद, लोक सभा, राज्य सभा, में भी कर दिया जाए तो कम से कम इन पदों पर जाहिल दिमाग न बैठ सकेंगे और कुछ तो गरिमा इन पदों की वापस लौटेंगी।
उ0प्र0 में पंचायत के चुनावों में प्रधान के पद पर अब वही व्यक्ति अपनी उम्मीदवारी का दावा कर सकेंगे जो कम से कम हाईस्कूल पास हो। इस फैसले से भले ही अंगूठा टेक प्रधानों को अघात लगा हो कि अब वह प्रधान न बन सकेंगे परन्तु इसके परिणाम अच्छे आयेंगे। लोकतंत्र की सबसे निचली इकाई ग्राम पंचायत होती है और पंचायती राज अधिनियम के द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने ग्रामीण स्तर पर स्थित ग्राम पंचायतों को विकास के लिए केन्द्र से भेजे जाने वाले धन का उपयोग करने का जिम्मेदार बताया था। उसके बाद से प्रधानी के चुनाव की अहमियत काफी बढ़ गई है और जो चुनाव बगैर धन खर्चा किए पहले हो जाया करता था वह अब लाखों रूपये में होने लगा है। अब ग्राम प्रधानी के पद पर प्रत्याशियों की होड़ सी मच गई है कारण वही पैसा, परन्तु इस पैसे को खर्च करने के लिए प्रधान का अशिक्षित होना काफी दिक्कते पैदा करता था और इसका लाभ सरकारी प्रशासनिक मशीनरी उठाती थी और प्रधानों को भ्रष्टाचार के जाल में फंसाकर जेल तक यही सरकारी तंत्र के बाबू, पंचायत सेक्रेटरी व अधिकारी पहुंचा देते थे।
इन्ही सब पर विचार करके शायद प्रधान की शिक्षित अनिवार्यता को रखा गया है। इससे जहाँ ग्राम पंचायतों की कार्यक्षमता व गुणवत्ता में सुधार आयेगा वहीं शिक्षा की ओर भी रूचि में इजाफा होगा।
अब यही कदम देश के सबसे बड़े लोकतंत्र के मंदिर लोकसभा व राज्य सभा तथा प्रदेश की विधान सभा व विधान परिषद के सदस्यों के लिए भी उठाना चाहिए और कम से कम स्नातक की शैक्षिक योग्तया अवश्य इनके लिए रखी जानी चाहिए। साथ ही यदि एम0एल0सी0 एम0पी0 के पदों के लिए उम्मीदवारी का दावा करने वालों के चरित्र का सत्यापन भी पुलिस व खुफिया विभाग से करा लिया जाये तो फिर काफी गुणात्मक सुधार हमारे लोकतंत्र के ढांचे में देखने को मिलेगा वरना अपराधियों व देश की धार्मिक सौहार्दता अखण्डता व उसकी अस्मिता के लिए खतरा उत्पन्न करने वाले सांसद व विधायक देश के उच्च पदों पर बैठकर ऐसे कारनामों करते रहेंगे जिसे अक्सर मीडिया कर्मी अपने स्टिंग आप्रेशन से बेनकाब करती रहती है। जब हज यात्रा पर जाने वाले, पत्रकारिता जगत में मान्यता प्राप्त सनद हासिल करने वाले और अपनी सुरक्षा के लिए शस्त्र लाइसेंस या विकास का कार्य करने वाले ठेकेदारों के चरित्र का सत्यापन देश में होता है तो देश के सबसे जिम्मेदार पदों पर बैठने वाले व्यक्तियों की शैक्षिक योग्यता की अनिवार्यता और उनके चरित्र के अच्छे होने का प्रमाण पत्र की आवश्यकता अनिवार्य क्यों नहीं।

मोहम्मद तारिक खान

रविवार, 14 मार्च 2010

धर्म के नाम पर अधर्म के मार्ग पर समाज

धर्म के नाम पर आज परस्पर इंसानों में बढ़ती नफरत की दीवारों ने इंसानियत को दर किनार कर इंसान को हैवान बना डाला है। आज इंसान इंसान के खून का प्यासा है। धर्म के नाम पर अधर्मी काम किये जा रहे हैं। मासूम बच्चों की बलि चढ़ाई जाती है। धार्मिक द्वेष के आवेश में आकर मस्जिद व मंदिर तोड़े जाते हैं तथा धमाके कर के जनहानि पहुंचाई जाती है। धर्म के अनुयाइयों की यह हालत देखकर धर्म के ना मानने वाले सीना फुलाने का अवसर पाकर धार्मिक व्यक्तियों से अपने को बेहतर बताते हैं और अपने पंथ का प्रचार करते नहीं थकते।
पहले इंसान बना या धर्म। इस प्रश्न को विद्वानों के आगे रखा जाये तो अलग अलग विचार आना लाज़मी है क्योंकि हर विद्वान अपने अपने ढंग से अपना तर्क देगा। इस बहस में ना जाकर यदि सीधे यह बात की जाये कि कोई भी धर्म हो वह बना इंसानों के लिए ही है और उसका मुख्य लक्ष्य इंसानियत को बढ़ावा देना है।
परन्तु आज के संसार में सामाजिक परिवेश कि घर जा रहे हैं इंसान पर हैवानियत तारी है। इंसानियत को एक किनारे रख व दूसरे की मदद का सेवाभाव समाप्त हो चला है और सोर अधर्मी काम व धर्म की चादर ओढ़कर कर रहा है। इंसानों का धर्म के नाम पर शोषण एवं दोहन पाखण्डी साधू मोलवी और पादरी करते फिर रहे हैं उनकी अक्ल पर धार्मिक भावनाओं का ऐसा काला पर्दा डाल दिया जाता है कि वह बिल्कुल कुंद हो जाती है।
कोई देवबंदी के नाम पर तो कोई बरेलवी के नाम पर कोई अहले हदीस व 24 नं0 के नाम पर तो कोई शिया सुन्नी के नाम पर तो कोई, सनातन व असनातन के नाम पर कोई आशाराम बापू के नाम पर तो कोई साई के नाम पर तो कोई गायत्री पंथ के नाम पर तो कोई वारसी के नाम पर तो कोई रज्जाकी के नाम पर तो कोई निरंकारी व अकाली के नाम पर कोई कैथोलिक के नाम पर तो कोई प्रोटेस्टेस्ट के नाम पर अपनी धार्मिक विचारधारा की दुकान चला रहा है। मनुष्यों को उपदेश तो धर्म के नाम पर दिये जा रहे हैं परन्तु इंसानों के धार्मिक प्रतिद्वन्दता एवं विद्वेष फैलाने की तालीम दी जा रही है।
नतीजा आज हमारे सामने है। हजारों साल सलीबी जंगे हुई। राम रावण युद्ध हुआ। महाभारत के युद्ध की क्या चर्चा रही। जंगे ओहद, जंगे बद्र, की लडाईयां हुई। इन सभी जंगों के बारे में बताया जाता है कि या धर्म की रक्षा करने वालों व अधार्मियों के मध्य हुई परन्तु इंसान को हैवान बनने से कोई भी बचा न पाया बल्कि अब इंसानों की संख्या घटती जा रही है और हैवानों की बढ़ती जा रही है या यूं कहा जाये तो बेहतर रहेगा कि मनुष्य ने भौतिकता के क्षेत्र में तो उन्नति कर ली परन्तु इंसानियत का पतन हो गया।
पाठक यह पंक्तियाँ पढ़कर अवश्य सोच रहे होंगे कि लेखक या तो औगनोस्टिक है या थैइस्ट परन्तु मुझे इस बात पर गर्व है कि मैं पहले इंसान हूं और बाद में किसी धर्म का अनुयायी। गलती किसी भी धर्म की शिक्षा में नही है गलती उसके अनुयाइयों में है जो अपनी बदनीयती व स्वार्थी प्रवृत्ति के चलते ऐसे कर्म करते रहते हैं जो धर्म के लिए बदनामी का कारण बनते हैं। इतना ही नहीं धर्मालम्बियों ने अपनी स्वार्थी प्रवृत्ति के चलते धर्म के स्वरूप को ही बदल डाला है।

मोहम्मद तारिक खान

बुधवार, 10 मार्च 2010

देश की अस्मिता पर भारी व्यवसायिकता

हाकी के जादूगर मेज़र ध्यानचंद

कुंवर दिग्विजय सिंह

देश के राष्ट्रीय खेल की वर्तमान में क्या दशा है इसका आंकलन वर्तमान में देश की सरजमीं पर चल रही विश्व कप प्रतियोगिता से भली-भांति लगाया जा सकता है जब उसके सातवें स्थान पर आने की आशा पर हांकी संघ के पदाधिकारी व खिलाड़ी गर्व की अनुभूति प्रदर्शित करते दिखलाई दे रहे हैं। हांकी के लिए हमारी सरकार के दिल में क्या जगह है और इसका क्या सम्मान है इसका एक उदहारण यह है कि दिल्ली में आयोजित विश्व कप प्रतियोगिता के प्रसारण अधिकार टेन स्पोर्ट्स चैनल को बेंच दिया गया है जो बड़े घरों की जीनत है।
किसी भी खेल की लोकप्रियता की अलख जगाने के लिए उसके प्रचार प्रसार का महत्वपूर्ण योगदान रहता है और यह गौरव हो और यह पतन की ओर जा रहा हो। जी हाँ हम बात कर रहे हैं अपने राष्ट्रीय खेल हाकी की जिसके स्वर्णिम इतिहास का कीर्तिमान पूरे विश्व में स्थापित करने में हाकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद व कुंवर दिग्विजय सिंह का महत्वपूर्ण योगदान व अथाह परिश्रम रहा है।
वर्ष 1980 के मास्को ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने के पश्चात एक भी ऐसा अवसर नहीं आया जिस पर देशवासी गर्व कर सकें। वह चाहे एशियाई खेल हो या विश्व कप वह चाहे चैंपियंस ट्राफी हो या सैफ खेल । सभी प्रतियोगिताएं में हमारे राष्ट्रीय खेल की प्रतिष्ठा तार-तार होती रही और हमारा हाकी संघ के पदाधिकारी अपनी बदनीयती के कारण एक दूसरे के गिरहबान में ही झांकते रहे। एक पत्रकार आशीष खेतान ने स्टिंग ऑपरेशन कर के हाकी संघ के भीतर फैले भ्रष्टाचार के जाल को सही समय पर चक दे इंडिया नाम की अपनी रिपोर्ट के शीर्षक के माध्यम से उजागर करने का प्रयास किया था बावजूद इसके कोई सुधार हमारी कार्यप्रणाली में नहीं आया और स्तिथि अब यहाँ तक आ पहुंची है की टीम के खिलाड़ी ब्लैक मेलिंग पर उतर आये हैं ।
लोगों के दिलों में खेल के प्रति लोकप्रियता जगाने के लिए एक माहौल मीडिया द्वारा उत्पन्न कराया जाता है और खेल का सजीव प्रसारण इस का सशक्त माध्यम है परन्तु राष्ट्रीय खेल हाकी को इसके गौरवमयी इतिहास की और पुनः वापसी के लिए हमारी सरकार और उसका खेल मंत्रालय जरा सा भी चिंतित नहीं है और न ही हाकी के प्रति युवाओं में अभिरुचि जाग्रत करने के लिए सरकार के पास योजना है ।अन्यथा सरकार व्यावसायिकता की दौड़ में न शामिल होकर राष्ट्रीय खेल हाकी का प्रसारण अधिकार दूरदर्शन के पास ही रखती जिससे हाकी के खेल का व्यापक प्रचार-प्रसार होता ।

मोहम्मद तारिक खान

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

आधुनिक भगवान को सेक्स गिफ्ट

मानव धर्म की सेवा करने वालों के अधर्मी कार्य

मेडिकल कौंसिल आफ इण्डिया द्वारा निर्णय लिया गया है कि अब दवा कम्पनियों द्वारा डाक्टरों को रिश्वत के तौर पर अपनी दवा की सेल प्रमोशन के लिए दिए जाने वाले तोहफों पर रोक लगाई जायेगी।
यह देर से उठाया जाने वाला एक अच्छा कदम है क्योंकि सफेदपोश कहलाए जाने वाले समाज के इस सम्मानित तबके के अंदर व्यवसायिक प्रवृत्ति इस दर्जे तक हो गई थी कि वह अपने धर्म व फर्ज को भूलकर हर समय दवा कम्पनियों के इशारें पर चलने लगा था। दवा कम्पनियों के इशारे पर चलने लगा था। दवा कम्पनियों ने परस्पर पनपती अपनी प्रतिस्पर्धाता के चलते गिरावट के सारे पैमाने तोड़ डाले हैं। डाक्टरों को गिफ्ट देने का सिस्टम तो बहुत पुराना है अब तो इससे भी एक कदम आगे बढ़ते हुए डाक्टरों को उनकी सैर तफरीह व शौक के सभी संसाधन दवा निर्माता मुहैया कराते हैं।
नाम न छापने की शर्त पर एक बड़ी दवा कम्पनी के एक बड़े सेल्स अधिकारी ने बताया कि उनको सेल्स लाइन में ट्रेनिंग देते समय 3 सी फार्मूला बताया जाता है जिसके मुताबिक पहले वह किसी भी डाक्टर को अपनी दवा के बारे में बताकर उसे कन्वेन्स करने का प्रयास करते हैं यदि इस सी के प्रयोग किया जाता है जिसके अंतर्गत डाक्टर को कामर्फिनस किया जाता है, अर्यात उस यह समझाने का प्रयास किया जाता है कि जो दवा उसके पेन पर इसरा किसी कम्पनी की चढ़ी हुई है उससे यह केमिकल र्फामूले में बेहतर है। र्याद यह दोनों सी के र्फामूले काम न आए तो फिर अन्तिम सी र्फामूले का प्रयोग किया जाता है। उसका अर्थ यह है कि डाक्टर को कमपीलीट बनाना यानि उसे भ्रस्टाचार में लित्त कर देना। अब यह भ्रष्टाचार भी कई प्रकार का होजा है। एक भ्रस्टाचार यह है कि डाक्टर को उसके क्लिीनिक या घर उपयोग के आनेवाली वस्तओं को गिफ्ट में उसे मेंटकर के उससे मनमाफिक सेल करवाना। दूसरा प्रकार भ्रष्टाचार का यह होता है कि डाक्टर को साल में एक या दो बार देश या विदेश के किसी शहर में सपरिवार सैर सपाटा कराने का खर्चा उपलब्ध कराना और एक और भ्रष्टाचार अब दवा कंपनियों ने यह अभी चन्द वर्षो से आजमाना प्रारम्भ किया है कि डाक्टर को जिन्दा मांस का तोहफा दिया जाता है यानि सेक्स गिफ्ट। इसी के चलते दवा कम्पनियों ने अब बड़े पैमाने पर अच्छी मोटी पगार देकर सुन्दर लड़कियों की तैनाती कर ली है ताकि डाक्टरों से मर्जी की सेल इनके माध्यम से निकलवायी जा सके।
समाज के इस सफेदपोश तबके को लोग पृथ्वी पर भगवान का दर्जा देते हैं शायद इसलिए कि जीवन बचाने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है परन्तु अपनी डिग्री लेते समय मानवता की सेवा करने की शपथ लेने वाले यह लोग अपनी व्यवसायी प्रवृत्ति व आर्थिक हवस के चलते अपने फर्ज पेशे के धर्म व इंसानियत सभी को भुलाकर केवल दोनों हाथों से धनोपार्जन में जुट जाते हैं।
मेडिकल कौंसिल ने इस ओर कदम बढ़ाकर एक अच्छा काम किया है। सरकार को भी डाक्टरों के रवैये में तबदीली लाने के लिए दवा कम्पनियों पर अपना अंकुश और मजबूत करना चाहिए।

-मोहम्मद तारिक खान

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

दुनिया के बादशाह को मुर्गा लडाने का शौक

पहले जमाने नवाबो व राजा महाराजाओं व बादशाहों को मुर्गों तीतर व बटेरें लडाने का शोक था और इन्हें बडी ही खातिर दारी के साथ पाल पास कर तैयार किया जाता था। आजकाल यही काम संसार में एक छत्र राज करने वाले अमरीका के द्वारा किया जा रहा है और अपने आर्थिक उद्देश्यो के लिए वह बराबर दो राष्ट्रों को पहले पाल पास कर सैन्य साजो सामानों से लैस कर के बाद में व्हाइट हाउस में बैठ कर कम्प्यूटर पर सैटेलाइट के माध्यम से अपने मुर्गो की भिडन्त का नजारा लेकर लुप्त अंदाज होता है।
सोवियत यूनियन के विद्यालय के पश्चात अन्तराष्ट्रीय स्तर पर एक छत्र वर्चस्व स्थापित करने वाले राष्ट्र अमरीका का किरदार इस समय एक शौकीन मिजाज नवाबे राजा या बादशाह सलामत की तरह हैं। पुराने जमाने के बादशाह व नवाब अपने मनोरंजन के लिए मुर्गे तीतर व बटेरें लडाया करते थे और बाकायदा बडे बडे मुकाबले आयोजित किए जाते थे कुछ राजा महाराजा पहलवान पालते थे उनकी खुराक का पूरा खर्चा वह उठाते थो फिर उन्हे लडा कर आनन्द मय होते थे चाहे रूस्तम व सोहराब हों या गामा पहलवान सभी राजा महाराजाओं व बादशाहों के पाले पास थे।
आजकल यही काम विश्व का राजा अमरीका करता दिखलायी दे रहा है। परन्तु यह काम वह अपने मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि अपनी आर्थिक आवश्यकताओं के लिए कर रहा है। कारण यह कि विश्व के सैन्य बाजार में उसकी तूती बोलती है। शस्त्रों के मामले में वह अब विश्व में नम्बर वन है पहले उसको कडा मुकाबला सोवियत यूनियन से करना पडता था परन्तू अस्सी के दशक के अन्त में सोवियत चुनौती देने वाला कोई नही बचा। फ्रांस चीन ब्रिटेन और कुछ हद तक उसका दस्तक पत्र इजराइल सैन्य बाजार में अपनी उपस्थित बनाए तो हुए है। परन्तु अमरीका का वर्चस्व पूरी तरह से इस क्षेत्र में कायम है।
स्पष्ट है कि अपने ग्राहक बनाए रखने के लिए उसे युद्ध का वातावरण को तैयार करना रहता है जो वह खूबी के साथ विगत दो इहाइयों से सफलता पूर्वक करता चला आ रहा है। इससे पूर्व द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद जब अपने प्रतिद्वन्दी जापान व जर्मनी को ठंडा कर देने के बाद अमरीका ने पहले कोरिया में अपने नापाक इरादों का ठिकाना बनाया और लम्बे अर्शे तक कोरिया में उसने अशांति का वातावरण पैदा कर अपने सैन्य कौशल का प्रदर्शन कर शस्त्र बाजार में अपनी धाक जमाई। फिर वियतनाम में उसने अपना दूसरा ठिकाना बनाया और यहां की नए नए शस्त्रों का प्रदर्शन कर उसने अपनी अर्थ व्यवस्था को चमकाया उसे यह कारोबार तब बन्द करना पडता है। जब जनहानि से त्रस्त अमरीकी नागरिक आक्रोशित होकर सडको पर निकल पडते हैं।

-मोहम्मद तारिक खान

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

एक और आतंकी घटना और फिर मुसलमान आतंकी

एक और आतंकी घटना और पिछली घटनाओं की भांति संदेह के घेरे में सर्वप्रथम मुसलमान। नाम मोहसिन चैधरी। मात्र एक घण्टे के अन्दर ए0टी0एस0 मुम्बई ने आतंकी घटना के मोहरे को ढूँढ़ निकाला, जबकि घटना आर0एस0एस0 के गढ़ में हुई, जहाँ मालेगाँव व अन्य विस्फोटों के आरोपी कर्नल पुरोहित ने अभिनव भारत नाम के संगठन का गठन किया था, और जहाँ आचार्य रजनीश का ओशो आश्रम व अन्र्तराष्ट्रीय स्तर पर आतंक के जन्मदाता यहूदी समुदाय का भी प्रार्थना स्थल ‘खबाद’ मौजूद है। अमरीकी खुफिया संगठन सी0आई0ए0 व बाद में आई0एस0आई0 पाकिस्तान से जुड़ा रहा जासूस डेविड कोलीन हेडली का भी इन्हीं स्थानों पर बराबर आना जाना रहा।
पूणे के जर्मन बेकरी रेस्टोरेन्ट में शनिवार की शाम लगभग 7.30 बजे एक धमाका हुआ। पहले पुलिस की ओर से यह समाचार आया कि यह बेकरी के किचन में फटे गैस सिलण्डर के कारण हुआ है, परन्तु बाद में वहाँ पहुँची ए0टी0एस0 व बम निरोधक दस्ते ने जानकारी दी कि एक पीठ पर टाँगने वाले बैग में रखी गई विस्फोटक सामग्री ने इस घटना को अंजाम दिया है, और यह एक आतंकी घटना है। इस घटना में प्रारम्भिक तौर पर जो समाचार प्राप्त हुए हैं, उसके मुताबिक लगभग एक दर्जन व्यक्ति हलाक हो गये और 40 व्यक्ति जख्मी हुए। मरने वालों में एक विदेशी नागरिक भी है जिसकी नागरिकता और उसकी खुद की शिनाख्त होनी अभी बाकी है।
गौरतलब बात यह है कि यह घटना तब घटी जब पूरे महाराष्ट्र में सम्प्रादायिक्ता व अलगाववाद की बात करने वाले संगठनों की थू-थू हो रही थी, और ‘‘माई नेम इज खान’’ के हीरो शाहरूख खान की जय जयकार। यानि धर्म निरपेक्ष ताकतों की फतह और सम्प्रदायिक शक्तियों की शिकस्त। यह घटना पाकिस्तान से होने वाली हमारे देश की वार्ता से मात्र 12 दिन पूर्व हुई है जब पाकिस्तान से वार्ता करने का विरोध हिन्दुवादी संगठन कर रहे थे। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान अपने एजेण्डे यानि कश्मीर के मुद्दे को भी वार्ता में शामिल करने की बात पर अड़ा हुआ था। उसे आतंकवाद के मुद्दे को भी बातचीत में शामिल करने पर एतराज था। यह घटना उस समय घटी है, जब भले ही राजनीतिक आवश्यकता के कारण ही सही, बाटला हाउस एनकाउण्टर पर कांग्रेस की ओर से ही अंगुलियाँ उठने लगी थीं, और जामा मस्जिद दिल्ली के पेश ईमाम अहमद बुखारी भी एक बयान के साथ बयानबाजी के मैदान में कूद पड़े थे।
घटना के मात्र एक घण्टे उपरान्त ही देश की सुरक्षा व खुफिया एजेन्सियों ने घटना के सूत्रधार व उसके संगठन को ढूंढ़ निकाला। इण्डियन मुजाहिदीन व लश्करे तोएबा नाम के आतंकी संगठनों का नाम सामने आया साथ में मोहसिन चैधरी नाम के एक कथित आतंकवादी का फोटो राष्ट्रीय चैनलों पर उभर कर सामने आ गया उसके शेष साथियों की तलाश, और आजमगढ़ से पकड़े गये तथाकथित आतंकवादी शहजाद से उसके तार जोड़ने की कवायद प्रारम्भ हो गई।
घटनास्थल के पास विश्व प्रसिद्ध ओशो आश्रम है जहाँ विदेशी सैलानियों का सिलसिला कायम रहता है फिर यहूदियों का प्रार्थना स्थल खबाद भी यहाँ से चन्द कदम की दूरी पर है। इसके अतिरिक्त सूर्या होटल भी यहीं है, जहाँ अमरीकी-पाकिस्तानी जासूस डेविड हेडली आकर रुकता था। बावजूद इसके शक के दायरे में किसी विदेशी का नाम पहले ए0टी0एस0 की जुबान पर नही आया। स्मरण रहे कि 26/11 की मुम्बई घटना स्थल के पास भी यहूदियों की काॅलोनी नारीमन हाउस थी और यहाँ भी खबाद के रूप में यहूदियों की उपस्थिति।
महाराष्ट्र प्रान्त का यह नगर
पुणे स्वतंत्रता संग्राम से भी पहले से हिन्दूवादी संगठनों का मुख्यालय रहा है और मालेगाँव बम काण्ड के जनक लेफ्टीनेन्ट कर्नल पुरोहित का अपने संगठन अभिनव भारत के कारसेवकों की ‘‘तरबियतगाह’’ भी इसी नगर में रही है। इनमें से किसी का नाम पहले जुबान पर नहीं आया मुसलमान का नाम पहले आया। शायद इस कारण कि राम मंदिर आन्दोलन के नायक भाजपा के वरिष्ठ लीडर लालकृष्ण आडवाणी के शब्दों में Every muslim is not terrorist but, the terrorist who is being caught is aways Muslim .

-मो0तारिक खान

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

महंगाई पर केन्द्र व राज्य सरकारों की तू-तू, मैं-मैं,

मंहगाई के मुददे पर केन्द्र व राज्य सरकारों के बीच वाकयुद्व चल रहा है। एक दूसरे पर मंहगाई को नियंत्रित न करने का आरोप लगाया जा रहा है। राज्यों की गेर कांग्रेसी सरकारों केन्द्र में स्थापित मनमोहन सरकार की आर्थिक नीतियों को बढ़ती महंगाई का दोषी बतला रही है तो मनमोहन सरकार की सहयोगी एन0सी0पी0 के मुखिया व भारत सरकार के कृषि मंत्री शरद पवार की बयानबाजी आग में घी का काम कर रही है। महंगाई की चक्की में पिस केवल गरीब रहा है और उसके लिए हालात बद से बदतर होते चले जा रहे हैं।
कहते हैं कि किसी भी काम की सफलता के पीछे उद्देश्य व नीयत का बहुत योगदान होता है महंगाई के मुद्दे पर फिलहाल ना तो नीयत केन्द्र सरकार की साफ दिखती है ना विपक्षी दलों की और ना प्रान्तों की सरकारों की। हर कोई महंगाई के मुद्दे की गेंद एक दूसरे के पाले में फेंककर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने में जुटा है।
देश की अर्थव्यवस्था कृषि नीति व वाणिज्य व्यापार जिसके तहत आयात एवं निर्यात आता है, पर केन्द्र सरकार का नियंत्रण होता है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर भी नियंत्रण केन्द्र सरकार रखती है राज्य सरकारें केवल केन्द्र द्वारा प्रतिपादित नीतियों पर अमल दरामद करती है और निचले स्तर की प्रशासनिक व्यवस्था देखती है।
वर्ष 1991 में जब से देश में आर्थिक सुधारों की बयार चली तो पहला प्रहार सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर किया गया। उपभोक्ताओं को दो हिस्सों में वोट दिया गया। ए0पी0एल0 एवं बी0पी0एल0 यानि अपर पावर्टी लाइन एवं बेलो पावर्टी लाइन ए0पी0एल0 श्रेणी में देश के सामान्य नागरिकों को रखा गया और उनको मिलने वाला राशन जो सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत उन्हें राशन दुकानदार व जिला आपूर्ति विभाग के रहमोकरम पर आधा परदा मिला करता था, वह एक के बाद एक कर के बंद कर दिया गया अब स्थिति यह है कि केवल मिट्टी का तेल मिलने के हक़दार सामान्य नागरिक रह गये हैं।
लोगों के पास का राशन कार्ड अब केवल उनके निवास की पुष्टि या परिचय मात्र के लिये रह गया है। दूसरी ओर नागरिकों को राशन कार्ड पर अनाज, चीनी, मिट्टी का तेल इत्यादि सभी वस्तुएं दिये जाने का प्रावधान बनाया गया साथ ही अति निर्धन व्यक्तियों को इसी व्यवस्था के तहत अन्त्योदय कार्ड (गुलाबी) के माध्यम से काफी सस्ते दामों पर खाद्य पदार्थों की सप्लाई की जाती है।
परन्तु इन तमाम व्यवस्थाओं पर पूर्ति विभाग का भ्रष्टाचार व राज्य सरकारों की बदनीयती ग्रहण लगाने का काम कर देती है। एक गलती तो केन्द्र सरकार की ओर से पेट्रोल पम्पों व गैस एजेंन्सियों की भांति राशन प्रणाली के कोटेदारों को निर्धारित कम कमीशन और फिर राज्य सरकारों की भ्रष्ट एवं लचर व्यवस्था के चलते खाद्यान्न भण्डारों एवं मिट्टी के तेल डिपों से दुकान तक पहुंचने के बीच के खर्चे व घटतौली से कम होते उनके कमीशन के कारण चोरी व काला बाजारी का धंधा परवान चढ़ता है। पूर्ति विभाग के अधिकारी इसी चोरी व कालाबाजारी का लाभ उठाकर कोटेदारों से प्रतिमाह अपनी हिस्सेदारी लेकर उन्हें बेलगाम बना डालते हैं। जिसका नतीजा यह है कि फर्जी राशन कार्डों की सौगात पूर्ति विभाग की शह पर पाकर कालाबाजारी का धंधा खूब चल निकलता है और आम नागरिकों को वह चाहे ए0पी0एल0 या अन्त्योदय कार्ड धारक राशन की दुकानों को अधिकांश समय बंद पाकर खाली हाथ निराशाजनक हालत में लौटना पड़ता है।
चूंकि खेल बाजार में महंगाई इतनी अधिक नहीं थी तो जनता का काम बगैर राशन दुकानों के भी चल जाता था परन्तु अब कमर तोड़ महंगाई के इस दौर में लोगों को सस्ते गल्ले की सरकारी दुकानों की याद फिर सता रही है। उधर महंगाई के मुंह उठाते दानव से अपना जनाधार खिसकने की आंशका के मद्देनजर एक बार फिर केन्द्र सरकार को ससस्ते गल्ले की व्यवस्था सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुदृढ़ करने की चिंता लग गई है। यही कारण है कि वह बराबर राज्य सरकारों पर दबाव बना नही है कि वह अपने प्रान्त में सार्वजनिक वितरण प्रणाली व्यवस्था को चुस्त दुरूस्त करें।
उधर गरीबों के मुंह से निवाला छीनकर ऐश करने वाले अधिकारियों, गल्ला माफियाओं व कोटेदारों को यह गवारा नही है इतने दिनों से वह इस धंधे पर ठाड जमा कर बैठे थे इतनी आसानी से कहां हराम छूटने वाली। राज्य सरकारों व उनके प्रशासनिक अधिकारियों के भी ऐश इसी पूर्ति विभाग की जिम्मेदारी उसकी गाड़ी का तेल भरवाने की। कोई सरकारी आयोजन हो तो उसकी खान पान की व्यवस्था की जिम्मेदारी भी पूर्ति विभाग के कंधों पर किसी अधिकारी या मंत्री या उसके किसी चमचे या बड़े पत्रकार के घर होने वाले किसी समारोह में भी पूर्ति विभाग किसी न किसी रूप में अपनी भागीदारी निभाता है।
खुले बाजार में जमा खोरी पर नियंत्रण करना राज्य सरकार की जिम्मेदारी में आता है आवश्यक वस्तु अधिनियम नाम का एक हथियार भी राज्य सरकारों के पास जमाखोरों के विरूद्ध कारवाई के लिए मौजूद हैं परन्तु व्यवसईयों के वोट का फ्रिक व चुनावों के दौरान इन्ही व्यापारियों से मिलने वाले फण्ड के चलते सरकारें इनके विरूद्ध कार्यवाई करने से गुरेज करती हैं ऐसे में थोक बाजार व फुटकर बाजार के बीच भी काफी अंतर बना रहता है। कुल मिलाकर राजनीतिक बदनीयती, गलत नीतियों व ऊपर से नीचे तक फैले भ्रष्टाचार के चलते आम जनमानस मंहगाई के बोझ तले दब कर मौत की आगोश में समाया जा रहा है।

मोहम्मद तारिक खान

रविवार, 10 जनवरी 2010

आप मुझे अच्छे लगने लगे

साम्राज्यवादी शक्तियों ने आज देश की राजनीतिक विचारधारा, अर्थव्यवस्था एवं संस्कृति को किस प्रकार अपने काबू में कर रखा है कि जो पार्टी अपने को समाजवादी विचारक डॉक्टर राम मनोहर लोहिया की अनुयायी कहा करती थी वह कार्पोरेट समाजवाद के जाल में फंस कर साम्राज्यवादी प्रवत्ति के गुण दर्शा रही है तो वही बेनी प्रसाद वर्मा जैसे लोग जो अमर सिंह के समाजवादी पार्टी में बढ़ते हस्तक्षेप व अपनी उपेक्षा से छुब्ध होकर पार्टी छोड़ गए थे अब उन्ही अमर सिंह को अपने साथ आने की दावत कांग्रेस में दे रहे हैं और अमर सिंह अब उन्हें अच्छे लगने लगे।

मुलायम सिंह पर समाजवादी विचारधारा का परित्याग कर अमर सिंह के कार्पोरेट समाजवाद के जाल में फंस कर चाल चरित्र बदलने का आरोप उनके पुराने साथी बेनी प्रसाद वर्मा लगा कर पार्टी से अलग हुए थे और कांग्रेस की गोद में बैठ कर उन्होंने मुलायम सिंह की पार्टी समाजवादी को प्रदेश में सत्ता से बाहर कर देने में अहम् भूमिका अदा की थी, आज वही बेनी प्रसाद वर्मा अमर सिंह को कांग्रेस में आने का न्योता दे रहे हैं ।
लोग शायद अनुमान नहीं कर पाए कि बेनी प्रसाद वर्मा ने जब कुरता धोती छोड़ सूट धारण किया तो केवल उनका तन का ढांचा नहीं बदला बल्कि उनके मन के विचारों में भी तब्दीलियाँ आ चुकी थी। जो नेता बाराबंकी में सड़कों पर पैदल चल कर बीड़ी पिया करता था अब वह विदेश निर्मित कारों एवं एयर कंडीशन कमरों में बैठ कर भला समाजवाद की बात कैसे करता ? अमर सिंह से भी समाजवादी पार्टी में उनकी रस्साकशी अपनी इसी बढती महत्वकांछा की प्रवृत्ति के चलते ही रही।
साम्राज्यवादी शक्तियों ने किस प्रकार देश की समाजवादी विचारधारा रखने वाले या आम जनमानस के हितों का विचार रखने वाले राजनितिक दलों को छिन्न-भिन्न करने की योजना बनाई है उसका अनुमान इस बात से भली भांति लगाया जा सकता है कि आंध्र प्रदेश के कांग्रेसी मुख्य मंत्री राज शेखर रेड्डी जिनका प्रदेश को सूचना प्रद्योगिकी में आत्म निर्भरता एवं निपुणता की और ले जाने में बहुमूल्य योगदान था की हेलीकाप्टर दुर्घटना में हुई मौत महज एक हादसा न होकर एक साजिश थी जो रिलायंस इनर्जी एवं ऑयल कंपनी के बोर्ड ऑफ़ ड़ाईरेक्टर के सलाहकार की हैसियत से काम कर रहे एक अमेरिकी ने अंजाम दिलाई थी और जिसका खुलासा रूस के गुप्तचरों ने अभी हाल में किया तो पूरे आन्ध्र प्रदेश में तीव्र प्रदर्शन रिलायंस कंपनी के विरुद्ध हुए।

चूँकि देश में कृषि के व्यवसाय को तहस नहस कर खाद्य पदार्थों में आत्म निर्भरता पर हमला करने की योजना साम्राज्यवादियों ने बना ली थी इसलिए आवश्यक था की समाजवादी विचारधारा का पहले नष्ट किया जाए बेनी प्रसाद वर्मा भी उसी साजिश का शिकार हुए अब वह स्वयं कार्पोरेट समाजवादी बन चुके हैं सो उन्हें अब अमर सिंह अच्छे लगने लगे हैं।

-मो॰ तारिक खान

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

सब कुछ लुटा के होश में आए....


सपा के प्रभावशाली लीडर अमर सिंह ने दुबई में बैठकर पार्टी के सभी महत्वपूर्ण क्रमशः महामंत्री, प्रवक्ता एवं संसदीय बोर्ड की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। उनका यह इस्तीफा ऐसे समय पर आया है जब पार्टी के अन्दर से उनकी कार्यशैली के विरूद्ध बुजुर्ग समाजवादी लीडर ज्ञानेश्वर मिश्रा एवं पार्टी में सबसे समझदार माने जाने वाले डा0 राम गोपाल यादव के विरोध के स्तर फूटने प्रारम्भ हो गये थे और पार्टी मुखिया इस पर खामोश थे।

वर्ष 1993 में आकर पार्टी के ब्राण्ड एम्बेस्डर का रोल निभाने वाले अमर सिंह ने चंद वर्षों के दौरान जिस प्रकार मुलायम सिंह के दिमाग पर अपना बंगाल का काला जादू चढ़ाया था, जहां से उन्होंने कांग्रेसी लीडर सिद्धार्थशंकर राम की छत्रछाया में राजनीति की ए0बी0सी0डी0 सीखी थी, उसके चलते सपा के सबके बाद एक दिग्गज नेता किनारे लगते चले गये। चाहे वह ज्ञानेश्वर मिश्रा हो या डा0 रामगोपाल यादव चाहे वह शफीकुर्रहमान बर्क रहे हों या सलीम शेरवानी, चाहे वह बेनी प्रसाद वर्मा रहे हो या आजम खां या राज बब्बर अन्त में मुलायम का हाल यह हुआ कि सारी खुदाई एक तरफ अमर प्रेम एक तरफ। मुलायम पर अमर सिंह का ऐसा नशा चढ़ा कि वह समाजवाद का पाठ भूलकर साम्राज्यवाद की डगर पर चल पड़े। उनके पुराने दोस्त जो लोहिया के विचारों के थे वह तो किनारे लग गये अनिल अम्बानी, अमिताभ बच्चन, सुब्रतराय जय प्रदा व जया बच्चन के साथ उनकी गलबहिएं बढ़ती गई। परिणाम यह हुआ कि लोहिया का समाजवाद बकौल वयोवृद्ध समाजवादी लीडर मोहन सिंह के वह काॅरपोरेट समाजवाद में तब्दील हो गया। मुलायम के वोट की दौलत लुटती गई और विदेशी बैंकों में उनकी दौलत में भण्डार बढ़ते गये।
मुलायम सिंह की राजनीतिक बैसाखी दो प्रबल वोट बैंकों पर टिकी थी एक यादव दूसरा मुस्लिम जो उन्हें अपना सच्चा और खरा हमदर्द समझती थी और उनकी इसी छवि के कारण संघ परिवार के लोग उन्हें अपना कट्टर दुश्मन मान कर मौलाना मुलायम सिंह भी कहा करते थे।
अमर सिंह ने मुलायम सिंह के चरित्र को ऐसा बदला कि अखाड़े का यह पहलवान जो कभी लंगोट का बेइंतेहा मजबूत माना जाता था, पर बदनामी के कई दाग लगने लगे। कभी फिल्मी तारिकाओं का लेकर तो कभी उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल में उनकी निजी सचिव रही एक महिला आई0ए0एस0 अधिकारी के साथ उनकी करीबी रिश्तों को लेकर। कहते हैं कि जब किसी व्यक्ति का चरित्र कमजोर हो जाता है तो वह आत्मबल से कमजोर होकर नैतिक पतन के अंधकार में चला जाता है। मुलायम के साथ भी ऐसा ही होने लगा। उनके घर में उनकी छवि बिगड़ने लगी। पहली पत्नी की बीमारी और उसके बाद उनका देहान्त फिर उनके पुत्र अखिलेश से उनके रिश्तों में कड़वाहट मुलायम सिंह की मौजूदा पत्नी व अखिलेश के बीच मतभेद के पीछे भी बताते हैं अमर सिंह का ही अहम किरदार शामिल है।
यही तक नहीं मुलायम सिंह के छोटे अनुज शिवपाल यादव, अखिलेश, डिम्पल वगैरह का एक ऐसा गुट अमर सिंह ने तैयार कर दिया कि मुलायम सिंह बिलकुल बेबस होकर अकेले रह गये मुलायम का अपना कोई स्वतंत्र निर्णय न हो पाता उनके ऊपर अमर सिंह का निर्णय ही सदैव हावी रहता। यहाँ तक कि बीते लोकसभा चुनाव में मुसलमानों में नफरत की निगाह से सदैव देखे जाने वाले कल्याण सिंह के साथ हाथ मिलाकर मुलायम ने अपने सबसे वफादार वोट बैंक मुस्लिम में भी हाथ धो लिया और इसी का लाभ उठाकर कांग्रेस ने अपने बरसों पुराने रूठे हुए मुस्लिम वोट बैंक को अपने घर वापसी कराने में सफलता प्राप्त कर ली।
अमर सिंह की ही गलत नीतियों के चलते हपले शफीकुर्रहमान बर्क, सलीम शेरवानी और राजबब्बर जैसे वफादार नेता मुलायम का साथ छोड़कर गये फिर उनके सबसे पुराने साथी बेनी प्रसाद वर्मा व आजम खाँ भी उनसे रूठकर अलग हो गये। यह सभी अमर सिंह के ही घायल रहे और मुलायम के अमर प्रेम के ही चलते उनसे नाराज हुए। बेनी का तो भरपूर इस्तेमाल कांग्रेस ने करके सपा को ठिकाने लगाने के अतिरिक्त उ0प्र0 में अपने दोबारा सत्ता में आने की राह हमवार कर ली। और वह सपने भी संजोने लगी, वही आजम खा की बयानबाजी ने मुस्लिम वोटों को उनसे काफी दूर कर दिया।
अमर सिंह ने मुलायम के हरे भरे राजनीतिक चमन में ऐसी आग लगाई कि उनके घर तक आग जा पहुंची। बताते हैं कि फिरोजाबाद में अखिलेश की पत्नी डिम्पल की हार की दुआ मुलायम की पत्नी कर रही थी तो वही पलटवार करते हुए मुलायम की पत्नी की पसंद के उम्मीदवार बुक्कल नवाब लखनऊ पश्चिम से विधान सभा उपचुनाव जो लालजी टण्डन के सांसद होने के पश्चात सपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे और जीत के करीब पहुंच गये थे कि अमर सिंह ने आकर एक ऐसा भड़काऊ भाषण इमाम हुसैन के हुसैनी लश्कर की तुलना अपने से करते हुए दिया कि बुक्कल नवाब का अपना स्वयं का शिया वोट बैंक उनसे रूठकर छिटक गया और सपा की जीती सीट मौके के ताक में बैठी कांग्रेस के पाले में चली गई। बुक्कल नवाब ने चुनाव बाद स्वयं यह बयान दिया था कि मेरी हार का कारण अमर सिंह है।
समाजवादी पार्टी के दिन प्रतिदिन गिरते राजनीतिक ग्राफ का सीधा लाभ कांग्रेस को हो रहा था जहाँ उसका मुस्लिम वोट जाने को पर तोल रहा था तो वहीं भाजपा के कमजोर होने पर हिन्दू मतों का धु्रवीकरण भी कांग्रेस की ओर होना प्रारम्भ हो गया। उधर विधान सभा का चुनाव होने में मात्र सवा दो साल बचे थे ऐसे में मुलायम सिंह की पार्टी की राजनीतिक भविष्य पर ही प्रश्न उठने खड़े हो गये थे। सपा से बड़े पैमाने पर भगदड़ प्रारम्भ होने के आसार भी साफ दिखने लगे थे सो मुलायम के पास इसके अतिरिक्त कोई चारा नहीं था कि अमर सिंह से छुटटी पा ली जाए। इसीलिए सोंची समझी रणनीति के तहत उन्होंने डा0 रामगोपाल यादव को उन्होंने आगेकर अमर सिंह के विरूद्ध उन्होंने मोर्चा खुलवा दिया वह जानते हैं कि अमर सिंह एक भावुक व्यक्ति हैं वह अपमान सहकर पार्टी में नही रह पायेंगे सो अमर सिंह की प्रतिक्रिया मुलायम की उम्मीदों के करीब आयी हैं। उधर अमर सिंह ने पार्टी की सदस्यता ना छोड़कर इतनी गुंजाइश बाकी बचा ली है कि दोबारा पार्टी में आने की डगर जीवित रहे। मुलायम भी अध्ययन करना चाहते हैं कि अमर सिंह के पार्टी से किनारा करने की खबर पाकर उनके रूठे नेताओं की तरफ से उन्हें क्या संकेत मिलते हैं।
समाजवादी का ऊँट किस करवट बैठेगा यह तो समय बतायेगा फिलहाल अमर सिंह के इस्तीफ से समाजवादी पार्टी के तेजी से होते नुकसान में थोड़ा ठहराव अवश्य आ जायेगा विशेष तौर पर मुस्लिम वोटों के पार्टी से जाते कदम रूक सकते हैं। परन्तु मुलायम सिंह को अपनी पुरानी छवि पाने में लोहे के चने चबाने होंगे क्योंकि सब कुछ लुटाने के बाद वह अब अपने होश में आने की तैयारी कर रहे हैं।

मो॰ तारिक खान

मंगलवार, 5 जनवरी 2010

बेनी प्रसाद का कांग्रेस में भविष्य

आजकल उत्तर प्रदेश में फिर बेनी प्रसाद वर्मा राजनीति की सुर्ख़ियों में हैं। कांग्रेस पार्टी से गोंडा के सांसद बेनी प्रसाद वर्मा ने अपने गृह जनपद बाराबंकी की राजनीति में अपना हस्तक्षेप न सिर्फ जारी रखा है बल्कि कांग्रेसी सांसद पुनिया से उनकी ठन गयी है। कारण स्थानीय निकाय के लिए विधान परिषद् सीट के चुनाव में उनका खुले आम बसपा प्रत्याशी को समर्थन का एलान करना और अपने इस निर्णय में कांग्रेस के राष्ट्रीय महामंत्री एवं प्रदेश प्रभारी दिग्विजय सिंह के नाम को घसीटने पर प्रदेश के कांग्रेसी इतने आग बबूला हो चुके हैं कि उनके निष्कासन की सिफारिश पी.सी.सी सदस्यों की तरफ से कांग्रेस आलाकमान को कर दी गयी है।

समाजवादी तहरीक से पोषित हो कर राजनीति में अपना कदम रखने वाले बेनी वर्मा के राजनीतिक जीवन का आगाज चरण सिंह के लोकदल से हुआ जो अपनी चौधरी चरण सिंह स्टाइल की ऐंठ व बरर के साथ राजनीति में अपनी स्वार्थ की प्रवत्ति के लिए प्रसिद्ध थे। बेनी का फिर साथ हुआ उस मुलायम सिंह से जिन्होंने अपने कर्णधार विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ घात करके समाजवादी पार्टी का गठन वर्ष 1989 में किया। फिर कशीराम के साथ उनका गठबंधन 1992 मनें बाबरी मस्जिद विध्वंश के बाद हुआ परन्तु वह भी मात्र डेढ़ वर्षों में ढेर हो गया।
उसके बाद बेनी प्रसाद वर्मा व मुलायम सिंह के रिश्तों में खटास समाजवादी पार्टी में अमर सिंह की आमद के बाद शुरू हुई जो अंत में 2007 के चुनाव से पूर्व बेनी के पार्टी से बागी होने के बाद पूर्णतया कड़वाहट में बदल गयी। बेनी ने अलग अपने दल का गठन समाजवादी क्रांति दल (एस.के.डी) कर के इंडियन जस्टिस पार्टी के साथ समझौता किया और पूरे प्रदेश में चुनाव लड़े परन्तु उन्हें जबरदस्त विफलता हाथ लगी यहाँ तक कि उनके गृह जनपद बाराबंकी में भी उनका सफाया हो गया उनका पुत्र एवं भूतपूर्व राज्य मंत्री राकेश कुमार वर्मा को भी अपने पिता की कर्म भूमि मसौली से शिकस्त खानी पड़ी।
राजनीति में सब कुछ लुटाने के बाद बेनी प्रसाद ने कांग्रेस की डगर पर आ कर विराम किया और कांग्रेस ने उन्हें सम्मान देते हुए गोंडा से न सिर्फ टिकट दिया बल्कि देवीपाटन की लगभग सात सीटों का टिकट उनकी सलाह ले कर दिया। बेनी वर्मा खुद भी जीते और फैजाबाद बहराइच श्रावस्ती, सुल्तानपुर और महाराजगंज पर कांग्रेस को जीत दिलाई बाराबंकी में 1984 के बाद 25 साल के लम्बे अरसे बाद कांग्रेस को सफलता पुनिया की जीत के तौर पर मिली। इसमें कोई शक नहीं कि यदि बेनी की कुर्मी बिरादरी का समर्थन पुनिया को न होता और एक बड़ा बेस वोट बैंक पुनिया के पास न होता तो फिर पुनिया की सफलता की राह आसान न होती।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सफलता का डंका भले ही बेनी वर्मा के लोग पीटते फिरें परन्तु कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व व प्रदेश कांग्रेस इसे राहुल का करिश्मा मानते हैं और सपा, बसपा व भाजपा से परेशान होकर ऊब चुकी जनता का पुन: कांग्रेस की ओर वापसी मान रहे हैं। उधर बेनी है कि आज भी अपने अड़ियल रवैये पर टिके हैं और उस पार्टी को आँख दिखा रहे हैं जिसके बारे में यह कहा जाता है कि वह राजनीति का महासागर है जिससे अलग होकर सभी दरिया निकले हैं चाहे वह भाजपा हो या समाजवादी, चाहे वह लोकदल हो या डी.ऍम.के , अन्ना डी ऍम.के चाहे वह तृणमूल कांग्रेस हो या राष्ट्रवादी कांग्रेस। यहाँ तक की भारतीय जनसंघ भी कांग्रेस के कोख से पैदा हुई पार्टी है. केवल कम्युनिस्ट पार्टियों को यह गौरव प्राप्त है कि उनका उदय कांग्रेस की कोख से नहीं हुआ।
जहाँ तक कांग्रेस में बेनी वर्मा के भविष्य का प्रश्न है तो वह बहुत उज्जवल नजर नहीं आता क्योंकि बेनी प्रसाद वर्मा की राजनीतिक पृष्टभूमि स्वार्थ की राजनीति और अवसरवादिता की बैसाखी पर टिकी हुई है विचारों के आधार पर कभी भी उनकी समानता कांग्रेसियों से नहीं हो सकती. कांग्रेस ने वर्ष 2007 में यदि बेनी वर्मा के कंधे पर हाथ रखा तो उसका लक्ष्य मुलायम व उनकी पार्टी सपा को कमजोर करना था सो उन्होंने सफलता के साथ वह कारनामा अंजाम दिया। अब चूँकि 2012 का आपरेशन उत्तर प्रदेश का लक्ष्य अभी कांग्रेस को प्राप्त करना है इसलिए बेनी वर्मा के बडबोलेपन को वह बर्दाश्त कर रही है परन्तु अधिक समय तक नहीं।
उधर बेनी वर्मा को भी एस.के.डी के प्रयोग के विफल हो जाने के पश्चात एक राजनीतिक छतरी की आवश्यकता थी सो वह उसके नीचे से आसानी से निकलने वाले नहीं जबतक उन्हें कोई नई छतरी न मिल जाए।

मो॰ तारिक खान

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

अपनी केचुल बदलती भाजपा

लोकसभा चुनाव में चारो खाने कांग्रेस से चित्त होने के पश्चात भाजपा ने अपनी पुरानी केचुल यानी अडवाणी को उतार फेंका है, अब वह पार्टी के लिए कोच की भूमिका निभाएंगे और लोकसभा में अपनी पुरानी प्रतिद्वंदी सोनिया गाँधी से दो-दो हाथ करने सुषमा स्वराज मैदान में उतर रही हैं । साथ ही अडवाणी के चहेते राजनाथ सिंह भी बड़े बे- आबरू होकर अध्यक्ष की कुर्सी से उतारे जा चुके हैं । इस पद पर संघ ने अपनी राईट च्वाइज़ को सुशोभित किया है जिनका बचपन व जवानी दोनों ही संघ के आँगन में बीता है ।
दरअसल संघ ने खूब सोच समझ कर टू टायर व्यवस्था इस बार की है । पार्टी संघ संचालक चलाये और सदन में सुषमा स्वराज कांग्रेस से नाराज दलों को अपनी लच्छेदार बातों से उसी प्रकार रिझा कर लायें जैसे कि पार्टी के अवकाश प्राप्त लीडर अटल बिहारी बाजपेई उदारवादी एवं धर्म निरपेक्ष मुखौटा चढ़ा कर अन्य दलों को साथ मिला कर किया करते थे । ज्ञातव्य रहे की सुषमा स्वराज जय प्रकाश नारायण के आन्दोलन के समय राजनीति में आई थी और नितीश कुमार , लालू यादव, शरद यादव व मुलायम सिंह सभी के साथ वह जनता पार्टी में कंधे से कंधा मिला कर चल चुकी हैं ।

-तारिक खान
loksangharsha.blogspot.com

सोमवार, 7 सितंबर 2009

भारत के विभाजन की सच्चाई से हम कब तक मुँह चुराएँगे?

देश की आजादी के 62 साल बाद भी एक कडुवा सच बराबर उभर कर ना जाने क्यों देश के सामने आ ही जाता है कि देश के विभाजन का जिम्मेदार क्या केवल मुहम्मद अली जिनाह ही थे, जिन्होंने मुसलमानों को बरग़ला कर देश से अलग एक राष्ट्र बनाने के लिए अहम भूमिका अदा की?
दो कौमी नजरिए के बानी कहे जाने वाले अपने-जमाने के दिग्गज कांग्रेसी मुहम्मद अली जिनाह ने किन हालात में पाकिस्तान बनाने की सोंची? और वह कौम जो उनकी वेशभूषा व भाषा से उन्हें कभी भी मुस्लिम लीडर के तौर पर कुबूल नहीं करती थी, आखिर क्या जादू उन्होंने किया कि पूरी कौम उनकी एक आवाज पर अपना घर बार, पूर्वजों की चैखट छोड़कर पलायन करने पर उतारू हो गई?
नब्बे के दशक के प्रारम्भ में जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तो एक शोर सा देश में मचा कि मौलाना आजाद द्वारा लिखित सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘‘इण्डिया विन्स फ्रीडम’’ के वह पृष्ठ जो उन्होंने अपनी मृत्यु के 50 वर्ष बाद खोलने को कहे थे और जो राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित है खोलकर पढ़े जाएं। पहले कांग्रेसी सरकार इसे टालती रही परन्तु जब सदन तक में यह मामला भाजपा व उसके सहयोगी दलों ने जोर-शोर से उठाया तो उन पृष्ठों को खोला गया। पृष्ठ खुलने पर उन शक्तियों को बहुत निराशा हुई जो यह आशा मौलाना आजाद जैसे निर्भीक वक्ता व लेखक से लगाए बैठे थे कि उन्होंने अवश्य देश के विभाजन के अस्ल जिम्मेदारों के बारे में कुछ लिखा होगा। पृष्ठों में मौलाना ने विभाजन के जिम्मेदारों में जिनाह की राजनीतिक अभिलाषाओं पर यदि एक ओर कटाक्ष किया था तो वहीं दूसरी ओर लौह पुरूष सरदार बल्लभ भाई पटेल को भी नहीं बख्शा था।
आजकल फिर यह मुद्दा गर्मा गया है। कारण भाजपा के वरिष्ठ लीडर जसवंत सिंह की पुस्तक ‘‘जिन्ना भारत विभाजन के आइने में’’ के अंदर मुहम्मद अली जिनाह की धर्मनिरपेक्ष छवि का महिमा मण्डन किया जाना और उन्हें उपमहाद्वीप की एक बड़ी राजनीतिक शख्सियत करार देना है। जसवंत सिंह की पुस्तक पर भाजपा से लेकर संघ व कांग्रेसी पंक्तियों से तीखी प्रतिक्रियाएँ आनी शुरू हो गयी हैं। इसी प्रकार भाजपा के एक और वयोवृद्ध लीडर लालकृष्ण आडवाणी जब अपने जन्म स्थान सिंध प्रान्त (पाकिस्तान) गये थे तो वहाँ क़ायदे आजम मुहम्मद अली जिनाह की मजार पर श्रृद्धांजलि देते समय उन्होंने जिनाह के उस भाषण की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी जो आजाद पाकिस्तान की असेम्बली में उन्होंने पाकिस्तान को धर्मनिरपेक्ष पाकिस्तान बनाने की वकालत के लिए दिया था। आडवाणी की जिनाह के प्रति यह प्रशंसा भी उन्हें भारी पड़ी और काफी दिनों तक उन्हें इस बाबत अपनी पार्टी से लेकर पार्टी की पैतृक संस्था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को सफाई देनी पड़ी।
बात चाहे आडवाणी द्वारा कही गई हो या जसवंत सिंह द्वारा, दोनों ने ही सच बात जिनाह के बारे में कही है क्योंकि जिनाह कभी भी अपने व्यक्तित्व के आधार पर मुस्लिम कट्टर पंथी लीडर नहीं कहे जा सकते। उनके अंदर एक जिद्दी व महात्वाकांक्षी राजनेता के गुण अवश्य थे।
देश के विभाजन के अहम पहलुओं पर देश के सुप्रसिद्ध इतिहासकार, गांधी वादी विचारक, समाजसेवी एवं पूर्व राज्यपाल उड़ीसा स्व0 विश्वम्भरनाथ पाण्डेय ने अपनी मृत्यु से कुछ समय पूर्व कोलकाता से प्रकाशित उर्दू दैनिक आजाद-हिन्द को दिये गये साक्षात्कार में भली भांति खुलकर प्रकाश डाला है। प्रस्तुत है उस साक्षात्कार का हिन्दी रूपान्तरणः-
प्रश्न-पाण्डेय जी, आज स्वतंत्रता और विभाजन को आधी शताब्दी बीत चुकी है। आज हमारे सम्मुख जो भारत है क्या स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में इसी भारत की परिकल्पना स्वतंत्रता सेनानियों ने की थी? या स्वतंत्र भारत का कोई अन्य स्वरुप आपके मस्तिष्क में था?
पाण्डेय जी-देखिये! स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में जनता को स्वतंत्र भारत के अनेक रूप उस समय के नेताओं ने दिखलाये थे। पं0 जवाहर लाल नेहरू ने जो रूप भारत की स्वतंत्रता का पेश किया था वह आशा वादी स्वरूप था, जिसमें आशाओं से भरे भारत की परिकल्पना का छाया चित्र था। महात्मा गांधी ने जो रूप स्वतंत्र भारत का जनता के सम्मुख रखा था वह इसके बिल्कुल विपरीत था। उन्होंने जनता को बताया था कि अभी जो स्वतंत्रता हमें मिली है वह मात्र राजनैतिक स्वतंत्रता है। जब तक हमें सामाजिक व आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो जाती, यह स्वतंत्रता लंगड़ी स्वतंत्रता कहलायेगी। दूसरी मुख्य बात जो गाँधी जी ने कही थी वह यह थी कि स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए हमने जो लड़ाई लड़ी थी उसमें हम अपने शत्रु को पहचानते थे, परन्तु सामाजिक व आर्थिक स्वतंत्रता के लिए हमारा संघर्ष अपने देश वासियों के विरूद्ध होगा, और ऐसे छुपे हुए शत्रुओं से संघर्ष करना स्वतंत्रता संग्राम से अधिक कठिन होगा। गांधी जी सामाजिक व आर्थिक स्वतंत्रता के प्रति बहुत अधिक आशा वादी नहीं थे। पं0 नेहरू का स्वतंत्र भारत का स्वरूप,
गांधी जी के विचारों से भिन्न था, जो कि नई उमंगों व आशाओं से भरा हुआ था। पं0 नेहरू का मानना था कि स्वतंत्र भारत का भविष्य बहुत उज्ज्वल होगा और जनता को बहुत कुछ प्राप्त होगा, परन्तु गांधी जी इस बात से सहमत नही थे उनकी दूरदर्शिता भविष्य के संकटों का पूर्वाभास कर रही थी। इसलिए गांधी जी कहा करते थे कि हमें जनता को ऐसे आशावादी स्वतंत्र भारत का सपना नहीं दिखाना चाहिए जो बाद में उसे हम न दे पायें।
प्रश्न-ऐसा कहा जाता है कि मो0 अली जिनाह ने मुस्लिम हितों को ध्यान में रखकर मुसलमानों के लिए
अधिक से अधिक अधिकार व राजनैतिक लाभ अर्जित करने के लिए ‘‘मुस्लिम कार्ड’’ खेला था, परन्तु बाद में ऐसे हालात बन गये कि जिनाह को पाकिस्तान की स्थापना के बारे में गम्भीरता से विचार करना पड़ा ऐसे हालात पैदा करने का दोष कांग्रेस के उस समय के ब्राह्मण वादी राजनैतिक नेताओं पर लगाया जाता है। यह कहाँ तक उचित है?
पाण्डेय जी-जिनाह का यह विचार था कि हम यह आवाज उठा रहे हैं, यह नक्कारखाने में तूती की आवाज के समान होगी, परन्तु जिनाह को पाकिस्तान की स्थापना में जिन शक्तियों से सहायता मिली वह न तो मुस्लिम लीगी थे और न ही पाकिस्तान नवाज। उस समय देश के सभी समाचार पत्रों ने पूरे-पूरे पृष्ठ एक सम्प्रदाय विशेष के विरोध में रंग दिये थे। विरोधी धारणा इतनी बढ़ गयी थी कि जनता को यह बात सच लगने लगी और वह यह सोचने पर मजबूर हो गई कि दो कौमी
विचारधारा में दम है। खुद जिनाह को अपनी बात पर विश्वास नहीं था कि उनकी यह छोटी सी सोच एक विशालकाय आन्दोलन का रूप ले लेगी। परन्तु अचानक पता नहीं क्या हुआ कि पूरी कौम एकदम जाग उठी और पाकिस्तान की स्थापना की सोंच ने जन्म ले लिया। यद्यपि उस समय तक पाकिस्तान का कोई प्रत्यक्ष स्वरूप जनता के सामने नहीं था। जिनाह से कई अवसरों पर यह प्रश्न पूछा गया कि पाकिस्तान के बारे में कुछ तो बतायें। पं0 नेहरू तो अपने स्वतंत्र भारत का स्वरूप पेश कर चुके हैं, आपका पाकिस्तान कैसा होगा? स्वतंत्र पाकिस्तान में अफगानों का भविष्य कैसा होगा? किसानों की स्थिति क्या होगी? इन सभी प्रश्नों का सही उत्तर जिनाह पेश करने में सदैव असमर्थ रहे। वह केवल इतना कहते थे कि इन सभी प्रश्नों का उत्तर पाकिस्तान की स्थापना के उपरान्त तलाश लिया जायेगा। उन्होंने वास्तव में अपनी जनता से कोई वायदा नहीं किया था कि पाकिस्तान का स्वरूप कैसा होगा।
प्रश्न-क्या सर माउन्टवेटेन ने पं0 नेहरू व सरदार पटेल को विभाजन के लिए तैयार कर लिया था?
पाण्डेय जी-जी हाँ यह बात सही है कि पं0 नेहरू और सरदार पटेल को माउन्टवेटेन ने विभाजन के लिए महात्मा गांधी से पहले ही राजी कर लिया था। गांधी जी से तो बाद में बात हुई थी। गांधी जी के राजी होने का कारण यह था कि वह अब और अधिक संघर्ष नहीं करना चाहते थे और वह भी अपने लोगों से।
प्रश्न-जो नेता, उदाहरणार्थ मौलाना अबुल कलाम आजाद व बादशाह खान स्वतंत्रता के समय देश के विभाजन का विरोध कर रहे थे, उनकों गांधी जी के इस वक्तव्य से बहुत ढांढस बँधा था कि देश का विभाजन ‘‘केवल मेरी लाश पर होगा’’ परन्तु बाद में गांधी जी को विभाजन के पक्ष में हथियार डालना क्या इन नेताओं के साथ धोखा नहीं था?
पाण्डेय जी- बादशाह खान के साथ तो धोखा हुआ था और उनको सदैव इस बात की शिकायत भी रही। वह यह कहते नहीं थकते थे कि आपने तो हमको भेड़ियों के आगे छोड़ दिया हमें आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी। पठानों ने देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में जिस प्रकार अपनी कुर्बानियाँ पेश कीं उसका बदला आपने इस प्रकार दिया? बादशाह खान को यदि यह शिकायत हमसे थी तो यह कोई गलत भी नहीं थी। जहाँ तक मौलाना आजाद का प्रश्न है तो उनको भी देश का विभाजन पसन्द नहीं था, परन्तु मौलाना भी इस मामले में एक हद तक ही सीमित रहे, और उनका विभाजन के प्रति विरोध कोई आन्दोलन का रूप न ले सका और ना ही वह स्वयं को किसी संघर्ष का भागीदार ही बना सके।
प्रश्न-क्या कांग्रेस में कोई ऐसी टोली थी जो मुसलमानों को पार्टी में शामिल नहीं देखना चाहती थी? क्या उनमें लाला लाजपतराय, सरदार बल्लभ भाई पटेल और किशन लाल गोखले थे?
पाण्डेयजी-देखियें! ईमानदारी की बात यह है कि जिनाह गोखले को बहुत सम्मान देते थे। हाँ लाला लाजपत राय के सम्बन्ध में यह कह सकते हैं कि उनके विचार हिन्दुत्व के पक्षधर थे। बल्लभ भाई के कोई स्पष्ट विचार इस बाबत कभी सामने नहीं आये। गांधी जी ने अन्तिम दिनों में विभाजन रोकने का अथक प्रयास किया। जब नेतृत्व का मुद्दा तेज होता गया कि स्वतंत्र भारत का नेता कौन होगा-पटेल या नेहरू? उस समय स्थिति यह थी कि नेहरू की संगठन पर उतनी पकड़ नहीं थी जितनी पटेल की, जो संगठन से भली भांति जुड़े हुए थे। यदि ईमानदारी से देखा जाये तो बल्लभ भाई का पलड़ा नेहरू से बहुत भारी पड़ रहा था। नेहरू उनके सामने कहीं टिक नहीं पाते, परन्तु गांधी जी यह बात समझते थे कि पटेल की राजनीति एक कट्टर पंथी व रूढ़िवादी धार्मिक विचारधारा पर केन्द्रित है जो राष्ट्र के लिए आगे चलकर घातक सिद्ध हो सकती है। गंाधी जी को नेतृत्व की इस लड़ाई की कितनी चिंता थी इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि अपनी मृत्यु से मात्र दो घण्टे पूर्व गांधी जी ने सरदार पटेल को बुलाकर उन्हें अच्छी प्रकार समझाबुझाकर उनसे यह वायदा ले लिया था कि वह नेतृत्व पर से अपना अधिकार त्याग कर नेहरू का समर्थन करेंगें। मैं समझता हूँ कि गांधी जी ने देश के लिए चलते-चलते यह एक बहुत बड़ा कार्य किया था। वरना देश की राजनैतिक स्थिति किस प्रकार का रूप लेती इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता।
गांधी जी ने जिनाह हाउस में बल्लभ भाई पटेल, नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद व मौलाना आजाद के सम्मुख यह प्रस्ताव रखा था कि वह लोग सरकार में भागीदार न कर, जूनियर व दूसरी श्रेणी के नेताओं को आगे करें और स्वयं उन्हें बाहर से निर्देशित करें जैसा 1937ई0 में कई राज्यों की प्रदेश सरकारों के गठन के दौरान किया गया था। इसका अभिप्राय यह था कि शासक सत्ता संभालने के बाद चूंकि जनता से दूर हो जाता है। इस प्रकार संगठन में अनुभवी लोगों की उपस्थिति से जनता व सरकार के बीच सामन्जस्य बना रहेगा। परन्तु अफसोस! किसी ने गांधी जी की बात नहीं मानी। तर्क यह दिया गया कि सत्ता संभालने और जनता की समस्याओं के निवारण की सामथ्र्य दूसरी श्रेणी के नेताओं के पास नहीं है। जनता अभी से कठिनाइयों में पड़ जायेगी। यदि यूँ कहा जाये तो ठीक रहेगा कि स्वतंत्रता संग्राम की लम्बी लड़ाई लड़ने के पश्चात
अधिकतर नेता थक चुके थे। वह अब और लड़ाई नहीं लड़ना चाहते थे। सबकी यही धारणा थी कि जो मिलता है वह ले लो। शायद इसी थकन ने उन्हें विभाजन का कडु़वा घूंट भी हलक के नीचे उतारने पर बाध्य कर दिया।
प्रश्न-गांधी जी ने एक समय विभाजन रोकने के उद्देश्य से जिनाह को प्रधानमंत्री पद का निमंत्रण दे डाला था परन्तु कांग्रेसियों ने इस प्रस्ताव का जबरदस्त विरोध किया। गांधी अकेले पड़ गये। यहाँ पर यदि यह कहा जाय तो बेजा न होगा कि गांधी का प्रयोग सत्ता के लोभी कांग्रेसियों ने एक समय तक ही किया अन्तिम निर्णयों में उनको अलग थलक कर दिया गया?
पाण्डेय जी-वास्तव में कांग्रेस कोई ऐसी राजनैतिक पार्टी तो थी नहीं जहाँ क्रमबद्ध नेतृत्व हो, वह एक ऐसी तहरीक थी जो लोगों को एक प्लेट फार्म पर तो ले आयी थी परन्तु विचाराधारा में विभिन्नता उपस्थित थी। गांधी जी हिन्दू मुस्लिम एकता के पक्षधर थे तो कांग्रेस में एक वर्ग ऐसा भी साथ चल रहा था जो 1925 में बनी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचारधारा के आधीन था और वह गांधी जी के विचारों का निरन्तर विरोध करता रहता था और अन्त में इसी वर्ग विशेष के प्रभाव में विभाजन का प्रस्ताव कांग्रेस को पारित करना पड़ा।
प्रश्न-कांग्रेस में स्वयं सेवक का प्रवक्ता कौन था? सरदार पटेल या कोई अन्य नेता?
पाण्डेय जी-सरदार बल्लभ भाई पटेल बड़ी हद तक संघ की आवाज थे, उनके सोंचने की शैली संघ की
विचारधारा से प्रभावित थी। कांग्रेस में पटेल के कद के बराबर अन्य नेता बौने थे। इस सांेच के कुछ नेता इस संसार से जल्दी प्रस्थान कर गये। लाला लाजपतराय 1930ई0 में चल बसे, परन्तु सरदार पटेल अन्तिम दौर तक रहे और स्वतंत्र भारत में 1950 में परलोक सिधारे। यहाँ एक बात और स्पष्ट करता चलूँ कि यदि सरदार पटेल को यह पता होता कि जिनाह एक ऐसी बीमारी से ग्रसित हैं जो उन्हें एक वर्ष से अधिक नहीं जीवित रहने देगी, तो शायद कोई और ही स्वरूप भारत वर्ष का हमारे सम्मुख होता।
प्रश्न-पाण्डेयजी! जिनाह का दो कौमी दृष्टिकोण किस हद तक सफल रहा?
पाण्डेय जी- दो राष्ट्र का दृष्टिकोण कभी भी सफल नहीं हो सका। इसका प्रचार देश के विभाजन के समय बड़ी हद तक हुआ परन्तु ध्यान देने की बात यह है कि दो कौमी नजरिया पाकिस्तानी सरकार ने भी उस समय स्वतंत्रता के हासिल करने के पश्चात नकार दिया (इसका स्पष्ट प्रमाण कायदे आजम जिनाह की पाकिस्तान की स्वतंत्रता के बाद का वह भाषण है जिसमें उन्होंने पाकिस्तान गणराज्य की बात कही जो
धर्मनिरपेक्ष होगा) वास्तव में दो कौमी दृष्टिकोण के पक्षधर यदि एक ओर पाकिस्तान की जमातें इस्लामी व मुस्लिम लीग थी तो दूसरी ओर भारत में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी इस बावत सक्रिय था। गांधी जी का दोनों कौमों का दिल जोड़ने का प्रयास विफल रहा। गांधी जी ने विभाजन के पश्चात ही दोनों कौमों को जोड़ने का असफल प्रयास किया। गांधी जी दोहरी राष्ट्रीयता के पक्षधर हो गये थे। वह चाहते थे कि पाकिस्तान बनने के बाद भी लोग वहाँ जाकर बसें। वह अपने कुछ साथियों के साथ पाकिस्तान जाकरबसना चाहते थे जिसमंे पं0 सुन्दर लाल भी थे परन्तु वह अवसर उन्हंे नसीब न हुआ।
प्रश्न-मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान से जो आशाएं बांध रखी थी क्या वह पूरी हो सकीं?
पाण्डेय जी-यदि आप किसी का दिल तोड़कर कोई काम करें तो कभी सफल नहीं होंगे। पाकिस्तान की उत्पत्ति हजारों लाखों के दिलों को तोड़कर हुई थी जहाँ तक मैं समझता हूँ कि न तो पाकिस्तान ही बन पाया और न ही वहाँ की जनता पाकिस्तानी । आज भी पंजाबी, सिंधी, बल्लोचियों व अफगानियों में पाकिस्तानी बटे हुए हैं। आज उस राष्ट्र में हर किसी की पहचान अलग-अलग है। जो मुस्लिम लीग की आशाओं पर पानी फेरने का सबूत है।
प्रश्न-स्वतंत्र भारत में हिन्दुओं व मुसलमानों को एक दूसरे के समीप लाने में मीडिया और समाचार पत्र अपना जो चरित्र निभा सकते थे क्या उसमें हमें सफलता मिली?
पाण्डेयजी-मीडिया का चरित्र बहुत अच्छा नहीं रहा और समाचार पत्र राष्ट्रीय एकता के विकास में अपना वह योगदान न दे सके, जैसा उन्हें देना चाहिए था। मीडिया पर सामंती शक्तियों का आधिपत्य है। चन्द छोटे-छोटे समाचार पत्र हैं जो धर्म निरपेक्षता व कौमी एकता के लिए कार्य कर रहे हैं, उनकी बात सुनने वालों की संख्या अधिक नहीं है।
प्रश्न-देश के विभाजन के बाद बाबरी मस्जिद कांड हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए क्या सबसे बड़ा धक्का सिद्ध हुआ है?
पाण्डेयजी- मैं ऐसा नहीं मानता। संघीय संस्थाओं ने यदि बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किया तो इसमें सामान्य हिन्दू सम्मिलित नहीं था। इसको साम्प्रदायिक या धार्मिक प्रश्न नहीं बनाया जाना चाहिए। केवल साम्प्रदायिक शक्तियाँ ऐसा चाहती है कि मस्जिद-मन्दिर प्रकरण साम्प्रदायिक व धार्मिक मुद्दे के रूप में सदैव जीवित रहें। आज देश पर सबसे बड़ा संकट साम्प्रदायिकता है। साम्प्रदायिकता के साथ छुआ छूत की राजनीति ने भी देश को आज एक संकीर्ण अवस्था में ला खड़ा किया है। अब कोई भी निर्णय जाति पांति के आधार के अतिरिक्त हो ही नहीं पाता है, जो कि एक खतरनाक संकेत हैं। इसको पूर्णतया समाप्त करना अति आवश्यक है।

-तारिक खान
मोबाइल: 9455804309

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