मंगलवार, 17 मई 2011

नीम के पेड़ की फरियाद मुख्यमंत्री मायावती के नाम



बाराबंकी। हलो हलो ..... बहन जी मैं बाराबंकी से नीम का पेड़ बोल रहा हॅू। आपके सुशासन और कार्यशैली के तमाम किस्से सुन रखा है। आप हर दिल अजीज और बड़ी ही न्याय प्रिय हैं। जिसका कोई नहीं उनकी आप जरूर सुनती है और न्याय भी दिलाती है।
कहने को तो मैं निर्जीव कहा जाता हॅू लेकिन ऐसा नहीं। हमारी सांसों से लोग जीवन पाते है। एक एक पत्ती लोगों को स्वास्थ्य व जीवनदान देती है। धर्मग्रंथ तो दस पुत्रों के बराबर मैं एक हॅू की बात बताते हैं। शायद इसीलिए पेटेंट हुआ। हलो हलो जी कुछ खरखराहट आ रही होगी, आपको शायद इसीलिए साफ नहीं सुनाई नहीं दे रहा होगा। दरअसल मेरे पड़ोस में आरा और कुल्हाड़ी चल रहे हंै। बहन जी मैंने इंसाफ पाने के खातिर आपको फोन लगाया है। किस्मत कुछ अच्छी है कि जहाॅ मैं हॅू बगल में ही एक पी0सी0ओ0 भी है। बहन जी मैं शहर नवाबगंज में जहां नगरपालिका का दफ्तर के पास मो0सत्यप्रेमीनगर स्थित एक पार्क, खेल ग्राउन्ड में पला और बढ़ा हूॅ। खसरा 154 व 204 भूभाग वाले इस पार्क का ले आउट जब पास हुआ था तो यहां जमीन इतनी कीमती नहीं थी। राष्ट्रीय कोआपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी लि0 जिसकी स्थापना स्वतंत्रता श्री सत्यप्रेमी जी ने की थी। उदार हृदय पंडित जी का सानिध्य कहिए कि मैं और मेेरे अन्य साथी जिसमें कई लोग तो यूकेलिप्टस वर्ग थे, कुछ गूलर आदि के बड़े प्रसन्न थे कि जब यहां पार्क बनेगा तो बच्चों की किकारियां भी गूंजेगी। बच्चे बूढ़े सभी यहां आकर शुद्ध वातावरण से लाभांवित होंगे तो हम तो हम लोगों का जीवन कृतार्थ एवं सुफल हो जावेगा। हमारे कई साथी यूकेलिप्टस तो बड़े मोटे हो गए कुछ तो खुशी में इतना बढ़ गए थे कि यहां की सबसे बड़ी बिल्डिंग पायनियर स्कूल 20फिट छोटी पड़ गयी थी। यहां कुछ हमारे साथी तो ऐसे भी विराजमान थे जिनका कोई साथी ही नहीं बचा। पत्रकार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चन्द्र भूषण शुक्ला और उनके परिवार के बच्चे उनकी पीढ़ी के बाद के लोग भी नहीं रहे। अगर पुराने लोग होते तो शायद हमारा आशियाना न उजाड़ा जाता। हमारी स्थापना करने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित चन्द्र भूषण शुक्ल भी नही रहे। आप तो डाॅ0 अम्बेडकर की परम अनुयायी हो हम कमजोर लोगों की व्यथा आपसे अधिक भला कौन जान सकता है। मेरे सभी साथियांे की हत्या की जा चुकी है। सबसे करीबी गूलर भी शनिवार को मेरा साथ छोड़कर जा चुका है। पता नहीं उसकी क्या गति की गयी होगी। वन विभाग द्वारा कोई रास्ता सुझाया गया होता तो मंजिल का पता रहता। आप चाहो तो अपने अधीन वाले वन विभाग के अधिकारियांे से जानकारी ले लो कि उसने हमारे अन्य साथियांे जिन पर भूमाफिया, कथित जनप्रतिनिधि गणबंधन ने आरे व कुल्हाड़ी चलवाए तो उन्होने शमशान तक हमारे साथियांे को ले जाने खातिर परमिट यानि ट्रंाजिट पास तक लेना उचित नहीं समझा। जी बहन जी बात कुछ लम्बी हो जा रही है, तो आपको और भी बहुत कुछ सुनना देखना रहता है। संक्षेप में बताता हॅू इस पार्क की कहानी जहां हमारा जन्म हुआ। हमारी जन्म भूमि है सत्यप्रेमी नगर स्थित वह पार्क जो रेलवे स्टेशन घंटाघर रोड किनारे स्थित है। बीती शताब्दी के मध्य काल में ले आउट पास हुआ था। मेरी देखरेख का जिम्मा सत्यपे्रमी जी वाली सोसाइटी राष्ट्रीय कोआपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी पर था। बाद में इस कालोनी के दोनो पार्को के रखरखाव का जिम्मा नगर पालिका के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया गया था। पुराने लोग जब तक रहे तब तक सब ठीक ठाक रहा।

एक भूमाफिया ने अपना हक जमाने का बार बार प्रयास किया तो सरकारी कागजातों में पार्क खेलकूद मैदान लिखा होने के नाते वह मेरी मातृ भूमि का बाल बांका नहीं कर सका था। नियम के विपरीत एक सोसायटी को सदस्य बनाकर भूमि दी गयी थी सोसायटी मुकदमा पर तुली तो भी कुछ नहीं बिगड़ा। बाराबंकी से मामला लखनऊ वाली कोर्ट में गया था वहां तक सब ठीक रहा। अचानक दोनो सोसाइटी जो आपस के दुश्मन थी। पड़ोसी देश पाकिस्तान की क्रिकेट टीम के खिलाड़ी बन गए। एक धन्नासेठ की तिजोरी खुलते ही दोनों टीमों में फिक्सिंग हो गयी और मेरी मातृभूमि पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। जिस भूमि को बेचा नही जा सकता, कानून जहां गरीबों के घर बनने चाहिए उस इलाके में बाजार बनने जा रही है। हमारा क्या हम लोग तो बाले नहीं सकते लेकिन जो बोल सकते हैं वे दौलत की चमक में अंधे हुए जा रहे है। सच्चाई जानने वाले निगरानीकर्ता आपके मातहत आला अफसर भी हमारी तरह ही गंूगे हो गए हंै न जाने क्यांे। हां हलो हलो, बहन जी मेरी बात पूरी भी नही हुई कि सामने से आरा कुल्हाड़ी समेत दो लोग आते दिखाई दे रहे हैं हो सकता है अगला नम्बर हमारा ही हो। जल्दी बात पूरी कर लेता हॅू। बहन जी सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय का आपका नारा बेमतलब हो गया है। दबंग सुखाय का नारा आपके ही सरकार में एक मंत्री ने यहां लागू किया है। अवैध काम गैर कानूनी क्रियाकलाप पर कोई उंगली न उठाए पार्क पर बाजार बनाने का एग्रीमेंट मंत्री श्री संग्राम सिंह ने खुद ही किया है। एक बात और कहनी है कि एक बाहुबली माफिया सरगना भी इस काम मंे लगा है। जानकर आपको ताजुब होगा कि यह वहीं माफिया है जिसने पिछले स्थानीय चुनाव बेला में आपको बदनाम किया था। कहा था कि चंदा लेकर भी टिकट नहीं दिया इसलिए धन वापसी की बात कही थी। अखबार वालों ने चुटकी लेकर माफिया सरगना की खबरें छापी थी।
मैं इसलिए भी गवाह हूं क्योंकि तब जिला सूचना का दफ्तर मेरे बाजू में ही था।

-महन्त बी0पी0दास

1 टिप्पणी:

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

'नीम के पेंड़' के माध्यम से आपने जनमानस की सारी अंतर्व्यथा को शब्द दे दिया ...